महर्षि दयानन्द और वैदिक संस्कृति का पुनर्जागरण

प्रो. डॉ ब्रह्मचारी व्यासनन्दन
प्राचार्य, रामेश्वर महाविद्यालय मुजफ्फरपुर (बिहार)


उन्नीसवीं सदी के महापुरुषों में महर्षि दयानन्द सरस्वती का स्थान अद्वितीय है। उनका प्रादुर्भाव उस समय हुआ जब हमारा देश अनेक प्रकार के ढोंग-पाखण्ड और नाना तरह की कुरीतियों व रूढि़वादी विचारों से जकड़ा हुआ था। बहुत प्रकार के मत-पंथ व सम्प्रदायों ने वैदिक धर्म और संस्कृति को विकृत कर दिया था। वेद प्रतिपादित एक ईश्वर की उपासना के स्थान पर विविध प्रकार की वेद विरुद्ध मान्यताएँ व पूजा-पद्धतियाँ प्रचलित हो गयी थीं। ‘स्त्रीशूद्रौ नाधीयाताम्’ की अवैदिक उक्ति के आधार पर स्त्रियों व शूद्रों को शिक्षा और वेद पढऩे से सर्वथा वंचित कर दिया गया था। नारियाँ घर की चौखट के अन्दर हो चुकी थीं। बाल विवाह, वृद्ध विवाह, बहु विवाह, अनमेल विवाह के कारण हजारों बाल विधवायें करुण-क्रन्दन कर रही थीं। दूसरी तरफ सोने की चिडिय़ा कहा जाने वाला हमारा देश अंग्रेजों का गुलाम था। देश के राजे-रजवाड़े विलासी और खंड-खंड बँट चुके थे। ‘फूट डालो और शासन करो’ (Divide and Rule) की नीति पर देश परतंत्रता का दंश झेल रहा था। ऐसी विषम परिस्थिति में देश को स्वामी दयानन्द सरस्वती जैसे वेदभक्त व देशभक्त ऋषि की परम आवश्यकता थी।

ईश्वर की महती कृपा से यह सौभाग्य गुजरात प्रान्त को मिला, जहाँ काठियावाड़ के टंकारा नामक ग्राम में करसन जी तिवारी व अमृता बाई के घर तिथि फाल्गुन बदी दशमी, विक्रम संवत् 1881 तदनुसार 12 फरवरी, 1825 को एक दिव्य बालक ने जन्म लिया। औदीच्य ब्राह्मण कुल में जन्मे इस बालक के बचपन का नाम मूलशंकर रखा गया। यही बालक आगे चलकर महर्षि दयानंद सरस्वती के नाम से विख्यात हुआ।

महर्षि दयानन्द सरस्वती की दृष्टि में वेद ही सर्वस्व था। यही कारण है कि इन्हें वेदों वाला ऋषि कहा जाता है। महर्षि दयानन्द जी ने वेदों के आधार पर वैदिक संस्कृति को पल्लवित और पुष्पित किया। वैदिक संस्कृति का प्राण यज्ञ है। यही कारण है कि हमारे सभी धार्मिक कार्य यज्ञ द्वारा ही सम्पादित होते हैं। परन्तु यह यज्ञ भी विकृत हो गया था। यज्ञ के नाम पर पशुओं की बलि दी जाती थी। पंच पशु यागो में अश्व मेध, गोमेध, अजमेध, अविमेध और नरमेध आते हैं। इन पशुयागों में क्रमश:— घोड़े, गाय, बकरे, भेंड़ और मनुष्य तक को काट कर यज्ञ में आहुतियाँ दी जाती थीं। इस तरह यज्ञ पूर्णत: विकृत हो गया था। यज्ञ के नाम पर फैली हिंसा के विरुद्ध स्वामी दयानन्द सरस्वती ने जगह-जगह पौराणिक विद्वानों से शास्त्रार्थ किए और वेदों के आधार पर यह सिद्ध किया कि यज्ञों में किसी भी प्रकार की बलि प्रथा यानी हिंसा का स्थान नहीं है। क्योंकि, वेदों में अध्वर अर्थात् हिंसारहित श्रेष्ठतम कर्म को ही यज्ञ की संज्ञा प्राप्त है। शतपथ ब्राह्मण का स्पष्ट कथन है-यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म। वेदों के शताधिक मंत्रों में यज्ञ को अध्वर कहा गया है। यथा-ओं अग्ने यज्ञमध्वरं विश्वत: परिभूरसि। स इद्देवेषु गच्छति ।। (ऋग्वेद 1/1/04 )

