सरल, व्यावहारिक और उपयोगी भारतीय गणित

डॉ. चन्द्रकान्त राजू
लेखक गणितज्ञ एवं कप्यूटर विज्ञानी हैं।


फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ का एक प्रसिद्ध गाना है जिसकी पहली पंक्ति में ही गणित में भारत के योगदान का जिक्र होता है-”जब जीरो दिया मेरे भारत ने।” अगली पंक्ति में दशमलव देने की बात भी कही जाती है, परन्तु यह कहानी फिर भी अधूरी है। यूरोपियों ने हिंदुस्तान से केवल अंकगणित ही नहीं, बल्कि ज्यामिति छोड़ लगभग सारा स्कूली गणित- अलजेब्रा’, त्रिकोणमिति और कैल्कुलस तथा सांख्यिकी भी सीखी। भारत में गणित की जो संकल्पना विकसित थी, वह सरल, उपयोगी और व्यावहारिक थी। इस व्यावहारिक लाभ के लिए ही यूरोपियों ने उसका आयात किया। लेकिन यूरोप में गणित की विधि अलग थी। इसलिए यूरोपियों को आयातित हिंदुस्तानी गणित समझने में सदियों तक कठिनाई आयी। आखिरकार उन्होंने उसे बदल दिया और मैथेमेटिक्स की अपनी परिकल्पना से जोड़ दिया। यूरोप में 1,500 साल से चर्च का दबदबा रहा, इसलिये मैथेमेटिक्स की यूरोपीय परिकल्पना भी चर्च की सियासत से जुड़ी थी। चर्च की सियासत अनन्त काल की परिकल्पना से जुड़ी थी और मैथेमैटिक्स में अनन्त की परिकल्पना इसी के अधीन हो गयी।

ब्रिटिश हुकूमत के दौरान हम पर उपनिवेशवादी शिक्षा प्रणाली थोपी गयी। यह चर्च की ही शिक्षा प्रणाली थी। न केवल मिशन स्कूल अपितु ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसी यूनिवर्सिटी भी चर्च ने स्थापित की और सदियों तक उनका नियन्त्रण किया। इसके अंतर्गत हमारा ही परिवर्तित गणित हमें एक झूठे इतिहास के साथ लौटा दिया जैसा कि यह कहकर कि कैलकुलस का आविष्कार न्यूटन और लेइब्रिज ने किया और हमें उनकी नकल करनी चाहिए। आज़ादी के 70 साल बाद भी हम वही उपनिवेशवादी शिक्षा-प्रणाली के आज भी शिकार हैं।

हमने कभी समझा नहीं कि चर्च एक धार्मिक ही नहीं राजनीतिक संस्था भी है। उसका तीनसूत्री प्रचार सिर्फ यह थारू 1. गैर-पश्चिमी सब कुछ तुच्छ है, 2. पश्चिमी सब कुछ श्रेष्ठ है और 3. हमें हर छोटी-से बड़ी बात में पश्चिम की नकल करनी चाहिये। इस प्रचार से प्रभावित होकर हमने मान लिया कि हम गिरे हुए हैं और आज हर छोटी-बड़ी बात में पश्चिम की अंधी नकल करते हैं। ख़ास तौर से हमने बग़ैर किसी समीक्षा के यह मान लिया कि गणित करने की पश्चिमी विधि ही श्रेष्ठ है। इस पश्चिमी विधि ने मूल हिंदुस्तानी गणित की व्यावहारिक उपयोगिता किसी तरह से नहीं बढ़ाई, किन्तु गणित को अत्यधिक जटिल बना दिया। इसी कारण से आज भारतवर्ष के बच्चे अधिकांशत: गणित को कठिन मानते हैं और उससे जी चुराते हैं।

इसलिए मैं हाँ गणित के क्षेत्र में भारतीयों के उन योगदानों की चर्चा नहीं करूँगा जोकि फिल्मी गानों, इंटरनेट आदि पर बहुतायत में उपलब्ध हैं और जिनका उदाहरण कोई भी राजनेता आदि दिया करते हैं। क्योंकि जिस हिंदुस्तानी गणित पर हमें इतना गर्व है, वह गणित हमारी शिक्षा प्रणाली से तलाकशुदा है।

इसलिए मैं उस सामान्य गुणगान से थोड़ा अलग हटकर और आगे बढ़ कर यह बताऊंगा कि भारतीय गणित आधुनिक यूरोपीय गणित की तुलना में श्रेष्ठ कैसे है।

असलियत यह है कि हमने गणित की अधिकांश विधाओं को केवल सबसे पहले ही नहीं किया, बल्कि अलग विधि से किया था। त्रिकोणमिति और ज्यामिति से लेकर कैल्कुलस तक हमने अलग विधि से किया। यदि हम इस असलियत को जान और स्वीकार लें तो इस प्रश्न का उत्तर देना जरूरी है कि कौन सी विधि श्रेष्ठ है। यह समीक्षा अब तक नहीं की तो भी आज करना बहुत जरूरी है।

यदि हमारी विधि श्रेष्ठ और उपयोगी है, तो उस पर गर्व करना चाहिये। और बात केवल गर्व करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि यह विधि वाकई में श्रेष्ठ और उपयोगी है, तो इसे हमारी शिक्षा- प्रणाली में वापस अपनाया भी जाना चाहिये। ऐसा करने से हमें क्या फायदे हैं, इसे संक्षिप्त में समझाने की कोशिश करूँगा।

