भोजन ही औषधि है

डॉ. महेश व्यास
डीन, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, दिल्ली


जीवन के सुचारू रूप से संचालन के लिए कुछ नियम बताये गये हैं। इन नियमों की पूर्ति के लिये हमें सर्वांग परिपूर्ण और ठीक भोजन करना चाहिये। परन्तु सर्वाग, परिपूर्ण और ठीक भोजन किसे कहा जा सकता है? यह निर्णय करने से पूर्ण हमें यह जानना चाहिए कि जीवन के नियमों की भांति भोजन के भी कुछ विशेष नियम है, इन नियमों के अधीन ही भोजन हमारे शरीर का अंश बनता है और हमारे जीवन की स्थिर रखने का कारण बनता है।

जब बच्चे का मां के पेट में पालन-पोषण होता है, तो उसका अभिप्राय केवल इतना होता है कि अन्दर ही अन्दर मां के भोजन से उसका शरीर बनता और बढ़ता चला जाए। यदि मा का भोजन ठीक प्रकार का नहीं तो उससे बने हुए रक्त से बच्चे का पालन-पोषण ठीक न होकर बच्चा अपना सांसारिक जीवन निर्बलता और स्वास्थ्य-हीनता से प्रारम्भ करेगा। यदि मां का भोजन ठीक होगा तो बच्या खूब बढ़ेगा और स्वस्थ होगा।

जब तक बच्चा मां के पेट में होता है, तब तक उस केवल शरीर के पोषण के लिए ही भोजन की आवश्यकता होती है, परन्तु जन्म के पश्चात उसे बाहर की गर्मी सर्दी का भी सामना करना होता है। हिलने-डुलने, खाने-पीने, देखने-भालने हँसने- खेलने, बोलने-चालने आदि सबके लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। इस प्रकार बच्चे के भोजन का कुछ भाग उसका शरीर बढ़ाने में कुछ गर्मी स्थिर रखने में और कुछ अन्य क्रियाओं में खर्च होने वाली शक्ति को पूरा करने के अतिरिक्त कुछ शक्ति शरीर में सुरक्षित रखने के लिए प्रयुक्त होता रहता है। भोजन एक अन्य आवश्यकता भी पूरी करता है। जैसे मशीनों को सदा तेल दिया जाता है इस शरीर रूपी मशीन को घिसावट से बचाने के लिए चिकनाई पैदा करना भी भोजन का काम है। बीमारियों का सामना करने की शक्ति भी भोजन से ही प्राप्त होती है।

अब आप समझिये कि जब इतने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भोजन खाया जाता है, तो उसके सम्बन्ध में कुछ सोच विचार करना क्या अनावश्यक है इतने भिन्न-भिन्न उद्देश्यों के लिए भिन्न-भिन्न खाद्यपदार्थों की आवश्यकता है। केवल एक प्रकार का भोजन इतने उद्देश्य पूरे नहीं कर सकता। क्या केवल चावल या केवल साग-दाल इतनी भारी आवश्यकता पूरी कर सकते हैं फिर क्या ऐसा अन्धेर भी यह शरीर सहन कर सकता है कि वर्षों तक एक ही भोजन खाया जाए, जैसे प्रतिदिन दाल रोटी ही खाई जाए और सब्जी नाम को भी न ली जाए या सुबह और रात को चावल और सब्जी ही खाई जाये दाल, मक्की, गेहूं में से कुछ भी न खाया जाय। यह तो रोगों को निमन्त्रण देना है। ऊपर वर्णित भिन्न-भिन्न उद्देश्य भिन्न-भिन्न खाद्य-पदार्थों के सेवन से ही पूरे होते हैं, इसलिए कई कई पदार्थ मिलकर ही पूर्ण भोजन कहला सकते हैं। इसके अतिरिक्त इनकी मात्रा भी न्यूनाधिक होगी। मकान वाला उदाहरण यहाँ ठीक बैठता है। मकान बनाते समय इंजीनियर को देखना पड़ता है कि उसमें इतने कमरे, इतने दरवाजे, इतनी अलमारियाँ, भोजनालय और स्नानगार इत्यादि होंगे। उसके लिये इतनी मात्रा में इतने इतने अच्छे प्रकार के सामान की आवश्कता है। यदि वह बिना सोचे-समझे ईटों का ढेर लगा दे, किन्तु गारा बनाने के लिये अच्छी मिट्टी, सीमेंट या चूने का प्रबन्ध ही न करें कब्जे कुंदे तो बहुत खरीद कर रख लें, परन्तु पेच और कील एक भी न लें या रेतली भूमि की ईट मकान में लगाने लगे या निकम्मे गांठदार लकड़ी के चौखट और दरवाजे बनाने लगे तो उस मकान का परमात्मा ही रक्षक है।

