ब्रजेश कुमार मिश्र, आई.पी.एस.
लेखक पुलिस अधीक्षक पुलिस ट्रेनिंग कालेज सुल्तानपुर (उ. प्र.)।
प्राचीन काल से ही मन्दिर भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र रहे हैं। मन्दिर वास्तुकला ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में महती भूमिका निभाई है। भारत में मन्दिर पूजा, आध्यात्मिक चिंतन और सामुदायिक समरोहों के केंद्र बिंदु के रूप में काम करते थे। प्राचीन काल में संचार के तीव्र साधन उपलब्ध न होने तथा नगरीय व्यवस्था सुदृढ़ रूप में विकसित न होने के कारण मंदिरों के आस पास मेलों का आयोजन किया जाता था ताकि लोग एक दूसरे से मिलजुल सकें तथा अपनी दैनिक जरूरतों की चीजों को वहां से खरीद सकें। मंदिरों पर लगने वाले मेलों के दौरान ही राजाओं द्वारा सांस्कृतिक और शासकीय आदेश भी जारी किये जाते थे। प्राचीन काल में राजा मन्दिर निर्माण पर विशेष जोर देते थे क्योंकि इसके द्वारा जहाँ एक ओर वे अपनी राजसत्ता के प्रति धार्मिक एवं दैवीय वैधता प्राप्त करते थे वहीं अपने आदेशों को जनसमुदाय तक आसानी से पहुंचा पाते थे। हिन्दू मन्दिर केवल धार्मिक और आध्यात्मिक स्थान ही नहीं थे बल्कि वे शिक्षा के अद्भुत केंद्र भी थे। मन्दिर परिसरों में स्थापित गुरुकुलों में संतों और आचार्यों के द्वारा छात्रों को वैदिक ज्ञान विज्ञान की शिक्षा दी जाती थी। मन्दिर हमारी सामाजिक गतिविधियों के भी केंद्र थे जहाँ पर लोग शादी, ब्याह, बच्चों का मुंडन जैसे कार्य सम्पन्न करते थे। भारतीय मन्दिर निर्माण कला अपने गहन प्रतीकवाद, ज्यामितीय एवं गणितीय समानुपात और आध्यात्मिक महत्त्व के लिए प्रसिद्ध है। भारतीय मंदिरों में पाए जाने वाले सामान्य घटकों में गर्भगृह उस पवित्र स्थान का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ देवता की मूर्ति रखी जाती है। सामान्य भाषा में इसे देवता का निवास स्थान भी कह सकते हैं। मन्दिर का ऊँचा विमान या शिखर मन्दिर की विराटता और भव्यता को प्रदर्शित करता है। मण्डपम् धार्मिक अनुष्ठानों और समरोहों के लिए एक सभा हाल के रूप में कार्य करता है। ध्यान मण्डपम् आध्यात्मिक विचार विमर्श का हॉल होता था जबकि कल्याण मण्डपम् शादी, ब्याह आदि समारोहों के लिए प्रयुक्त होता था। मन्दिर का गोपुरम् विस्तृत मूर्तियों के साथ प्रवेश द्वार को चिन्हित करता है। प्रदक्षिणापथ मन्दिर के गर्भगृह के चारों ओर एक परिक्रमा पथ होता है जिसे भक्त भगवान को प्रसन्न करने के लिए लगाता है। मन्दिर की चहार दिवारी पूरे मन्दिर प्रांगण की सुरक्षा के लिए बनायीं एक ऊँची प्राचीर होती है जिस पर कई धार्मिक प्रतीक जैसे सिंह, हाथी, सर्प, बैल, गाय आदि जानवरों की प्रतिमायें बनी होती हैं। मन्दिर के ये सभी घटक मिलकर मंदिर के माहौल को आध्यात्मिक और चमत्कारिक बनाते हैं। भारतीय मंदिरों को ऐसे स्थान के रूप में डिज़ाइन किया गया है जहाँ आध्यात्मिक और भौतिक, स्थूल और सूक्ष्म, शान्त और अनन्त, जीव और ब्रह्म, आत्मा और परमात्मा, लौकिक और पारलौकिक जगत एक दूसरे से मिलते हैं तथा जहाँ भक्त परम ध्यान और परम शान्ति का अनुभव प्राप्त करता है। इन मंदिरों को बनाने में गणित और ज्यामिति के अद्भुत