हम इतिहास में नहीं जी सकते। इसलिए, उदाहरण के लिए, केवल यह कहना भर पर्याप्त नहीं है कि पाइथागोरस से पहले भी वह प्रमेय हमारे शुल्बसूत्रों में था। हमें यह भी जानना होगा कि हमारे इस कथन पर पाश्चात्य गणितज्ञों ने प्रश्न खड़े किये हैं। उनका कहना है कि प्रमेय तो था, परंतु उसका प्रमाण नहीं था। प्रमाण पाइथागोरस ने दिया और इसलिए शुल्बसूत्रों को इस प्रमेय का श्रेय नहीं दिया जा सकता। उनके इस आरोप का उत्तर भारत के किसी और गणितज्ञ ने आज तक नहीं दिया।

उत्तर- दो भाग में है। पहला तो यह कोरा झूठ है कि पाइथागोरस ने प्रमेय का कोई भी प्रमाण दिया। पाइथागोरस के अस्तित्व का या उसके कथित प्रमाण का कोई भी सबूत नहीं है। पश्चिम में इस प्रमेय का पहला प्रमाण दसवीं शती में, अर्थात् पाइथागोरस के कथित समय से 1500 साल बाद की पाण्डुलिपि में तुर्की में मिलता है।

दूसरी बात यह कि शुल्बसूत्रों में वर्णित प्रमेय के ठीक ऐसे प्रमाण हिंदुस्तान में भी मिलते हैं। यह बात उजागर करने पर अब पश्चिम के बचाव में एक नयी समस्या उठाई जाती है कि इस हिंदुस्तानी प्रमाण में प्रत्यक्ष प्रमाण का उपयोग होता है, जिसे यूरोपीय फॉर्मल गणित में नकार दिया जाता है। (स्मरण रहे कि पाइथागोरस प्रमेय के 10वीं शती के प्रमाण में भी, और 20वीं शती तक सभी उपलब्ध प्रमाण में प्रत्यक्ष का उपयोग होता है), लेकिन चर्च को प्रत्यक्ष और यथार्थ से बहुत तकलीफ थी, इसलिए पश्चिमी मैथेमैटिक्स में प्रत्यक्ष प्रमाण वर्जित है। यह फॉर्मल गणित, परिकल्पनाओं (a&ioms, postulates) से शुरू कर केवल डिडक्शन (निगमन, अनुमान) पद्धति को ही स्वीकार करता है, प्रत्यक्ष प्रमाण यानी इम्पीरिकल प्रूफ को नहीं।

यह वास्तव में गणित के दर्शन की बात है, जिसे इतिहास से जोडऩे की चाल हम कभी समझे नहीं। पश्चिमी समर्थक चर्च की कोरी नक़ल कर हमेशा यह कहने की कोशिश करते हैं कि सभी गैर पश्चिमी दर्शन वाहियात हैं। यह बात हम बगैर किसी चर्चा के आँख मूँदकर नहीं स्वीकार कर सकते। इसकी चर्चा आगे करेंगे। फिलहाल सिर्फ इतना याद रहे कि विज्ञान भी प्रत्यक्ष प्रमाण या एक्सपेरिमेंट पर धारित है और विज्ञान के विद्यार्थी ही ज्यादा मैथेमैटिक्स सीखते हैं। तो सवाल यह उठता है कि यदि प्रत्यक्ष प्रमाण मैथेमैटिक्स में तुच्छ है तो विज्ञान में क्यूँ नहीं ? और यदि विज्ञान में मान्य है, तो मैथेमैटिक्स में क्यूँ नहीं? इस छोटे-से सवाल का कोई भी आज तक जवाब नहीं दे पाया।

अंकगणित
पश्चिम की अंधी नकल करने से पहले हम यह जान लें कि सरल-से-सरल हिंदुस्तानी गणित को समझने में बड़े-से-बड़े पश्चिमी विद्वानों ने सदियों तक कैसी मूर्खता दिखायी यूरोप में हिंदुस्तानी अंकगणित के आयात की बात सिर्फ रोमन या ‘अरबी’ अंकों तक सीमित नहीं है। बात एक दक्ष अंकगणित की है जो व्यापार और वाणिज्य के लिए बहुत उपयोगी था। यूरोपीय ग्रीक और रोमन अंकगणित की प्रणाली ‘अबेकस’ से जुड़ी थी, जो अंकगणित करने का बहुत रद्दी तरीका था। इसलिए फ्लोरेंस के व्यापारियों ने बारहवीं शताब्दी से ‘अबेकस’ छोड़ अल्गोरिथम अपनाना चालू किया।