इसलिये इंजीनियर लोग और मकान के मालिक अपनी सारी आवश्यकताओं को सम्मुख रखते हुए सारे सामान की व्यवस्था कर लेते हैं, किन्तु हमारे शरीर रूपी मकान के लिए उतने विचार और दूरदर्शिता से खाद्य-पदार्थ संग्रहित नहीं किए जाते। आवश्यकता और उद्देश्य को दृष्टि से ओझल कर दिया जाता है। न यह पता होता है कि गेहूं की रोटी से कौन-सी आवश्यकता पूरी होती है, सब्जी किस लिए खाई जाती है, चावल कौन-कौन-सी जरूरत पूरी करते हैं और जो आवश्यकतायें ये चीजे पूरी नहीं करती, उनकी कमी कैसे और किस प्रकार के भोजन से पूर्ण हो सकती है।

हम सब मन से यह चाहते है कि जो भोजन हम खाये उससे अधिक से अधिक लाभ हमको हो। हमारी तन्दुरुस्ती की ताकत बढ़े, इम अधिक से अधिक काम कर सकें हमारा वजन इतना अधिक बढ़ जाए या घट जाए इत्यादि। इसके लिए आवश्यक है कि हम इम-इन जरूरतों को पूरा करने वाले खाद्य-पदार्थों का ज्ञान हो। चावल, रोटी, दाल, दूध, दही, घी, मक्खन, साग, सब्जी, फूल, फल, खट्टा, मीठा कहने का अभिप्राय यह है कि भोजन रूपेण जो कुछ खाया जाता है, उसमें सात वस्तुएं पाई जाती है। 1- प्रोटीन, 2- चिकनाई, 3 निशास्ता 4- शक्कर या मिठास, 5- नमक, 6- पानी, 7- विटामिन ।

इनमें से प्रत्येक का संक्षिप्त वर्णन नीचे दिया जाता है।
प्रोटीन शब्द प्रथमीन से बना है, जिसका अर्थ है महिला अवश्य ही प्राणियों की शरीर- पुष्टि में इसका नम्बर पहला है और वही है जो मकान बनाने में ईटों का मांस, रक्त और दिमाग हमारी खुराक के प्रोटीन से ही बनते है, प्रोटीन से ताकत भी मिलती है। रक्त में प्रोटीन की काफी मात्रा होती है। बच्चे का शरीर सबसे पहले मां के रक्त से ही बनता है, जिससे उसे काफी प्रोटीन मिलती है इसलिए गर्भवती को अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है। जन्म लेने के बाद बच्चे को मां के दूध से काफी प्रोटीन मिलती है, जिससे इसका शरीर बढ़ता है। दूध में प्रोटीन उस भोजन से बनती है जी मां खाती है, परन्तु सब तरह की खुराक में प्रोटीन नहीं होती। घी, तेल, शहद खांड, साबूदाना में यह होती ही नहीं। दूध, दही, छाछ, पनीर, हृह्वह्लह्य,मूंगफली, बादाम, सूखे मेवे आदि गेहूं, चना, मक्की और दालों में शरीरवर्धक प्रोटीन अधिक होती है।
शरीर की वृद्धि के लिए प्रोटीन की अधिक आवश्यकता 34 वर्ष तक होती है, परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि इस आयु के बाद प्रोटीन अधिक खाना सरासर भूल है और हानिकारक है। प्रोटीन वाले पदार्थों को पंचाना साग-सब्जी, अनाज इत्यादि से कठिन है। बड़ी आयु में प्रोटीन-जनक पदार्थ अधिक खा कर पाचन शक्ति पर व्यर्थ बोझ -डालने से क्या लाभ?
चिकनाई

