राजीव रंजन
एनएचपीसी में इंजीनियर तथा प्रसिद्ध लेखक
जब हम वेदों में युद्ध के संदर्भ देखने का यत्न करते हैं तो तर्क उत्पन्न होता है कि क्या यह संभव भी है? सूक्ष्मता से समझें तो ‘वेद’ शब्द संस्कृत भाषा के विद् शब्द से बना है, जिसका अर्थ है – ‘ज्ञान’। चूंकि वेद सनातन धर्म का आधार हैं, हमें यह भी मानना चाहिए कि वेद अनादि हैं, वे ‘नित्यं’ अर्थात् अविनाशी हैं, वे असीमित भी हैं – ‘अनंत वै वेद:’। इसके साथ ही किसी के द्वारा रचे नहीं गए हैं। इन उपमानों के साथ भी हम यह पाते हैं कि वेद इन्द्र को सबसे शक्तिशाली देवता निरूपित करते हैं। जब शक्ति का उल्लेख हो तो उसके प्रदर्शन-अनुमापन के बिना संभव नहीं। ऐसी दृष्टि से हमें वेदों का अवलोकन करना होगा जहाँ हमें शक्ति प्रदर्शन या कि संघर्ष के संबंध में दृष्टांत प्राप्त होते हैं।
सर्वप्रथम ऋग्वेद के नदी सूक्त से यह उद्धरण ले रहा हूँ कि “इन्द्रोअस्माँइरदवज्राहुरपाहन्वृत्रं परिधिंनदीनाम्” अर्थात् वह इन्द्र ही है जिसने सबसे पहले नदियों के मार्गों का निर्माण किया और वर्षा को अवरुद्ध करने वाले वृत्र नामक राक्षस का संहार करके नदियों में जल की धारा को प्रवाहित किया। क्या यह युद्ध की ओर इशारा है? इस उदाहरण को बिम्ब माना जा सकता था लेकिन हम पाते हैं कि ऋग्वेद में अनेक बार उल्लेख है कि इन्द्र द्वारा वृत्र का संहार करके जल को मुक्त कराया गया –
”अपांबिलमपिहितंयदासीद्वृत्रंजघन्वाँअपतद्ववार”
संदर्भ को टटोलने पर ज्ञात होता है कि ”नदं न भिन्नममुयाशयानंमनोरुहाणा अति यन्त्याप:। याश्चिद्वृत्रेमहिनापर्यतिष्ठत्तासामहि:पत्सुत:शार्बभूवज्” जो स्पष्ट करता है कि वृत्र ने पर्वतों के मध्य जल के अनेक स्रोतों को अवरुद्ध कर रखा था, याकि बांध बना कर पानी रोक लिया था, इसलिए इन्द्र ने उसका वध करके बांधों से पानी को बहा दिया। यहाँ स्पष्टत: संघर्ष और उसके कारण विद्यमान है। इसी तरह इन्द्र और देवताओं के शत्रु पाणि के संघर्ष का भी रोचक उल्लेख हमें वेदों में मिल जाता है।
इस क्रम में ऋग्वेद के सातवें मंडल में दाशराज्ञ युद्ध का वर्णन मिलता है।
”एवन्नुकंदाशराज्ञेसुदासंप्रावदिंद्रोब्रम्हणा वो वशिष्ठा:” अर्थात् दाशराज्ञ युद्ध में वशिष्ठ पुत्रों के मंत्रबल से इंद्र ने भारतों के राजा सुदास की रक्षा की थी। पाँच महान नदियों का वह क्षेत्र जो अब भारत और पाकिस्तान के मध्य बट गया है एक दौर में सभ्यताओं के उन्नयन और विकास का केंद्र बिंदु था। बात लगभग नौ हजार वर्ष पुरानी है, इन सदानीरा सरिता समूहों के किनारे तुत्सु राज्य की उपस्थिति थी। इस उपजाऊ और समृद्ध राज्य पर राजा सुदास का आधिपत्य हुआ करता था। कौन थे राजा सुदास, यह जानने के लिए आरम्भिक आर्यजन के उल्लेख को ऋग्वेद के पहले मण्डल की इस ऋचा से समझना चाहिये –
”यदिन्द्राग्नियदुषुतुर्वशेषुयदद्रुह्युण्वनुषुपुरुषुस्थ।
अत: परिवृषणावाहियातमथासोमस्यपिवतंसुतस्य”
अर्थात इंद्र और अग्नि यदि तुम यदुओं, तुर्वशों, द्रुह्युओं, अनुओं और पुरुओं में रहते हो तो भी आओ और छाने गये सोमरस का पान करो। इस ऋचा के माध्यम से पुरु, यदु, तुर्वश, द्रुह्यु और अनु आर्य जन की जानकारी मिलती है। पुरु जन परुष्णी अथवा रावी नदी के किनारे आवस्थ थे, इनकी तीन अन्य शाखायें भरत, तृत्सु और कुशिक नाम से जानी गयीं। पुरुओं से पृथक हो कर भरतों ने अपने आधिपत्य क्षेत्र का निर्माण किया। भरतों के अंतर्गत बध्रयश्व,दिवोदास और उनके पश्चात सुदास क्रमिकता से राजा हुए। दिवोदास के दो पुत्रों ज्येष्ठ पुत्र प्रतर्दन और कनिष्ठ सुदास के मध्य राजा बनने को ले कर विवाद हुआ था। वसिष्ठ के सहयोग से सुदास राजा बने। भारतों का नेतृत्व कर रहे राजा सुदास निश्चय ही प्रभावशाली रहे होंगे साथ ही उपजाऊ भूमि के आधिपत्य में होने के कारण उनके शत्रुओं की भी कमी न रही होगी। यदि वे शक्तिशाली न होते तो दस राजाओं के संगठन को एक साथ आ कर सुदास के विरुद्ध मोर्चाबंदी करने की आवश्यकता न होती।