‘अल्गोरिथम’ शब्द ‘अल्गोरिथ्मस’ से आया है जो बगदाद के अल ख्वारिज्मी का लातिनी नाम था। याद रहे कि नवीं शताब्दी में अल ख्वारिज्मी ने ‘हिसाब अल हिंद’ नाम की किताब लिखी। इसी किताब को अफ्रीका में अरबी व्यापारियों से सीखकर उसका लातिनी अनुवाद फ्लोरेंस के फिबोनाच्ची ने बारहवीं शती में ‘लिबेर अबेकी’ के नाम से किया, जिससे यूरोप में हिंदुस्तानी-विधि का अंकगणित फैला। यह वही अंकगणित है जो आज भी हम प्राइमरी स्कूल में सिखाते हैं। लेकिन अचम्भे की बात यह है कि पश्चिम ने इसे समझने में लगभग पाँच शताब्दी से ज्यादा लगा दिए। यूरोप के बड़े-से-बड़े विद्वानों ने हिंदुस्तानी अंकगणित की विधि समझने में गलतियाँ की। जैसे कि जो कि गर्बर्ट जो कि दसवीं शती में यूरोप का सबसे बड़ा विद्वान् माना जाता था और आगे चलकर पोप सिल्वेस्टर 2 बना, माना जाता है पोप ने सर्वप्रथम 976 ई. में कुर्तबा Cordoba से हिंदुस्तानी अंकगणित विधि ‘अरबी अंकों’ के नाम से आयातित की। गर्बर्ट ने अबेकस पर एक किताब लिखी थी। इसलिए उसने मूर्खतापूर्वक यह सोचा कि अंकगणित केवल अबेकस की विधि से किया जा सकता है। इसलिए उसने ‘अरबी’ अंकों का एक अबेकस बना दिया, जैसे कि अंकों के आकार में ही कुछ जादू है ! यह मूर्खता थी; क्योंकि गर्बर्ट नयी अंकगणित विधि नहीं समझा। लेकिन हम आज भी केवल अरबी अंकों और उनके हिंदुस्तानी मूल की बात करते हैं, हिंदुस्तानी अंकगणित की विधि की नहीं।

फ्लोरेंस के व्यापारियों को भी हिंदुस्तानी अंकगणित समझने में मुश्किल हुई। यह बात ‘जीरो’ नाम से ही स्पष्ट है। यह नाम ‘जिफ्र’ या अरबी ‘सिफ्र’ cipher शब्द से निकला है, जिसका अर्थ रहस्यमय कोड है। यह यूरोपियों को रहस्यमय इसलिए लगा; क्योंकि रोमन अंक सिक्कों के समान हैं। ङ्गढ्ढढ्ढ का अर्थ होता है 10+1+1, याने की दस का एक सिक्का और एक-एक के दो सिक्के। दशमलव-प्रणाली में 12 का अर्थ 1+2 = 3 नहीं होता लेकिन कई यूरोपियों को लगा कि ऐसा होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीरो का कोई मान नहीं है, इसलिए 10 और 1 एक बराबर होना चाहिए। यह कठिनाई लेन-देन में चकमा देने का सरल तरीका बन गया। जैसे कि 125 की करार को आसानी से 12500 की करार में बदला जा सकता था।

इसलिए 13 वीं शताब्दी में फ्लोरेंस ने अरबी अंकों के खिलाफ कानून बनाया कि कोई भी वितीय करार को अंकों और शब्दों- दोनों में लिखना जरूरी है। इस कानून का पालन हम आज भी चेक लिखने में करते हैं। और इसी कारण आज हम सिर्फ जीरो की बात करते हैं, हिंदुस्तानी अंकगणित की दक्षता की नहीं।

यूरोपियों ने अंकगणित ही नहीं अलजेब्रा, त्रिकोणमिति, कैल्कुलस और सांख्यिकी का सरल, व्यावहारिक और उपयोगी भारतीय गणित आयात भी हिंदुस्तान से किया। इसे समझने में उन्हें अंकगणित से कुछ बढ़कर कठिनाइयाँ आयी।

‘अलजेब्रा’ नाम अल ख्वारिज्मी की किताब ‘अल जब्र वाल मुकाबला’ से आता है जो कि ब्रह्मगुप्त के अव्यक्त गणित और उससे समीकरण मुकाबला को जबरन हल करने की विधि का अरबी अनुवाद है। इस अव्यक्त गणित का कैल्कुलस में जो उपयोग हिंदुस्तान में हुआ और आज भी है, वह पश्चिमी विद्वानों ने आज तक नहीं समझा।

ऋग्वेद 10.2.34 के अक्ष सूक्त में और महाभारत में नल और दमयन्ती की कथा में सांख्यिकी के सिद्धान्त को लेकर झाड़ में फल को गिनने का वर्णन है। सांख्यिकी के सिद्धान्त के पश्चिमी दर्शन में आज की तारीख में भी जो अस्पष्टता है, उसकी चर्चा मैं अलग से कर चुका हूँ और यहाँ नहीं करूंगा।

इसी तरह त्रिकोणमितीय फलन साइन ह्यद्बठ्ठद्ग हिंदुस्तानी नाम ‘जीवा’ का गलत अनुवाद है। यह अनुवाद टोलेडो में 12 वीं शताब्दी में हुआ, जब अरबी किताबों का लैटिन में सामूहिक अनुवाद हुआ। अनुवाद दो चरणों में हुआ। पहले चरण में अनुवाद करने वाले मोज्हरब और यहूदी गणित नहीं जानते थे। अरबी में जीवा को जीबा लिखा जाता था। उस जमाने में नुक्ता प्रचलित नहीं थे तो सिर्फ व्यञ्जन ज और ब लिखे और अनुवाद करने वालों ने उससे गलत जेब शब्द निकाला। दूसरे चरण में लैटिन में अनुवाद करने वाले ने जेब का अनुवाद sinus किया; क्योंकि जेब कपड़े को मोड़ विसक कर बनाई जाती है। इसी गलत अनुवाद से साइन बना।

एक्जेक्ट या व्यावहारिक
यूरोपियों को सर्वाधिक कठिनाई कैल्कुलस समझने में आयी। 16वीं शताब्दी में जेसुइट लोगों ने कोचीन से कैल्कुलस की चोरी की। यूरोपीय नाविकशास्त्र में 1762 तक कमजोर थे और अच्छे नाविकशास्त्र के लिए सटीक त्रिकोणमितीय मान चाहते थे। उन्हें निकालने की विधि यूरोपियों को नहीं आती थी। लेकिन हिंदुस्तान में सटीक त्रिकोणमितीय मान कैल्कुलस की अनन्त श्रेणी के सहारे ही निकले।

