गोमाता की महिमा

प्रो. विवेकानंद तिवारी
अध्यक्ष, आम्बेडकर पीठ, एचपीयू, शिमला


गोवंश भारतीय जीवन, संस्कृति, इतिहास का अटूट अंग है यानी जबसे सृष्टि की रचना हुई तभी से गो इतिहास का भी प्रारम्भ होता है। संसार में अतुलनीय हैं गोमाता। सारे भारत में कहीं भी चले जाइए और सारे तीर्थ स्थानों के देवस्थान देख आइए। आपको अधिक-से-अधिक दस-बीस देवी-देवता मिल जाएंगे, पर सारे भूमंडल में ढूंढने पर भी ऐसा कोई देवस्थान या तीर्थस्थान, ऐसा दिव्य मंदिर, दिव्य तीर्थ देखना हो तो बस वह आपको गोमाता के दर्शन से बढ़कर न कोई देव स्थान है, न कोई जप-तप है, न ही कोई सुगम कल्याणकारी मार्ग है। न कोई योग-यज्ञ है और न कोई मोक्ष का साधन ही।
तीर्थों में तीर्थराज प्रयाग, उसी प्रकार देवी-देवताओं में अग्रणी गोमाता को बताया गया है। गोमाता के रोम-रोम में देवी-देवताओं का एवं समस्त तीर्थों का वास है। गोमाता को एक ग्रास खिला दीजिए तो वह सभी देवी-देवताओं को पहुंच जाएगा। इसीलिए धर्मग्रंथ बताते हैं कि समस्त देवी-देवताओं एवं पितरों को एक साथ प्रसन्न करना हो तो गोभक्ति-गोसेवा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है। गोमाता के दर्शन मात्र से ऐसा पुण्य प्राप्त होता है जो बड़े-बड़े यज्ञ, दान आदि कर्मों से भी नहीं प्राप्त हो सकता।

सनातन सत्य गोमाता में है, समस्त तीर्थ गाय, गोपाल, गीता, गायत्री तथा गंगा धर्मप्राण भारत के प्राण हैं, आधार हैं। इनमें गोमाता का सर्वोपरि महत्व है। पूजनीय गोमाता, हमारी ऐसी मां हैं, जिनकी बराबरी न कोई देवी-देवता कर सकता है और न कोई तीर्थ। जिस गोमाता को स्वयं भगवान कृष्ण नंगे पांव जंगल-जंगल चराते फिरे हों और जिन्होंने अपना नाम ही गोपाल रख लिया हो, उसकी रक्षा के लिए उन्होंने गोकुल में अवतार लिया। रघुवंश के राजा दिलीप गोसेवा के पर्याय और रामजन्म सुरभि गाय के दुग्ध द्वारा तैयार खीर से माना गया है, कृष्ण, जो गोपाल के नाम से जाने गए ने पूर्ण बृजक्षेत्र की रक्षा गोवर्धन पर्वत उठा कर की और माखनचोर कहलाये।

औषधियों के स्वामी धन्वन्तरि ने गोभक्ति और गोसेवा कर आरोग्य प्रदायनी गो दुग्ध, गो घी, गोदधि, गोमूत्र और गोबर के मिश्रण से पंचगव्य की रचना की। यहां तक कि गाय के गोबर और मूत्र को एक पर्यावरण रक्षक के रूप में माना जाता था और फर्श और घरों की दिवारों रसोई में इस्तेमाल किया गया था, शुद्ध रहने के लिए हर घर और मानव शरीर पर गोमूत्र छिड़काव एक आम बात थी।

गोकुल यानी जहां 10,000 से अधिक गोवंश हों और नन्द जो की हजारों गोवंश का अधिपति हो जाना जाता था। सनातन धर्म में कन्या को दुहिता का नाम दिया है, यानी दुग्ध को दोहन करने वाली। गाय का दान एक सबसे महान दान माना जाता है। शास्त्रों में कहा है सब योनियों में मनुष्य योनी श्रेष्ठ है, क्योंकि वह गोमाता की निर्मल आभा में अपने जीवन को धन्य कर सकते हैं। मानव संरक्षण, कृषि और अन्न उत्पादन में गौवंश का अटूट सहयोग और साथ रहा है। इसी कारण हमारे शास्त्र वेद पुराण गो महिमा से भरे हुए हैं।
अर्थववेद में कहा गया है-

मित्र ईक्षमाण आवृत आनंद: युज्यमानों
वैश्वदेवोयुक्त: प्रजापति विर्मुक्त: सर्पम्।
एतद्वैविश्वरूपं सर्वरूपं गौरूपम् उपैनंविश्वरूपा:
सर्वरूपा: पशवस्तिष्ठन्ति य एवं  वेद।।

अर्थात् देखते समय गो मित्र देवता है, पीठ फेरते समय आनंद है। हल तथा गाड़ी में जोतते समय (बैल) विश्वदेव, जाने पर प्रजापति तथा जब खुला हो तो सबकुछ बन जाता है। यही विश्वरूप अथवा सर्वरूप है, यही गोरूप है। जिसे इस विश्वरूप का यथार्थ ज्ञान होता है उसके पास विविध प्रकार के पशु रहते हैं। अथर्ववेद में ही कहा गया है ब्राह्मण तथा क्षत्रिय विश्वरूप गो के नितंब हैं। गंधर्व पिंडलियां तथा अप्सरायें छोटी हड्डियां हैं। देवता इसके गुदा हैं, मनुष्य आते, अन्य प्राणी अमाशय हैं। राक्षस रक्त तथा इतर मानव पैर हैं। प्रभु राम के वनवास गमन के पश्चात् जब भरत उनसे मिलने वन में गये तो प्रभु का पहला प्रश्न भरत से यही था कि तुम्हारे राज्य में गाय तो ठीक से हैं न। (स्कंदपुराण आवंत्यखंड रेखाखंड अध्याय-13)
गो रूपी तीर्थ में गंगा आदि सभी नदियाँ और तीर्थों का वास है, उनकी परम पवित्र धूलि में पुष्टि विद्यमान है, उनके गोबर में साक्षात लक्ष्मी की मूर्ति है और उन्हें प्रणाम करने से व्यक्तिगत धर्म-सम्पन होता है। मूलत: गो सदा-सर्वदा प्रार्थना करने योग्य है। (विष्णुधर्मकोटि पुराण : 2.42.58)