कोई भी युद्ध अकारण नहीं होता, दसराज्ञ संघर्ष के भी अनेक कारण माने जाते हैं। पहला कारण तो उपजाऊ भूमि के अतिरिक्त नदी जल पर अधिकार करने की आवश्यकता थी। दूसरा कारण विचारधारा परक जान पड़ता है। चूंकि एक ओर राजा सुदास, जो राजतंत्र के प्रतिनिधि थे, जबकि उनके प्रतिपक्ष में लामबंद होते समूह गणतंत्रात्मक शासन पद्धति के प्रतिपालक थे। इसके अतिरिक्त उस कालखण्ड के दो प्रभावशाली पुरोहितों विश्वामित्र तथा वशिष्ठ का आपसी वैमनस्य भी इस महायुद्ध का एक कारण माना जाता है। युद्ध का क्या परिणाम हुआ यह जानने से पूर्व आक्रांताओं के विषय में भी जानकारी होनी चाहिये। दसराज्ञ युद्ध इसलिये कि एक ओर राजा सुदास और दूसरी ओर तत्कालीन दस प्रमुख समूह – अनु, द्रुह्यु, यदु, तुर्वसु, पुरु, अलिन, पक्थ, भलानस्, शिव और विषाणिन। युद्ध को परुष्णी अथवा रावी नदी के तट पर लड़ा गया था।

विश्वामित्र की रणनीति के साथ पुरु समूह के नेतृत्व में दस राजाओं की शक्ति अधिक व संख्या अधिक थी। इसलिए ऋग्वेद कहता है – ”परिच्छिन्ना भरता अर्भकास:” अर्थात् सम्मिलित दस राजाओं की संख्या के आगे भारत समूह सीमित थे, चारों ओर से घेर लिये गये। विवरणों के अनुरूप इस युद्ध में पैदल सेना तो थी ही, ऐसे रथों का भी प्रयोग हुआ जिसमें योद्धा के साथ सारथी भी सम्मिलित थे। पुरुषणी नदी के तट पर दस राजाओं की सम्मिलित सेना अभी व्यूह रचना और आक्रमण के विषय में विमर्श कर ही रही थी कि सुदास ने प्रथमाक्रमण कर सभी को हैरत में डाल दिया। दस राजाओं के सामने वाणों की वर्षा थी और पीछे बहती हुई विकराल नदी। पुरुओं के अधिपति युद्धभूमि में काम आये, अणु और प्रदय समूहों के राजा नदी प्रवाह में बह गये, सेना में अव्यवस्था मच गयी और सुदास का नियंत्रण युद्धभूमि पर स्थापित हो गया था। ऋग्वेद के अनुसार सुदास की विजय में इंद्र की भूमिका सहायक की रही है। दस राजाओं के समूह से आक्रांता हुए साठ हजार से अधिक सैनिक मारे गये। विश्वामित्र भूमिगत हो गये, इस तरह भारतों का उत्तर भारत के एक बड़े भूभाग पर विस्तार और अधिकार हो गया था।
वेदों में युद्ध के ये केवल सीमित उदाहरण नहीं हैं। युद्ध विषय पर अथर्ववेद में अधिक विस्तार है, वहाँ राजा का वर्णन है, सैनिकों का उल्लेख है, युद्ध कला पर विमर्श है।
वेदों में वर्णित युद्ध की अवधारणा कैसी थी, हथियार कैसे थे, संचालन किस प्रकार से होता था, इस पर भी एक संक्षिप्त दृष्टि डालते हैं। उन समयों में युद्ध मुख्य रूप से मवेशियों पर अधिकार पाने (अथर्ववेद) या मवेशी चोरों को दंडित करने अथवा चुराए गए मवेशियों को वापस पाने के लिए (ऋग्वेद) आदि के लिए हुआ करते थे। शनै:—शनै: युद्ध कृषि भूमि पर एकाधिकार के लिए भी संचालित होने लगे। ऋग्वेद के अंतर्गत अनेक उल्लेख प्राप्त होते हैं कि युद्ध के लिए सेना की सज्जा महत्वपूर्ण थी, जिसमें ध्वजा अथवा पताका की भूमिका हुआ करती थी। किसी अभियान के लिए बढ़ती सेना के आगे उनका ध्वज चला करता था। युद्ध में पताका का कटना भी पराजय के चिन्हों में जबकि झुका दिया जाना समर्पण के रूप में देखा जाता था। ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर उल्लेख है कि वास्तविक सैन्य संघर्ष से पूर्व युद्ध वाद्य बजाए जाते थे। वाद्य यंत्र दुंदुभि का इसमें अनिवार्य रूप से प्रयोग होता था जिसे युद्ध पूर्व युद्धोद्घोषणा व युद्ध में सफलता के उपरांत विजयोत्सव के लिए बजाया जाता था।