सिद्धांतों का प्रयोग किया जाता है जैसे – मन्दिर के गोपुरम की दिशा, देवता की स्थिति, मन्दिर के प्रदक्षिणापथ के आधार और विमान की ऊँचाई का अनुपात, मूर्ति की लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई आदि। प्राचीन भारत के कई ग्रंथों में मन्दिर निर्माण की शास्त्रीय और ज्यामितीय विधि का वर्णन किया गया है इनमें विश्वकर्मा वास्तु शास्त्र, शिल्प शास्त्र, बृहत् संहिता, मानसार शिल्प शास्त्र, अग्नि पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, मत्स्य पुराण आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। बृहत संहिता में कहा गया है कि – मन्दिर के प्रतिमा की कुर्सी ( पिंडिका ) की ऊंचाई गर्भगृह के दरवाजे की ऊंचाई का तीन भाग होनी चाहिए (जब दरवाजे की ऊंचाई आठ भागों में विभाजित हो), और प्रतिमा की ऊंचाई कुर्सी की ऊंचाई से दोगुना होना चाहिए। इसी ग्रन्थ में आगे कहा गया है कि प्रतिमा की नाक, माथा, ठोड़ी, गर्दन और कान प्रत्येक प्रत्येक की माप चार उंगलियों के बराबर होगी , मुँह दो उंगलियों का होगा तथा ठोड़ी की चौड़ाई भी दो उंगलियों के बराबर होगी। कान और भौहों के बीच की जगह साढ़े चार अंगुल की होनी चाहिए। इसी प्रकार अग्नि पुराण में मंदिर के ऊपरी भाग में आठ दिशाओं में केंद्रीय देवता के चारों ओर बड़ी बड़ी भगवतप्रतिमा बनाने का आदेश दिया गया है। पूर्व में वराह, पश्चिम में श्रीधर, उत्तर में हयग्रीव, दक्षिण में नरसिंह, अग्निकोण में भगवान परशुराम, नैऋत्यकोण में श्रीराम, व्यवहार कोण में वामन और ईशान कोण में वासुदेव की मूर्ति बनायी जानी चाहिए। मंदिर संरचना में हमेशा सम संख्या यानी आठ, बारह, चौदह आदि से स्तम्भों को क्रमांकित कर बनाया जाना चाहिए। अग्नि पुराण के अनुसार वर्तमान मन्दिर के समीप यदि दूसरा कोई मन्दिर बनना हो तो दोनों मंदिरों के बीच की दूरी दोनों मंदिरों की ऊंचाई से दुगुनी होनी चाहिए। स्पष्ट है कि भारत में मन्दिर कुछ निश्चित ज्यामितीय और गणितीय सिद्धांतों पर बनाये जाते हैं क्योंकि इसे ब्रह्माण्ड का प्रतिबिम्ब माना जाता है। जो सृजन और विनाश की चक्रीय प्रक्रियाओं का अनुसरण करता है। वास्तुशास्त्र के नियम प्रकाश, ध्वनि और ध्वनि प्रबंधन के माध्यम से उस स्थान की सुंदरता को संरचनात्मक स्थिरता और गुणवत्ता प्रदान करते हैं। एक हिन्दू मंदिर वस्तुत: विविध दृश्य पहलूओं का एक उत्सव है और भक्त जब उनमें से किसी एक को देखता है, गोपुरम से प्रवेश करता है, परिक्रमा करता है या आतंरिक गर्भगृह के पास जाता है या वहां पूजा करता है तो वह समग्रता तक पहुँच जाता है।
भारत में मन्दिर निर्माण परम्परा बृहदारण्यकोपनिषद के इस महावाक्य कि-अहं ब्रह्मास्मि (मैं ही ब्रह्माण्ड हूँ ) पर विश्वास करती है। जो कुछ ब्रह्माण्ड में है, वह मुझमें मौजूद है और जो कुछ मुझमें है उसी का विस्तृत रूप ब्रह्माण्ड में मौजूद है। भारतीय मंदिर ब्रह्माण्ड के स्थूल जगत का प्रतिनिधित्व करते हैं और मानव की संरचना सूक्ष्म जगत का प्रतिनिधित्व करती है। हमारा शरीर भी एक मन्दिर है। वेद भी कहता है – यथा पिन्डे तथा ब्रह्मान्डे अर्थात्, मनुष्य के भीतर जो चल रहा है वही ब्रह्माण्ड