प्रो. के. एम. एल. पाठक
पूर्व कुलपति, पं. दीनदयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय एवं गो-अनुसंधान संस्थान, मथुरा
पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित ‘अर्थायाम’ भारतीय अर्थचिंतन की एक मौलिक एवं दूरदर्शी अवधारणा है। इसका उद्देश्य केवल उत्पादन, उपभोग अथवा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में वृद्धि नहीं है, बल्कि धर्म, अर्थ, समाज, संस्कृति और प्रकृति के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए समग्र मानव कल्याण सुनिश्चित करना है। भारतीय दृष्टि में अर्थ का स्थान धर्म के अधीन है; इसलिए आर्थिक विकास तभी सार्थक माना जाता है, जब वह न्यायपूर्ण, नैतिक, पर्यावरण-अनुकूल तथा समाज के अंतिम व्यक्ति के हित में हो। पंडित जी के एकात्म मानव दर्शन में प्रतिपादित ‘अंत्योदय से सर्वोदय’ का आदर्श इसी संतुलित विकास का आधार है। यदि पंडित दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित ‘अर्थायाम’ की कसौटी पर भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन किया जाए, तो देशी गौ-आधारित अर्थव्यवस्था उसका सर्वाधिक उपयुक्त एवं व्यावहारिक उदाहरण है, जो व्यापक ग्राम-स्वावलंबन और सतत विकास की एक केंद्रीय धुरी के रूप में उभर रही है।
देशी गाय का कृषि में योगदान
देशी गौ का गोबर और गोमूत्र प्राकृतिक खेती के प्रमुख आधार हैं। गोबर-आधारित उर्वरक, जीवामृत, घनजीवामृत, वर्मी कम्पोस्ट तथा अन्य जैविक उत्पाद मृदा की उर्वरता बढ़ाते हैं, लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बनाए रखते हैं तथा रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर निर्भरता कम करते हैं। इससे भूमि की उत्पादकता दीर्घकाल तक बनी रहती है तथा पर्यावरण प्रदूषण में कमी आती है। हरित क्रांति के बाद रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों पर बढ़ती निर्भरता के कारण मृदा की उर्वरता में गिरावट, जैविक कार्बन की कमी तथा उत्पादन लागत में वृद्धि जैसी गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न हुई हैं। ऐसी परिस्थिति में देशी गौ-आधारित प्राकृतिक खेती एक प्रभावी एवं टिकाऊ विकल्प के रूप में उभर रही है। आज जब संपूर्ण विश्व सतत कृषि, जलवायु परिवर्तन तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी जैसे विषयों पर गंभीरता से विचार कर रहा है, तब देशी गौ-आधारित प्राकृतिक कृषि भारत ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए एक व्यावहारिक एवं टिकाऊ समाधान प्रस्तुत कर रही है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं रोजगार में योगदान
‘अर्थायाम’ का एक प्रमुख सिद्धांत यह है कि आर्थिक विकास का आधार स्थानीय संसाधन, स्थानीय कौशल तथा स्थानीय आवश्यकताएँ हों। देशी गौ इस सिद्धांत को व्यवहार में उतारने का सर्वोत्तम माध्यम है। ग्रामीण क्षेत्रों में गौपालन केवल दुग्ध उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि गाय का गोबर एवं गोमूत्र दोनों ही बहुउपयोगी एवं बहुमूल्य संसाधन हैं। गोबर एवं गोमूत्र से जैविक खाद के साथ-साथ अनेक उत्पाद, जैसे धूपबत्ती, साबुन, फिनाइल, अगरबत्ती, मच्छर अगरबत्ती, हवन सामग्री, मूर्तियाँ, कंडे, कागज़, गमले, दीपक, पेंट, सैनिटाइजऱ, टाइल्स, जैव-कीटनाशक तथा औषधीय उत्पादों का निर्माण