विश्व को मिला वैज्ञानिक आधार वेदों से

प्रो. बलवंत सिंह राजपूत
लेखक पूर्व कुलपति
कुमांयु एवं गढ़वाल विश्वविद्यालय


ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम रचना है जिससे सृष्टि-सृजन के संदर्भ में मानव की जिज्ञासाओं का प्रारंभ हुआ था। यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में भी विज्ञान की अनेक विधाओं का विकास हुआ था। इसी प्रकार चारों उपवेद भी शुद्ध विज्ञान है। स्थापत्य उपवेद में अभियांत्रिकी वास्तुकला एवं संरचनात्मक विज्ञान का भरपूर समावेश है, जिसके प्रमाण क्षारीय तथा भस्मयुक्त चमत्कारी औषधियों के प्रयोग एवं निर्माण का विशद वर्णन था तथा गजशास्त्र एवं अश्वशास्त्र को विकसित किया था। नागार्जुन शतक एवं माधव रस रसायन में इन औषधियों एवं मिश्र धातुओं के प्रयोग के अद्भुत प्रमाण मिलते हैं। आयुर्वेद में शरीर रचना विज्ञान एवं वनस्पति विज्ञान पर आधारित अनेक चमत्कारी एवं आश्चर्यजक उपलब्धियाँ वर्णित हैं। आयुर्वेद के प्रकाण्ड पंडित सुश्रुत को प्लास्टिक सर्जरी एवं शल्य चिकित्सा का जनक माना गया है। आठवी शताब्दी में सुश्रुत संहिता का अनुवाद अरबी भाषा में किताबे शाह सूने हिन्द एवं किताबे सुश्रुत के रूप में किया गया था। अन्य आयुर्वेदाचार्य चरक थे जिनके द्वारा रचित चरक संहिता में आयुर्वेद एवं रसायन का अपार भण्डार भरा है। यह प्रथम शरीर विज्ञानी थे, जिन्होंने पाचन किया उपचार तथा संकाम्यता के सिद्धांत प्रस्तुत किये थे तथा वात, पित्त एवं कफ के दोषों को समझा था। इन्होंने नाड़ी द्वारा शरीर के दोषों एवं व्याधियों को जानने के अदभुत विधि विकसित की थी तथा अनुवांशिकी के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था। उन्हें शिशु के जन्म के पूर्व ही उसका लिंग निर्धारण करने की कला विकसित की थी। आचार्य चरक ने मानव शरीर के विभिन्न अंगों का विस्तृत अध्ययन किया था तथा जड़ी-बूटियों का विस्तृत विश्लेषण किया था एवं इनकी जड़ों, पुष्पों, पत्तियों, तनों आदि के व्यापक प्रयोग के दोष निवारण हेतु किये थे। इन्होंने प्राण, उदान, व्यान, समान तथा अपान नामक पंचविद्या वायु का अस्तित्व मानव शरीर में प्रमाणित किया था।
आचार्य पाणिनी ने ईसापूर्व पांचवी शताब्दी में अष्टाध्यायी की रचना की थी जिसमें व्याकरण, शब्दरचना, भाषा एवं शब्द उत्पत्ति का वैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुतिकरण मिलता है तथा मस्तिष्क क्रिया एवं संभाषण क्रिया के अंत संबंधों का ज्ञान मिलता है जिसके आधार पर एक उच्च स्तरीय प्रभावशाली कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा विकसित की जा सकती है।
प्राचीन भारतीय गणित- मानव सभ्यता के विकास के प्रथम चरण में ही दार्शनिकों ने ब्रह्माण्ड की मूलभूत समिति एवं एकता की परिकल्पना कर ली थी एवं अनुभव किया था कि इस संरचना का गणितीय आधार है, जिसके कारण इसके किसी भी प्रक्रम के प्रदत्त शुद्धता सीमा तक विश्लेषण हेतु निश्चित गणितीय नियमों का पालन आवश्यक है। अत: प्राचीन भारत में गणित एवं इसकी विभिन्न क्रियाओं का विकास हुआ तथा गणित को विज्ञान की सभी विद्याओं का सिरमौर माना गया है जैसा कि वेदांग ज्योतिष में उल्लेख है।