चिकनाई का काम गरमी और ताकत तथा शरीर में आवश्यक और पैदा करना है। चिकनाई पांच तरह की होती है घी, मक्खन, तेल, वनस्पति घी चर्बी इनमें मक्खन उत्तम प्रकार की चिकनाई कही गई हैं उत्तर कर बादाम का तेल, बादाम रोगन और जैतून का तेल फिर सरसों का तेल, फिर खालिस मूंगफली और नारियल का तेल फिर बिना किसी मिलावट के वनस्पति घी जानवरों की चर्बी सब से घटिया है। नियम यह है कि शरीर की गर्मी से पिघल कर चिकनाई शरीर का अंग बनती है, परन्तु शरीर की गर्मी से चर्बी पिघलती नहीं। इस कारण उसे पचाना हमारी शारीरिक मशीन के लिए कठिन हो जाता है।

अच्छी पाचन शक्ति होने पर घी-मक्खन का अधिक सेवन किया जाए तो वह हमारे पट्टों में जमा रहता है परन्तु एक हद से अधिक खा जाने की हालत में हमारी मशीन उसे पचा नहीं सकती। पहले तो कुछ समय जरूरत से अधिक खाया हुआ घी पचे बिना ही टट्टी के साथ बाहर आ जाता है, यदि बार-बार अधिक प्रयोग किया जाए तो यह हमारे पेट की मशीन को खराब कर देता है और दस्त, पेचिश, संग्रहणी, दांतों की पीप, पायोरिया, इत्यादि का कारण बनता है तथा पेशाब में शक्कर आने की हालतों में हानिकारक सिद्ध होता है।

चिकनाई की अधिकता की हमारे शरीर को आवश्यकता नहीं, बल्कि जो लोग गरीबी के कारण बिल्कुल ही घी नहीं खा सकते, उनकी शारीरिक मशीन इस कमी की परवाह नहीं करती दूध, दही, लस्सी-छाछ, पनीर, सूखे हुए मेवों में से कोई एक भी सेवन करने वालों को अपनी आवश्यकता के अनुसार चिकनाई मिल जाती है। गेहूं, मक्की, ज्वार से भी निर्वाह के योग्य पर्याप्त चिकनाई मिल जाती है। छाछ और रोटी खाने वाले किसान दूध-घी खाने वालों से क्या कम ताकत रखते है या कम मोटे ताजे होते हैं?

जिनको मिल सके, वे घी-मक्खन खुशी से खायें, परन्तु इसका अधिक सेवन न करें। जितने पेट के बीमार हमारे पास आते हैं, उनमें से अधिकांश अधिक घी का प्रयोग करने वाले होते हैं। घी को पचाने और अपने शरीर का अंग बनाने के लिए पर्याप्त परिश्रम और व्यायाम की आवश्यकता होती है, जो कि बहुत कम लोग करते हैं। जो परिश्रम और व्यायाम नहीं करते, उनका अधिकार नहीं कि घी का अधिक प्रयोग करें। डाक्टर, हकीम, वैद्य अमीर घरानों में घी के अधिक इस्तेमाल घी पड़े पकवान स्वादिष्ट तो अधिक होते हैं और स्वाद के लिए ही खाये जाते हैं परन्तु कहा यह जाता है कि हम ताकत और तन्दुरूस्ती के लिए खाते हैं। ये दोनों बात गलत साबित हो रही है।

दुर्भाग्यवश गरीब लोग जिनको अधिक परिश्रम करना पड़ता है और जो अधिक घी पचा भी सकते हैं, उनको घी कम मिलता है। अमीर लोग जो कम मेहनत करते हैं उनको घी अधिक मिलता है, परन्तु वे न अच्छी तरह पचा सकते हैं और न उससे स्वास्थ्य और शक्ति प्राप्त कर सकते है।

