वेदों में आयुर्वेद

वैद्य योगेश कुमार पांडेय  
एसोसिएट प्रोफेसर, काय चिकित्सा विभाग, सी.बी.पी. आयुर्वेद चरक संस्थान, नजफगढ़, नई दिल्ली

आयुर्वेद के ग्रंथों में ज्वर नाम की जिस व्याधि को प्रमुख व्याधि के रूप में वर्णित किया गया है उसका वर्णन अथर्ववेद में ‘तक्मा’ शब्द से किया गया है, जिसका अर्थ है जीवन को कष्ट देने वाला। आयुर्वेद ग्रंथों की भांति वेदों में भी इसका हेतु अग्निमांद्य को स्वीकार किया गया है । जठराग्नि को आमशयाग्नि के नाम से सम्बोधित किया गया है। ज्वर के लिए 20 से अधिक पर्याय शब्दों का प्रयोग वेदों में किया गया है। निदान के आधार पर ज्वर के भेदों का भी वर्णन किया गया है। ऋतुओं के अनुसार ज्वरों का वर्गीकरण करते हुए ग्रैष्मिक (ग्रीष्म ऋतु में होने वाला) वार्षिक (वर्षा ऋतु में होने वाला) और शरद (शरद ऋतु में होने वाला) इस प्रकार ज्वरों का वर्णन किया गया है। नैदानिक कारणों में मेघ से उत्पन्न होने वाले ज्वरों के लिए अभ्र और वात से उत्पन्न होने वाले ज्वारों के लिए वातज शब्द का प्रयोग किया गया है। एकान्तर, द्वंतर, और त्र्यन्तर होने वाले ज्वारों को आयुर्वेद ग्रंथों की भांति ही विषम ज्वर की संज्ञा दी गई है। मलेरिया नामक ज्वर का वर्णन विश्व-शारद नाम से प्राप्त होता है। ज्वर के उपद्रव के रूप में शैथिल्य, पर्वभेद, शिरो रुक, हिक्का और कमला का वर्णन किया गया है। विश्व—शारद के लिए जांगिड़ नामक औषध का उल्लेख किया गया है। कूठ को सर्व ज्वर निवारक औषध कहा गया है । अंजन नामक औषध को ज्वर और दाह दोनों के लिए उपयोगी बताया गया है। क्षय (राज्यक्ष्मा) को ज्वर का पुत्र बताया गया है। ज्वर के उपद्रव के रूप में हरित (कामला) का वर्णन प्राप्त होता है। कास का उल्लेख कासिका नाम से आया है और कास को ज्वर का मित्र स्वीकार किया गया है। एक अन्य प्रकरण में कास को ज्वर की भगिनी कहा गया है। श्लेष्मा के लिए बहुधा बलास शब्द का प्रयोग किया गया है। अस्थि, पर्व, हृदय दोनों कक्ष, मूषक तथा अंडकोष को बलास का स्थान कहा गया है।

आयुर्वेद में ग्रंथि युक्त अपाचे नामक जिस रोग का वर्णन प्राप्त होता है अथर्ववेद में भी इस रोग का उल्लेख है। वहाँ उसके लिए अपचित शब्द का प्रयोग किया गया है। इसके आठ भेद बताये गए हैं- एनी, श्येनी, कृष्णा रोहिणी, असूतिका, रामायणी, गावो और गमतु। सूर्य और चंद्रमा इसे ठीक करते हैं और मुनिवृक्ष (अगस्त्य) नामक वृक्ष के पत्तों से इसका भेदन किया जाता है।

