ब्रि. डॉ. राजबहादुर शर्मा
लेखक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं इतिहासकार हैं।
भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति लागू करते समय राष्ट्र भावना को महत्व देने के संकल्प को चरितार्थ करते हुए विद्यालयी स्तर पर इतिहास विषय के पाठ्यक्रम में रामायण और महाभारत काल को सम्मिलित करने का निर्णेय किया है। इस दृष्टि से पाठ्यक्रम को चार भागों, प्राचीन काल, मध्य काल , बर्तानवी काल एवं नवभारत काल, में बांटा गया है। प्राचीन काल के अध्ययन में रामायण और महाभारत वर्णित घटनाओं को मात्र पौराणिक कथायें न मानकर उन्हें ऐतिहासिक घटनाओं के अनुरूप पढऩा और पढ़ाना सम्मिलत रहेगा। भारतीय काल गणना के अनुसार श्री रामायण के महानायक भगवान श्रीराम का जन्म त्रेता युग में और श्री महाभारत के महानायक भगवान श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग के अंत में होने के कारण इन दोनों घटनाओं में एक बहुत लम्बा अंतराल रहा है। आधुनिक इतिहासज्ञों के अनुसार भी यह अंतराल 8000 से 9000 वर्षों का तो था ही।
इस लेख की विषय वस्तु रामायण कालीन अस्त्र शस्त्र ही है ,अत: श्रीराम के समकालीन और आदि ऋषि के रूप में प्रख्यात महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित श्री रामायण को आधार मान कर ही प्रस्तुत जानकारी जुटाई गयी है। शस्त्रों में ऐसे सभी हथियार सम्मिलित रहते हैं जिन्हें योद्धा अपने हाथ /हाथों में पकड़ कर/ पकड़े रखकर ही अपने शारीरिक बल के प्रयोग से शत्रु पर काटने अथवा मारक चोट पहुँचाने के लिए वार करता है जैसे कि फरसा, तलवार, गदा , मुसल आदि (Hatchet, sword ,mace ,club and the like), जबकि अस्त्रों में वे सभी हथियार सम्मिलित रहते हैं जिन का प्रक्षेपण किया जाता है जैसे कि भाला, बाण, प्रक्षेपणास्त्र आदि (spear , arrow , missile etc)।
अस्त्र शस्त्रों की उत्पत्ति
सभी अस्त्र शस्त्र प्रजापति के पुत्र कृशाश्व की जया और सुप्रभा नामक दो पत्नियों की संतान हैं । दोनों ने सौ अस्त्र शस्त्रों को जन्म दिया जो रूप रहित हैं, अर्थात जिन का रूप, मारक क्षमता एवं प्रभाव आदि समय, आवश्कता और परिस्थिति के अनुरूप बदल जाता है अथवा बदला जा सकता है । इन उपकरणों के साथ ही युद्ध कला में निपुणता के अनेक सधनों का भी वर्णन मिलता है जिन में बला एवं अतिबला नामक दो अति प्रभाशाली मंत्र समुदाय योद्धाओं की निजी क्षमताओं को विपुलता प्रदान करते हैं। ये दोनों समुदाय युद्धज्ञान की जननी हैं और ब्रह्मा जी की पुत्रियां हैं । महर्षि विश्वामित्र ने तपोबल से प्राप्त करके इन सभी अस्त्र शस्त्रों का ज्ञान श्री राम को सम्पूर्ण जगत की रक्षा हेतु दिया। उनहों ने कहा ‘ महाबाहु राजकुमार श्रीराम ! ये सभी अस्त्र इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, महान , बल से संपन्न तथा परम उदार हैं। तुम शीघ्र ही इन्हें ग्रहण करो।’ (बाल कांड सत्ताईसवाँ सर्ग/21) . इन के अतिरिक्त राजऋषि विश्वामित्र ने सत्यवान आदि पचास प्रकार के और अस्त्र श्रीराम को दिए।
