शक्तिपीठ अलोपशंकरी

हरि मंगल
वरिष्ठ पत्रकार


देश में अनादिकाल से नवरात्रि के दौरान माँ दुर्गा और उनके विभिन्न स्वरूपों की पूजा की परंपरा चली आ रही है। हिंदू मान्यताओं में कुल चार नवरात्रि का वर्णन मिलता है। इनमें माघ और आषाढ़ नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। इन दोनों नवरात्रि को लेकर आम जनमानस में अपेक्षाकृत कम उत्साह दिखाई देता है। अन्य दो नवरात्रि में चैत्र नवरात्र हिंदू नववर्ष के प्रारंभ का प्रतीक है। इसका समापन रामनवमी के दिन होता है, जिसे भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। चैत्र नवरात्रि वसंत ऋतु यानी मार्च-अप्रैल में आती है। सनातन धर्म में दूसरा और सर्वाधिक प्रसिद्ध नवरात्रि पर्व शारदीय नवरात्रि है। इस दौरान घरों, सार्वजनिक पार्कों, मंदिरों और धार्मिक स्थलों के अलावा अस्थायी रूप से बनाए गए पूजा पंडालों में भी देवी दुर्गा की पूजा और उत्सव की धूम रहती है। देवी मंदिरों और शक्तिपीठों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। कई स्थानों पर यह आयोजन मेले का स्वरूप ले लेता है। नवरात्रि की समाप्ति के अगले दिन विजयादशमी का पर्व मनाया जाता है। प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार, क्रूर राक्षस महिषासुर के अत्याचारों से देवताओं को मुक्त कराने के लिए माँ दुर्गा ने उससे नौ दिन तक युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध किया। इसी विजय की स्मृति में विजयादशमी मनाई जाती है। इसी दिन देशभर में चल रहे दुर्गा पूजा आयोजनों का भी समापन होता है।

शक्तिपीठों की कथा
शक्तिपीठों की स्थापना कब और कैसे हुई, इसे लेकर आम जनमानस में अनेक पौराणिक मान्यताएँ प्रचलित हैं। इनके अनुसार, ब्रह्मा के पुत्र राजा दक्ष की पुत्री सती ने अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध भगवान शिव से विवाह किया था। राजा दक्ष भगवान शिव को श्मशानवासी, भस्मधारी और अघोरी स्वरूप वाला मानते थे। इस कारण वे उन्हें दामाद के रूप में स्वीकार नहीं कर पाए। एक बार राजा दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों और राजाओं-महाराजाओं को आमंत्रित किया, लेकिन जानबूझकर भगवान शिव और अपनी पुत्री सती को निमंत्रण नहीं दिया। जब सती को यज्ञ के बारे में पता चला तो उन्होंने पिता के मोह और धार्मिक आयोजन में शामिल होने की इच्छा से भगवान शिव से वहाँ जाने की अनुमति माँगी। भगवान शिव ने उन्हें जाने से मना किया और कहा कि यह यज्ञ उन्हें अपमानित करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। लेकिन सती अपने निर्णय पर अड़ी रहीं। अंतत: भगवान शिव ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी। सती जब पिता के घर पहुँचीं तो परिवार के किसी सदस्य ने उनका स्वागत नहीं किया। यज्ञ स्थल पर राजा दक्ष ने भगवान शिव के प्रति अपमानजनक शब्द कहे और उन्हें यज्ञ में शामिल होने के अयोग्य बताया। पति के अपमान से आहत सती ने यज्ञकुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए।

पत्नी सती की मृत्यु का समाचार मिलते ही भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। वे यज्ञ स्थल पर पहुँचे, सती के शव को उठाकर अपनी पीठ पर रखा और तांडव करने लगे। इससे तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। सृष्टि को बचाने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता माँगी। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव के टुकड़े कर दिए। शव के जिन-जिन अंगों के टुकड़े पृथ्वी पर गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुए। इन शक्तिपीठों में देवी शक्ति के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है।

मूर्ति नहीं, पालने की होती है पूजा
देवी सती का अंग यहाँ अदृश्य हो जाने की मान्यता के कारण मंदिर के गर्भगृह में उनकी कोई मूर्ति या प्रतीक चिह्न नहीं है। यहाँ लकड़ी का एक पालना स्थापित है, जिसे देवी सती का स्वरूप मानकर पूजा जाता है। लकड़ी को सुरक्षित रखने के लिए पालने पर चाँदी का पत्र चढ़ाया गया है। श्रद्धालु पालने का श्रृंगार करते हैं और उस पर फूल-माला तथा प्रसाद अर्पित करते हैं। दर्शन के दौरान भक्तों की विशेष इच्छा रहती है कि उन्हें पालने को स्पर्श करने या उस पर माथा टेकने का अवसर मिले। मंदिर के बरामदे में देवी के नौ स्वरूपों की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। परिसर में भगवान शिव, नंदी और हनुमान जी की प्रतिमाएँ भी हैं। श्रद्धालुओं द्वारा लाए गए फूल और प्रसाद पुजारी के माध्यम से देवी को अर्पित किए जाते हैं, जबकि नारियल, धूप और अगरबत्ती बाहर बरामदे में जलाने की परंपरा है।