कुटीर उद्योगों के माध्यम से किया जा सकता है। इससे किसानों, महिलाओं और ग्रामीण युवाओं के लिए आय एवं रोजगार के विविध अवसर उपलब्ध होंगे तथा ग्रामीण क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था, स्वरोजगार, महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर ग्राम की अवधारणा सुदृढ़ होगी। यह मॉडल पूँजी-प्रधान विकास के स्थान पर श्रम-प्रधान, संसाधन-संरक्षण आधारित तथा समावेशी आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त करता है।
मानव स्वास्थ्य एवं पोषण में योगदान
देशी गाय के दूध का मानव स्वास्थ्य एवं पोषण की दृष्टि से भी विशेष महत्व है। देशी गाय का ए2 दूध अपने विशिष्ट पोषण गुणों के लिए जाना जाता है। आयुर्वेद में पंचगव्य तथा दुग्ध-उत्पादों का उल्लेख रोग-प्रतिरोधक क्षमता के संवर्धन, स्वास्थ्य संरक्षण तथा प्राकृतिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण साधनों के रूप में किया गया है। देशी गाय के दूध में ए2 बीटा-केसीन प्रकार का प्रोटीन पाया जाता है, जिसे अनेक लोग अपेक्षाकृत अधिक सुपा’य मानते हैं। पाचन के दौरान इससे बीटा-कैसोमॉर्फिन-7 नामक पेप्टाइड का निर्माण अत्यल्प या नगण्य माना जाता है। यही कारण है कि पाचन संबंधी असुविधा वाले व्यक्तियों के लिए देशी गाय का ए2 दूध अपेक्षाकृत अधिक सुपा’य होता है। देशी गाय के दूध में वसा के कण अपेक्षाकृत छोटे होते हैं तथा इसमें शॉर्ट एवं मीडियम चेन फैटी अम्ल, ओमेगा-3 फैटी अम्ल तथा कंजुगेटेड लिनोलिक अम्ल (CLA: Conjugated Linoleic Acid) अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, जो इसके पोषण मूल्य को बढ़ाते हैं तथा पाचन में सहायक हो सकते हैं।
पंचगव्य : अर्थायाम का जैव-आर्थिक आधार
देशी गौमाता से प्राप्त पाँच प्रमुख उत्पाद—दूध, दही, घी, गोमूत्र एवं गोबर—का समु’चय पंचगव्य कहलाता है। भारतीय परंपरा में पंचगव्य का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व रहा है, किंतु वर्तमान समय में यह जैव-आर्थिक, प्राकृतिक कृषि, ग्रामीण उद्यमिता तथा सतत विकास का भी एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभर रहा है। ‘अर्थायाम’ के दृष्टिकोण से पंचगव्य का महत्व इसलिए विशेष है, क्योंकि यह स्थानीय संसाधनों पर आधारित, कम लागत वाला, पर्यावरण-अनुकूल तथा रोजगार-सृजन करने वाला मॉडल प्रस्तुत करता है। पंचगव्य से जैविक उर्वरक, जैव-कीटनाशक, पौध-वृद्धि प्रवर्धक, औषधीय एवं स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद, सौंदर्य-प्रसाधन, स्वच्छता उत्पाद तथा अन्य मूल्यवर्धित वस्तुओं का निर्माण किया जा सकता है। इससे किसानों, महिलाओं, स्वयं सहायता समूहों तथा ग्रामीण युवाओं के लिए स्वरोजगार के नए अवसर उत्पन्न होते हैं।
अनुपयोगी गौवंश का आर्थिक सुदृढ़ीकरण
वर्तमान में अनुपयोगी समझे जाने वाले बछड़ों एवं बैलों के गोबर एवं गोमूत्र का उपयोग भी औषधियों, जैव-उर्वरकों एवं जैव-कीटनाशकों के निर्माण तथा उनके विपणन से प्राप्त अतिरिक्त आय द्वारा इनके भरण-पोषण की समुचित व्यवस्था की जा सकती है। साथ ही, बैलों का उपयोग आटा चक्की, कोल्हू, बैल-चालित विद्युत जनरेटर तथा बैल-चालित कृषि यंत्रों के संचालन में कर अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है। इस प्रकार बैलों को पुन: ग्रामीण अर्थव्यवस्था का उत्पादक अंग बनाया जा सकता है।