यूरोपियों को कैल्कुलस की अनन्त श्रेणी का योग समझने में अत्यधिक कठिनाई आयी। इस कठिनाई का कारण यह था कि पश्चिमी मैथेमैटिक्स पुराने जमाने से पारलौकिक दर्शन से जुड़ी है। अफलातून के ज़माने से यूरोपियों ने मैथमेटिक्स को मजहब और आत्मा से जोड़ा। इसलिए उनका य मानना था की मैथमेटिक्स शाश्वत सत्य है जो अमर आत्मा को उसकी निद्रा से जगाता है। इसके विपरीत हिंदुस्तान में गणित सदैव व्यावहारिक था।

चूँकि यूरोपियों ने मैथमेटिक्स को अंधविश्वासी तरीके से शाश्वत सत्य से जोड़ा, इसलिए उनका मानना था कि मैथमेटिक्स एक्जेक्ट exact है और उसमें छोटी-से-छोटी त्रुटि भी नहीं हो सकती। व्यवहार में हमें सटीकता precision की तो जरूरत पड़ती है, लेकिन एक्जेक्ट त्रुटिहीन होना किसी भी व्यावहारिक उपयोग के लिए जरूरी नहीं है।

अनन्त श्रेणी का योग एक्जैक्ट होना सम्भव ही नहीं है। उदाहरण के लिए 2 का वर्गमूल लीजिए। हिंदुस्तान में यह शुल्बसूत्र में पाया जाता है, और उसका एक खास नाम है ‘सविशेष’ याने अवशेष के साथ हिंदुस्तान में वर्गमूल निकालने का एक एल्गोरिथ्म algorithm था और कुछ ऐसी ही विधि इराक और अफ्रीका में भी पाई जाती है। लेकिन यूरोप में यह विधि 12वीं शताब्दी के बाद आयी, इसलिए हिंदुस्तानियों को यह पता था कि 2 के वर्गमूल निकालने की विधि का कोई अन्त नहीं है। यानी यदि हम 2 के वर्गमूल का दशमलव-विस्तार करें, तो यह एक अनन्त श्रेणी होगी

√2=1+4/10+1/100+4/1000+ज्
तीन बिन्दुओं…. का अर्थ है कि इस श्रेणी का अन्त नहीं है।
अनन्त होने के कारण उपर्युक्त श्रेणी का वास्तव में कोई एग्जेक्ट exact योग नहीं है। इसके किन्हीं दो पदों को हम कितने भी जल्दी जोड़ें, उसमें कुछ-न-कुछ तो समय लगेगा ही। इसलिए सभी अनन्त पदों को अगर एक-एक करके जोड़ा जाए, तो इसमें अनन्त काल लग जाएगा और मनुष्य की जि़ंदगी काल से सीमित है। अगर हम कुछ सीमित पदों के बाद रुक जाते हैं, तो छोटी-मोटी त्रुटि रह जाएगी। इसलिए हिंदुस्तान में इसका नाम ‘सविशेष’ रखा गया।

अनन्त श्रेणी के एग्जेक्ट द्ग3ड्डष्ह्ल योग की कोई व्यावहारिक उपयोगिता भी नहींए छोटी-मोटी त्रुटि मान्य है। व्यवहार में दस या बीस दशमलव स्थान काफी हैं, जैसे- √2=1.4142135623731 और अगर कभी ज्यादा सटीकता की जरूरत पड़ती है, तब इसका मान सौ या हजार दशमलव स्थान तक निकाला जा सकता है। आज की तारीख में कंप्यूटर का इस्तेमाल कर हम उसी विधि से अरब-खरब दशमलव स्थान तक यह कर सकते हैं। लेकिन यह बात दुहराना जरूरी है कि त्रुटिहीनता तो क्या, ऐसी सटीकता की भी आज की तारीख में व्यावहारिक उपयोगिता नहीं है।

लिमिटविहीन था कैल्कुलस
अनन्त श्रेणी के योग की यूरोपीय समस्या कैल्कुलस के कारण और जटिल हो गयी। यह तो सभी जानते हैं कि कैल्कुलस के सहारे ही भौतिकी के सभी अवलोकन समीकरण differential equations लिखे जाते हैं, परंतु बहुत कम यह जानते हैं कि कैल्कुलस का अविष्कार वास्तव में पाँचवीं शती में आर्यभट ने भारत में संख्यात्मक रूप से किया था। संगमग्राम के माधव ने इसी विधि से ज्या, कोज्या, इत्यादि के सटीक मान 10 दशमलव स्थान तक निकाले और हम इससे संतुष्ट थे; क्योंकि इससे अधिक सटीकता की कुछ व्यावहारिक उपयोगिता तब नहीं थी। इसी कारण से आर्यभट ने पाई π के सटीक मान को आसन्न कहा। लेकिन पश्चिमी अंधविश्वास के अनुसार मैथमेटिक्स को एग्जैक्ट होना जरूरी है, और उसके लिए 10 दशमलव स्थान तो क्या, अरब-खरब दशमलव स्थान की सटीकता भी काफी नहीं है। यूरोपियों को सारे-के-सारे अनन्त दशमलव स्थान चाहिए थे, जो कि वास्तव में सम्भव ही नहीं है। मैथमेटिक्स एग्जैक्ट है, इस अंधविश्वास के कारण यूरोपियों ने सोचा कि जो चीज एग्जैक्ट नहीं है, वह मैथमेटिक्स नहीं हो सकती। डेकार्ट ने अपनी ‘ज्यामिति’ नाम की किताब में लिखा पाई की अनन्त श्रेणी की तरफ इशारा करते हुए कि सीधी रेखा व्यास और वक्र रेखा परिधि की तुलना करना यानि पाई की अनन्त श्रेणी का त्रुटिहीन योग निकालना मनुष्य के दिमाग से परे है।

