प्रो. लल्लन प्रसाद
अध्यक्ष, कौटिल्य फाउंडेशन, दिल्ली
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य-व्यवस्था, कूटनीति, अर्थनीति और युद्धकला का अत्यंत सूक्ष्म एवं व्यावहारिक विवरण मिलता है। आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) ने राज्य की रक्षा तथा शत्रुओं के दमन के लिए प्रत्येक उपलब्ध संसाधन के उपयोग का निर्देश दिया है। इसी क्रम में अर्थशास्त्र का 14वाँ अधिकरण विशेष रूप से औषधियों, रसायनों, विषों तथा विभिन्न प्रकार के गुप्त योगों (नुस्खों) के निर्माण और उनकी प्रयोग-विधियों के लिए समर्पित है। इस अधिकरण में प्राचीन भारतीय विष-विज्ञान, आयुर्वेद और रसायनशास्त्र का एक अनूठा समन्वय देखने को मिलता है। रासायनिक युद्ध (केमिकल वॉरफेयर) की अवधारणा चाणक्य ने 2500 वर्ष पूर्व ही प्रस्तुत कर दी थी। अर्थशास्त्र में ऐसी रासायनिक औषधियों के निर्माण और प्रयोग-विधि का वर्णन मिलता है, जो शत्रु की सेना को बेहोश कर दें, अंधा कर दें, भयंकर रोगों से ग्रस्त कर दें अथवा मृत्यु के घाट उतार दें। युद्ध में इन्हें उचित माना गया था। औषधियों का उद्देश्य केवल जीवन-रक्षा या चिकित्सा करना नहीं था, बल्कि ‘औपनिषदिक’ (रहस्यमयी अथवा गुप्त) उपायों द्वारा शत्रु का विनाश करना, गुप्तचरों की रक्षा करना तथा युद्ध में मनोवैज्ञानिक बढ़त प्राप्त करना भी था।
14वें अधिकरण का नाम ‘औपनिषदिक’ है। इसमें कुल चार अध्याय हैं। कौटिल्य ने स्पष्ट किया है कि इन औषधियों और रसायनों का निर्माण पूर्णत: राजकीय नियंत्रण में तथा अत्यंत गोपनीय ढंग से किया जाना चाहिए। इसका प्रमुख उद्देश्य धर्म और न्याय की रक्षा के लिए अधार्मिक तथा शत्रु राजाओं को दुर्बल करना है। कौटिल्य के अनुसार—
‘चातुर्वण्र्यरक्षार्थमौपनिषदिकमधर्मिष्ठेषु प्रयुञ्जीत।’
अर्थात्, राजा को चाहिए कि वह चारों वर्णों की रक्षा के लिए अधार्मिक व्यक्तियों पर औपनिषदिक प्रयोग करे। शत्रु के विनाश तथा अपने राज्य की रक्षा के लिए मंत्र, तंत्र, औषधि और विषों का प्रयोग पूरी तरह न्यायसंगत माना गया है।
कौटिल्य ने विभिन्न प्रकार की औषधियों के निर्माण के लिए वानस्पतिक, खनिज तथा जंतु-आधारित घटकों के जटिल मिश्रण तैयार करने की विधियाँ बताई हैं। शत्रु सेनापति, राजा अथवा गुप्तचरों को समाप्त करने के लिए 14वें अधिकरण के प्रथम अध्याय में जिन अत्यंत तीव्र विषैली औषधियों के निर्माण का उल्लेख है, उनमें प्रमुख हैं— प्राणघातक औषधियाँ, अंधा करने वाला धुआँ तथा पागल या बेहोश करने वाला मदन-रस। शत्रु-वध के लिए हवन-मंत्र भी दिया गया है— “आदित्य नमस्ते! अनुमति नमस्ते! सरस्वती नमस्ते! अग्नेय स्वाहा। सोमाय स्वाहा! भू: स्वाहा! भुव: स्वाहा!”
