स्वर्णप्राशन राष्ट्रीय अभियान बने

सन्त समीर
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, विचारक एवं भाषाविद्


एक बच्चा जब इस संसार में अपनी आँखें खोलता है, तो माता-पिता की सबसे पहली चिन्ता क्या होती है? यही कि उनकी सन्तान पूरी तरह से स्वस्थ हो, उसका विकास सुदृढ़ हो। बच्चा ठीक से बढ़े, उसका पाचन अच्छा हो, उसकी बुद्धि तीक्ष्ण हो, उसकी स्मरण-शक्ति विकसित हो, शरीर में पर्याप्त बल हो और वह बार-बार रोगों का शिकार न हो—ये ऐसी आकांक्षाएँ हैं, जो केवल आज के माता-पिता की ही नहीं हैं। हजारों वर्ष पहले भी भारतीय मनीषियों के सामने यही प्रश्न था। अन्तर केवल इतना था कि आज हमारे पास प्रतिरक्षा-विज्ञान, सूक्ष्मजीव-विज्ञान, जैवरसायन और आधुनिक औषध-विज्ञान की एक अलग भाषा है, जबकि प्राचीन आयुर्वेद ने इन प्रश्नों को अपने अनुभव, निरीक्षण और अपनी चिकित्सकीय संकल्पनाओं के माध्यम से अपनी अलग शैली में और कुछ मायनों में शायद और बेहतर ढंग से समझा था। आजकल हमारे देश में बच्चों को जन्म से लेकर किशोरावस्था तक कई प्रकार के टीके अलग-अलग समय पर दिए जाते हैं। जन्म के समय बीसीजी, हेपेटाइटिस-बी और पोलियो की खुराक दी जाती है। इसके बाद छह, दस और चौदह सप्ताह की आयु में पोलियो, पेण्टावैलेण्ट और रोटावायरस के टीके दिए जाते हैं।
प्रचारित करने की आवश्यकता
जन्म से सोलह वर्ष की आयु तक बच्चे को कई बार अलग-अलग टीकों की अनेक खुराकें दी जाती हैं। लेकिन, इतना कुछ होने के बावजूद जब-तब कुछ और बीमारियों के लिए कुछ और नए टीके लाने की बात भी उठती रहती है। एक बड़ा प्रश्न उठता है कि रोगों से बचाने के लिए इतनी बड़ी संख्या में टीके क्या सचमुच पूरी तरह से कारगर हैं? कोविड में जिस तरह से टीकों के नुकसान सामने आए और तमाम किन्तु-परन्तु के बाद कम्पनियों को भी मानना पड़ा कि टीकों से कुछ तरह के नुकसान हो सकते हैं, उसके चलते आधुनिक टीकाकरण के प्रति आशंकाएँ गहरी होने लगी हैं।