गौ-सान्निध्य मॉडल से आत्मनिर्भर ग्रामीण उद्यम
भारतीय संस्कृति में गौ-सान्निध्य (Cow Cuddling) की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। देशी गाय के प्रति स्नेह, उसकी सेवा तथा उसके निकट समय व्यतीत करना मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन तथा प्रकृति के साथ आत्मीय जुड़ाव का प्रभावी माध्यम माना गया है। आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों से भी यह संकेत मिलता है कि पशुओं के साथ सकारात्मक संपर्क तनाव को कम करने, मानसिक स्वास्थ्य में सुधार लाने तथा भावनात्मक संतुलन स्थापित करने में सहायक हो सकता है। ‘अर्थायाम’ की अवधारणा के संदर्भ में गौ-सान्निध्य केवल एक सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक एवं मानवीय मूल्यों पर आधारित विकास का एक अभिनव मॉडल भी है। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में इस परंपरा को योजनाबद्ध एवं संगठित रूप से विकसित किया जाए, तो यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है।
विशेष रूप से शहरी एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों के निकट स्थित गौशालाएँ इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। आज महानगरों में बढ़ते तनाव, अवसाद तथा प्रकृति से दूर होती जीवनशैली के कारण लोग मानसिक शांति, प्राकृतिक वातावरण और जीवन के मानवीय मूल्यों से पुन: जुडऩे के अवसर खोज रहे हैं। यदि ऐसी गौशालाओं में सुव्यवस्थित रूप से गौ-सान्निध्य, गौ-सेवा, गौ-भ्रमण, पंचगव्य-आधारित वेलनेस कार्यक्रम, योग, ध्यान तथा भारतीय जीवन-दर्शन पर आधारित गतिविधियाँ संचालित की जाएँ, तो वे देश-विदेश से आने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकती हैं।
पर्यावरण संरक्षण में योगदान
पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी देशी गौ का महत्व अत्यंत व्यापक है। गोबर से निर्मित जैविक खाद मृदा में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाती है, जल-धारण क्षमता में सुधार करती है तथा भूमि के क्षरण को रोकती है। बायोगैस के माध्यम से स्व’छ ऊर्जा प्राप्त होती है, जिससे ईंधन की समस्या का समाधान होता है तथा कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है। बायोगैस संयंत्र से प्राप्त स्लरी उत्कृष्ट जैविक खाद के रूप में कृषि के लिए अत्यंत उपयोगी है। जैविक खेती जैव-विविधता के संरक्षण में सहायक होती है तथा मिट्टी, जल और वायु प्रदूषण को कम करती है। देशी गायें अपेक्षाकृत कम मीथेन गैस का उत्सर्जन करती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि वे आकार में अपेक्षाकृत छोटी होती हैं और कम मात्रा में चारा खाती हैं, जिससे उनके पाचन के दौरान मीथेन गैस का उत्सर्जन भी अपेक्षाकृत कम होता है। इस प्रकार देशी गौ पर्यावरणीय संतुलन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि देशी गौ-आधारित अर्थव्यवस्था को आधुनिक विज्ञान, अनुसंधान, नवाचार तथा मूल्य-संवर्धन के साथ जोड़ा जाए। देशी नस्लों के संरक्षण एवं संवर्धन, गौ-आधारित उत्पादों के वैज्ञानिक प्रमाणीकरण, जैविक कृषि के विस्तार, गौ-आधारित उद्यमिता को प्रोत्साहन तथा प्रभावी विपणन व्यवस्था विकसित करके ग्रामीण भारत में नई आर्थिक ऊर्जा का संचार किया जा सकता है।