चूँकि अनन्त श्रेणी का योग भौतिक रूप से निकालना असम्भव है, इसलिए यूरोपियों ने अनन्त श्रेणी का योग गैरभौतिक metaphysical या कल्पनामात्र तरीके से निकाला। इसके लिए काल्पनिक या गैर.वास्तविक वास्तविक संख्याओं real numbers और सीमा limits की भी कल्पना की। ध्यान रहे कि इन गैर-वास्तविक और कल्पनामात्र संख्याओं को हम आज ‘वास्तविक संख्या’ कहकर स्कूल में सिखाते हैं और बच्चों को भ्रमित करते हैं। उपनिवेशवादी शिक्षा ने फिर हमें यह बताया कि मैथेमैटिक्स करने का यह गैरभौतिक तरीका श्रेष्ठ है। हमारे ही गणित पर एक गैरभौतिक परत लगाकर हमें लौटा दिया।

आर्यभट ने कैल्कुलस, संख्यात्मक विधि से किया था जो आज की लिमिट वाले कैल्कुलस से कहीं अधिक सरल और उपयोगी है। यही तरीका आज कैल्कुलस से सभी व्यावहारिक उपयोग जैसे कि आदमी को चांद पर भेजने में इस्तेमाल किया जाता है। इस विधि से कैल्कुलस पढऩे से वह सरल भी हो जाता है। विद्यार्थी को कुछ भी रटना नहीं पड़ता और वह केवल पाँच दिनों में इसे समझ जाते हैं। फिर उससे कठिन से कठिन सवाल का हल कर सकते हैं, ऐसे भी सवाल जिसका हल सामान्य कैल्कुलस में पढाया नहीं जाता। उदहारण के लिए यह प्रश्न पत्र देखिये। इस विधि को देश-विदेश के दस विश्वविद्यालयों में पढ़ाकर इस बात को सिद्ध किया जा चुका है और आज फिर से पढ़ाया जाना प्रारम्भ हुआ है। लेकिन हम आज भी उपनिवेशवाद के शिकार है और शिक्षा में पश्चिम की अंधी नकल करना अपना परम धर्म मानते हैं।

दु:ख की बात यह भी है कि मैथमेटिक्स की गलत पश्चिमी विधि से एक ही प्रहार में हमारे सारे दर्शन और संस्कृति का नाश हो जाता हैय क्योंकि हमारे सभी दर्शन में प्रत्यक्ष प्रमाण मान्य हैए लेकिन मैथेमैटिक्स में प्रत्यक्ष प्रमाण वर्जित है।
पहले संस्कृति की बात करते हैं। गैर-वास्तविक वास्तविक संख्याओं unreal real number के सहारे हम काल्पनिक ‘वास्तविक रेखा’ real line की अवधारणा बचपन से सिखाते हैं। भौतिकी के सभी अवकलन समीकरण differential equations कैलकुलस के सहारे लिखे जाते हैं। इस गलत विधि से कैल्कुलस करने के कारण वास्तविक संख्याओं का प्रयोग कैल्कुलस के लिए जरूरी माना जाता है। इसलिए काल की अवधारणा भी रेखाकार बन जाती है और इसे विज्ञान कहा जाता है।

लेकिन वेद और उपनिषद में और अफलातून के लेखों में भी जिस आत्मा का जि़क्र है, वह कालचक्र या लगभग चक्रीय काल quasi cyclic time की अवधारणा पर आधारित है। काल की ऐसी चक्रीय कल्पना को चर्च ने अपनी राजनीति के लिए अपना सबसे बड़ा शाप anathema दिया। इसलिए कैल्कुलस पढ़ाने की आज की विधि से यह आसानी से सिद्ध हो जाता है कि ‘विज्ञान’ के अनुसार चर्च सही है और वेदोपनिषद् गलत है। किसी और हिंदुस्तानी गणितज्ञ या वैज्ञानिक या दार्शनिक को यह बात आज तक समझ में नहीं आयी। याद रहे कि यह निष्कर्ष पूरे ही गैर-भौतिक तरीके से निकला है, लेकिन इसे भौतिकी कहा जाता है।

स्टीफन हॉकिंग के विज्ञान का सार यही था और इसलिए पश्चिम में उसका ऐसा महिमागान हुआ। एक अमेरिकी भौतिकशास्त्री टिपलर ने साफ़-साफ़ यह लिख दिया कि हॉकिंग के विज्ञान ने चर्च की हठधर्मिता पूरी तरह से सिद्ध कर दी है। हालांकि मैं यह बात विगत 15 साल से समझाने की कोशिश कर रहा हूँ, परन्तु यह बात हमारे वैज्ञानिकों और गणितज्ञों के पल्ले नहीं पड़ी; क्योंकि वह सब कैल्कुलस पश्चिमी विधि से ही सीखते हैं।

