आयुर्वेद के रसायन

डॉ. दीप नारायण पाण्डेय
लेखक इंडियन फारेस्ट सर्विस के पूर्व अधिकारी हैं।


आयुर्वेद के रसायनों पर दुनिया भर में बड़ी शोध हो रही है। वर्ष 2023 के आंकड़े बताते हैं कि अभी तक रसायन शब्द को संदर्भित करते हुये यों तो 500 से कम शोधपत्र प्रकाशित हुये हैं किन्तु अलग अलग रसायनों में भारी शोध हुई है। उदाहरण के लिये आँवला को ही लें तो वर्ष 2023 तक 2961 शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। इसी प्रकार दूसरा उदाहरण अश्वगन्धा का लें तो वर्ष 2023 तक 3,521 शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। कुल मिलाकर सभी रसायन औषधियों पर लगभग एक लाख से अधिक शोधपत्र हैं। रसायन में ऐसी क्या विशेष बात है? आज की चर्चा एक बार पुन: इस प्रश्न के उत्तर पर है।

यदि व्यक्ति का बल और मांस क्षीण हो जाये तो ऐसा लगता है जैसे आयु पूरी हो चुकी है। कोई महाव्याधि अचानक निवर्तित हो जाये व भोजन से मिलने वाले लाभ मिलना भी बंद हो जायें तो भी यही स्थिति बनती है (देखें, सु.सू.32.7-8):

जानी-मानी व बहुत लोगों पर सफल और बढिय़ा तैयार औषधि भी यदि किसी व्यक्ति में वांछित प्रभाव ना दे पा रही हो तो व्यक्ति को गैर-उपचार योग्य श्रेणी में माना जाता है। चिकित्सक की सलाह से तैयार कर दिये गये भोजन का वांछित परिणाम नहीं मिल रहा हो, तो चिंताजनक स्थिति मानी जाती है (देखें, च.इ.12.7-8):

बात यहाँ अति-कठिन परिस्थिति की है। वस्तुत: आयुर्वेद के दृष्टिकोण से माना जाता है कि जब मृत्यु का समय निकट आता है तो कुछ अरिष्ट प्रकट होते हैं (देखें, च.इ.2.5):

किन्तु माना यह भी जाता है कि अरिष्ट को निर्विवाद रूप से पहचानने में त्रुटि भी हो सकती है (देखें, च.इ.2.6):
कहने का तात्पर्य यह है कि हो सकता है वास्तव में अरिष्ट प्रकट ना हुआ हो, फिर भी त्रुटिवश प्रकट हुआ मान लिया जाये।

अत: यदि भ्रम की स्थिति हो तो चिकित्सा की जाये या नहीं? यदि हाँ, तो कैसी चिकित्सा उपयुक्त हो सकती है? मेरे विचार से अरिष्ट की सही या गलत पहचान के पचड़े से बाहर निकलकर चिकित्सा करना ही उचित है। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्हें अंतिम स्थिति में पहुंचा हुआ मानकर धरती पर लिटाकर तुलसी और गंगाजल खिला-पिला दिया गया। गाय की बछिया की पूँछ पकड़ाकर दान-पुण्य भी करा दिया गया। पर वे फिर उठ खड़े हुये और कई साल चले। इसलिये जब तक प्राण हैं, चिकित्सा करना उपयोगी है।

अब प्रश्न यह है कि ऐसी कौन सी चिकित्सा है जो अरिष्ट निवारण में सक्षम हो सकती है? वैसे तो अरिष्ट-निवारण की सामथ्र्य कम ही व्यक्तियों में होती है, तथापि यह असंभव नहीं है। अरिष्ट प्रकट होने के बाद भी युक्ति-व्यपाश्रय, सत्त्वावजय और दैव-व्यपाश्रय की त्रिवेणी में की गयी चिकित्सा मृत्यु को टाल सकती है। इसका संकेत वैज्ञानिक-महर्षि आचार्य सुश्रुत ने दिया है। रिष्ट उत्पन्न होने पर मृत्यु निश्चित है, तथापि मानस दोषों से मुक्त विद्वान के द्वारा या रसायन, तप, और जप में पारंगत व्यक्ति द्वारा मृत्यु का निवारण किया जा सकता है (देखें, सु.सू.28.5):
कठिन रोगों की स्थिति में भी बचने की संभावना यहाँ साफ़ दृष्टिगोचर है।

