पं. विनोद शास्त्री
निदेशक, श्रीपीठम कन्सट्रक्सन प्राइवेट लिमिटेड
”चित्रकूट के चित्रकूट के घाट घाट पर भाई संतन की भीड़, तुलसीदास चंदन घिसे,तिलक करे रघुवीर”
हिंदू धर्म में तिलक की परंपरा वैदिक काल से चलती आ रही है ब्राह्मण पुराण,गरुड़ पुराण,गर्ग संहिता विष्णु संहिता एवं अनेक ग्रंथों में तिलक का वर्णन विस्तार से किया गया है मस्तक पर लगाए जाने वाले तिलक की परंपरा भारत और हिंदू धर्म में अत्यंत प्राचीन है। हिंदू धर्म अनुसार मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान निवास करते हैं इसलिए तिलक भी इसी स्थान पर लगाया जाता है।
शास्त्रों में तिलक धारण एक आवश्यक धार्मिक कृत्य माना गया है। यथा- हृदय की एक सौ एक नाड़ी हैं। उनमें से सुषुम्णा नाम की नाड़ी मस्तक प्रदेश के सामने से निकलती है, उसके द्वारा ऊँचे स्थान को प्रस्थान करने वाला मोक्ष को प्राप्त करता है, शेष सबका प्राणोत्सर्ग के समय चारों ओर से उपयोग होता है। अर्थात् स्नान, होम, देव और पितृकर्म सब निष्फल होता है यदि मस्तक में तिलक धारण न किया हो। ब्राह्मण को चाहिए कि वह तिलक धारण करने के पश्चात् तर्पण आदि नृत्य करे।
किस उंगली से तिलक लगाने का क्या फल
स्कंदपुराण में बताया गया है कि अलग-अलग अंगुली से तिलक लगाने का फल अलग-अलग होता है
अनामिका से तिलक करने पर शांति, मध्यमा से आयु, अंगूठे से स्वास्थ्य और तर्जनी से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
चन्दन धारण करना महान् पुण्यदायक, पवित्रतावर्धक, पाप नाशक, आपत्ति निवारक और नित्य प्रति समृद्धिवर्धक है।
यद्यपि चन्दन, गोपी चन्दन, सिन्दूर, कुमकुम और भस्म आदि द्रव्यों का भी तिलक लगाया जाता है परन्तु मुख्य तिलक तीर्थों की पवित्र मृत्तिका को स्वच्छ करके जो तैयार किया जाता है- वह सात्विक और अनेक वैज्ञानिक लाभों से परिपूर्ण है, इसीलिए उपर्युक्त शास्त्र प्रमाण में भी उसे सर्व प्रथम स्थान दिया गया है। शुद्ध मृत्तिका में सर्वविध संक्रामक कीटाणुओं के विनाश की अद्भुत शक्ति है यह सभी भौतिक विज्ञानवादी स्वीकार करते हैं, पदार्थों की पूर्तिगन्ध नाम सड़ांध को दूर करने का एक मात्र साधन- ”गन्ध गुण” केवल पृथ्वी में ही विद्यमान है।
साबुन, इत्र, फुलैल आदि पदार्थ-अपनी उग्रगन्ध के कारण वस्तुओं में क्षणिक स्वच्छता का आभास चाहे प्रकट कर दें, परन्तु वास्तव में यदि सूक्ष्मवीक्षण यन्त्र की सहायता से उन पदार्थों का निरीक्षण किया जाए तो वे मलिन-कीटाणुओं से तथैव क्लिन्न रहते हैं। इसलिए अब तो बहुत से पाश्चात्य विचारक भी यह घोषित करने लगे हैं, कि ”कांच और चीनी का प्याला यदि एक बार भी ओठों से ”टच” हो तो मनुष्य के थूक से सहस्त्रों कीटाणु उस पर जम जाते हैं” पानी से धोने पर या साबुन का प्रयोग करने पर भी वे नहीं मरते, मिट्टी और राख ही उनका मूल नाश करने के लिए सबसे सस्ता और सुलभ पदार्थ है। सो मृत्तिका के अधिक गुण वर्णन न करके हम इतना ही कहना पर्याप्त समझते हैं, कि लेपन द्रव्यों में यह सर्वोत्तम द्रव्य है, फिर यदि वह तीर्थस्थानों की हो तब तो कहना ही क्या ?
यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं कि हमारे मन में जो संकल्प उठता है, वह सर्वप्रथम मस्तिष्क की धमनियों में ही प्रकम्पन करता है। मस्तिष्क के प्रकम्पन के अनन्तर ही वह इन्द्रियों को कार्यानुकूल होने को सज्जित करता है। तो हमारा मस्तिष्क जितना विकार रहित होगा, उतना ही हम प्रत्येक बात की वास्तविकता का शुद्ध परिशीलन कर पायेंगे। हमारे ज्ञान-तन्तुओं का विचारक केन्द्र भृकुटी और ललाट का मध्यभाग है। यह प्राय: सभी ने कई बार अनुभव किया होगा कि जब कभी आवश्यकता से अधिक विचार करने हम का अवसर पड़ता है तो इसी केन्द्र में वेदना अनुभव होने लगती है। अत: हमारे महर्षियों ने ज्ञान तन्तुओं के में केन्द्र-स्थान में ही तिलक धारण करने का विधान किया के है। तिलक की महिमा के अविश्वासी लोग भी जब मस्तिष्क वेदना से पीडि़त होते हैं तब वे भी चन्दन उशीर आदि शीतल द्रव्यों को माथे पर पोतने के लिए विवश होते हैं।