आधुनिक टीकाकरण या वैक्सीनेशन पर उठते सवालों के बीच अब एक फिर भारतीय आयुर्वेदिक परम्परा में प्रचलित स्वर्णप्राशन जैसी विधि प्रासंगिक होती हुई दिखाई देती है। दासता के लम्बे कालखण्ड और आधुनिकता के शोर में हमने अपनी विरासत पर ध्यान देना बन्द कर दिया, परन्तु स्वस्थ भारत की सफल यात्रा के लिए अब स्वर्णप्राशन जैसी विधियों को फिर से प्रचारित करने की आवश्यकता है। व्यापक बाल-स्वास्थ्य की दृष्टि से देखें तो यह एक अत्यन्त रोचक परम्परा है। स्वर्णप्राशन के पूरे विज्ञान को समझने से पहले स्वर्णप्राशन शब्द को समझना भी आवश्यक है। ‘स्वर्ण’ अर्थात् सोना और ‘प्राशन’ अर्थात् ग्रहण करना, खाना या चटाना। अत: सामान्य अर्थ में स्वर्णप्राशन का आशय बालक को स्वर्ण के किसी संसाधित रूप का सेवन कराना है। यह समझना आवश्यक है कि स्वर्णप्राशन मूलत: किसी एक आधुनिक बोतल, किसी एक निश्चित औषधि अथवा केवल महीने में एक दिन दी जाने वाली कुछ बूँदों का नाम नहीं है। आयुर्वेद के विभिन्न ग्रन्थों में स्वर्ण के अनेक रूपों, उनके संस्कारों, उनके अनुपान और उनके विभिन्न प्रयोजनों का उल्लेख मिलता है। काश्यप संहिता में स्वर्णप्राशन का जो विशिष्ट वर्णन मिलता है, वह लेहन के प्रसंग में है; वहीं सुश्रुत संहिता में नवजात-शिशु के जातकर्म के प्रसंग में स्वर्ण, मधु और घृत के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। आधुनिक समीक्षा भी स्वर्णप्राशन को मुख्यत: दो सन्दर्भों लेहन और जातकर्म में रखती है।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सामान्यत: इसे बच्चों को स्वर्ण अथवा स्वर्ण भस्म का सेवन कराने की विधि के रूप में जाना जाता है और कुछ लोग इसे प्राय: रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली आयुर्वेदिक विधि के रूप में जानते हैं। लेकिन स्वर्णप्राशन को केवल ‘इम्युनिटी बढ़ाने की बूँदें या दवा’ कह देना उसके मूल स्वरूप को बहुत छोटा कर देना है। आयुर्वेद में इसका सम्बन्ध केवल रोगों से बचाव से नहीं, बल्कि मेधा, अग्नि, बल, आयु और बालक के समग्र विकास से जोड़ा गया है। स्वर्णप्राशन का सबसे स्पष्ट और प्रसिद्ध शास्त्रीय वर्णन महर्षि काश्यप की संहिता में मिलता है।

‘इम्युनिटी बूस्टर’ से भी आगे की चीज
काश्यपसंहिता के लेहनाध्याय में कहा गया है— स्वर्ण को स्वच्छ पाषाण पर घिसकर, अल्प जल के साथ मर्दित करके मधु और घृत के साथ शिशु को चटाने का विधान बताया गया है। इसके बाद काश्यप कहते हैं कि यह सुवर्णप्राशन मेधा, अग्नि और बल को बढ़ाने वाला, आयुष्यवर्धक, मंगलकारी, पुण्यकारी, वृष्य, वण्र्य तथा व्याधियों से रक्षा करने वाला है। एक महीने तक इसके सेवन से बालक के परममेधावी और छह महीने तक सेवन से श्रुतधर होने की बात कही गई है। यहाँ एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। काश्यप ने ‘इम्युनिटी बूस्टर’ शैली के किसी शब्द का प्रयोग नहीं किया है। ‘इम्युनिटी बूस्टर’ आधुनिक प्रतिरक्षा-विज्ञान की शब्दावली है और काश्यप का स्वर्णप्राशन ‘इम्युनिटी बूस्टर’ से भी आगे की चीज है। उन्होंने अग्नि, बल, मेधा, आयु और व्याधि से रक्षा क्षमता की भाषा में बात की। इसलिए यदि आज हम स्वर्णप्राशन को केवल ‘इम्युनिटी बूस्टर’ कहकर समझना चाहेंगे, तो हम स्वयं उसकी सीमा निर्धारित कर देंगे। उसके मूल में बालक के सम्पूर्ण स्वास्थ्य की कल्पना है। इम्यूनिटी बूस्ट होना एक हिस्सा भर है। स्वर्णप्राशन को आधुनिक टीकाकरण से तुलना करने पर सबसे पहले जो बात समझनी चाहिए, वह यही है। कुछ गहराई से समझें कि टीका किसलिए लगाया जाता है? किसी विशिष्ट संक्रामक रोग से सुरक्षा के लिए। किसी रोगजनक अथवा उसके विशिष्ट ‘एण्टीजन’ को पहचानने के लिए शरीर की प्रतिरक्षा-व्यवस्था को प्रशिक्षित किया जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी टीकाकरण को विशिष्ट संक्रमणों के विरुद्ध शरीर की प्राकृतिक प्रतिरक्षा को तैयार करने वाली प्रक्रिया के रूप में समझाता है; टीकाकरण से प्रतिरक्षा-तंत्र रोगजनक को पहचानता है, एण्टीबॉडी बनाता है और उसके विरुद्ध स्मृति विकसित कर सकता है। स्वर्णप्राशन का प्रश्न इससे कुछ अलग है। यह किसी एक वायरस या जीवाणु के ‘एण्टीजन’ को लेकर शरीर को उसके विरुद्ध प्रशिक्षित करने की विधि नहीं है। इसका लक्ष्य आयुर्वेदिक दृष्टि से शरीर में ऐसे सामथ्र्य का विकास करना है, जिसमें पाचन, धातुपोषण, बल, मेधा और रोग-प्रतिरोधक क्षमता का समुचित विकास हो। स्वर्णप्राशन से शरीर में ऐसी क्षमता विकसित होती है कि वह एक नहीं, अनेक रोगों के जीवाणुओं और विषाणुओं के विरुद्ध आवश्यक एण्टीबॉडी बना सके। इसलिए इसे ‘आयुर्वेदिक वैक्सीन’ कहना सरल तो है, परन्तु इसके काम को सीमित कर देना है। स्वर्ण प्राशन रोगों से बचाते हुए शरीर को ठीक दिशा में विकास की ओर ले जाता है, जबकि टीका या वैक्सीन केवल रोग विशेष के प्रति रोग-प्रतिरोधक क्षमता विकसित करता है। यह भी सम्भव है कि कोई वैक्सीन एक रोग से बचाए, परन्तु दूसरे रोगों के प्रति शरीर को संवेदनशील बनाए, जबकि स्वर्णप्राशन के साथ ऐसी आशंका नहीं हो सकती। दोनों में एक सामान्य बात अवश्य है—दोनों रोग होने के बाद केवल उपचार करने की अपेक्षा पहले से शरीर को तैयार करने की दिशा में काम करते हैं—लेकिन दोनों की कार्यपद्धति और लक्ष्य एक नहीं हैं।