प्रत्यक्ष बनाम कल्पना
जहाँ तक गणित के दर्शन की बात है, सारे हिंदुस्तानी दर्शन, प्रत्यक्ष प्रमाण को पहला प्रमाण मानते हैं, लेकिन पश्चिम में गणित की विधि में प्रत्यक्ष प्रमाण वर्जित है और उसे अविश्वसनीय माना जाता है। भारतीय गणित, भारतीय दर्शनों की भाँति प्रत्यक्ष प्रमाण को भी स्वीकार करता है।

जैसा कि आर्यभट ने कहा कि ऊध्र्वता लम्ब के सहारे सिद्ध होती है। प्रत्यक्ष स्वीकार किया, इसका कतई यह मतलब नहीं कि अनुमान निगमन, डिडक्शन, वर्जित था। उसी आर्यभट ने कहा कि पृथ्वी कदम्ब के फूल के समान गोल है। उसने अन्तरिक्ष में जाकर पृथ्वी को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा। उसके अनुयायी बताते हैं कि दूर के झाड़ दिखाई नहीं देते। और इस बात से पृथ्वी चपटी नहीं है, का पता चलता है। समुद्र में चलता जहाज क्षितिज में विलीन हो जाता है और क्षितिज गोलाकार है। इससे यह पता चलता है कि पृथ्वी गोलाकार है। यहाँ से क्षितिज की दूरी नापने से पृथ्वी का व्यास निकाला जा सकता है और यह सभी भारतीय गणितज्ञों ने काफी सटीकता से किया।

पश्चिमी गणित के दर्शन के अनुसार प्रत्यक्ष प्रमाण अविश्वसनीय है और इसलिए सारे हिंदुस्तानी दर्शन भी अविश्वसनीय हैं; क्योंकि वे विज्ञान के समान प्रत्यक्ष को पहला प्रमाण मानते है!। पश्चिम याने चर्च का मानना है कि डिडक्शन अनुमान पर आधारित प्रमाण ही विश्वसनीय और अचूक है। तो प्रत्यक्ष प्रमाण की नामंजूरी के पूर्व-पक्ष का खण्डन ज़रूरी है और उसके बिना हिंदुस्तानी अचूक गणित पर गर्व व्यर्थ है।

डिडक्टिव-प्रमाण चूक सकता है
डिडक्टिव-प्रमाण अचूक है यह महज पश्चिमी अंधविश्वास है। डिडक्टिव प्रमाण कई कारणों से चूक सकता है। जैसे गलत डिडक्टिव प्रमाण को गलती से सही माना जा सकता है। ऐसा यूक्लिड की किताब ‘एलिमेंट्स’ में दिए गए प्रमाणों के साथ हुआ। वे सभी-के-सभी गलत डिडक्टिव प्रमाण थे, लेकिन पश्चिमी अंधविश्वासियों ने सदियों तक उन्हें सही माना। इन्द्रियों के मुकाबले में दिमाग ज्यादा आसानी से धोखा खा सकता है, इसलिए अनुमान निगमन प्रत्यक्ष से कमजोर है।
जैसे हिंदुस्तान में लोकायत दर्शन मानता था, अनुमान निगमन, डिडक्शन में चूकने के और भी कारण हैं। यदि हम गलत परिकल्पना axiom, postulate, assumption से शुरू करते हैं, तो निष्कर्ष गलत निकलेगा। सारी-की-सारी आधुनिक मैथेमैटिक्स सेट थ्योरी और अनन्त की परिकल्पना से जिड़ी है। इसकी प्रत्यक्ष के आधार पर जांच असम्भव है। अनन्त की अलग-अलग परिकल्पनाएँ हो सकती हैं, तो हिंदुस्तानी तरीका क्यों न अपनाएँ ?

दूसरी बात यह कि डिडक्शन, लॉजिक पर आधारित है। पश्चिम में यह चर्च का अंधविश्वास रहा कि लॉजिक सार्वभौमिक है; क्योंकि गौड भी इससे बँधा है। इसलिए फॉर्मल गणित के सभी प्रमाण बायनरी लॉजिक पर आधारित हैं। हिंदुस्तान में न्याय-वैशेषिक दर्शन-प्रणाली में यह बायनरी लॉजिक मिलती है। लेकिन हिंदुस्तान में असली अरस्तु के पहले से भी और भी अलग-अलग किस्म के लॉजिक पाए जाते हैं, जैसे-बौद्ध चतुष्कोटि, जैन स्वादवाद, इत्यादि। तो सांस्कृतिक तौर पर लॉजिक सार्वभौमिक नहीं है। तो लॉजिक का आधार भी प्रत्यक्ष प्रमाण ही हो सकता है। यदि प्रत्यक्ष से देखा जाए, तो हमें क्वांटम लॉजिक के बारे में भी सोचना होगा। और इसलिए लॉजिक बायनरी होना ज़रूरी नहीं है, जैसे पश्चिम के गणित दर्शन ने गलत माना है। इसलिए भी डिडक्शन प्रत्यक्ष प्रमाण से कमज़ोर है।