युद्ध की स्थिति में सारथी कुशलता से रथ को चलाता व योद्धा को बचाता हुआ युद्ध में अपने दायित्व का निर्वहन करता था। भालों और धनुषों से लैस रथ रक्षक होते थे। सैनिक अच्छी तरह से सिले हुए कवच पहनते थे। योद्धा धातु के कवच पहनते थे और धनुर्धारियों के पास बाहु-रक्षक भी होते थे। मुख्य रूप से सिर की सुरक्षा के लिए बिल्म और धड़ के लिए द्रापी का प्रयोग होता था (ऋग्वेद)। वरूठ(ढाल) का प्रतिरक्षात्मक हथियार के रूप में प्रयोग होता था (अथर्ववेद)। युद्ध में पशुबल का प्रयोग होता था जिसमें हाथी की भूमिका बड़ी थी। यही कारण है कि सेना के साथ पशु चिकित्सा का ज्ञान रखने वाले भी सम्मिलित होते थे। अथर्ववेद के अनुसार सेना में सम्मिलित पशुओं के व्यवहार की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञ हाथी को वश में करने में भी अपनी भूमिका निभाते थे। वेदों में तीर बनाने वाले, धनुष बनाने वाले और धनुष की डोरी बनाने वाले के व्यवसायों का उल्लेख है, जिन्हें क्रमश: इशुकार, धनुष्कार और ज्याकार कहा जाता था।ऋग्वेद में स्पाश अथवा गुप्तचर का भी उल्लेख है जिनकी युद्ध में शत्रु सेना से संबंधित जानकारी जुटाने में बड़ी भूमिका हुआ करती थी। योद्धा मंत्रों की शक्ति में विश्वास करते थे तथा अपने अस्त्रों शस्त्रों के संचालन के साथ उनका भी अनुप्रयोग अवश्य करते थे।
युद्ध में जिन तरह के हथियारों का उल्लेख मिलता है विविधता है। धनुष सबसे प्रभावी हथियार था। तीर की डोरी कान तक खींचकर ही छोड़ा जाता था। बाणों में पंख होते थे और उनकी नोक में लोहा या सींग होता था। विषैले बाणों का भी इस्तेमाल किया जाता था। पत्थरों (ऋग्वेद) तक का उपयोग होता था साथ ही अनेक अन्य अस्त्रों-शस्त्रों जिनमें गोफन, हेति, सायक, गदा, मत्य आदि के संबंध में जानकारी मिलती है। अनेक स्थानों पर पवि का उल्लेख है, जो संभवत: भाला जैसा हथियार हो सकता है। चूंकि इसे दुश्मन पर फेंका जाता था। इन्द्र के द्वारा कार्पण, चक्र, तीर व श्रक संचालन के संबंध में भी जानकारी मिल जाती है। इसी तरह शक्ति ऐसा अस्त्र जान पड़ता है जो किसी अंकुश से जुड़ा हुआ था। आरा (ऋग्वेद) पशुपालक देवता पूषन का विशिष्ट हथियार नुकीली धातु की नोक वाला एक अंकुश था। परशु का उपयोग भी युद्ध के लिए किए जाने के स्थान—स्थान पर उल्लेख मिलते हैं। स्वाधिति किसी कुल्हाड़ी जैसा हथियार होगा जिसे लकड़ी काटने के लिए तो प्रयोग में लाया ही जाता था (ऋग्वेद) इसका युद्ध में प्रयोग इन्द्र द्वारा किए जाने के उल्लेख मिलते हैं। इसी क्रम में अनेक स्थानों पर पाश के युद्ध में प्रयोग की जानकारी मिलती है जिसका उपयोग घुड़सवार योद्धाओं द्वारा दुश्मनों को पकडऩे के लिए किया जाता था।
सभ्यताओं के आगे बढऩे और स्थायित्व को प्राप्त करने में युद्धों की अपनी भूमिका रही है। अत: हमें वेदों से अनेक उदाहरण उपलब्ध हो जाते हैं। समयपर्यंत युद्ध आधुनिक हो गए, हथियार अधिक घातक हो गए, उद्देश्यों में विविधता आने लगी तब भी इतिहास के आरंभिक युद्धों और उनकी शैलियों के अभिज्ञान के लिए वैदिक संदर्भ बड़ी भूमिका निर्वाहित करते हैं।





