प्रो. बलवंत सिंह राजपूत
वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं पूर्व कुलपति
पर्यावरणीय चेतना प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं विज्ञान का अभिन्न अंग रही है तथा सभी वेदों एवं उपवेदों में अक्षुण्ण स्थाई विकास की युग्मित अवधारणा को स्वीकार किया गया है। ब्रह्माण्ड में कार्यरत प्रकृति की अनंत शक्तियों में परस्पर समन्वय तथा सामंजस्य स्थापित करके सर्ग संचालन हेतु शक्ति संवर्धन करने वाले दिव्य कृत्य का अपर नाम यज्ञ है। प्रकृति के लिए प्रेम, आदर तथा श्रद्धा प्राचीन भारतीय परंपरा रही है जिसका उद्गम वैदिक युग में ही हो गया था। प्रकृति, ब्रह्मांडीय ऊर्जा तथा पर्यावरण के व्यापक महत्व को स्वीकारते हुए वैदिक ऋषियों ने किसी भी कार्य को प्रारंभ करते हुए शांति पाठ एवं स्वस्तिवाचन का निर्देश दिया था।
द्यो शांति अंतरिक्ष शांति पृथ्वीशांति,
रापाशांति औषधियशांति।
वनस्पति शांति: शांति विश्वर्देवा द्या ।
जिसमें द्यौ को सर्वोच्च पिता एवं पृथ्वी को सर्वोच्च माता के रूप में सर्वदा पूजनीय माना गया है। पृथ्वी, सूर्य तथा प्रकृति के माध्यम से परम चेतना के द्वारा जीवन के उद्गम की वैदिक मान्यता है। वेदों में स्पष्ट निर्देश एवं शुभकामनाएं हैं कि अन्न एवं जल को प्रदूषण से मुक्त रखा जाए, वायुमंडल को स्वच्छ एवं स्वास्थ्यवर्धक रखा जाए तथा पृथ्वी को धन के भंडार के रूप में सहेज कर अक्षुण्ण रखा जाए एवं इसकी मृदा को हर प्रकार के प्रदूषण से मुक्त रखा जाए। इन वैदिक निर्देशों में प्रकृति एवं मानव के मध्य सामंजस्य एवं सादर संतुलन समाहित है। प्रकृति के प्रति प्रेम एवं श्रद्धा की ये परंपराएं वैदिक युग में प्रारंभ हुई तथा भारत में मानव सभ्यता के विकास में शीर्ष पर पहुंची। इसके परिणाम स्वरूप यज्ञ, प्रकृति प्रेम एवं पारस्परिक सहिष्णुता तथा समायोजन की परंपराओं के माध्यम से पर्यावरण एवं समाज के मध्य स्थाई सहअस्तित्व एवं स्थाई संतुलन का प्रदूभाव हुवा। इसके कारण आध्यात्मिक साधना एवं बौद्धिक सुग्राहिता के धागे इतनी सहजता से बुने गए कि मानव की सांसारिक स्थूल आवश्यकताएं बहुत समित रखी गई जिनकी पूर्ति प्रकृति द्वारा सहजता से की जाने लगी थी। वैदिक काल में मानव जीवन इतना संयमित एवं संतुलित था कि इसका अधिकतम भाग पारंपरिक रूप से वनों, पर्वतों एवं पवित्र नदियों के तटों पर बिताया जाता था। ब्रह्मचर्य आश्रम में ज्ञानी ऋषियों के आश्रमों में, वानप्रस्थ आश्रम में नदियों के तटों पर धार्मिक स्थानों पर तथा वृद्धावस्था में वनों, पर्वतों एवं पवित्र गुफाओं में जीवन बिताने की परंपरा प्राचीन भारत में विकसित हुई थी। इस से प्रकट होता है कि प्राचीन भारत में मानव जीवन का प्रकृति के साथ कितना गहन सामंजस्य था। इन कारणों से भी उस काल में भारत में संपूर्ण मानव समाज के लिए प्राकृतिक संसाधन प्रेम, आदर और श्रद्धा के केंद्र होते थे।
वेदों में बारंबार निर्देशित किया गया है कि शुद्ध वायु में सांस लो, शुद्ध पानी और शुद्ध दुग्ध का पान करो, शुद्ध अन्न का सेवन करो तथा प्रदूषण रहित मृदा में उपजाए फलों और सब्जियों का भोजन में प्रयोग करो। चांदोग्य उपनिषद में उसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है:
आहारशुद्घो सत्वशुद्धि:
सत्व शुद्धो ध्रुवास्मृति:
स्म्रतिलाभे सर्व ग्रंथिना विप्रमाक्षा।