आधुनिक उपकरणों से विश्लेषण
काश्यप का ‘मेधाग्निबलवर्धनम्’ शब्द अपने भीतर बहुत कुछ समेटे हुए है। मेधा केवल परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करने की क्षमता नहीं है। वह ग्रहण, धारण, स्मरण और विवेक से सम्बन्धित व्यापक बौद्धिक क्षमता है। अग्नि केवल भूख नहीं है; आयुर्वेद में यह भोजन के सम्यक् पाचन और उससे शरीर के लिए आवश्यक पोषण-प्रक्रिया का आधार है। बल केवल मांसपेशियों की शक्ति नहीं है; वह शरीर के समग्र सामथ्र्य से सम्बन्धित है। और जब काश्यप इसके साथ आयुष्य तथा व्याधियों से रक्षा की बात करते हैं, तब स्पष्ट हो जाता है कि स्वर्णप्राशन को किसी एक रोग की औषधि के रूप में नहीं देखा गया।

यहाँ हमें ‘स्वर्ण’ और ‘स्वर्ण भस्म’ के अन्तर को भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। यदि सोने का एक टुकड़ा किसी व्यक्ति के हाथ में दे दिया जाए और वह उसे निगल ले, तो उससे स्वर्णप्राशन नहीं हो जाता। साधारण धात्विक स्वर्ण अत्यन्त कम प्रतिक्रियाशील होता है। रसशास्त्र में धातु को उसी रूप में उपयोग में नहीं लाया जाता; उसे संस्कारित करके औषधीय रूप में परिवर्तित करने के बाद उसका औषधीय महत्त्व बनता है।

यह देखना आवश्यक है कि स्वर्ण भस्म का निर्माण शास्त्रोक्त विधि से हुआ है या नहीं और उसमें वास्तव में कितना स्वर्ण है, कोई अवांछित धातु तो नहीं है? उसका कण-आकार क्या है और उसका भौतिक-रासायनिक स्वरूप कैसा है—इन सबकी जाँच की जा सकती है और की जानी चाहिए। आधुनिक विज्ञान ने इस दिशा में कुछ अत्यन्त रोचक परिणाम दिए हैं। 2021 में प्रकाशित एक अध्ययन में स्वर्ण भस्म का आधुनिक उपकरणों से विश्लेषण किया गया। एक्स-रे डिफ्ऱैक्शन, इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी तथा एलिमेण्टल एनालिसिस जैसी विधियों से जाँच करने पर उस नमूने में 5-20 नैनोमीटर आकार के गोलाकार स्वर्ण-कण पाए गए। ग्रैविमीट्रिक एनालिसिस में लगभग 95 प्रतिशत स्वर्ण पाया गया और परीक्षण किए गए नमूने में पारे की उपस्थिति नहीं मिली।

