देवालयों की सर्वतोभद्र शैली

डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’
लेखक प्राचीन संस्कृत साहित्य के विद्वान हैं।


देवालय भारतीय मान्यताओं में यज्ञोत्तर काल में स्थापित मानवीय कर्तव्यों में इष्टापूर्त संज्ञक कार्यों में पूर्त नामक कर्म है, जिसमें जलाशय के साथ साथ देवालय निर्माण भी आता है। प्रारंभ में आत्म कल्याण, स्वर्ग प्राप्ति जैसे लक्ष्य रहे, लेकिन कालांतर में शासकों के विजय, शत्रु पुरध्वंस, स्व और पर कल्याण आदि उद्देश्य भी सामने आए। जैसा कि मूर्तियों के निर्माण के लक्ष्य आगमों, संहिताओं में कहे गए हैं।

देवालयों की शैलियों का विकास हमेशा होता रहा है। कहना न होगा कि हर मंदिर बेजोड़ होता है। अपने आप में मौलिक और एकमेव लेकिन उनकी अपनी शैलियां भी हैं जो क्षेत्र विशेष या निर्माता अथवा स्थापति की वांशिक कार्य परंपरा की उपज होती हैं। इन मंदिरों की शैलियों के नाम हमें वराहमिहिर पहली बार देते हैं जो संख्या में 20 हैं और इसी तर्ज पर बाद में प्रासाद विंशतियों ( 20 – 20 के समूह) का विकास हुआ। वराह कृत नामकरण इतना मानक हुआ कि संहिताओं, आगम, पुराण और विश्वकर्मीय शिल्प ग्रंथों में यथा रूप मिल जाता है लेकिन उनके रूप और परिभाषाएं बदली जाती रहीं।
मंदिर का एक स्वरूप है : सर्वतोभद्र। यह भद्रिका या सर्वतोभद्र वेदी के स्वरूप में बनाया जाता है। इसको सामान्य रूप से चौमुखा मंदिर भी कहा जाता है। इसका सबसे सुंदर उदाहरण है राजस्थान के रणकपुर का जिनालय। यह मंदिर इतिहास, भूगोल, काम, अर्थ व्यवस्था और धार्मिक भावनाओं का अनूठा संगम है। विक्रमीय11 वीं सदी में जब इस केंद्र को सूर्य पूजा स्थल के रूप में विकसित किया गया, तब प्रत्येक दिशा में सात -सात अश्वों में रथ पर सवार सूर्य देव की प्रतिमाओं का ऐसा अंकन किया गया कि गुजरात की चालुक्य शक्ति निरंतर प्रगति के पग पर आरूढ़ रहे। मूलत: इस स्थान का नाम सूर्य की पत्नी रणकदे नाम पर हुआ। राजस्थानी लोक गीतों में उनका यश गान गाया जाता है। कालो जी कालो काई करों सहल्यां ए , काला राणी रणकदे रा केश…।

प्राचीन मेवाड़, मारवाड़, आबू, सांभर, नागौर जैसे प्राचीन क्षेत्रों के बीच ये स्थान महत्वपूर्ण रहा है। महाराणा कुंभा के शासनकाल (1433 – 1468 ) धरणाक शाह ने इस स्थान पर जिनालयों का निर्माण करवाया था। उसका कुंभा के सभागार में विशिष्ट सम्मान था। इस काल में देश के चार श्रेष्टतम शिल्पी थे : सूत्रधार नारद, जयतो, मण्डन और सूत्रधार देपाक जिन्होंने कौतुकप्रद वास्तु रचनाएँ की। नारद ने चित्तौडग़ढ़ का प्रसिद्ध सतबीस देवालय बनवाया तो जयतो ने कीर्ति स्तंभ (विजय स्तंभ), मण्डन ने दिव्य दीवार वाला कुंभलगढ़ तो देपाक ने रणकपुर का चौमुखा जिनालय बनाया।

इसका उत्सव इतना भव्य हुआ कि उसके विषय में सोम सौभाग्य काव्य और संस्कृत मे प्रशस्तियां रची गई और पाषाण में उत्कीर्ण करवाई गईं।

देपांक को श्रेष्ठी धारणाक शाह ने इतना सम्मान दिया कि उसकी मूर्ति भी बनवाकर मंदिर में लगवाई। कुंभा ने स्वयं सूत्रधार जयतो की मूर्ति उसके पुत्रों सहित कीर्ति स्तंभ में जड़वाई । रणकपुर के आदिश्वर प्रासाद में मूर्तिकला के अनेक पक्षों को ध्यान में रखा गया है। जैन शासन के देवताओं, इंद्रादि दिक्पालों के अतिरिक्त लोक मंगल के केतुओं को भी मूर्तिमान किया गया। इनमें कटार में करतब दिखाती नटी की प्रतिमा राजस्थान से गुजरात तक के मंदिरों में मिलती जुलती है।