साधारणत: दिमागी काम करने वालों की दिन-भर में एक छटांक और बाकी की आध छटांक घी की जरूरत हो सकती है, परन्तु जिनको इतना भी नहीं मिल सकता, उनको भी घबराने की कोई जरूरत नहीं हैं। अच्छा आप ही बताएं घोड़ों और बैलों को घास चारा दाना तो दिया जाता है, परन्तु घी-मक्खन नहीं दिया जाता फिर भी उनके शरीर कितने मजबूत होते है। वे उचित समझ और बुद्धि भी आवश्यकतानुसार रखते हैं। इसलिए निर्धन घी तेल न मिलने की शिकायत न करें।
निशास्ता और शक्कर- इन दो को हमने इक_ा कर दिया है, क्योंकि इनका एक ही काम है। साधारणत: हमारे शरीर को गुड़, शक्कर, खांड की कोई आवश्यकता नहीं हुआ करती। गेहूं, चावल, मक्की इत्यादि अनाज और दालों में जो निशास्ता होता है, पेट में जाकर वही एक तरह की शक्कर में तबदील हो जाता है। चिकनाई की तरह शक्कर का काम भी ताकत और गर्मी पैदा करना है। जितनी ताकत और गर्मी एक छटांक खांड और शक्कर पैदा करती है उससे दुगनी ताकत और गर्मी एक छटांक चिकनाई पैदा करती है। इसलिए गरीब मजदूर और दूसरे अन्य प्रकार की मजबूरियों के कारण जो घी का प्रयोग नहीं कर सकते, अधिक घाटे में नहीं रह सकते। ये आध छटांक भी नहीं खा सकते तो 1 छटांक शक्कर या गुड़ तो खा सकते है। यदि खांड और चिकनाई दोनों न खायें, तो पाव भर अनाज से ही ये आवश्यकता के अनुसार शक्ति प्राप्त कर लेते हैं।

मांस, मछली,अण्डा, पनीर, घी, तेल और साग सब्जी में निशास्ता नहीं मिलता। निशास्ता अधिकतर सब तरह के चावल गेहूं आदि अनाजों, दाल, आलू, शक्रकंदी, सिंघाड़ा और मीठे सूखे मेवो में मिलता है। यद्यपि शहद, गुड़, शक्कर, खांड सब वही चीज शरीर को देते हैं जो निशास्तेदार भोजन परन्तु एक बात निवेदन करनी आवश्यकता है, गुड़ शक्कर खाड बिल्कुल प्राकृतिक मिठास नहीं। शरीर को इनकी बहुत कम आवश्यकता है। उचित परिमाण में रोटी चावल दाल खाने वालों की जरुरत इसी में पूरी हो जाती है। दूध चाय में कम मीठा डालना चाहिए सर्दी और थकावट की हालत में, या जब सर्दी में निकलने लगे या शारीरिक कठिन परिश्रम करने लगें तो दूध चाय या घी में डालकर या वैसे ही शहद, गुड या खांड खाना श्रमजीवियों के लिए विशेषकर बहुत लाभदायक सिद्ध होगा। इसके अतिरिक्त बहुत कम मिठास की आवश्यकता पड़ती है। ताजे गन्ने में बहुत अधिक खूबियां है और मौसम पर इसका चूसना तन्दुरूस्ती के लिए हितकर है। परन्तु कुर्सी पर बैठने वाले किसी मिठास के अधिकारी नहीं।

निशास्तेदार भोजन से पूरा लाभ उठाने का ठीक तरीका यह है कि इन्हें खूब चबाकर खाया जाए। निशास्तेदार भोजनों के पंचाव में मुंह के थूक का बड़ा हिस्सा है। यदि किसी शोरबे और तरी वाली चीज या दही-लस्सी के साथ ये (रोटी आदि) खाए जायं तो बिना अधिक बचाए ही पेट में चले जाते हैं और पाचक (थूक) को साथ मिलने का अवसर नहीं मिलता। ये अकले या किसी खुश्क साग सब्जी के साथ खाएँ तो चबाते चबाते थूक इनके साथ मिलकर आधे से अधिक मुंह में ही इनको पचा लेता है। बहुत चबाकर खाने से एक तो मैदा और अंतडिय़ों पर बिल्कुल बोझ नहीं पड़ता दूसरे शक्ति अधिक प्राप्त होती है। हां फलों के निशास्ते और मिठास में यह खूबी है कि इसे पचाने के लिए थूक (लार) की जरूरत नहीं। सो फलों का रस बहुत जल्द पच जाता है।

साधारणत: बहुत तरह के निशास्तेदार खाने इक_े नहीं खाने चाहिए, विशेषताएं जब पाचन शक्ति कमजोर हो। इस तरह उनके पाचन में मेदे और अंतडिय़ों के कमजोर होने के कारण पाचन क्रिया के बिगडऩे की अधिक आशंका रहती है। यही सलाह एक समय में बहुत से खाने साग, सब्जी, दाल, दही, मुरब्बा, अचार, गोश्त, मछली, रोटी, चावल, पनीर, खीर, हलवा, फिरनी इत्यादि इक_ा खाने के विरुद्ध दी जाती है। इससे पेट में एक अजीब गड़ बड़-चौथ पैदा हो जाती है। कुछ समय तक तो हमारी शारीरिक मशीन जोर मारती है, पर अन्त में हार जाती है। तब मनुष्य बुरी तरह पाचन शक्ति की खराबी का शिकार बन जाता है। इसलिए एक समय में अधिक पदार्थ न खाएं।