असल में अनुमान निगमन, डिडक्शन पर आधारित प्रमेय वैध ज्ञान ही नहीं होता। बल्कि सुविधाजनक प्रतिज्ञा postulates से शुरूआत कर कोई भी बकवास प्रमेय सिद्ध किया जा सकता हैए जैसे-
1. सभी जानवर के दो सींग होते हैं।
2. खरगोश एक जानवर है।
3. इसलिए खरगोश के दो सींग होते हैं।
डिडक्शन एकदम सही है, लेकिन निष्कर्ष गलत है। खरगोश के सींग की बात पूरे बकवास का उदाहरण है। इस बकवास का डिडक्टिव प्रमाण 2 प्रतिज्ञाओं पर आधारित है, जिसमें से पहली प्रतिज्ञा सभी जानवर के दो सींग होते हैं गलत है। लेकिन यह गलत इसलिए है कि हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं कि कई एक जानवर ऐसे हैं जिनके सींग नहीं है। लेकिन पश्चिमी औपचारिक गणित formal mathematics में प्रत्यक्ष पूर्णत: वर्जित है, तो हमें यह बात कैसे पता? रसेल का कहना है। कि डिडक्टिव प्रमाण किसी भी प्रतिज्ञाओं से शुरू हो सकता है जो हमें हास्यास्पद amusing लगती हैं, और मुझे सभी जानवर के दो सींगों की बात अत्यन्त हास्यास्पद लगती है।

याद रहे कि हिंदुस्तानी गणित normal mathematics में दोनों-प्रत्यक्ष और अनुमान- का उपयोग होता है, जैसा पहले बता चुके हैं कि आर्यभट ने पृथ्वी के गोलाकार का अनुमान प्रत्यक्ष के आधार पर किया। अवलोकन और अनुमान दोनों का सहारा लेना विज्ञान की भी विधि है। लेकिन न आर्यभट ने, न विज्ञान ने कभी अचूक होने का दावा किया जैसे कि पश्चिमी गणित डिडक्शन में अंधविश्वास के सहारे करता है।

तो अचूक होना तो दूर, डिडक्शन के आधार पर कोई भी बकवास प्रमेय प्रमाणित किया जा सकता है। सिर्फ डिडक्शन से प्रमाणित प्रमेय वैध ज्ञान है या अवैध है- यह प्रतिज्ञा की सच्चाई पर निर्भर करता है, सिर्फ प्रमाण की नहीं। विज्ञान और साधारण गणित में यह सच्चाई हम प्रत्यक्ष के आधार पर जाँच सकते हैं। लेकिन यह विधि पश्चिमी फॉर्मल गणित में उपलब्ध नहीं है; क्योंकि वह अपने आपको श्रेष्ठ और अचूक बताने के लिए प्रत्यक्ष प्रमाण को वर्जित करता है। इसके बदले फॉर्मल गणित हमें यह सिखाता है कि आधिकारिक रूप से जो भी प्रतिज्ञाएँ पश्चिमी लोगों ने बना रखी हैं सेट थ्योरी इत्यादि, उनमें हमें विश्वास करना चाहिए जैसा कि हमारे सारे गणितज्ञ आज की तारीख में करते हैं।

वाकई में 1+1= 2 के प्रमाण के लिए भी फॉर्मल गणित की जो प्रतिज्ञाएँ postulates, axioms जरूरी हैं, उनकी जांच प्रत्यक्ष के आधार पर की ही नहीं जा सकती; क्योंकि वे प्रतिज्ञाएँ अनन्त की एक ख़ास पश्चिमी परिकल्पना से जुड़ी हैं। ज्यादातर गणितज्ञ भी अनन्त की यह परिकल्पना सेट, थ्योरी इत्यादि अच्छे से नहीं समझते, तो यह समझना तो दूर रहा कि अनन्त की यह परिकल्पना सार्वभौमिक नहीं है बल्कि चर्च की अनन्त काल की राजनीतिक कारणों से जुड़ी परिकल्पना से खास ताल-मेल रखती है। और यह अनन्त काल की कल्पना हिंदू-धर्म की लगभग चक्रीय काल quasi-cyclic time के विपरीत है।

आजकल जो सिखाया जा रहा है, उस गणित की कठिनाई इस ग़ैर-भौतिक पक्ष पर जोर देने से जुड़ी है। प्रत्यक्ष प्रमाण के सहारे 1+1=2 बहुत आसानी से समझाया जा सकता है, जैसे हम किंडरगार्टन में आज भी सिखाते हैं कि एक अनार और एक अनार से दो अनार बनते हैं। लेकिन 1+1=2 के प्रमाण के लिए बटरैंड रसेल को 378 पन्ने इसलिए लगे क्योंकि इसमें अनन्त की परिकल्पना निहित रूप से आ जाती है । क्योंकि हमें यह बतलाना ज़रूरी पड़ता है कि हम पूर्ण संख्याओं integers की बात कर रहे हैं और पूर्ण संख्याएँ अनन्त हैं। जब इतनी सरल चीज़ इतनी जटिल बन जाती है, तो बाकी गणित का क्या होगा!

ज्योमेट्री बॉक्स या सुतली?
प्रत्यक्ष को चर्च की विधि से नीचा दिखाने के लिए आज भी हमारी पाँचवीं और छठी कक्षा की पाठ्यपुस्तकें यह सिखाती है कि ज्यामिति में बिंदु अदृश्य है, और यदि दिखता है तो गलत है। ऐसे गैर- भौतिक तत्व के महिमागान से स्कूली बच्चे भ्रमित हो जाते हैं। भला बच्चा दो अदृश्य बिदुओं के बीच की दूरी कैसे सकता है?