अलोप से अलोपशंकरी
प्रयागराज की अलोपशंकरी शक्तिपीठ के बारे में मान्यता है कि यहाँ देवी सती के दाहिने हाथ का पंजा गिरा था, किंतु पृथ्वी पर गिरते ही वह अदृश्य हो गया। इसी कारण इस स्थान का नाम अलोप या अलोपी पड़ा। यहाँ स्थापित देवी सती का मंदिर अलोपशंकरी और अलोपी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर के महात्म्य के कारण आसपास के क्षेत्र का नाम भी अलोपी बाग पड़ा। मान्यता है कि जब देवी सती का पंजा यहाँ गिरा तो भगवान शिव को अपनी पीठ पर रखा बोझ अचानक गायब होने का अहसास हुआ। पीछे मुड़कर देखने पर सती का शव वहाँ नहीं था। तब उन्हें प्रभु की लीला का आभास हुआ और इसी स्थान पर उनका क्रोध शांत हुआ।

सामाजिक और धार्मिक संस्कारों की स्थली
नवरात्रि के दिनों में मंदिर में सुबह से ही दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतार लग जाती है। मनोकामना पूर्ति के लिए बड़ी संख्या में लोग यहाँ अनुष्ठान भी कराते हैं। सामान्य दिनों में भी, विशेषकर सोमवार को, मंदिर में श्रद्धालुओं की अच्छी-खासी भीड़ रहती है। प्रयागराज और आसपास के जिलों में यह मंदिर मनोकामना पूर्ण होने के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। लोग अपने बच्चों का मुंडन, अन्नप्राशन और जनेऊ संस्कार कराने के लिए यहाँ आते हैं। विवाह निर्विघ्न संपन्न होने की कामना से भी लोग मन्नत मानते हैं। कई परिवारों के जन्म से लेकर विभिन्न धार्मिक संस्कारों तक की परंपरा इस मंदिर से जुड़ी हुई है। मंदिर संगम जाने वाले मार्ग पर स्थित होने के कारण संगम स्नान के लिए आने वाले अनेक श्रद्धालु यहाँ दर्शन-पूजन के लिए अवश्य पहुँचते हैं। प्रयागराज में कुंभ और महाकुंभ के आयोजन के दौरान भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस प्राचीन मंदिर में दर्शन करते हैं।

मंदिर का इतिहास
मंदिर की स्थापना के वास्तविक समय का कोई स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। कुछ स्थानों पर इसकी स्थापना 11वीं शताब्दी में होने का उल्लेख मिलता है। आधुनिक काल में उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार, मराठा योद्धा श्रीनाथ महादजी शिंदे वर्ष 1771-72 में प्रयागराज आए थे। उन्होंने संगम क्षेत्र और उसके आसपास के इलाकों के विकास का कार्य कराया, जिसमें इस मंदिर का निर्माण भी शामिल बताया जाता है। इसके बाद मंदिर के निर्माण और जीर्णोद्धार से महारानी बैजाबाई का नाम भी जुड़ता है। माना जाता है कि लगभग 1800 के आसपास उन्होंने संगम क्षेत्र के कई मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार कराया। आधुनिक समय में प्रदेश सरकार की ओर से भी मंदिर परिसर का व्यापक सौंदर्यीकरण कराया गया है।

जालपा देवी मंदिर
अलोपशंकरी मंदिर के समीप ही प्रसिद्ध जालपा देवी मंदिर स्थित है। जालपा देवी को माता शीतला का स्वरूप माना जाता है। स्थानीय लोग इसे बुढिय़ा माई का मंदिर भी कहते हैं।

अलोपशंकरी मंदिर की तरह यहाँ भी देवी की कोई प्रतिमा नहीं है। छोटे से मंदिर में एक चबूतरा है, जिसमें एक कुंड बना हुआ है। इस कुंड के जल को श्रद्धालु पवित्र मानते हैं। स्थानीय मान्यता है कि इसके जल से असाध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं। इसी विश्वास के चलते अनेक श्रद्धालु कुंड का जल अपने साथ ले जाते हैं। जालपा देवी मंदिर में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मुंडन और विवाह जैसे संस्कारों के लिए आशीर्वाद लेने पहुँचते हैं। भक्त माता को नारियल, लाचीदाना, खोये की मिठाई और फल का भोग लगाते हैं। इसके साथ पियरी अथवा चुनरी के रूप में लाल या पीली साड़ी भी चढ़ाई जाती है। इस प्राचीन मंदिर की स्थापना के संबंध में मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं महर्षि भारद्वाज ने की थी। उनका आश्रम भी मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित बताया जाता है।

इस प्रकार, अलोपशंकरी और जालपा देवी मंदिर केवल आस्था के केंद्र ही नहीं, बल्कि प्रयागराज की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं से गहराई से जुड़े जीवंत तीर्थ हैं।