गणित में शून्य, अनन्त एवं नौ अंकों तथा दशमलव मान स्थिति की खोज सर्वप्रथम भारत में ही हुई थी।
आधुनिक विज्ञान में ऐसा कोई भी प्रक्रम ज्ञात नहीं है जिसके विश्लेषण हेतु 9 से अधिक की संख्या की आवश्यकता पड़े।
प्राचीन भारतीयों को आधुनिक ब्रह्माण्ड के प्रसार से भी परे प्रक्रम ज्ञात थे जिनके विश्लेषण हेतु 9 जैसी दी संख्या की परिकल्पना की गई थी। इसी प्रकार न्यूनतम समय सहस्त्रांश सूक्ष्म घटिका का ज्ञान प्राचीन भारतीय को था जिसका मान 9 सेकण्ड आता है। आधुनिक क्लासिकल भौतिक में किसी प्रक्रम को जानने के लिए सेकेण्ड से न्यून समय की आवश्यकता नहीं पड़ती तथा 9 सेकेण्ड के समान समय की आवश्यकता के क्वांटम भौतिकी के प्रक्रमों में ही पड़ती है। इससे ही प्रमाणित है के प्राचीन भारतीयों ने इतने न्यून समय की गणना की परमाण्वीय तथा नाभिकीय प्रक्रमों के विश्लेषण हेतु ही की थी। 476 ए डी में महान खगोलज्ञ एवं गणितज्ञ आर्यभट्ट हुए, जिन्होंने बीजगणित का सूत्रपात किया तथा गणित को वैदिक गणित एवं खगोलशास्त्र पढ़ाया एवं भारतीय पद में सैंतीस श्लोकों की रचना की।
अन्य प्राचीन भारतीय गणितज्ञ आचार्य शिरोमणि, कर्णकुतुहल, लीलावती एवं बीजगणित के अदभुत ग्रंथों की रचना की थी। इन्हें चलन और कलन का भी जनक माना जाता है। इनके ग्रंथ लीलावती में गणित की अत्यंत जटिल समस्याओं को अतिसरल विधियों से सुलझाया गया है। अन्य महान गणितज्ञ वराहमिहिर हुए हैं, जिनके प्रसिद्ध ग्रंथ पंचसिद्धातिका में वर्णित पाच सिद्धांत सूर्य, वशिष्ठ, पैतामह, रोमक एवं पैलिश को व्यापक मान्यता प्राप्त हुई थी, जिसमें पृथ्वी के गोल होने, एवं इसके सूर्य के चारों और घूमने एवं ग्रहों तथा नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार पंचांग विधि का स्पष्ट उल्लेख है तथा सूर्यग्रहण एवं चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक विश्लेषण है। इस ग्रंथ में काल गणना के अदभुत उदाहरण है। बौधायन को ज्यामिति का जनक माना जाता है। जिन्होंने शुल्बसूत्रों के माध्यम से रेखा, पृष्ठ, मापन यंत्र तथा मात्रक का आविष्कार किया था। इसको इन्होंने तथा कथित पाईथागोरस प्रमेय के स्वतंत्र रूप में खोज लिया था।
इसी प्रकार ब्रह्मगुप्त द्वारा रचित ब्रह्मस्फुटसिद्धांत में अनेक आश्चर्यजनक गणितीय सिद्धांतों का उल्लेख है। प्रो. गिन्सबर्ग ने प्राचीन भारतीयों के शून्य दशमलव एवं अंकों के योगदान को आधुनिक गणित के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना है तथा स्वीकार किया है कि ई. सन 770 में उज्जैन निवासी पंडित कनक नामक एक हिन्दू विद्वान अब्बान्त सैय्यद खलीफ अलमंसूर के आमंत्रण पर बगदाद गये