विश्वामित्र बोले ‘रघुकुलनन्दन राम ! तुम्हारा कल्याण हो ! तुम अस्त्र विद्या के सुयोग्य पात्र हो , अत: निम्नांकित अस्त्रों को भी ग्रहण करो-सत्यवान ,सत्यकीर्ति ,धृष्ट ,रमस , पतिहारतर ,परांगमुख , अवांगमुख, लक्ष्य, अलक्ष्य, दृढऩाभ, सुनाम, दशाक्ष , शतववस्त्र, दशशीर्ष, शतोदार, पद्मनाभ, महानाभ, दुंदुनाभ, स्वनाम, ज्योतिष, शकुन, नैराशय, विमल, दैत्यनाशक, यौगन्धर और विनिद्र, शुचिबाहु , महाबाहु, निष्कलि, विरूच, शार्चिमली, धृतिमालि, वृतिमान, रूचिर, पित्र्य, सौमनस, विधूत, मकर, परवीर, रति, धन, धान्य, कामरूप, कामरूचि, मोह, आवरण, जृम्भक, सर्पनाथ, पन्थान और वरुण-ये सभी प्रजापति कृशाश्व के पुत्र हैं। ये सभी इच्छानुसार रूप धारण करने वाले और परम तेजस्वी हैं। तुम इन्हें ग्रहण करोÓ। (बाल काण्ड सर्ग 28 /4 -10 ). समय समय पर, विषेशकर लंका युद्ध में कुम्भकरण और रावण जैसे राक्षस महा प्राकर्मी दुर्दांतयोद्धाओं का इन्हीं अस्त्रों द्वारा अंत हुआ। ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से ही श्रीराम ने राक्षस राज रावण का वध किया था। ‘श्रीराम ने अत्यंत कुपित हो बड़े यत्न के साथ धनुष को पूर्ण रूप से खींचकर उस मर्मभेदी बाण को रावण पर चला दिया। शरीर का अंत कर देने वाले उस महान वेगशाली श्रेष्ठ बाण ने छूटते ही दुरात्मा रावण के हृदय को विदीर्ण कर डाला ‘( सर्ग 108 /16,17,18 )
विषय व्यापति
रामायण के बाल काण्ड के 14, अयोध्या काण्ड के 8, अरण्य काण्ड के 16, किष्किंधा काण्ड के 10 ,सुन्दर काण्ड के 18 ,युद्ध काण्ड के 76 और उत्तर काण्ड के 19 सरगों में लगभग 241 बार युद्ध कला से सम्बंधित विषयों का वर्णन मिलता है। इनमें अधिकतर अस्त्र शस्त्रों के नामों और क्षमताओं का ही सन्दर्भ है, उनके स्वरुप का नहीं। वस्तुत: उन सभी के अरूप होने के कारण यह कार्य प्रत्येक पीढ़ी को अपने समीचीन अस्त्र शस्त्रों के अनुसार ही करना होता है। हथियारों के अतिरिक्त अनेक स्थानों पर योद्धा एवं युद्ध
सम्बन्धी बहुत से दूसरें उपकरणों का उल्लेख भी हुआ है जैसे कि पाश, कवच, विमानन, बाणों को धार देने वाले सारण और क्षति ग्रस्त शस्त्रों की मरम्मत करने के साधन, चलते युद्ध के समय हथियारों की आपूर्ति- प्रक्रिया, संजीवनी जैसी औषधियां, सैन्य टुकडिय़ों की संरचना आदि।
साधारण मान्यता यह है कि श्रीराम केवल धनुष-बाण के ही ज्ञाता और प्रयोगकर्ता थे
, परन्तु तथ्य यह है कि सभी प्रकार के अस्त्र शास्त्रों के सभी रूपों पर उनका पूर्ण अधिकार था। उन की पकड़ बहुत विस्तृत थी जैसे कि 1. आग्नेय अस्त्र, 2. पर्जन्य अस्त्र,3. पन्नग अस्त्र,4. गरुड़ अस्त्र,5. ब्रह्मास्त्र,6. शुपत अस्त्र, 7. वैष्णव नारायणास्त्र, 8. वायव्य अस्त्र, 9. ब्रह्मशिरा अस्त्र,10. एकाग्नि अस्त्र,11. शक्तिअस्त्र,12. तोमर अस्त्र,13. पाश अस्त्र,14. ऋष्टि अस्त्र,15. मुद्गर अस्त्र, 16. गदा शस्त्र,17. शूल अस्त्र,18. चक्र अस्त्र,19. वज्र अस्त्र,20. त्रिशूल अस्त्र21. असि अस्त्र,22. खड्ग शस्त्र,23. फरसा शस्त्र 24. चन्द्रहास शस्त्र 25. मुशल शस्त्र, अस्त्र,26. धनुष शस्त्र ,27. बाण अस्त्र,28. परिघ अस्त्र29. भिन्दिपाल अस्त्र,30. नाराच अस्त्र,31. परशु शस्त्र , 32. कुण्टा अस्त्र,33. शंकु बर्छी शस्त्र , 34. पट्टिश अस्त्र,35. वशि अस्त्र,36. भुशुण्डी अस्त्र.