राजयक्ष्मा का वर्णन जयान्य नाम से आया है। अधिक मैथुन और क्षय से यह रोग उत्पन्न होता है ऐसा लिखा है। ऐसा ही वर्णन आयुर्वेदीय ग्रंथों में भी देखने को मिलता है। इसका कारण एक उडऩशील जीवाणु बताया गया है, जो कि आधुनिक वर्णन के समकक्ष है। राजयक्ष्मा के लिए वर्णन आया है कि यह अस्थि, मांस, वीर्य को अधिस्थान बनाकार निवास करता है। कमला रोग का वर्णन करते हुए इसे ज्वर का उपद्रव बताया गया और सूर्य स्नान को इसकी मुख्य औषधि बताया गया है।
मानसिक रोगों में उन्माद का वर्णन अथर्ववेद में देखने को मिलता है। यजुर्वेद 16।32।11 में वर्णन आया है कि उच्छिष्ट बर्तनों में लगे हुए जीवाणु खाने—पीने वाली वस्तुओं को विषैला कर देते हैं। ऋग्वेद में जल में रहने वाले विषैले जीवों का उल्लेख भी है श्रृंग तथा कुत्सित मलमूत्र के विषाक्त प्रभाव का वर्णन भी किया गया है। आयुर्वेद के ग्रंथों की ही तरह यहाँ भी स्थावर और जंगम इस प्रकार के दो विष भेदों का वर्णन वेदों में भी प्राप्त होता है। वृश्चिक विष और सर्प विषों का उल्लेख है। दोनों ही प्रकार के विष अग्नि सदृश दाह उत्पन्न करते हैं। विषों के कारण शरीर में व्रण उत्पन्न होने का भी उल्लेख प्राप्त होता है। सूर्य को मुख्य रूप से विष नाशक माना गया है और साथ ही बहुत सारी वनस्पतियों का वर्णन भी किया गया है। वामी मृत्तिका को भी विष नाशक बताया गया है। शास्त्रों और विष के अन्य अधिष्ठानों को निर्वीर्य करने का वर्णन भी मिलता है। विष की चिकित्सा करते समय हृदय की रक्षा विशेष रूप से करने का आग्रह भी है। विषाण नामक औषधि को नासा, व्रण, गुदा स्राव तथा मूत्र स्राव रोकने वाली औषधि बताया गया है। क्षत क्षीण तथा अस्थि भंग तथा उनके चिकित्सा का भी उल्लेख है। कुष्ठ के सदृश किलास का उल्लेख किया गया है। अस्थि, मांस एवं मज्जा में इसकी स्थिति बतायी गई है। इसकी चिकित्सा के लिए श्यामा नाम की औषधि का उल्लेख है। विसूचिका और उन्माद रोग का वर्णन भी है। उन्माद के प्रकरण में देव कृत पाप, ज्वर, राक्षस तथा कृमियों को इसका कारण बताया गया है।

रक्त संचार का वर्णन और रक्त संचार में सम्मिलित अवयवों यथा हृदय, धमनी एवं सिर का वर्णन भी मिलता है। शुद्ध और अशुद्ध रक्त के वर्ण में भिन्नता का वर्णन मिलता है। रक्त को शरीर में सर्वत्र घूमने वाला बताया गया है। शुद्ध और अशुद्ध रक्त का वहन अलग-अलग वाहिनियों के द्वारा होने का उल्लेख भी प्राप्त होता है ।

स्त्री के मासिक धर्म एवं उसमें होने वाली समस्याओं का वर्णन भी अथर्ववेद में देखने को मिलता है। गर्भाधान की प्रक्रिया का भी वर्णन प्राप्त होता है। गर्भाधान का वर्णन करते हुए इस बात का उल्लेख किया गया है कि नर—नारी को उन सभी साधनों का उपयोग करना चाहिए जिससे दशम मास में वीर संतान पूर्णांग उत्पन्न हो। उपलब्ध आख्यान में गर्भाशय के गविनियों में गर्भ स्थापित करने का निर्देश दिया गया है। अथर्ववेद 5/25 के आख्यान के अनुसार सर्वांग तथा निरोग बालक के जन्म की आवश्यक शर्त यह है कि गर्भाशय निरोग हो। गर्भवती को क्रोध तथा अभिमान नहीं करने का परामर्श दिया गया है। प्रसव काल में योग्य धात्री की व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया है, जिससे कि बालक को कोई क्षत न हो तथा माता भी निरोग एवं सुखी रहे ।