में चल रहा है। हिंदू मंदिर मानव शरीर की संरचना से प्रेरणा लेते हैं। श्रुति, स्मृति और पुराण मंदिर को एक वास्तु पुरुष ( ब्रह्माण्डीय अलौकिक व्यक्ति) के रूप में वर्णित करते हैं। वास्तु पुरुष मण्डल ब्रह्माण्डीय सत्ता के रूप मे प्रकट करता है जिस पर मन्दिर बनाया जाता है और जिस पर वह टिका होता है। व्यक्ति के शरीर में ऊर्जा के सात केंद्र बिंदु होते हैं जिन्हे चक्र कहा जाता है। मानव शरीर के ये सात चक्र या ऊर्जा बिंदु इसप्रकार हैं – मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार चक्र। इसी प्रकार मन्दिर के भी सात मुख्य शक्ति केंद्र होते हैं जो इसप्रकार हैं – गोपुरम्, गर्भगृह, प्रदक्षिणापथ, प्रतिमा, अद्र्ध मण्डपम्, महामंडपम् और ध्वज- स्तम्भ। ये सातों घटक किसी भी दिव्य आकृति को पूर्ण मन्दिर का रूप देते हैं। विश्वकर्मा वास्तु शास्त्र में देव मंदिर और मानव शरीर की अद्भुत तुलना की गयी है। इसमें कहा गया है कि – गर्भगृह की तुलना मानव शरीर से की जाती है, अंतराल ( बरामदा ) की तुलना मानव की गर्दन से की जाती है, अद्र्ध मंडप ( आधा हॉल ) की तुलना मानव की छाती से की जाती है, महामंडप ( मुख्य हॉल ) की तुलना पेट से की जाती है, ध्वज स्तम्भ को मानव के पुरुष अंग के साथ देखा जाता है तथा गोपुरम या प्रवेश द्वार को मानव के पैर के साथ देखा जाता है। इसप्रकार भारतीय मंदिरों का मानव के शरीर के साथ एक प्रकार का अद्भुत सामंजस्य है। इसी कारण जब कोई भक्त मन्दिर में बैठकर अपने आराध्य का ध्यान करता है तो उसके शरीर के सातों चक्र यानी ऊर्जा केंद्र सक्रिय हो उठते हैं और उसे अलौकिक शक्ति और आनंद की प्राप्ति होती है। स्पष्ट है कि हिन्दू मन्दिर केवल उपासना स्थल नहीं हैं बल्कि सकारात्मक ऊर्जा के अनन्त पुंज भी हैं।
इसी क्रम में भारत में निम्नलिखित तीन स्थापत्य कला शैलियों के अंतर्गत अनेकानेक मंदिरों का निर्माण किया गया –
1- नागर शैली
नागर शब्द नगर से बना है। सर्वप्रथम नगर में निर्माण होने के कारण इसे नागर शैली कहा गया जो हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत तक के क्षेत्रों मे प्रचलित थी। आठवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत में मौजूद शासकों ने इस शैली को पर्याप्त संरक्षण दिया। नागर शैली के मंदिरों में समतल छत से उठती हुई शिखर की प्रधानता पायी जाती है। इसे अनुप्रस्थिका एवं उत्थापन का समन्वय भी कहा जाता है। नागर शैली के मन्दिर आधार से शिखर तक चतुष्कोणीय होते हैं। इस शैली के मन्दिर एक वर्गाकार गर्भगृह, स्तम्भों वाला मंडप, तथा गर्भगृह के ऊपर एकरेखीय शिखर से संयोजित होता शिखर का सबसे महत्वपूर्ण भाग सबसे ऊपर लगा आमलक होता है जो इस शैली की मुख्य पहचान है। नागर शैली के मंदिरों में सभा भवन तथा प्रदक्षिणापथ का विशेष स्थान जोटा हज। मध्य प्रदेश के खजुराहो, उत्तर प्रदेश के काशी, उड़ीसा के पुरी, भुवनेश्वर, कोणार्क के मन्दिर, उत्तराखंड के केदारनाथ, बद्रीकानाथ के मन्दिर तथा बंगाल आदि अन्य उत्तर एवं पूर्वी भारत के मन्दिर इस शैली के प्रमुख मन्दिर हैं।
2- द्राविड़ शैली