वैदिक ग्रंथों में यज्ञ को कामधेनु, कल्पवृक्ष और स्वर्ग की प्राप्ति का साधन बताया गया है- स्वर्गकामो यजेत व अग्निहोत्रं जुहूयात् स्वर्गकाम: (मैत्रायणी उपनिषद्)। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के तृतीय समुल्लास में डंके की चोट से उद्घोषणा की- होम करना अत्यावश्यक है। आर्यवर शिरोमणि ऋषि-महर्षि, राजे-महाराजे बड़े-बड़े यज्ञ करते और कराते थे। तब हमारा आर्यावर्त देश रोगों से रहित और सुखों से पूरित था। अब भी हो तो वैसा ही हो जाए। महर्षि दयानन्द ने यज्ञ द्वारा अग्नि, जल, भूमि, वायु, आकाशादि की शुद्धि होकर सम्पूर्ण पर्यावरण के परिशोधन का विशेष माध्यम बताया। उन्होंने वैदिक संस्कृति के पुनर्जागरण के लिए पंचमहायज्ञ को प्रत्येक गृहस्थी के अनिवार्य बताया। इसके लिए महर्षि दयानन्द ने पंचमहायज्ञ विधि नामक पुस्तक लिखी जिसमें ब्रह्मयज्ञ, (ईश्वरोपासना), देवयज्ञ (अग्निहोत्र), पितृयज्ञ (माता-पिता आदि जीवित पितरों की सेवा), अतिथियज्ञ (विद्वान, ज्ञानी, साधु, महात्माओं, लोकोपकारार्थ विचरने वाले अतिथियों का सेवा-सत्कार) तथा बलिवैश्वदेवयज्ञ (कुत्ते, चींटी व जरूरतमन्द लोगों को भोजन देना) इन पंचमहायज्ञों का उल्लेखनीय वर्णन है। गो, गंगा और गायत्री के लिए भी महर्षि ने अद्भुत कार्य किया। महर्षि दयानन्द ने सनातन वैदिक संस्कृति के रक्षण और पोषण हेतु ‘गोकरुणानिधि’ और ‘संस्कार विधि’ नामक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों की रचना कर जनमानस को गायों के लाभों से अवगत कराया और सोलह संस्कारों (गर्भाधान से अन्त्येष्टि पर्यन्त) का पुन: समाज में प्रचलन कराया। गंगा के तट पर आसन लगा ऋषि ने 18-18 घंटे की समाधि लगायी परन्तु अकेले मुक्ति का मार्ग त्याग कर परतंत्रता से देश को मुक्त कराने लग गये। उनके तथा उनकी शिष्य परम्पराओं में पं. श्याम जी कृष्ण वर्मा, भाई परमानन्द, वीर सावरकर, राम प्रसाद बिस्मिल, स्वामी श्रद्धानन्द जैसे लोगों को गंगा की पवित्रता के लिए प्रेरित किया।

गायत्री मंत्र के प्रचार-प्रसार हेतु उपनयन और वेदारम्भ संस्कार को द्विज बनाने का मुख्य आधार बताया तथा गायत्री मंत्र से लेकर सांगोपांग वेदों के पठन-पाठन का मार्ग प्रशस्त किया। महर्षि दयानन्द की दृष्टि में वेद ईश्वरीय कल्याणी वाणी है जिसका प्रकाश परमात्मा ने सृष्टि के आदिकाल में अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा इन चार मुक्तात्मा ऋषियों के हृदयों में प्रकाशित किया। फलत: वेद ब्रह्मा से लेकर जैमिनी पर्यन्त ऋषियों द्वारा गुरु-शिष्य परम्परा से अद्यावधि प्रचारित-प्रसारित हो रहा है। परस्पर सुनना-सुनाना के कारण वेद को श्रुति कहा जाता है- श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेय: (मनुस्मृति)। वेदों के पठन-पाठन से ही वैदिक संस्कृति अक्षुण्ण रहेगी, इसका भलीभांति ज्ञान ऋषिवर को था। तभी तो उन्होंने उद्घोषणा की-
वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढऩा-पढ़ाना और सुनना-सुनना सब आर्यों का परम धर्म है। (आर्यसमाज का तीसरा नियम) महर्षि दयानन्द ने कहा कि वेद नित्य तथा सकल ज्ञान-विज्ञान का अक्षय भंडार है। वेदों में तृण से ब्रह्माण्ड पर्यन्त सभी सत्यविद्याएँ पायी जाती हैं। परा-अपरा अर्थात् भौतिक व आध्यात्मिक दोनों प्रकार की विद्याएँ मिलती हैं। देखें-महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका।

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने वेदों के नाम पर प्रचलित मिथ्या धारणाओं तथा यज्ञ के नाम पर प्रचलित अवैदिक कुप्रथाओं का ‘सत्यार्थ प्रकाश’ और ‘ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका’ द्वारा जोरदार खण्डन किया तथा वैदिक संस्कृति के विशुद्ध प्राचीन सत्य स्वरूप को उद्घाटित किया। पुन: नारियाँ वैदिक आर्ष शिक्षाओं को प्राप्त कर अपाला, घोषा, लोपामुद्रा, अदिति, मदालसा, गार्गी, मैत्रेयी आदि वेदकालीन प्राचीन विदुषियों के समान वेद विदुषी हो रही हैं। शिक्षा की बदौलत नारियाँ समाज व देश के विकास में हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं। यह सब महर्षि दयानन्द सरस्वती की अद्भुत दूरदृष्टि का सुपरिणाम है। गुरुकुलीय वैदिक परम्परा के पुन:स्थापन से समाज व राष्ट्र को बड़ा बल मिला है। सती प्रथा, बाल विवाह, अनमेल विवाह से समाज को काफी हद तक मुक्ति मिली है। अब कन्यायें विदुषी व युवती होकर अपने गुण-कर्म-स्वभाव के अनुरूप युवा विद्वान् पति को वरण कर रही हैं। लेकिन अभी भी समाज में वैदिक संस्कृति का पूर्ण प्रभाव नहीं हो पाया है। इसके लिए पुन: वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था को समाज में प्रचलित व प्रभावी बनाने के लिए महर्षि दयानन्द सरस्वती के विचारों का सम्यक् परिपालन करना होगा, तभी हम वैदिक संस्कृति का सर्वतोभावेन पालन कर ‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ नारो को सफल और सार्थक बना पायेंगे।
जयतु—जयतु महर्षि-दयानन्द:।
जयतु—जयतु वैदिक संस्कृति:।।