अधिकरण 14 के दूसरे अध्याय “प्रलंभन योग” में अद्भुत प्रयोगों का वर्णन है। इसमें भूख रोकने, शरीर में कुष्ठ उत्पन्न करने, शरीर का रंग बदलने, शरीर में जलन उत्पन्न करने, अंगारों पर चलने, मुँह से आग और धुआँ निकालने तथा बेडिय़ाँ और हथकडिय़ाँ तोडऩे वाली औषधियों के निर्माण एवं प्रयोग की विधियाँ बताई गई हैं। यद्यपि ये अनिष्टकारी हैं, फिर भी शत्रुता बढ़ जाने की स्थिति में इनके प्रयोग का उल्लेख किया गया है।
तीसरे अध्याय में ऐसी औषधियों का वर्णन मिलता है, जिनके प्रयोग से रात्रि के घोर अंधकार में भी दिखाई देना, छाया रहित विचरण करना तथा दृष्टि से अंतर्धान हो जाना संभव बताया गया है। ताला तोडऩे और बंद द्वार खोलने के मंत्र भी दिए गए हैं। इन औषधियों और मंत्रों का उद्देश्य शत्रुओं का विनाश तथा स्वजनों का हित करना बताया गया है। शत्रु की सेना में भ्रम उत्पन्न करने अथवा किसी विशिष्ट व्यक्ति को अपने वश में करने के लिए मतिभ्रम उत्पन्न करने वाली औषधियों का भी उल्लेख है। शत्रु के किले अथवा छावनी में महामारी फैलाने के लिए विशेष प्रकार के सडऩ उत्पन्न करने वाले तथा संक्रामक मिश्रण तैयार किए जाते थे, जिनसे गैस अथवा तीक्ष्ण धुआँ उत्पन्न हो सके।
औषधियों और विषों का निर्माण जितना महत्वपूर्ण था, कौटिल्य ने उनके प्रयोग की विधियों का भी उतना ही सटीक और कूटनीतिक ढंग से वर्णन किया है। किले के भीतर प्रवेश करने अथवा शत्रु की सेना को आगे बढऩे से रोकने के लिए जलस्रोतों (कुएँ, बावडिय़ों और नदियों) में औषधि-मिश्रण डालने का विधान था। कौटिल्य निर्देश देते हैं कि गुप्तचरों को व्यापारियों अथवा रसोइयों के वेश में शत्रु के शिविर में प्रवेश करना चाहिए और भोजन में सुई की नोक के बराबर अथवा अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में औषधि मिला देनी चाहिए। ‘परसैन्यवध’ (शत्रु सेना के वध) के लिए विषैले धुएँ के प्रयोग का भी विस्तार से वर्णन किया गया है, जिसे वायु की दिशा के अनुसार जलाया जाता था। जब यह धुआँ शत्रु के शिविर की ओर जाता था, तब सैनिक या तो अंधे हो जाते थे अथवा मूर्छित होकर गिर पड़ते थे। औषधियों को त्वचा अथवा आँखों के माध्यम से शरीर में पहुँचाने के लिए शत्रु-राजा के वस्त्रों, जूतों, छत्र अथवा बिस्तर पर अदृश्य विषैले लेप लगाए जाते थे। इसके अतिरिक्त, आँखों में लगाए जाने वाले अंजन (काजल) के रूप में भी सम्मोहक औषधियों का प्रयोग किया जाता था। युद्ध के मैदान में बाणों की मारक क्षमता बढ़ाने के लिए उनकी नोक पर औषधि और विष का गाढ़ा लेप लगाया जाता था, ताकि केवल एक खरोंच से भी शत्रु की मृत्यु सुनिश्चित हो सके।
14वें अधिकरण के चौथे अध्याय में केवल दूसरों को हानि पहुँचाने वाली औषधियों का ही वर्णन नहीं है, बल्कि अपने राजा, सैनिकों और गुप्तचरों की रक्षा के लिए चिकित्सा-व्यवस्था का भी उल्लेख है। कौटिल्य का मानना था कि जिस विष का प्रयोग हम दूसरों पर करते हैं, उसका प्रभाव हम पर भी पड़ सकता है। उन्माद शांत करने, शिरोरोग दूर करने तथा बेहोशी समाप्त करने वाली औषधियों के निर्माण और प्रयोग का भी विवरण मिलता है। औषधि को स्वर्ण-पत्र में रखकर ताबीज बनाने का भी उल्लेख है, जिसे धारण करने वाले पर विष का प्रभाव नहीं होता। अन्य रक्षात्मक प्रयोगों में अग्नि-प्रतिरोधक लेप, विष-निरोधक तथा जल-शुद्धि योग आदि सम्मिलित हैं।
कौटिल्य ने औषधियों के प्रयोग को अंधविश्वास और धर्म से भी जोड़ा, ताकि शत्रु सेना के मनोबल को तोड़ा जा सके। गुप्तचर इन औषधियों का प्रयोग कर ‘चमत्कार’ प्रदर्शित करते थे। इनमें आँखों की रोशनी गायब करने (अदृश्य होने) के लिए कुछ विशिष्ट जड़ी-बूटियों के रस को आँखों में डालकर अंधकार में भी देखने की क्षमता विकसित करना अथवा दूसरों को भ्रमित करना कि वे अदृश्य हो गए हैं, तथा भूख-प्यास पर नियंत्रण के लिए जंगलों अथवा मरुस्थलों में लंबे समय तक बिना भोजन-पानी के रहने हेतु ‘क्षुधा-नाशक’ (भूख मिटाने वाली) गोलियों का निर्माण करना, जो आज के समय के ‘सप्लीमेंट्स’ जैसी थीं, जैसे प्रयोग सम्मिलित हैं।
चाणक्य-प्रणीत सूत्र जहाँ एक ओर भारतीय जीवन-दर्शन का सुंदर चित्रण करते हैं, वहीं अर्थशास्त्र में समृद्ध, शक्तिशाली और खुशहाल राज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की गई है, जिसकी स्थापना, संचालन, विकास और विस्तार के लिए व्यावहारिक निर्देश दिए गए हैं। चाणक्य जैसा कूटनीतिज्ञ पूरे विश्व में दूसरा नहीं हुआ; आज भी कूटनीति चाणक्य के नाम से ही पहचानी जाती है। अर्थशास्त्र का 14वाँ अधिकरण ‘औपनिषदिक’ इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है।