मुख्यत: दक्षिण भारत के इस मंदिर कला शैली का विकास सातवीं शताब्दी ईस्वी में कांची के पल्लव राजाओं के काल में हुआ किन्तु इसका पूर्ण विकास चोल एवं पांण्ड्य राजाओं के समय में हुआ। दक्षिण में कृष्णा नदी से लेकर कन्याकुमारी तक द्रविड़ शैली के मन्दिर पाये जाते हैं। द्रविड़ शैली के मंदिरों का निचला भाग वर्गाकार और मस्तक गुम्बदाकार छह या आठ पहलूओं वाला होता है। इस शैली के मंदिरों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बड़ा प्रवेश द्वार है जिसे गोपुरम कहते हैं तथा इसके शैली के मन्दिर ऊंची चहरदीवारी से सुरक्षित किये जाते हैं। इनका गर्भगृह अष्टकोणीय एवं वर्गाकार होता है तथा इनका शिखर पिरामिडनुमा होता है। इस शैली के मंदिरों के पास विशाल संकेंद्रित प्रांगण होता है तथा सम्पूर्ण मन्दिर की संरचना अष्टकोणीय होती है। पल्लव, चोल, पांड्य आदि राजाओं द्वारा निर्मित कांची, महाबलीपुरम तथा शेष तमिलनाडु, केरल तथा आंध्र प्रदेश के मन्दिर द्रविड़ शैली के मन्दिर के उत्तम उदाहरण हैं।
3- बेसर शैली
नागर तथा द्रविड़ शैली के मिले जुले रूप को बेसर शैली कहते हैं। इस शैली के मन्दिर विंध्याचल पर्वत से लेकर कृष्णा नदी तक पाये जाते हैं। बेसर शैली को चालुक्य शैली भी कहते हैं। इस शैली के मंदिरों का आकार आधार से शिखर तक पूर्ण या अद्र्ध गोलाकार ( वृत्ताकार ) होता है। होयसल राजाओं के द्वारा मैसूर के हेलेबिड का होयसलेश्वर मन्दिर बेसर शैली के उत्तम उदाहरण हैं। इसके अतिरिक्त बेसर शैली के उदाहरण के तौर पर वृन्दावन के वैष्णव मन्दिर में गोपुरम देखने को मिलता है। इस शैली के मंदिरों में मुख्यत: कर्नाटक में चालुक्य, राष्ट्रकूट तथा होयसल राजाओं द्वारा निर्मित शैव और वैष्णव मंदिरों के नाम मुख्यत: लिए जाते हैं।
अब हम उपरोक्त तीनों शैलियों में निर्मित भारतवर्ष के प्रमुख मंदिरों की स्थापत्य विशेषताओं का वर्णन करेंगे। ये मंदिर इस प्रकार हैं –
(1)- दशावतार मन्दिर
यह उत्तर प्रदेश में झाँसी के पास बेतवा नदी के किनारे स्थित एक विष्णु मन्दिर है। यह मंदिर उत्तर भारत में पंचायतन शैली का शुरूआती उदाहरण है जो गुप्त राजाओं के काल में निर्मित कराया गया था। इस मन्दिर में सुन्दर नक्कासी के जरिये भगवान विष्णु के दस अवतारों की कहानी बतायी गयी है।इस मन्दिर में भगवान विष्णु एक मूर्ति नर नारायण तपस्या के स्वरुप में है और दूसरी मूर्ति में वह शेषनाग पर लेते प्रदर्शित किये गये हैं। यह मन्दिर वर्तमान में काफ़ी जजऱ्र हालत में है।
(2)- कैलाश मन्दिर
महाराष्ट्र के एलोरा में स्थित इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम के कार्यकाल मे हुआ था। इस मन्दिर की मुख्य विशेषता है की इसी एक ही बड़े चट्टान को काटकर बनाया गया है तथा इस मंदिर का निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। भगवान शिव को समर्पित इस मन्दिर को हिमालय के कैलाश का रूप देने का प्रयास किया गया है।
(3)- सूर्य मन्दिर
उड़ीसा के कोणार्क में स्थित इस सूर्य मंदिर का निर्माण राजा नरसिंह देव प्रथम द्वारा कराया गया था। कोणार्क के सूर्य मंदिर का निर्माण सूर्य भगवान के विशाल रथ के रूप में की गयी है जिसमें 12 पहिये और साथ घोड़े बनाये गये हैं। वर्ष 1984 में इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी गयी।