कुछ चीजें अदृश्य होती हैं लेकिन उनका अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन अदृश्य बिंदु कहाँ है, उसका किसी भी विधि से अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। बच्चों को और अधिक भ्रमित करने के लिए, आगे चलकर नवीं कक्षा की पाठ्य-पुस्तक यह सिखाती है कि ज्यामिति के बिंदु की परिभाषा भी नहीं की जा सकती। न दिखता है, न अनुमान लगा सकते हैं और न ही दूसरे शब्दों में परिभाषा की जा सकती है। ऐसे में बच्चा क्या सीख सकता है-केवल रटना। और यही औपनिवेशवादी शिक्षा का उद्देश्य है।

बच्चा, जो व्यावहारिक ज्यामिति सीखता है, वह केवल कम्पास बॉक्स के सहारे सीखता है, जिसमें बिंदु प्रत्यक्ष दिखाई देता है और इसलिए दो बिंदुओं की दूरी नापी जा सकती है जो अदृश्य बिंदुओं के साथ नहीं किया जा सकता। ठीक चर्च की विधि से हम दोनों चीजें सिखाते हैं कि बिंदु अदृश्य भी है। और दृश्य भी। अचम्भे की बात यह है कि माँ-बाप और पालकों को इस तरह का बकवास सिखाने से कोई ऐतराज नहीं। यह है उपनिवेशवादी शिक्षा की ताकत, जो हमें सामान्य बुद्धि में अविश्वास सिखाती है और पूरी तरह नपुंसक बना देती है। और हमारी गणित की शिक्षा-प्रणाली में जहाँ प्रत्यक्ष का इस्तेमाल होता भी है, वह भी पश्चिमी तरीके से; क्योंकि कम्पास बॉक्स उपनिवेशवादी शिक्षा के साथ आया। यह हिंदुस्तानी पद्धति में नहीं पाया जाता था।

भारत में ज्यामिति पढ़ाने के लिए ‘सुतली’ का प्रयोग होता था। सुतली को ही ‘शुल्ब’ भी कहते हैं। आज भी भारत में बढ़ई, राजमिस्त्री आदि कारीगर सुतली से ही नापने का सारा काम करते हैं। इसका इस्तेमाल कर ज्यामिति सिखाने की शुल्बसूत्र पर आधारित विधि पर पाठ्यपुस्तक तैयार है। सुतली की तुलना ज्योमेट्री बॉक्स से करें। ज्योमेट्री बॉक्स, ज्यामिति पढऩे वाले सभी बच्चे खरीदते ही हैं, लेकिन इसके अन्दर के सभी सामानों का प्रयोग नहीं करते। उसमें से केवल ‘डी’, जिसे चाँद भी कहते हैं, परकार और स्केल ही उपयोग में आते हैं। डिवाइडर और त्रिभुजों का कोई प्रयोग नहीं होता। इस पर भी सभी इस ज्योमेट्री बॉक्स को खरीदते ही हैं, क्योंकि उपनिवेशवादी शिक्षा रस्में सिखाती है।

इस तरह ज्योमेट्री सीखने वाला बच्चा कभी भी भूमि पर लम्ब नहीं डाल सकता। साथ ही वक्र रेखा को नापना और टेढ़ी-मेढ़ी मेड़वाले खेत का क्षेत्रफल निकालना इससे सम्भव नहीं है। परन्तु भारतीय परम्परागत गणित से यह आसानी से किया जा सकता है। इसलिए अब ‘रोप ज्योमेट्री’ रज्जू गणित की बात होने लगी है। प्रत्यक्ष रूप से कोई भी बच्चा एक सुतली लेकर रज्जू गणित की विधि से व्यास और परिधि को नापकर, सीधी और वक्र रेखा की तुलना कर पाई का मान निकाल सकता है, इसके लिए लम्बे-चौड़े प्रमेयों और डिडक्शन की कोई आवश्यकता नहीं है।

सुतली स्केल का काम तो कर ही सकती है, लेकिन वह डी का काम भी करती है। यानि ज्योमेट्री बॉक्स के बदले सुतली पर्याप्त है। हम आज यह नहीं सिखाते कि डी कैसे बनाया जाता है और वृत्त की परिधि को 360 बराबर भागों में कैसे विभाजित किया जाता है। यह इसलिए कि हम आज कोण की गलत परिभाषा अपनाते हैं। यह ‘कोण’ शब्द हिंदुस्तानी पद्धति में 1723 ई. के बाद आता है, जब सम्राट जगन्नात्र नामक गणितज्ञ ने, सवाई जयसिंह के कहने पर, पश्चिमी ज्यामिति का ‘रेखागणित’ नाम से अनुवाद किया।

इसके पहले ऋग्वेद 1.164.11,1.164.48 और वेदांगज्योतिष ऋक् 11 के जन्माने से ‘चाप’ शब्द ही इस्तेमाल होता था और चाप की सापेक्ष लम्बाई ही नापी जाती थी, और पूरे वृत्त को 360 या 720 भागों में बांटा जाता था। चूँकि चाप एक वक्र रेखा है, इसलिए कोण या चाप की सापेक्ष लम्बाई सुतली से ज़्यादा आसानी से नापी जा सकती है। इसके कई फायदे हैं जो मैं अपने ‘रज्जू गणित’ की किताब में समझा चुका हूँ ।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अंकगणित, त्रिकोणमिति, बीजगणित, रेखागणित, कैल्कुलस, सांख्यिकी, आदि गणित की सभी विधाओं का भारत में न केवल विकास हुआ था, बल्कि वह अधिक सरल, उपयोगी और व्यावहारिक था और आज भी है। यदि हमें भारतीय गणित पर गर्व है, तो हमें यही पद्धति अपनी शिक्षा-प्रणाली में भी अपनानी चाहिए।