अब वह प्रश्न आता है, जो किसी भी आधुनिक पाठक के मन में स्वाभाविक रूप से आएगा—क्या मनुष्य के बच्चों में भी इसका परीक्षण हुआ है? उत्तर है कि हाँ, कुछ अध्ययन हुए हैं। 102 स्वस्थ शिशुओं पर एक यादृच्छिक, नियंत्रित, एकल-अन्ध (Randomised, Controlled, Single-blind) नैदानिक परीक्षण किया गया। परीक्षण समूह को स्वर्ण भस्म, मधु और घृत दिया गया, जबकि नियंत्रण समूह को केवल मधु और घृत दिया गया। दोनों को चार सप्ताह तक दिया गया और उसके बाद आठ सप्ताह तक अनुवर्ती परीक्षण (Follow-up) किया गया। इसमें शारीरिक वृद्धि से सम्बन्धित मापदण्ड, रक्त सम्बन्धी मापदण्ड, जैवरासायनिक मापदण्ड तथा प्रतिरक्षा सम्बन्धी मापदण्ड का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में बच्चों की सामान्य वृद्धि पर स्वर्णप्राशन का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पाया गया। जैवरासायनिक मापदण्डों में भी ऐसा कोई संकेत नहीं मिला, जिससे उपचार ने सामान्य वृद्धि को बाधित किया हो। अनुवर्ती परीक्षण सहित पूरे अध्ययन में कोई औषधि-सम्बन्धी प्रतिकूल प्रतिक्रिया दर्ज नहीं हुई।

महत्वपूर्ण चिकित्सकीय संकेत
शोधकर्ताओं ने स्वर्णप्राशन को शिशुओं में सहनीय पाया। प्रतिरक्षी प्रोटीन इम्युनोग्लोबुलिन-जी के स्तर में भी दोनों समूहों के भीतर उपचार से परिवर्तन देखा गया। अध्ययनकर्ताओं ने प्रतिरक्षी प्रोटीनों के सामान्य स्तर पर आने से सम्बन्धित कुछ सकारात्मक परिणाम निकाले और उपचार से लाभ पाने के लिए आवश्यक रोगियों की संख्या का विश्लेषण भी किया। उनके अनुसार लगभग प्रत्येक 4.535 उपचारित शिशुओं में एक में प्रतिरक्षी प्रोटीनों के सामान्य स्तर पर आने से सम्बन्धित अतिरिक्त लाभ देखा गया। इसे स्वर्णप्राशन के सम्भावित प्रभाव का एक महत्त्वपूर्ण चिकित्सकीय संकेत माना जा सकता है।
स्वर्णप्राशन के इतिहास का एक और पहलू ध्यान देने योग्य है—पुष्य नक्षत्र। आज स्वर्णप्राशन का नाम आते ही पुष्य नक्षत्र का उल्लेख होने लगता है। अनेक आयुर्वेदिक केन्द्र महीने में एक बार पुष्य नक्षत्र के दिन स्वर्णप्राशन कराते हैं। पुष्य को पोषण और संवर्धन से सम्बन्धित शुभ नक्षत्र माना जाता है। लेकिन काश्यप के मूल स्वर्णप्राशन-वर्णन में पुष्य नक्षत्र का उल्लेख नहीं मिलता। वहाँ एक महीने और छह महीने तक सेवन की बात है। वैसे, आयुर्वेद की परम्परा में वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों के सङ्ग्रह में कई बार विशेष नक्षत्र का उल्लेख अवश्य मिलता है। आयुर्वेद के मूल सिद्धान्तों के अनुसार, स्वर्णप्राशन केवल औषधीय द्रव्यों का मिश्रण मात्र न होकर काल-प्रभाव और औषधीय प्रभावशीलता के समन्वय का एक विशिष्ट उदाहरण है। पुष्य नक्षत्र ‘पुष्’ धातु से निष्पन्न है, जिसका अर्थ पोषण और संवर्धन होता है, और इसके स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं, जिन्हें मेधा, ज्ञान तथा आरोग्य का कारक माना गया है। आयुर्वेद शास्त्र में औषध सेवन के लिए ‘काल’ की भूमिका को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि किसी विशेष नक्षत्र और प्राकृतिक ऊर्जा चक्र के दौरान शरीर के ‘धातु-अग्नि’ और चयापचय (Metabolism) का स्तर अनुकूलतम होता है। स्वर्ण भस्म, गव्य घृत, मधु और ब्राह्मी आदि मेध्य औषधियों का यह योग जब पुष्य नक्षत्र के सन्धिकाल में बच्चों को दिया जाता है, तब शरीर में इसकी जैव उपलब्धता और अवशोषण की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है, जिससे यह औषधि बच्चे के शरीर में रस, रक्त आदि धातुओं का पोषण कर उसकी व्याधिक्षमत्व (रोग प्रतिरोधक क्षमता), प्रज्ञा और मानसिक तीक्ष्णता को सर्वोत्कृष्ट रूप से समृद्ध करती है।