जहाँ उन्होंने अरब के विद्वानों मूल के अंकों से अवगत कराया। यही अंक कालांतर में अरब से मिस्र होते हुए पश्चिमी देशों में जाकर अरेबिक अंकों के रूप में ग्रहण किये गए। वैदिक दर्शन एवं आधुनिक विज्ञान प्राचीन भारतीयों के अनुसार विश्व एवं इसकी वस्तुएं विश्व ज्योति नामक धनात्मक ऊर्जा का प्रकटीकरण हैं तथा गणित पक्ष एवं अन्य सिद्धांत यज्ञ से संबंधित है। अनेक मनीषियों ने विश्व के पदार्थ घटकों के रूप में विभिन्न तत्वों की संकल्पनाएं प्रस्तुत की थीं, जिनके आधार पर लौकिक विकास के रूप में वैदिक दर्शन के साक्ष्य यंत्र का प्रादुर्भाव हुआ था। जिसमें सातत्यक एवं परिमित दोनों सिद्धातों का समावेश है। इस दर्शन के प्रवृतक महर्षि कपिल थे। यह वस्तुत: द्वैतवादी दर्शन है, जो विश्व सृजन में दो मौलिक तत्वों के अस्तित्व को स्वीकार करता है तथा पदार्थ की स्वतंत्र सत्ता को मानता है। इसने तत्व मीमांसा को उस स्थान तक पहुंचा दिया था जहां से वेदांत ने इसे ग्रहण किया एवं सर्वतोभावेण पूर्ण कर दिया। इस दर्शन में कारण तथा प्रभाव से संबंधित आधुनिक कारणता सिद्धांत पूर्णत: निहित है। सांख्य में दिक तथा काल को सम्मिलित करके दिक्काल की परिकल्पना को विकसित किया था। जिसे आधुनिक विज्ञान ने स्पेस-टाइम कन्टीनुम के रूप में ग्रहण किया है। सांख्य दर्शन में प्रकाश को कणों के रूप में स्वीकार किया गया था, जिनमें वेग तथा ऊर्जा होती है। इसी के आधार पर आधुनिक विज्ञान में प्लेक के नियम एवं प्रकाश वैद्युत के आइन्स्टाइन के सिद्धांत विकसित हुए। सांख्य में प्रकृति को कारण माना है, जिसमें ऊर्जा प्रवाह के रूप में प्रभाव को प्रादुर्भाव होता है जिसके फलस्वरूप ऊर्जा संरक्षण जैसे नियमों के अंतर्गत सृजन प्रारंभ होता है।
प्रकृति के सभी मूलभूत युग धर्मों के मौलिक आधार पर वैशेषिक दर्शन में बहुवादी निरूपण के रूप में व्याख्या की गयी हैं। इस दर्शन ने नौलिक विश्व के तत्वज्ञान को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योग दिया है। इसके प्रवर्तक महर्षि कणाद थे, जिन्होंने सर्वप्रथम पदार्थ के मूलभूत घटक अन्तत: अविभाज्य इन्द्रियों द्वारा अमेद अविनाशी एवं अप्रेषित परमाणु की संकल्पना की थी। इस दर्शन के अनुसार द्रव्य में कर्म तथा गुण निहित होते हैं तथा ये संयोग कारण नहीं होते हैं।
वैशेषिक दर्शन में पदार्थ को नौ घटकों से युक्त माना है क्षिति, आप, तेज, वायु, आकाश, दिक, काल मानस तथा आत्मन् । जिनमें से पांच तत्व भौतिक है तथा अंतिम चार अभौतिक है। सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक बैकन तथा डेकार्ट जैसे दार्शनिकों की भी यही मान्यता थी कि पदार्थ की रचना इन्हीं प्रथम पांच तत्वों से होती है। आधुनिक एटम के घटकों में विभाजित कर लिए जाने पर आधुनिक भौतिकविदों द्वारा पदार्थ घटकों के रूप में बड़ी संख्या में रचना खंडों की पहचान की गई एवं अनेक परिकल्पनाएँ प्रस्तुत की गयीं। बड़ी संख्या