अथर्ववेद 6/10 में वृष्य चिकित्सा का वर्णन प्राप्त होता है। वाजीकरण कर्म संपन्न करने के लिए हर्षिणी नामक औषधि का उल्लेख प्राप्त होता है। नपुंसक के शिश्न को अश्व, अश्वत्थ, अज, ऋषभ तथा मृग विशेष के शिश्नों की भाँति वजीवन बनाने का आख्यान है। ऋग्वेद के एक प्रकरण में में वर्णन आया है कि विपश्ल की जांघ कट गई तो उसे अश्विनी कुमारों द्वारा ठीक किया गया तथा तत्काल ही लोहे की जंघा लगा दी गई। ऋग्वेद 1/117 में उपस्थित आख्यान के अनुसार अश्विनी कुमारों ने ऋजास्व को नेत्र प्रदान किए तथा अंध को नेत्रों की ज्योति प्रदान की ।

वेदों में विभिन्न औषधियों का भी वर्णन है।
1. अथर्ववेद 4/37 में अजश्रृंगी का वर्णन है। वीरूध और औषधियों में इस औषधि को श्रेष्ठ बताया गया है। इस प्रकरण में इसका मुख्य प्रयोग अप्सरस और गंधर्व इन दो कृमि भेदों की चिकित्सा के लिए किया गया है। गंधर्व कृमियों का वर्णन करते हुए उन्हें श्वान और कपि के रूप के सदृश रूप वाला, केशधारी कुमार की भांति आकृति वाला बताया गया है। गंधर्व कृमियों द्वारा हवि एवं अवाक भक्षण करने का निर्देश है। उपलब्ध वर्णन के अनुसार अज शृंग की गंध से यह कृमि नष्ट होते हैं। यह आख्यान मिलता है कि कश्यप, कण्व एवं अगस्त्य ने कृमियों को नष्ट किया था। गुग्गुलु, पीला औक्षगन्धि और प्रमन्दनी के होम से भी अप्स कृमियों को दूर करने का वर्णन इसी प्रकरण में किया गया है। अजश्रृंगी को तीक्ष्ण श्रृंगी भी कहा गया है।

2. अथर्ववेद 4/17, 4/18,4/19, 7/65 तथा यजुर्वेद 35/11 में अपामार्ग का वर्णन प्राप्त होता है। सत्यजित, सहमाना, शपथ यावनी, पुन: सरा, विभिन्दती भेदन करने वाली), शत शाखा सैकड़ों शाखाओं से युक्त), प्रतीचीनफल उल्टे फल वाली) इस गुण बोधक पर्याय है। इस औषध को ‘भेषजनामुज्जेष’ कहा गया है। इसे सहस्रवीर्य के रूप में संबोधित किया गया है। यह औषध मुख्यत: कृत्या के नाश के लिए प्रयुक्त है। कृत्या का शाब्दिक अर्थ है हिंसा की भावना से किया गया कृत्य। भँजती, विश्वरूप और कुरुतिनी इसके पर्याय हैं। आंगिरसी और आसुरी भेद से यह दो प्रकार के होती है। अन्यत्र उपलब्ध प्रकरण में एक खुर वाले पशुओं, उभय दंत पशुओं, क्रिक वाक् पक्षी, अजा भेड़, मयूर, कुक्कुट, गर्दभ, गौ तथा पुरुष को भी कृत्या के प्रयोग के हेतु के रूप में वर्णित किया है तथा कूप, गृह, श्मशान, क्षेत्र, सभा स्थान, क्रीड़ा स्थल, द्युत स्थान, सेना स्थान, शस्त्रागार, स्नान स्थान को कृत्या के स्थान के रूप में वर्णित किया गया है। आसन्द, सरहाना, उप वस्त्र, दुन्दुभी आदि इसके संवाहक के रूप में वर्णित हैं। अपामार्ग के प्रयोग से न केवल मनुष्यों को आक्रांत करने वाली कृत्यायों को नष्ट किया जा सकता है अपितु गौ और क्षेत्र के कृत्याओं को समूल नष्ट करने में यह औषध सक्षम है। अथर्ववेद में अंजन, जंगिड मणि तथा प्रतिसर मणि कृत्या के प्रभाव को नष्ट करने वाले अन्य द्रव्यों के रूप में वर्णित किया गया है ।
अपामार्ग को दुर्बलों की रक्षक और राक्षसों की नाशक बताया गया है। यह औषध दौष्वप्न्य, दोर्जीवित्य, दूर्णामादि राक्षस कृमियों; क्षुधामार, तृष्णामार, अगोता, अनपत्यता; क्षेत्रिय रोग, शपथ तथा पापों को दूर करने में भी सक्षम है। इसी प्रकरण में यह वर्णन भी प्राप्त होता है कि राक्षस कृमियों के कारण बालकों में मूच्र्छा एवं रक्त क्षय जैसे रोग होते हैं। कच्चे पात्र, नील- लोहित वर्ण के पात्र तथा अपक्च मांस को कृत्या का संवाहक बताया गया है।