(4)- लिंगराज मन्दिर
उड़ीसा के भुवनेश्वर में स्थित यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है। सोमवंशी राजा ययाति प्रथम द्वारा निर्मित यह मन्दिर नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मन्दिर शैव और वैष्णव दोनों सम्प्रदायों का प्रतिनिधित्व करता है इसीकारण इस मन्दिर में मौजूद देवता का हरि-हर कहा जाता है।
(5)- जगन्नाथ मंदिर
उड़ीसा के पुरी में स्थित यह मन्दिर भगवान विष्णु को समर्पित है तथा हिन्दुओं के चार धामों में से एक है। मन्दिर के गर्भगृह में जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की लकड़ी की मूर्तियां स्थित हैं जिसे हर बारह वर्ष में पवित्र वृक्षों का उपयोग कर बदल दिया जाता है। पुरी का यह मन्दिर अपने वार्षिक रथ यात्रा उत्सव के लिए प्रसिद्ध है। इस स्थान पर भगवान कृष्ण का साक्षात् वास माना जाता है। भगवान कृष्ण की प्रेरणा से जयदेव ने यहीं पर गीतगोविंदम् की रचना की थी।
(6)- कंदरिया महादेव मन्दिर
म. प्र. के खजुराहो में स्थित यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है जिसे राजा विद्याधर चंदेल ने बनवाया था। इसमें शिवलिंग संगमरमर से बनाया गया है तथा मन्दिर की दीवारों पर सुन्दर सी नक्काशी की गयी है। इस मन्दिर को सामने से देखने पर ऐसा लगता है की जैसे गुफा में प्रवेश कर रहे हों।
(7)- बृहदेश्वर मन्दिर
तमिलनाडु के तंजौर में कावेरी नदी के तट पर स्थित यह मन्दिर द्रविड़ कला शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस मन्दिर को चोल राजा राज राज प्रथम ने भगवान शिव की आराधना में बनवाया था। 216 फिट ऊँचे इस मंदिर का निर्माण ग्रेनाइट पत्थरों से किया गया है। इन पत्थरों को जोडऩे में सीमेंट, सरिया, प्लास्टर आदि का प्रयोग नहीं किया गया है बल्कि पजल तकनीक से आपस में जोड़कर तैयार किया गया है । यह मन्दिर अपनी विराटता, भव्यता, वास्तुशिल्प और केंद्रीय गुम्बद के कारण लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करता है। इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है।
(8)- मीनाक्षी मन्दिर
तमिलनाडु के मदुरै शहर मे स्थित यह मन्दिर मीनाक्षी (पार्वती ) और सुन्दरेश्वर ( शिव ) दोनों को समर्पित है। इस मंदिर में 12 गोपुरम हैं जो काफ़ी बड़े हैं और इन पर बड़ी महीनता एवं कुशलतापूर्वक रंग एवं चित्रकारी की गयी है। मन्दिर परिसर में 165 फिट लम्बा तथा 120 फिट चौड़ा एक सरोवर भी है। इस मन्दिर का स्थापत्य, वास्तु एवं शिल्प आश्चर्य चकित कर देने वाला है।
(9)- पद्मनाभ स्वामी मन्दिर
यह द्रविड़ कला शैली का एक अन्य महत्वपूर्ण मन्दिर है जो केरल के तिरुअनन्तपुरम मे स्थित है तथा मन्दिर भगवान विष्णु को समर्पित है। मन्दिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन की मुद्रा में विराजमान हैं। यह मन्दिर भगवान विष्णु के 108 पवित्र मंदिरों में से एक है इसे भारत का दिव्य देशम भी कहते हैं। यह विश्व का सबसे धनी मन्दिर माना जाता है। इस मन्दिर में सात तहखाने हैं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में खोले गये थे। मन्दिर मे प्रवेश के लिए पुरुषों को धोती तथा स्त्रियों को साड़ी पहनना अनिवार्य है।