आश्चर्यजनक परिणाम
अब स्वर्णप्राशन में प्रयुक्त अन्य द्रव्यों की चर्चा भी आवश्यक है, क्योंकि आज बाजार में स्वर्णप्राशन के नाम पर अनेक औषधीय संयोजन (Formulation) मिलते हैं। कहीं स्वर्ण भस्म के साथ मधु और घृत हैं, कहीं ब्राह्मी, मण्डूकपर्णी, वचा, शंखपुष्पी, गुडूची, अश्वगन्धा आदि अनेक द्रव्य भी जोड़ दिए जाते हैं। यहाँ भी मूल शास्त्रीय पाठ को ठीक से पढऩा आवश्यक है। काश्यप के उक्त श्लोक में स्वर्ण को मधु और सर्पि अर्थात् घृत के साथ देने की बात है। उसके बाद उसी ‘लेहन अध्याय’ में आगे चलकर महर्षि काश्यप ने नवजात और बालकों के लिए विशेष मेध्य योग (Brain Tonics) बताए हैं, जिनमें अलग-अलग मेध्य द्रव्यों—ब्राह्मी, मण्डूकपर्णी, त्रिफला, चित्रक, वचा, शतपुष्पा, शतावरी, दन्ती, नागबला, त्रिवृत आदि—का उल्लेख आता है। उत्तरवर्ती आचार्यों और वैद्यों ने स्वर्णप्राशन की फलश्रुति (मेधा, बल और अग्नि की वृद्धि) को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए काश्यप संहिता के इन दोनों अंशों (स्वर्णप्राशन + मेध्य घृत) को एक व्यावहारिक योग के रूप में संयोजित कर दिया। स्वर्णप्राशन में प्रयोग किए जाने वाले घृत को इन्हीं औषधियों से विशेष रूप से सिद्ध किया जाता है।

सन् 2025 में उत्तर प्रदेश और बिहार में कई स्थानों पर इंसेफेलाइटिस से बचाव के लिए स्वर्णप्राशन का प्रयोग किया गया और अद्भुत ढंग से कारगर पाया गया। केजीएमयू, लखनऊ के चिकित्सकों ने पाया कि सहजनवा इलाके के भड़सार, तेलियाडीह, गोपलापुर, चिरईगाँव और परसाडाढ़ के बच्चों को इंसेफेलाइटिस से बचाव के लिए जब स्वर्णप्राशन की चन्द बूँदें दी गईं तो परिणाम आश्चर्यजनक रहा। लगभग दस हजार की आबादी वाले इस इलाके के इन पाँचों गाँवों में एक भी बच्चे को इंसेफेलाइटिस नहीं हुआ। ऐसे में आज स्वर्णप्राशन की प्रासंगिकता इस बात में है कि आधुनिक जीवन में स्वास्थ्य के बारे में हमारी चर्चा प्राय: रोग-केंद्रित हो गई है। कौन-सी बीमारी हुई, कौन-सी जाँच करानी है, कौन-सी दवा लेनी है, कौन-सा संक्रमण है, कौन-सा एण्टीबॉयोटिक है—यह सब आवश्यक है; लेकिन बच्चे की पाचन-क्षमता, नींद, बल, मानसिक विकास, आहार, दिनचर्या और दीर्घकालिक स्वास्थ्य की चर्चा उससे कहीं कम होती है। बात तो यह होनी चाहिए कि बचपन में रोग-प्रतिरोध की ऐसी क्षमता विकसित होने लगे कि बढ़ती उम्र में भी रोगों का पास आना कठिन हो जाए। आयुर्वेद इस खाली स्थान को भरने का दावा करता है। वह कहता है कि रोग हो जाने के बाद चिकित्सा करना ही पर्याप्त नहीं; ऐसा शरीर बनाना भी चिकित्सा का उद्देश्य है, जो अपने सामान्य सन्तुलन को बनाए रख सके। यही कारण है कि स्वर्णप्राशन को काश्यप ने मेधा, अग्नि, बल और आयु से जोड़ा। यह केवल ‘रोग नहीं होगा’ वाली विधि नहीं है; यह ‘बालक स्वस्थ कैसे विकसित हो’ वाली विधि है।