3. अथर्ववेद 4/09 में सम्प्रति स्रोतों अंजन के रूप में प्रचलित औषध का वर्णन अंजन नाम से प्राप्त होता है। (इसे त्रायमाण प्राणियों की रक्षा करने वाला), पर्वताक्षि पर्वत पर उत्पन्न होने वाला), त्रैककुद (त्रिकूट पर्वत से उत्पन्न), यामुन (यमुना से उत्पन्न), विप्र भेषज स्फूर्ति वाला, सिन्धुगर्भ नदी का गर्भ, विद्युत पुष्प आदि पर्यायों से सम्बोधित किया गया है। वायु को इस औषधि के प्राण तथा सूर्य को नेत्र के रूप में संबोधित किया गया है। इस औषध को जीवों के जीवन की परिधि, पुरुषों और गौओं की रक्षक, कृमियों की नाशक बताया गया है। इस औषध को ‘हरितभेषज’ भी कहा गया है। अथर्ववेद में उपलब्ध वर्णन के अनुसार हरित पाण्डु रोग होता है जो कि ज्वर के उपद्रव के रूप में प्रकट होता है। इससे पता चलता है अंजन को पाण्डु रोग की औषध के रूप में प्रयोग किया जाता रहा होगा। उपलब्ध वर्णन के अनुसार यह औषध मनुष्य के जोड़-जोड़ में जाकर यक्ष्म रोग को नष्ट कर देती है। तक्मा रोग ज्वर), बलास तथा आदहि इन तीनो रोगों को अंजन का दास बताया गया है। उपलब्ध वर्णन के अनुसार इसको अंजन के रूप में धारण करने, मणि के रूप में धारण करने, पान करने का भी निर्देश मिलता है।

4. अथर्ववेद 6/56 में अरुन्धती औषध का वर्णन अरुन्धती, विश्वरूपा, सुभगा तथा जीवला नाम से आया है। अरुन्धती का प्रयोग पाँच वर्ष की आयु पर्यन्त तथा अन्य चतुस्पदों में दैव प्रकोप से होने वाले रोगों की चिकित्सा के लिए प्रयुक्त किया जाता था। आयुर्वेद्य निघंटुओं में अरुन्धती नामक किसी औषध का वर्णन देखने को नहीं मिलता।