चिकनाई और निशास्ता जो केवल शक्ति और गर्मी पैदा करने के लिए है, आपस में बहुत हद तक अदले-बदले जा सकते हैं, अर्थात एक-दूसरे की जगह काम आ जाते हैं। उनमें चिकनाई दुगनी बल्कि ढाई गुनी गर्मी और ताकत पैदा करती है पर पचने में भारी होती है। निशास्तेदार खाद्य सामग्री शीघ्र तो पचती है पर आवश्यक गर्मी और ताकत पैदा करने के लिए बड़े परिणाम में खानी पड़ेगी। इसलिये ऊपर लिखे हिसाब से दोनों साथ-साथ खाई जाएं तो अच्छा है।

लवण और धातु-यह अधिकतर साग और सब्जियों में पाये जाते हैं, पनीर दही और दूध में भी बहुतेरे होते हैं। बादाम और ताजा फलों में भी कुछ होते हैं। बाक़ी अनाज, दाल और सूखे मेवों में थोड़े परिणाम में पाये जाते हैं। इसलिए धातु और नमक का वर्णन वास्तव में साग-सब्जियों का ही वर्णन है। सब्जियों का बड़ा काम हमारी खुराक में काफी संख्या में नमक और और धातुएं पहुंचाना है। इसके अतिरिक्त इनका दूसरा बड़ा भारी काम हमारे शरीर में विटामिन पहुंचाना है। हमारे शरीर को नमक, कैल्शियम, चूना, सोडा, फास्फोरस गन्धक, आयोडीन, पोटाशियम, मैग्नीज और फौलाद की थोड़े परिणाम में जरूरत होती है। एक तो फेफड़ा और दिल की ताकत और दिल की धड़कन में धातुओं का बड़ा भारी हाथ है, दूसरे हड्डियों और दातों की बनावट के लिये अधिकतर इन्हीं की और इन में से भी हरे शाकों के कैल्शियम की आवश्यकता होती है।

ये नमक और धातु अलग भी बाजार में बिकते हैं पर जब ताजी सब्जियों से प्राप्त किए जाते है, तो शरीर के लिए अधिक लाभदायक होते हैं। समुद्री या खनिज नमक जो हम सब्जी में डालते है केवल दाल-चावल खाने वालों को ही उनकी अधिक आवश्यकता है। साधारणत: उनका प्रयोग कम होना चाहिए। प्रोटीन वाली खुराक अधिक खाने में उन्हें पचाने के लिए नमक बहुत लाभदायक होते है। ये पेट में हवा पैदा नहीं होने देते और दूसरी बीमारियों के जहरीले मवाद को मारते हैं। रक्त में मिलकर ये नमक हमारे शरीर की हर एक तेल (अणु) की तन्दुरुस्ती का स्नान कराते हैं। जिन देशों में पसीना अधिक आकर शरीर से नमक खारिज होता रहता है उनमें सब्जियों के कुदरती नमक के साथ-साथ कानी (पहाडी) और समुद्री नमक अधिक खाया जा सकता है।

कैल्शियम (चूना) तो दूध, दही, मक्खन, छाछ, पनीर अण्डे और बादाम में अधिक होता है। हड्डियों और फेफड़ों की बीमारी में ये बड़ा काम करता है। खाने का चूना भी इसी काम के लिए प्रयोग किया जाता है। पनीर दही, गेहूँ मक्की, दाल, पिस्ता, बादाम, काजू, जैतून, अखरोट, चिलगोजे और नारियल में फासफोरस का अधिक हिस्सा होता है। यह बढ़ते शरीर में खास कर सन्तानोत्पादक अंगी और दिमाग की ताकत के लिए विशेष लाभदायक है।

जिन खाद्य-वस्तुओं में प्रोटीन होती है, उन्हीं में गंधक भी होता है। पोटाशियम सब ही सब्जियों में अधिकता से होता है, यह गर्म के दिनों में और दूध पिलाने के दिनों में बच्चे की बढ़ोतरी के लिए लाभदायक होता है। यह जी, ज्वार, मक्की, गेहूँ और दाले तथा चावलों की ऊपर की तह में पाया जाता है। दालों के धोने में और चावलों के मशीन से छिलके उतारने में यह नष्ट हो जाता है।