सरकारी स्तर पर मिले बढ़ावा
यदि आधुनिक परीक्षणों में स्वर्णप्राशन अपनी उपयोगिता सिद्ध करता दिखाई दे रहा है, तो प्रश्न है कि क्यों न इसे सरकारी स्तर पर भी बढ़ावा दिया जाए? केन्द्र और प्रदेश सरकारें अपनी तरफ से परीक्षण करवा सकती हैं, जिसका तरीका आसान है। जो परिवार स्वर्णप्राशन के लिए सहमत हों, उन परिवारों के हजार-दो हजार बच्चे चयनित किए जाएँ और उन्हें स्वर्णप्राशन दिया जाए। इसी तरह से इतने ही दूसरे बच्चों को प्रचलित टीके दिए जाएँ। इन सभी बच्चों की कुछ सालों तक निगरानी की जाए। यदि सामान्य टीके वाले बच्चों की तुलना में स्वर्णप्राशन वाले बच्चों का विकास बेहतर हो और उन पर रोगों का आक्रमण कम हो, तो मान लिया जाना चाहिए कि स्वर्णप्राशन एक उपयोगी विधि है और इसके बाद इसे राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य कार्यक्रमों का हिस्सा बना दिया जाए।

सोना एक महँगी धातु है, बावजूद इसके स्वर्णप्राशन कई टीकों से सस्ता हो सकता है। सरकारी योगदान हो तो इसे और सुलभ बनाया जा सकता है। उपलब्ध आँकड़ों की बात करें तो भारत में टीकाकरण का बाजार वर्तमान में लगभग 25,000 करोड़ रु. का एक विशाल उद्योग है। जहाँ सरकारी प्रतिरक्षण कार्यक्रम मुफ्त टीके उपलब्ध कराते हैं, वहीं निजी अस्पतालों और क्लीनिकों के माध्यम से 0 से 5 वर्ष तक के बच्चों के सम्पूर्ण टीकाकरण पर एक परिवार को औसतन 35,000 रु. से 65,000 रु. तक खर्च करने पड़ते हैं। इसके विपरीत, यदि स्वर्णप्राशन को एक व्यापक बाल-सुरक्षा और इम्युनिटी बूस्टर के रूप में अपनाया जाए, तो 5 वर्ष के दौरान प्रति बच्चा यह खर्च घटकर दसवाँ हिस्सा रह जाता है। इस प्रकार निजी क्षेत्र के महँगे टीकों के सापेक्ष केवल स्वर्णप्राशन को अपनाने से प्रति परिवार 30,000 रु. से 50,000 रु. की प्रत्यक्ष बचत हो सकती है, जो राष्ट्रीय स्तर पर आम जनता के हजारों करोड़ रुपए की आर्थिक राहत का कारण बन सकती है।
हजारों वर्षों की इस आजमाई हुई परम्परा को केवल अतीत की स्मृति बनाकर रखने के बजाय आज के बाल-स्वास्थ्य के सन्दर्भ में फिर से समझने और अपनाने का समय आ गया है। आवश्यकता केवल इतनी है कि स्वर्णप्राशन शुद्ध द्रव्यों, शास्त्रोक्त विधि और योग्य मार्गदर्शन के साथ प्रत्येक बालक तक पहुँचे। यदि स्वस्थ भारत का स्वप्न देखना है, तो स्वर्णप्राशन जैसी अपनी परम्पराओं को घर-घर पहुँचाना उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।