5. कुष्ठ कूठ मुख्यत: अथर्ववेद 5/4 एवं 19/39 में इस औषध का वर्णन प्राप्त होता है। इस औषधि को (वीरुध वनस्पतियों) में सबसे बलवान, विश्वभेषज, अमृत के पुष्प, सोम का सखा तथा पर्वतों पर विशेष कर हिमालय की उत्तर दिशा में उत्पन्न होने वाला बताया गया है। मुख्यत: इसका वर्णन तक्म नाशक (ज्वर नाशक) विशेषकर तृतीयक, संतत और हान ज्वर की औषध के रूप में किया गया है। शिरो रोग, नेत्र रोग तथा शरीर दोष को भी यह औषध दूर करती है। साथ ही यह वृष्य वाजीकर) भी है। उपलब्ध वर्णन के अनुसार इक्ष्वाकु, काम्य, वस, तथा आत्स्य इस औषध के ज्ञाता और प्रयोगकर्ता हैं ।

6. केश वृंहणी अथर्व वेद 6/21 में केशों को दृढ़ करने तथा केशवर्धन के लिए केश—वर्धिनी, नितलि तथा केश बृंहणी नाम की औषधि का वर्णन है, जिसके स्वरस को इंद्रलुप्त नामक व्याधि में सिर पर लगाने का निर्देश किया गया है तथा यह भी इंगित किया गया है कि ऐसा करने से केशों की वृद्धि होती है। इसे अनाधृष:, सिषासव, सिषासथ अर्थात् धन देने वाली अहिंसित और आरोग्य देने की इच्छा से युक्त है। इसके गुणों का वर्णन करते हुए इसे पुराने केशों को दृढ़ करने वाला, अजात् केशों को उत्पन्न करने वाला तथा उत्पन्न केशों को बढ़ाने वाला बताया गया है। अथर्ववेद 6/137 में प्राप्त आख्यान के अनुसार इसे ऋषि जमदग्नि ने अपनी पुत्री के लिए खोजा था।

7. अथर्ववेद 6/15 में तलाशा नामक एक औषधि का वर्णन आता है जिसे सोम के समतुल्य माना गया है। परंतु उसके प्रयोग के संबंध में अन्य कोई वर्णन नहीं मिलता न ही नया वेदों में इसका कोई वर्णन मिलता है। इसी प्रकार 6/16 में तोविलिका वनस्पति का नाम आया है। आवयु, अनावुयु, अलसाला, सिलांजाला, नीलागलसाला आदि इसके पर्याय के रूप में उद्धृत हैं।

8. दशवृक्ष  अथर्ववेद 2/9 में प्रस्तुत आख्यान के अनुसार राक्षस रूपी आमवात रोग, जो कि रोगी के पर्वों को जकड़े हुए हैं, के लिए दशवृक्ष श्रेष्ठ औषधि है और जिस वैद्य ने इस औषधि का निवेशन किया हुआ है वही इस रोग के लिए श्रेष्ठतम वैद्य है। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि मनुष्य के जोड़ों को त्रास देने वाला यह रोग वैदिक काल में भी त्रास देता रहा है।

9. पाटा— इस औषधि के संबंध में ऐस आख्यान आया है कि इसे गरुड़ देवता ने प्राप्त किया था तथा शूकर ने अपनी नासिका से खोदकर निकाला था। असुरों को जीतने के लिए इंद्र ने इसे भुजा में धारण किया और इसको खाया था। जला-भेषज, नीलशिखण्ड तथा कर्म कृत इसके पर्याय हैं।

10. पिप्पली— अथर्ववेद के 6/109 सूक्त में पिप्पली संबंधित तीन सूत्र देखने को मिलते हैं। क्षिप्त भेषजी, अतिविद्ध भेषजी इसके पर्याय के रूप में आए हैं। अथर्ववेद के आख्यान के अनुसार इस औषधि ने देवताओं को समर्थन बनाया तथा यह जीवन के लिए पर्याप्त है। ऐसा भी आख्यान मिलता है कि पीपली जिस जीव में व्याप्त हो जाती है वह नष्ट नहीं होता। इसे वात रोगों की औषध बताया गया है। इस आख्यान में यह कहा गया है कि अश्योर ने इसे खोदा और देवताओं ने इसे फिर बोया। इस बात से इसके महत्वपूर्ण होने के संकेत मिलते हैं। संप्रति पिप्पली रसायन औषध के रूप में आयुर्वेद चिकित्सकों द्वारा व्यवहृत की जाती है।