फौलाद प्राय: गेहूँ मक्की, दाल, सब्जी, मटर, बादाम, ताजा फलों और खासकर उन फलों में पाया जाता है, जो काट कर रखने से थोड़ी देर में काले पड़ जाते है। दूध में यह कम होता है। यदि बच्चों के अधिक समय तक (1 वर्ष की आयु से ऊपर) दूध पर ही रखा जाय, तो फौलाद की कमी से बच्चा कमजोर होने लगता है।

दूध, दही, छाछ, पनीर, छिलके सहित दाल चोकर सहित गेहूँ का आटा, चना, मटर, मक्की, चावल आलू साग-सब्जियां, फल, सूखे अंजीर और बादाम ऊपर लिखी सब आवश्यकताएं पूरी कर देते है यह चीजें अदल-बदल कर खाने का अवसर होता रहे, तो तन्दुरूस्ती बनी रहेगी। गरीबों के लिए इस सूची को और भी आसान किया जा सकता है। चक्की के पीसे अनाज और छिलकेदार दाले चावल आलू, लस्सी, सस्ती साग-सब्जी से किसी दशा में भी तन्दुरुस्ती नहीं गिरती बढ़ती ही है। मात्रा का प्रश्न आगे हल किया जायेगा।

विटामिन
डाक्टरों में विटामिन के सिद्धान्त की आजकल बहुत चर्चा है। आपके ज्ञान के लिए इस सिद्धान्त का संक्षिप्त वर्णन करना आवश्यक समझा है।

हमारा भोजन प्रोटीन, निशास्ता, शक्कर चिकनाई, नमक तथा पानी का सम्मिश्रण है। ये सब वजनदार चीजें हैं, जिनको एक-दूसरे से पृथक करके देखा जा सकता है। परन्तु इनके अतिरिक्त एक और चीज भी होती है जिसका वजन कुछ नहीं पर गुण बहुत हैं ऐसे गुण कि इनका अभाव हमारे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है। यदि अधिक देर तक यह हमें भोजन में प्राप्त न हो, तो हमारा स्वास्थ्य बिगड जाता है, कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते है, शरीर दुर्बल हो जाता है और अन्य रोगों का मुकाबला करने में असमर्थ बन कर शीघ्र मनुष्य रोगों में फंस जाता है। यदि यह चीज़ भोजन में विद्यमान हो तो स्वास्थ्य ठीक रहता है, शरीर मजबूत रहता है मनुष्य रोग का सामना करने के योग्य होता है। इन चीजो को जिनकी भोजन में उपस्थिति स्वास्थ्य को बढ़ाती है और अनुपस्थिति कई एक विशेष रोगों को उत्पन्न करने का कारण होती है, विटामिन कहते हैं।

विटामिन एक बहुत गहरे सिद्धान्त के आसरे काम करते हैं। हमारे शरीर में, हमारे खेतों में और जहां प्राणीवर्ग या वनस्पतिवर्ग के जीवन के लक्षण है, दो ताकते हर समय काम करती है। एक बढ़ाने की ताकत दूसरी बढ़ाव में रुकावट डालने वाले कारणों से बचाने की ताकत खेती का दृष्टान्त बहुत शीघ्र समझ में आ जायगा। बीज एक पौधे के रूप में उगता है। जमीन, खाद, धूप, हदा उसे बढ़ाते हैं, कीड़े और टिड्डियां उस छोटे से पौधे की पत्तियां काटते हैं। तब चिडिय़ां, तोते, कौवे, बटेर, तीसर इत्यादि इन कीड़ों और टिड्डियों को अपना भोजन बनाकर पौधों को इन दुश्मनों से बचाते हैं। यही कारण है कि पक्षियों का शिकार सरकार की ओर से वर्जित किया जाता है और आज्ञा न मानने वालों को दण्ड दिया जाता है।