क्या वास्तव में रसायन इतने उपयोगी और प्रभावी हैं? संहिताओं, शोध और अनुभव तीनों में ही इस प्रश्न का उत्तर धनात्मक ही मिलता है। आइये पहले संहिताओं के वे प्रमाण देखते हैं जो केवल कठिन रोगों व परिस्थितियों के सन्दर्भ में हैं। पहला प्रमाण आचार्य सुश्रुत के उस कथन से मिलता है जिसमें रोगों की सूची देते हुये संकेत किया गया है कि ये रोग रसायन के बिना असाध्य हो जाते हैं (देखें, सु.सू.33.3):

इस संदर्भ से यह संकेत तो स्पष्ट है ही कि रसायन से रोगों को उन अवस्थाओं में जाने से रोका जा सकता है जहां वे चिकित्सा की दृष्टि से असाध्य हो जाते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि रसायन असाध्य रोगों को भी साध्य बनाते हुये चिकित्सा में मददगार हो सकते हैं। उदाहरण के लिये, हालाँकि कुष्ठ और प्रमेह असाध्य होते हैं, पर आचार्य सुश्रुत ने स्वयं एक ऐसा योग दिया है जो असाध्य कुष्ठ और प्रमेह को भी ठीक कर देता है (सु.चि. 10.12):

वस्तुत: यह उस सिद्धान्त की विजय है जिसमें आचार्य चरक ने चिकित्सा की सफलता में युक्ति को सर्वोपरि माना है। यहाँ निहितार्थ यह है कि यदि रसायन चिकित्सा की जाये तो ये रोग असाध्य नहीं हो पाते। आधुनिक वैज्ञानिक शोध में रसायन उसी प्रकार उपयोगी पाये गये हैं जैसा कि आचार्य सुश्रुत ने निर्दिष्ट किया है। दूसरा प्रमाण, चरकसंहिता की टीका में चक्रपाणि द्वारा महर्षि अगस्त्य को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि रसायन, तप व जप में सिद्ध महान लोग काल मृत्यु को भी जीत लेते हैं, पर आलसी आदमी नहीं (देखें, च.सू.1.62 पर चक्रपाणि.):

तीसरा प्रमाण महर्षि-वैज्ञानिक आचार्य चरक द्वारा सोसायटल कोलैप्स या जनपदोध्वंश की स्थिति—हवा, पानी, मिट्टी और ऋतुओं के प्रदूषित हो जाने से उत्पन्न महामारियाँ—में पंचकर्म व रसायनों के द्वारा समस्या निवारण हेतु सुझाया गया रास्ता है (देखें, च.वि.3.13-14):
रसायन द्रव्यों के साथ ही अद्रव्य रसायन भी हैं जो सत्त्वावजय और दैव-व्यपाश्रय चिकित्सा में मददगार हैं। उदाहरण के लिये दान, विनम्रता, दया, सत्य, ब्रह्मचर्य, कृतज्ञता, मित्रता, रसायन व अच्छे कार्य सब उम्रवर्धक हैं (अ.हृ.शा.3.120):
संहिताओं के साथ ही आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों से भी रसायनों की क्रियात्मकता के ठोस प्रमाण मिल रहे हैं। आइये कुछ उदाहरण देखते हैं।

उम्र-आधारित रोगजनन का एक प्रमुख कारण डी.एन.ए. रिपेयर मैकेनिज्म में गड़बड़ी होना माना जाता है। जीवित कोशिकाओं के गुणसूत्रों में पाये जाने वाले तंतुनुमा अणु को डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड या डी.एन.ए. कहा जाता है। इसी में अनुवांशिक कोड निहित रहता है। जैसे जैसे डी.एन.ए. डैमेज का बोझ बढ़ता जाता है, शरीर बुढ़ापे की ओर बढ़ता जाता है। इस कारण अनेक समस्यायें जैसे कैंसर, न्येरोडीजेनरेशन और बढ़ती उम्र के कारण होने वाली अनेक व्याधियां विकसित हो जाती हैं। शरीर की कोशिकाओं द्वारा डी.एन.ए. डैमेज के संकेत प्राप्त करना और टूट-फूट की मरम्मत करने की क्षमता उम्र के साथ घटती जाती है। इसीलिये बढ़ती उम्र में अनेक रोग लग जाते हैं।