11. पृष्णिपर्णी— मनुष्य की बुद्धि का निरोध करने वाली तथा शरीर में प्रवेश करके रक्त पीने वाले एवं गर्भ को नष्ट करने वाले कण्व और दुर्नाम नामक कृमियों की औषध के रूप में पृष्णिपर्णी का वर्णन अथर्ववेद 2/55 में प्राप्त होता है। कण्वजम्भनी, सहस्वती एवं सहसनामा इस औषधि के पर्याय हैं। इसे अग्नि के समान उग्र औषधि बताया गया है।

12. रोहणी— छिन्न अस्थि का रोहण करने का अद्भुत गुण होने के कारण इसे अस्थिरोहिणी नाम से अथर्ववेद 4/12 में वर्णित किया गया है। वैद्य के लिए अभीष्ट है कि वह जो अंग हिंसित है, जो जला हुआ है, पीस गया है ऐसे भग्न पीडि़त रोगी में इस भद्र औषध रोहिणी का प्रयोग करे । फिर ऐसी प्रार्थना की गई है कि त्वचा से त्वचा, रुधिर से रुधिर, मांस से मांस, अस्थि से अस्थि तथा मज्जा से मज्जा जुड़ जाय। यहाँ तक कि लोम से लोम मिल जाय ऐसी ऐषणा इस प्रकरण में दिखाई पड़ती है।

13. सहस्रचक्षु— अथर्ववेद 04/20 में सहस्र चक्षु नाम की जिस औषधि का वर्णन है उसके आख्यान से प्रतीत होता है कि इस औषधि के प्रयोग से सहस्र गुण दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। इसके प्रयोग से सूक्ष्म से सूक्ष्म कृमियों, तीन घु लोकों, तीन पृथिवियों, छह पृथक् दिशाओं तथा सब भूतों को देखा जा सकता है। इसके प्रयोग से समस्त यातुधानों (राक्षसों), यातुधानियों एवं पिशाचों को देखने की शक्ति प्राप्त हो जाती है।

14. सहस्रपर्णी— अथर्ववेद 6/139 में उपलब्ध आख्यान से इसकी सहस्त्रों ऊध्र्व शाखाओं एवं 33  अध: शाखाएँ होने का संकेत मिलता है। इस औषधि को कामोद्दीपक औषध के रूप में प्रस्तुत किया गया है। बभ्रु, कल्याणी, न्यस्तिका, वीर्यवती, न्यस्तिका, संवननी आदि शब्द इसके पर्याय के रूप में प्रयुक्त हुए हैं। संप्रति आयुर्वेद के ग्रंथों में इस प्रकार की किसी औषध का वर्णन नहीं है।

15. सीस नाग— यद्यपि वेदों में स्वर्ण, रौप्य, लौह, ताम्र, सीस तथा ट्रैप सभी का वर्णन प्राप्त होता है तथापि औषध के रूप में सीसक का ही प्रयोग देखने को मिलता है। यजुर्वेद 1/36  में इसे कृमियों और राक्षसों से रक्षा करने वाला बताया गया है।