अर्थात मस्तिष्क शुद्ध भोजन से शुद्ध होता है, मस्तिष्क की पवित्रता से स्मृति प्रबल होती है, तथा इस दिव्य स्मृति से युक्त होने पर सभी बंधनो से मुक्ति हो जाती है।
इन सभी वैदिक शिक्षाओं में जल, वायु, मृदा, ऊर्जा तथा आकाश (सभी पंचभूत), मस्तिष्क, विचार, स्मृति, बुद्धि,एवं चेतना (सभी पांच सूक्ष्म तत्व) तथा सभी पांच तन्मात्राओं (रूप, गंध, रस,स्पर्श एवं शब्द) सभी को प्रत्येक प्रकार के प्रदूषण से पूर्णत: मुक्त रखने के निर्देश दिए गए हैं।
वैदिक साहित्य में मानव जीवन को उन्नत बनाने हेतु वैदिक यज्ञ परिपाटी को पूर्ण निष्ठा से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं। वेदों के अनुसार मानव के उच्चतम विकास एवं उन्नति का मार्ग यज्ञमय जीवन है। यज्ञ के द्वारा प्रकृति की अनंत शक्तियों के मध्य सामंजस्य एवं संतुलन स्थापित करके ब्रह्मांडीय ऊर्जा को विस्तारित एवं संतुलित किया जाता है। यज्ञ के इस दैविक प्रभाव की अनुभूति वैदिक ऋषियों ने की थी। इस ब्रह्मांडीय प्रदुर्भाव को ही यज्ञ कहते हैं। यजुर्वेद में यह यज्ञ प्रक्रिया विस्तार से कई अध्यायों में 1975 मंत्रों द्वारा वर्णित है। अन्य वेदों, उपवेदो, छ: वैदिक दर्शनों तथा चार अवैदिक दर्शनों और सभी पुराणों एवं अन्य सदग्रंथों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का विस्तार से वर्णन मिलता है। इनमें राष्ट्र को एक सुदृढ़ सुरक्षित राजनैतिक सूत्र में बांधने हेतु किए गए अश्वमेध यज्ञों का विशेष उल्लेख मिलता है। जैसे चक्रवर्ती नरेश मान्धाता, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र, सत्यवादी नरेश युधिष्ठिर तथा सम्राट विक्रमादित्य द्वारा राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञ करके क्रमश: मान्धाता-संवत, राम-संवत, युधिष्टिर संवत और विक्रमी- संवत चलाया जाना। इसके अतिरिक्त कई बहुत महत्वपूर्ण एतिहासिक विशिष्ट व्यक्तिगत यज्ञों का भी विस्तृत उल्लेख विभिन्न शास्त्रों में मिलता है जैसे त्रेता में अयोध्या नरेश दशरथ द्वारा पुत्र -प्राप्ति यज्ञ द्वारा श्री राम सहित चार पुत्रों की प्राप्ति करना, द्वापर में अग्नि-यज्ञ द्वारा याज्ञ- सैनि पुत्री द्रौपदी को प्राप्त करना, हस्तिनापुर नरेश जन्मेजय द्वारा नाग-यज्ञ करके अपने पिता सम्राट परीक्षित की सर्पदश से हुई मृत्यु का प्रतिशोध लेना आदि।
यज्ञ का व्यापक रूप प्राकृतिक शक्तियों को सशक्त तथा संतुलित करके प्राणी मात्र का कल्याण है। प्रकृति की दिव्य शक्तियां जिन्हें यज्ञ द्वारा सशक्त एवं संतुलित किया जाता है। वे हमारे पर्यावरण के विभिन्न महत्वपूर्ण घटक हैं। जो हैं: वरुण, मरुत, अग्नि,भूमि,तथा आकाश जिन्हे हर प्रकार के प्रदूषण से मुक्त रखा जाता है। यज्ञ के अग्निहोत्र की अग्नि तथा यज्ञ में शुद्ध रूप से उच्चारित मंत्रों के स्पंदन संपूर्ण वायुमंडल एवं अंतरिक्ष को ऊर्जित कर देते है जिससे सभी जंतुओं एवं वनस्पतियों को जीवन बल प्राप्त होता है। ये सभी मंत्र वेदों में उल्लेखित हैं। यज्ञ में वेदमंत्रो के लययुक्त उच्चारण आकाश तत्व एवं उसके गुण शब्द को ऊर्जा एवं संतुलन भी प्रदान करते हैं। इन वैदिक मंत्रों के उच्चारण में लय और स्वर का बहुत महत्व होता है जैसा कि अत्रे ब्राह्मण( 4/1/23) में उल्लेखित है कि सुस्वर एवं उत्तम लय के साथ ये मंत्र औषधि के