में इन कथित मूलकणों की परिकल्पना प्रस्तुत की, जिनमें से प्रत्येक तीन कलर्स से युक्त होता है। संघटकों की संख्या की दृष्टि से यह पंच क्वार्क सिद्धांत वैशेषिक दर्शन के पांच तत्व सिद्धांत के सहचर्य प्रतीत होती है। आज यह नवीन धारणा बलवती होती जा रही है कि ये संघटकों से युक्त हैं जिन्हें दिक काल में निश्चित अन्त: स्वातंत्र्य कोटियों में प्रकटीकरण के रूप में निरूपण के ही समान है।
वैशेषिक दर्शन इस अवधारणा से भी आगे जाकर उन गुणों पर बल देता है जिनका अपना स्वतंत्र अस्तित्व न होते हुए भी पदार्थ में समाहित रहते हैं। वैशेषिक के अनुसार कोई गुण ससुग्मन एवं वियोजन का स्वमंत्र कारण नहीं होता है। आधुनिक विज्ञान को इस सिद्धांत पर आने में अभी विलम्ब है।
कारणता सिद्धांत में अटूट विश्वास के आधार पर आधुनिक विज्ञान का विकास हुआ है परंतु इस संबंध में निहित नियमों से आज का विज्ञान अभी भी अनभिज्ञ है जबकि भारतीय चिंतन के आधार पर महर्षि कणाद ने वैशेषिक में इस संबंध की स्थापित करने का प्रथम प्रयास किया तथा प्रमाणित किया था कि सभी सार्वभौमिक प्रक्रियाओं में कारणता सिद्धांत का पालन किया जाता है। तत्पश्चात् इस सिद्धांत को सांख्य तथा बौद्ध-चिन्तन एवं वेदान्त में विकसित किया गया था। वैशेषिक के अनेक सूत्रों से निष्कर्ष निकलता है कि पदार्थ में कारणता निहित होती है जिसके कारण पदार्थ सरक्षण के नियम का पालन होता है। महर्षि व्यास का वेदान्त कारणता सिद्धांत के रूप में विवर्तवाद के अस्तित्व को मानता है। बल तथा पदार्थ कण एवं तरंग गति एवं विराम अस्तित्व एवं अस्तित्वहीनता इत्यादि कुछ परस्पर विरोधी धारणाएं है जो आधुनिक क्वांटम भौतिकी में निहित है। हाइजनबर्ग का अनिश्चितता सिद्धांत वैशेषिक में वर्णित इन्हीं परंपरा अपवर्जित एवं पूरक धारणाओं का निरुण है। किन्तु इस सिद्धांत के आलोक में यांत्रिकी को सवांगपूर्ण सिद्धांत नहीं माना जा सकता है। इसी सवांगपूर्णता हेतु परमाणवीय भौतिकी में हम इन परस्पर अपवर्तित धारणाओं एवं पूरक सिद्धांत एवं अस्तित्वहीनता से कहीं आगे ले जा रहा है, जिसमें एक विशिष्ट विधा निहित है, जो मस्तिष्क के दृष्टिकोण को परिवर्तित करते रहती है, जैसा कि अश्वघोष में उल्लेख है। यथार्थ न तो वह है जिसका अस्तित्व है। न ही वह है जो अस्तित्व हीन है।।
वह है जिसका कभी अस्तित्व है एवं कभी नहीं था। और न ये वह ही है जिसका कभी भी अस्तित्व नहीं है कुवाक्र्स भी संग्रहीत हैं एवं इसमें से प्रत्येक उन दो और जो कभी भी अस्तित्वहीन नहीं रहेगा। आधुनिक भौतिकी का कण जरंग द्वैतवाद तथा दोनों पक्षों के मध्य किस संदर्भ में कौन सी वरीयता रखनी है। एवं किस प्रकार एक धारणा से दूसरी धारणा पर आया जाता है तथा आवश्यकतानुसार पुन: प्रथम पर आया जाता है, निम्नलिखित बौद्धदर्शन गूंज ही तो है। यथार्थ एक बहुविनीय प्रभाव है, जो भिन्न दृष्टिकोणों के प्रथम प्रभावों के अध्यारोपण का परिणाम होता है।