16. सोमलता— ऋग्वेद में यदि किसी औषध की सबसे अधिक प्रशस्ति की गई है तो वह सोम नामक औषधि है। ऋग्वेद के नवम मण्डल के सभी 114 सूक्त मेंं सोम की प्रशस्ति गायी गई है । अन्य मण्डलों के 6 सूक्त सोम की महिमा में लिखे गए हैं। ऋग्वेद में जो आख्यान मिलता है उसके अनुसार यह पर्वत की चोटी पर पाया जाता है। यह पौधा ऊँचा होता है और अनेक शाखाएँ नीचे की ओर झुकी हुई हैं। जो वर्ण प्राप्त होता है उससे स्पष्ट होता है कि यह श्रेष्ठ, बलदायी, और वीर्य वर्धक औषधि है। पीने से पहले इनकी स्तुति का विधान है। यह भी वर्णन मिलता है कि इसके अधिक प्रयोग से वमन लाता है और विषूचिका रोगोत्पादक है। आयुर्वेद के ग्रंथों में जिस सोम नाम की औषधि का वर्णन मिलता है वह ऋग्वेदोक्त सोम औषधि से किंचित भिन्न है । सुश्रुत संहिता में जिस औषधि का वर्णन है उसे भी औषधियों का राजा बताया गया है उसके 15 पत्ते होते हैं जो चन्द्रमा की भांति घटते—बढ़ते रहते हैं। यह औषधि पूर्णमासी को पूरे 15 पत्ते और अमावस को यह औषधि बिना पत्तों के हो जाती है।

वेदों में प्राप्त आख्यान के अनुसार औषधियों को मणि के रूप में धारण करने का भी विधान है। उपलब्ध आख्यान के अनुसार निम्न मणियों का वर्णन किया गया है-
1. अस्तृत मणि का प्रयोग आयु, वर्च, ओज और बाल बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है। ऐसा विश्वास व्यक्त किया गया है कि इसके प्रयोग से असुर, कृमि, नष्ट होते हैं।
2. औदुम्बर मणि के प्रयोग से पशुओं विशेषकर गौ की रक्षा एवं पुष्टि के लिए विहित है। इस मणि का प्रयोग धन प्राप्ति के लिए अश्व आदि पशुओं की रक्षा लिए अन्न की अधिकता के लिए और गौओं की वृद्धि के लिए प्रयुक्त हो जाने के प्रमाण मिलते हैं।
3. जांगिड मणि का प्रयोग दीर्घायु, ऐश्वर्य, चातुर्य के लिए एवं अत्रि कृमि के लिए, कृत्याओं को नष्ट करने के प्रयोग के आख्यान मिलते हैं। संप्रति जांगिड औषधि का उल्लेख आयुर्वेद ग्रंथों में नहीं मिलता।
4. दर्भ मणि: अथर्व वेद में उपलब्ध आख्यान के अनुसार मेघ की गर्जना के साथ जो ज्योतिर्मय वर्षा) बिंदु आती है उससे दर्भ उत्पन्न होता है। इसे बुढ़ापे को दूर करने वाली औषधि के रूप में वर्णित किया गया है।
5. पर्ण मणि : इस औषधि को देवों का ओज और औषधियों का सार कहा गया है। इसे अरिष्ट नाशक और दीर्घायु प्रदान करने वाला कहा गया है।
6. प्रतिसर मणि : इसे वीर औषधि कहा गया है। इसे वीरों द्वारा ही धारण करने का आख्यान है
7. फाल मणि : अथर्ववेद में इसे उग्र मणि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह कर्ण, नेत्र और वाणी के लिए उपयोगी औषधि है।
8. वरण मणि: इसके संबंध में आख्यान आता है कि माता, पिता, भाई और आत्मीय लोगों ने जो पाप किया है उससे भी यह मणि बचाती है।
9. शतावर : अथर्ववेद में उपस्थित आख्यान के अनुसार शतावर मणि को पाप्मा रोग अतिक्रमण नहीं करता।
10. शंख मणि : अथर्ववेद में शंख मणि को अंतरिक्ष से उत्पन्न, विद्युत की ज्योति से उत्पन्न होने वाला और हिरण्य से उत्पन्न होने वाला बताया गया है। शंख को विश्व-भेषज कहा गया है। यह आयु को बढ़ाने वाला है। इसे सोम मंडल से उत्पन्न माना गया है।

नोट: इस लेख को वैद्य पंडित श्री राम गोपाल शास्त्री की पुस्तक ‘वेदों में आयुर्वेद’ और डॉ. वी. डबल्यू. करमबेलकर की पुस्तक ‘द अथर्वेद एंड द आयुर्वेद’ के आधार पर लिखा गया है।