तुल्य है और टूटी लय एवं भंजित स्वर में ये वज्र के समान दुखदाई हो जाता है। वैदिक यज्ञ (वैदिक मंत्रों के लय युक्त सुस्वर उच्चारण के साथ किया गया यज्ञ) को परिस्तिथिकी (इकोलॉजी) चक्र के रूप में समझा जा सकता है जिससे प्रकृति में संतुलन स्थापित होता है तथा समय पर वर्षा होती है। जैसे कि शुक्ल यजुर्वेद (22/22) में वर्षा हेतु निम्नांकित मंत्र उल्लेखित है कि वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ यज्ञ की अग्नि में क्रम बद्ध आहुतियां सूर्य को प्राप्त होती हंै जिनसे वर्षा होती है और जिसके परिणाम स्वरूप अन्न उत्पन्न होता है जिससे जीवन चलता है।
इसका अर्थ है कि मंत्रोच्चारण के साथ किया गया यज्ञ विश्व में सर्वश्रेष्ठ कर्म है जैसा कि शतपथ ब्राह्मण (5/3/5) में कहा गया है कि यज्ञ में शुद्ध रूप से उच्चारित वैदिक मंत्रों के स्पंदन सभी जीवों (जंतुओं एवं वनस्पतियों) को ऊर्जित करते हैं तथा सभी प्राकृतिक शक्तियों को संतुलित करते हैं। हिंदुओं में बचपन से लेकर मृत्यु तक सारे संस्कारों में वैदिक मंत्रों का लय युक्त शुद्ध उच्चारण करके दिव्य शक्तियों की पूजा की जाती है जिससे सभी का कल्याण होता है।
यज्ञ वास्तव मे एक प्रकार का विज्ञानमय विधान है जिससे मनुष्य का भौतिक तथा आध्यात्मिक उत्कर्ष होता है। यज्ञ में जो आहुतियां दी जाती हैं उनसे और वेद मन्त्रों के प्रभाव से यज्ञ में भाग लेने वाले व्यक्ति पर और परिसर के वायुमंडल पर विशेष परिणाम होता है। पाप और ताप का नाश होता है जो कि कर्म जनित रोगों का हेतु है। इस से मनुष्य को शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य लाभ होता है। अग्निहोत्र यज्ञ में ऋतु के अनुसार अलग अलग पदार्थों से निर्मित सामग्री की आहुतियां दी जाती हैं।
इनमें वाष्प तत्व 200 से 400 अंश सेल्सियस तापमान तक उड़ जाते हैं तथा वायु में मिलकर दूर-दूर तक फैल जाते हैं। ये अति सूक्ष्म कण अनेक शारीरिक व्याधियों को दूर करते हैं यज्ञ से ना केवल वायु शुद्ध होती है बल्कि उसके संपर्क में आकर जल और फिर मृदा भी शुद्ध होती है। यज्ञ भस्म भी एक अनुपम उर्वरक होता है।
शास्त्रों में वर्णित बाह्य धार्मिक अनुष्ठान के रूप में यज्ञ का एक रूप वह समारोह है जिसमें घी और अन्य आहुतियां जैसे धूप, अन्न और पुष्प विशिष्ट मंत्रों के साथ विशिष्ट कार्य की सिद्धि हेतु पवित्र अग्नि में अर्पित किए जाते हैं। इसका बहुत व्यापक वैज्ञानिक महत्व है परंतु इसमें निहित क्रियाओं के प्रतीक अर्थ को समझे बिना ऐसे अनुष्ठानों का कोई अध्यात्मिक मूल्य नहीं है। यज्ञ के प्रतीक महत्व का ज्ञान, श्रद्धा के साथ अनुष्ठान करते समय, मन में पवित्रता उत्पन्न करता है। अग्नि में घी अर्पित करना मनुष्य के शुद्ध मन को ब्रह्मांडीय चेतना के साथ जोड़ता है। पुष्प अर्पण शुद्ध जीवन शक्ति का प्रतीक है। जो योगी अपने मन और इच्छा को इन्द्रिय मोह से हटा लेता है, वह उन्हें ब्रह्मांडीय चेतना-यज्ञ की अग्नि में ईंधन के रूप में अर्पित करता है तब उसकी सभी सांसारिक इच्छायें ज्ञान की पवित्र अग्नि में भस्म हो जाती हैं। जब कोई आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है तब उसका सारा जीवन ज्ञान-यज्ञ बन जाता है जिसमें ब्रह्म की अग्नि में आत्मा द्वारा ही आहुति दी जाती है। ये यज्ञ सर्वोच्च यज्ञ कहा जाता है।