हमारे शरीर को जिस भोजन की आवश्यकता है, उसमें ये दो गुण होने आवश्यक है। प्रोटीन, चिकनाई, शक्कर, निशास्ता, लवण और जल तो हमारे शरीर को बढ़ाने के लिये हैं और विटामिन शरीर को खराबी बीमारी और कमजोरी से जाकर इसके प्रभाव प्रकट होते हैं। उनसे बचाने के लिए है। यदि ये हमारे भोजन में न हों, तो घातक बीमारियां जोड़ों की कठोरता और सूजन आंखों की लाली, गले की सूजन, मसूढ़ों का फूलना, दांतों का हिलना, हड्डियों का कमजोर और टेढ़ा होना, नर्सों का फूलना भोजन का न पचना आदि बीमारियां मनुष्य को दबा लेती है। ये विटामिन अधिकतर ताजी सब्जियों और उनके हरे पत्तों में हरे घास में अनाजों के ऊपर की तह में दालों के छिलकों के अन्दर, ताजा दूध में तथा हरे चने, मटर, टमाटर, सन्तरे, नीबू आदि में अधिकतर पाये जाते हैं। जो लोग शौकीनी और अमीरी के कारण मशीनों का बारीक आटा, मशीन से छिलका उतरे हुए बारीक चावल छिलका उतरी धुली हुई दाल बहुत जला हुआ दूध और बहुत दूर-दूर से आई हुई बहुत दिनों की बासी सब्जिया खाने का शौक रखते हैं, वे इन स्वास्थ्यप्रद विटामिन से अधिक वंचित रहते हैं और बीमारी का जरा भी हमला होने पर बहुत कष्ट उठाते हैं।

विटामिन प्राय: हरी सब्जी, फल-फूल, घास तथा मेवों में पाये जाने के अतिरिक्त हरी घास- खाने वाले पशुओं के दूध में भी पाये जाते हैं। इस प्रकार इनकी वास्तविक उत्पत्ति पहले वनस्पतियों में होती है, फिर वहां से ये पशुओं और मनुष्यों के शरीर में जाते हैं।

विटामिन पानी में घुल जाते हैं। अधिक गर्मी या ताप से इनकी समाप्ति हो जाती है प्राय 100 डिग्री सेंटीग्रेड ताप परिणाम (जलने) पर ये नष्ट हो जाते हैं। उबालने से या बहुत थोड़ा सा घी डालकर पकाने से इनका बहुत कुछ अंश बचा रहता है, परन्तु अधिक घी डालकर पकाने से, या घी में तलने से विटामिन बिल्कुल नष्ट हो जाते हैं। फिर इतने खर्च और मेहनत का क्या लाभ? यह तो उल्टा परिणाम निकला, अर्थात सरासर हानि। सर्वोतम तो यह है कि पके हुए शाक दाल आदि में बाद में मक्खन डाला जाए।

क्षारीय पदार्थ सोडा आदि इनको अतिशीघ्र नष्ट कर देते हैं। विशेषकर जब सोडा सालकर किसी सब्जी आदि को पकाया जाए तो विटामिन शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। होटल, बोडिंग, लंगर आदि स्थानों पर जहां थोड़े समय में सब्जी आदि तैयार करने के लिए रसोइये लोग सोडा डाल देते हैं ताकि यह शीघ्र गल जाए, वहां सब्जी तो शीघ्र गल जाती है, परन्तु स्वास्थ्य का रहस्य विटामिन पूर्ण रूप से नष्ट हो जाते हैं।

साग-सब्जी को सुखाने से भी इनका प्रभाव नष्ट हो जाता है। मांस में विटामिन बिल्कुल कम होते हैं। विटामिन सिद्धान्तानुसार मांस खाना स्वास्थ्य के विरुद्ध है। इसके प्रयोग से रोगनिवारक शक्ति,अस्थि और मस्तिष्क को हानि पहुंचती है। हमारा सौभाग्य है कि विटामिन का अभाव अपना प्रभाव झटपट नहीं दिखाता प्रत्युत जब कुछ मास लगातार भोजन में इनका अभाव रहे, तब जाकर इसके प्रभाव प्रकट होते हैं।

विटामिन की कई जातियां और प्रकार है। नीचे कुछ भोजनों का नाम लिखा गया है जिनमें विभिन्न विभिन्न विटामिन अधिक पाये जाते हैं। हमें सब प्रकार के विटामिन की आवश्यकता है। समय-समय पर प्रत्येक ऋतु में विटामिनों के प्रत्येक ग्रुप (समूह) में से चुनकर वस्तुएं प्रयोग की जा सकें, तो तन्दुरूस्ती के लिए अत्यन्त लाभदायक रहेंगी।