(10)- वेंकटेश्वर मन्दिर
आंध्र प्रदेश के तिरुपति में स्थित यह मन्दिर द्राविड़ कला शैली का अत्यंत भव्यतम उदाहरण है जो भगवान विष्णु को समर्पित है। यह मन्दिर तिरुमाला पर्वत की वेंकटाद्री नामक सातवीं चोटी पर स्थित है जो पुष्करणी नामक तालाब के किनारे स्थित है। इसी कारण यहाँ पर बालाजी को भगवान वेंकटश्वर के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि भगवान के इस रूप में लक्ष्मी भी समाहित हैं इसी कारण भगवान वेंकटश्वर को स्त्री और पुरुष दोनों के वस्त्र पहनाने की परम्परा है। इस मन्दिर के निर्माण में चोल, विजयनगर और होयसल राजाओं का काफ़ी योगदान रहा है। इस मन्दिर में बाल उतरवाने की परंपरा काफ़ी प्रसिद्ध है।
(11)- होयसलेश्वर मन्दिर
यह मंदिर कर्नाटक के हालेबिद नामक स्थान पर स्थित है जो भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर न तो पूरी तरह नागर शैली में ही और न पूरी तरह द्रविड़ शैली में है बल्कि यह बेसर शैली में है। इस मंदिर का निर्माण बारहवीं शताब्दी में होयसल राजा विष्णुवर्धन के कार्यकाल हुआ।
(12)- स्वर्ण मन्दिर
स्वर्ण मन्दिर की नीव गुरु रामदास ने रखी और इसे गुरु अर्जुन देव ने पूरा कराया। इस गुरुद्वारे को श्री हरमंदिर साहब और श्री दरबार साहब के नाम से भी जाना जाता है। महाराजा रणजीत सिंह द्वारा दिये दान से मन्दिर को सोने से मिढ़वाया गया ।
(13)- दिलवाड़ा मंदिर
राजस्थान के माउंट आबू में स्थित जैन तीर्थकरों को समर्पित दिलवाड़ा मंदिर सोलंकी राजाओं द्वारा बनवाये गये थे। यह मंदिर अपने सफ़ेद संगमरमर तथा जटिल नक्कासी की वजह से बेहद प्रसिद्द है।
(14)- महाबोधि मंदिर
महाबोधि मन्दिर परिसर भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित पवित्र स्थानों मे से एक है । यह वही स्थान है जहाँ भगवान बुद्ध को परम ज्ञान प्राप्त हुआ था। बोध गया में स्थित इस स्थान पर सम्राट अशोक तीर्थ यात्रा पर आये थे और उन्होंने ही सबसे पहले यहाँ पर मंदिर का निर्माण कराया था। यह प्रारंभिक बौद्ध मंदिरों में से एक है जो पूरी तरह से ईंट से बना है। महाबोधि मन्दिर परिसर में एक मुख्य मन्दिर तथा छ: अन्य पवित्र स्थान हैं तथा दक्षिण की ओर एक प्रांगण के ठीक बाहर कमल कुंड नामक सातवां पवित्र स्थान है।
इसके अतिरिक्त अंगकोरवाट कम्बोडिया, स्वामिनारायण मन्दिर न्यूजर्सी, इंडोनेशिया के बाली और जावा में स्थित विष्णु और शिव मन्दिर विदेशों में भी भारतीय संस्कृति की जीवंतता को प्रदर्शित करते हैं। वस्तुत: सनातन वैदिक धर्म में मन्दिर एक ऐसा संस्थान होता है जो भक्तों की सामाजिक, शैक्षिक, धार्मिक और आर्थिक अवश्यकताओं की एक साथ सम्पूर्ति करता है। सनातन हिन्दू संस्कृति में मन्दिर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति का अनिवार्य साधन माने गये हैं। इसप्रकार हिन्दू धर्म एवं संस्कृति में मंदिर मानव जीवन की सम्पूर्णता के पर्याय हैं। मन्दिर हमारी सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण अध्याय हैं जिनका अध्ययन और संरक्षण प्रत्येक भारतीय का दायित्व है।