इस मंदिर की कुछ विशेषताएं हैं
1. साधुसंतों, यात्राओं के समूह उत्कीर्ण है।
2. इसमें 1444 स्तंभ उस संवत के सूचक है ( यानि 1387) जब धारणा शाह के पूर्वज संघपति हुए-ऐसा माना जाता है कि ये मूलत: 4 का अंक है । मंदिर भी चौमुखा है।
3. इसमें कल्पवृक्ष की वह कला में मौजूद है जो किसी काल के पत्थरों को सुई से तराशकर उसे तैयार कि जाती थी। गुजरात के बाद ये कला यहीं पर है। यह कल्पवृक्ष कल्पसूत्र की प्रतिष्ठा का सूचक है ।
4. स्तंभ और तोरण रचना में कीर्तिमुख लुम्बकों, तोड़ों और मकरमुखों का सुंदर प्रयोग किया गया है। जैन ग्रंथो में वर्णित स्वर्गपुरियो ( अमर लोक ) को भूमि पर दिवाने का आयोजन जैसा प्रसाद।
5. पिछली सदी में गुजरात के नर्मदा शंकर सोमपुरा ने इसका जीर्णोद्धार किया था। इस कार्य से इतने प्रभावित हुए कि शिल्परत्नाकार जैसा ग्रंथ भी लिखा।

यह उल्लेखनीय है कि कभी ब्रह्मा के सभी मुखों का दर्शन हो सके, उस उद्देश्य से सर्वतोभद्र मंदिरों का चलन हुआ लेकिन जब शिव का प्रभुत्व बढ़ा तो शिवालय भी सर्वतोभद्र बने। इसका एक और बहुत सुन्दर उदाहरण है उदयपुर के पास अंबेरी में बना अमरख महादेव मंदिर। अरावली की चीरुवाक और अम्बवा पहाडिय़ों के बीच जहां बारहमासी सोता है, वहीं अमरखजी बिराजित है।

अमरख महादेव मंदिर उदयपुर – नाथद्वारा मार्ग पर उदयपुर से उत्तर में 10 किलोमीटर दूरी पर है। यह 11वीं सदी के बाद का नहीं हो सकता। पहाडिय़ों की तलहटी में इसके निर्माण के लिए ऐसे स्थान को चुना गया है जो जलभरण और झंझावात आदि से अप्रभावित रहे। नागदा के सास बहू मंदिर, पालड़ी के वामेश्वर और एकलिंग जी के पाशुपत मंदिर की तरह ही यह मंदिर निश्चित रूप से लाकुलिश संप्रदाय का रहा होगा।

सर्वतोभद्र देवालय की योजना चार त्रिकोण से की जाती है। लंब और आधार की भुजाओं को कुछ इस तरह संयोजित किया जाता है कि मध्य में मुख्य मंदिर हो और चारों दिशाओं में गूढ़ मंडप सोपान सहित प्रवेश के लिए हों। भद्र का सामान्य आशय है : भला। सर्वत या सभी ओर, सदा सर्वदा। ऐसे में यह देवालय सदैव कल्याण का धाम होता है।

कहना न होगा कि इसमें मुख्य मंदिर में चारों ही दिशाओं से प्रवेश किया जा सकता है। हां, एक और अंतराल के बाद विशाल सभा मंडप की योजना है। इसमें भी चारों ओर से आया जाया जा सकता है। वर्षा, धूप और हवा से मंदिर सहित मंडप की सुरक्षा के लिए बनाए गए हंस पक्षीय छज्जे बड़े मनोहारी हैं और कीचक तो सुदृढ़ भारवाहक ही लगते हैं।

पिछले कई वर्षों में अमरखजी संरक्षण मंडल ने इसको बचाने के लिए क्या नहीं किया! मित्रवर श्री अनन्त गणेश त्रिवेदी इसके पर्याय ही बने लगते हैं। उनकी टीम ने इस वर्ष जीर्णोद्धार के बाद शिखर पर कलश आरोहण भी करवा दिया। मेरे लिए यह आत्मिक तीर्थ है। यहां पहाड़ बारहों मास झरते हैं और शिव सरिता प्रवाहित करते हैं। वैशाख की चिलचिलाती धूप में भी जलधारा बीच मछलियों की मुस्कान मोहती है। उन जोगियों के नाम भी याद आ रहे हैं जिन्होंने कभी यहां की यात्रा का पुण्य अर्जित किया।