तो क्या आयुर्वेद के रसायन बढ़ती उम्र के लोगों में डी.एन.ए. रिपेयर मैकेनिज्म की गति को बढ़ा सकते हैं? इस विषय में कई अध्ययनों से यह सिद्ध होता है कि रसायन औषधियाँ डी.एन.ए. रिपेयर की गति को बढ़ाकर बुढ़ापा आने की गति को धीमा कर देती हैं। हाल में हुये एक क्लीनिकल ट्रायल में पाया गया कि आमलकी रसायन के प्रयोग से डी.एन.ए. स्ट्रैंड में तोडफ़ोड़ की गति कम होती है तथा रिपेयर मैकेनिज्म तेज हो जाती है। यह रसायन सुरक्षित भी पाया गया है। एक अन्य अध्ययन में, जो 45-60 वर्ष के लागों के मध्य किया गया, पाया गया है कि आमलकी रसायन का प्रयोग रक्त की परिफेरल ब्लड मोनोन्यूलियर सेल्स में टीलोमीयर की लम्बाई में बदलाव किये बिना टीलोमेरेज क्रियात्मकता को बढ़ा देता है। इससे चूंकि टीलोमियर के क्षरण में कमी आती है, अत: हैल्थस्पान में बेहतरी होती है। एक प्रमाण-आधारित तथ्य यह भी है कि आयुर्वेद के रसायनों से बेहतर एंटी-एंग्जाइटी व वाजीकर से बेहतर एंटी-डिप्रेशेंट औषधि कोई नहीं है। बुढ़ापा आने का एक कारण ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और इनफ्लेमेशन का बढऩा भी है। रसायन द्रव्यों के उपयोग करते रहने से शरीर का व्याधिक्षमत्व बढ़ता है तथा ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और इनफ्लेमेशन में कमी होती है।

एक अन्य उदाहरण देखें तो रसायन चिकित्सा उपचार मॉड्यूल ब्रोन्कियल अस्थमा में सुधार दिखाते हैं और उनकी क्रिया का तंत्र, विशेष रूप से डीएनए मिथाइलेशन पर प्रभाव काफी हद तक हाल में ही समझा जा सका है। वर्ष 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार आयुर्वेद की रसायन चिकित्सा के बाद ब्रोन्कियल अस्थमा के लक्षणों में सुधार तथा डीएनए मिथाइलेशन-विनियमित जीन को स्पष्ट करता है। पहचाने गए जीनों और क्रियात्मक मार्गों में डीएनए मिथाइलेशन विनियमन मूलत: आयुर्वेद हस्तक्षेप और उत्तरदायी जीनों को इंगित करता है।
रसायनों के माध्यम से कोविड-19 की चिकित्सा पर तो अब अनेक क्लिनिकल ट्रायल्स प्रकाशित हो ही चुके हैं। उन पर यहाँ चर्चा भी की जा चुकी है।

उत्तम बात यह है कि कुछ ऐसे द्रव्य हैं जो आहार, रसायन और औषधि, तीनों ही प्रकारों में वर्गीकृत हैं। फल व सूखे मेवे, खजूर, द्राक्षा, मुनक्का, बादाम, तिल, आँवला, लहसुन, सोंठ, कालीमिर्च, पिपली, हल्दी, केसर, जीरा, धनिया, मूंग, जल, दूध, घी, तुलसी, शहद, गुड़, त्रिकटु एवं त्रिफला आदि ऐसे द्रव्य हैं जिनके युक्तिपूर्वक सेवन हितकारी है। संहिता, साइंस और अनुभव सब इन द्रव्यों के पक्ष में हैं।

मृत्यु की तिथि तय नहीं है, अपितु प्राणियों की आयु युक्ति की अपेक्षा रखती है (च.वि. 3.29: भूतानामायुर्युक्तिमपेक्षते। युक्ति से उम्र बढ़ सकती है। इसलिये आयुर्वेदाचार्यों की देखरेख में लिये जाने वाले रसायन मौत के मुंह से निकाल लाने की क्षमता रखते हैं। (यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक कल्याण के सिद्धांतÓ से प्रेरित हैं)