एकात्म हैं देश की सभी भाषाएं

पुस्तक का नाम – राष्ट्रभाषा और भारत-भारती
लेखक – आचार्य रघुवीर, मूल्य – 215 रूपये मात्र, पृष्ठ – 188
प्रकाशन – राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, नेहरू भवन, 5 इंस्टीट्युशनल एरिया फेज 2, बसंत कुंज, नई दिल्ली, 011-26707700


देश को अंग्रेजों के शासन से मुक्ति मिलने के पहले से ही राष्ट्रभाषा का प्रश्न उभरने लगा था। वर्ष 1875 में ही महर्षि दयानंद सरस्वती ने स्वयं गैरहिंदीभाषी होते हुए भी उस काल में अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश हिंदी में लिखी। तत्कालीन लगभग सभी नेता, लेखक आदि हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए प्रयासरत थे। अंग्रेजी राज में जो बात इतनी प्रमुखता से उठाई जा रही थी, स्वराज मिलने के बाद वह एकदम से कठिन होती गई। इसमें एक बड़ा कारण अंग्रेजों से सत्ता हासिल करने वाले नेताओं की मानसिकता थी। हालांकि महात्मा गाँधी जैसे नेता हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात करते थे, परंतु वे हिंदी को नहीं, हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे। हिंदी और गाँधी की हिंदुस्तानी में संस्कृत तथा ऊर्दू का अंतर था। हिंदी जहाँ संस्कृतनिष्ठ थी, वहीं हिंदुस्तानी में 70 प्रतिशत शब्द अरबी-फारसी से उधार लिए गए होते थे। हिंदी अरबी-फारसीनिष्ठ हो या फिर संस्कृतनिष्ठ, यह विवाद निरंतर बना ही रहा और प्रकारांतर से आज भी बना ही हुआ है। सत्ता के नजदीकी अधिकांश नेताओं ने जहाँ हिंदी के संस्कृतनिष्ठ रूप को नष्ट करने का प्रयास किया, वहीं हिंदीप्रेमियों ने उसे बचाने के लिए संघर्षरत रहे।

प्रस्तुत पुस्तक राष्ट्रभाषा और भारत-भारती में राष्ट्रभाषा के इस प्रश्न और संघर्ष को आचार्य रघुवीर ने बहुत ही सक्षमता के साथ संबोधित किया है। यह पुस्तक देवनागरी लिपि की वरेण्यता और और उद्भव से आरम्भ होती है। लिपि भाषा के विकास का आदि चरण है। नागरी के प्राचीन रूप एशिया के देशों में भी गए। आचार्य रघुवीर न केवल एक बहुभाषाविद् हैं, बल्कि वे भारत की संस्कृति, भाषा संस्कृत आदि से पूरी तरह एकात्म रहे हैं। उन्होंने विभिन्न आलेखों में भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी और वह भी संस्कृतनिष्ठ हिंदी क्यों हो, इसे स्थापित किया है। उन्होंने यह भी दिखलाया है कि किस प्रकार संस्कृत देश की ही सभी भाषाओं में नहीं, बल्कि विश्वभर की भाषाओं में व्याप्त है। एक उदाहरण देखें। आचार्य रघुवीर लिखते हैं, ‘वर्तमान समय में भारत के विभिन्न प्रदेशों में बोली जाने वाली भाषाओं में संस्कृत शब्दों का अनुपात पर्याप्त मात्रा में है।’

1. बंगला, उडिय़ा, असमिया 6 करोड़ के लगभग 80 प्रतिशत
2. हिंदी 15 करोड़ के लगभग 60 से 70 प्रतिशत
3. गुजराती1 करोड़ के लगभग 60 से 70 प्रतिशत
4. मराठी 2 करोड़ के लगभग 60 से 70 प्रतिशत
5. तमिल 2 करोड़ के लगभग 50 प्रतिशत
6. मलयालम (शिष्टभाषा), कन्नड़. तेलुगु 6 करोड़ के लगभग 70 से 80 प्रतिशत

इस तालिका से यह स्पष्ट है कि उर्दु को छोड़ कर भारत की शेष समस्त भाषाओं का शब्द-भण्डार संस्कृत के आधार पर ही है।
पुस्तक में आचार्य रघुवीर ने चीन, मंगोलिया, कोरिया, जापान के अलावे इंडोनेशिया, जावा, बोर्नियो आदि दक्षिण एशियायी देशों में संस्कृत तथा भारतीय संस्कृति की व्याप्ति को बहुत ही प्रमाणों तथा तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया है। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने में जो अड़चनें बताई जाती हैं, उनके लिए भी उन्होंने समाधान प्रस्तुत किया है। नए शब्दों का निर्माण, पारिभाषिक शब्दावली निर्माण आदि प्रश्नों पर उन्होंने बहुत ही सुगम उपाय बताए हैं।

कुल मिला कर 23 आलेखों के इस संग्रह को पढऩे के बाद न केवल मन में अपनी हिंदी तथा संस्कृत भाषा के प्रति मन में गौरव जाग उठता है, बल्कि देश की भाषाई एकता का भी बोध होता है। आज दक्षिण की भाषाओं को जिस प्रकार उत्तर से भिन्न दिखाने और उस नाम पर देश में एक विभेद पैदा करने का कुत्सित प्रयास किया जाता है, यह पुस्तक उसका जबरदस्त उत्तर देती है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि यह पुस्तक हरेक भारतीय को अपने देश की एकात्मता तथा उसके विश्व संचार को जानने तथा समझने के लिए पढऩी चाहिए।

रवि शंकर