इन अस्त्रों-शस्त्रों के अतिरिक्त भी अन्य अनेक अस्त्र हैं, जिनका वर्णन उनके विषय में अल्प जानकारी होने के कारण नहीं कर सके हैं । धनुर्वेद, धनुष-चन्द्रोदय और धनुष-प्रदीप तीन ग्रन्थों में ‘परमाणु’ – शक्ति के निर्माण का भी उल्लेख मिलता है। ( स्वर्गीय प्रोफेसर श्री रामदास जी गौड़ के वर्ष 1995 में प्रकाशित ग्रन्थ ‘हिंदुत्व ‘ से साभार ) इन ग्रंथों के रचना काल की सप्रमाण जानकारी न होने के कारण तथा उनका उल्लेख श्री रामायण में न होने के कारण परमाणु शक्ति को सम्मिलित नहीं किया गया है अपितु ऐसी शक्तियों का उल्लेख अवश्य हुआ है जिन की मारक क्षमता परमाणु शक्ति से कम नहीं थी।
अस्त्र शस्त्रों का वर्गीकरण
लोकभाषा में जिन तीन शब्दों का प्रयोग हथियारों के वर्गीकरण के लिए किया जा सकता है वे हैं ‘जंतर ,मंतर और तंतर’ जिनका सही स्वरुप है ,’ यंत्र’ अर्थात कोई उपकरण अथवा मशीन (An instrument or a machine ), इस में योद्धा स्वयं उपकरण रहता है, धनुष भी एक उपकरण मात्र है हथियार तो बाण ही रहता है । दूसरा है ‘मंत्र’ अर्थात पुनीत शब्दावली, सूत्र , अथवा संकेतक आदि ( A sacred te&t , a formula, a code and the like) इस में किसी भी हथियार के प्रयोग करने के लिए कोई ऐसा संकेतक निश्चित रहता है जिस का पालन करने पर ही उसे चलाया जा सकता है ताकि वह घातक हथियार कोई योग्य अधिकारी ही प्रयोग कर पाए। तीसरा है ‘ तंत्र ‘ अर्थात प्रणाली , व्यवस्था , क्रमबद्धता ,निकाय, तरीका आदि (System, warp and woof , mystical formulae and the like). अत्यंत घातक हथयारों का निर्णय लगभाग अंतिम बलप्रयोग के लिए ही करने के लिए मन्त्र और तंत्र दोनों के समिश्रण से एवं अत्यंत गोपनीयता से ही इन हथियारों को साधा जाता है। इस प्रकार के अस्त्रों का प्रयोग निर्णेय केवल सर्वोच्य सक्षम अधिकारी ही कर सकता है।
उपसंहार
बाल्मीकि रामायण में वर्णित अस्त्र शस्त्रों का उपरोक्त वर्गीकरण कालातीत रहा है। विश्वभर में सदा से ही हथियार किसी न किसी मशीन, कोड अथवा सिस्टम के अनुसार ही बनते और समृद्ध होते आये हैं। श्री रामायण में वर्णित एवं प्रयुक्त अस्त्र शस्त्र इस तथ्य के साक्षी हैं कि प्राचीन भारत में युद्धकला बहुत विकसित थी और उसे दिव्य कलाओं में गिना जाता था। यह कोई साधारण सत्य नहीं है कि उस समय महाराज दशरथ जैसे राजा देवासुर संग्राम में सेना नायक रहे , उन की पत्नी कैकेयी युद्धक्षेत्र में योद्धा के रूप में उन के संग रहीं, स्वंय न केवल श्री राम अपितु अयोध्या के चारों राजकुमार अद्वितीय योद्धा थे, धनुर्वेद नामक उपवेद के रचियता महऋषि वशिष्ठ , सभी आयुधों के ज्ञाता राजऋषि विश्वामित्र और अनेकों युद्धों के विजेता भगवान परशुराम उस कालखण्ड के महानायक रहे। क्या विश्व के इतिहास में कहीं ऐसा उदाहरण मिलता है कि जहाँ कोई सम्राट अपनी इकलौती सन्तान के स्वंवर के लिए पिनाक सरीखे धनुष की प्रत्यंचा चढाने की शर्त रखे।
वास्तव में, श्री रामायण भारत के गौरव और वीर्य की पराकाष्ठा की कहानी है।





