प्रो. दयाल सिंह पँवार
आचार्य, व्याकरण विभाग,श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
परिवार सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन का मूल आधार है और विवाह उसकी आधार-शिला। विवाह के बाद जिस परिवार का निर्माण होता है, वही मनुष्य-निर्माण की प्रथम पाठशाला बनती है और माता-पिता वहाँ प्रथम शिक्षक की भूमिका में होते हैं। विश्व के प्रत्येक समाज ने सभ्यता के विकास के साथ ही विवाह-व्यवस्था को स्वीकार किया और अपने चिन्तन और संस्कृति के अनुरूप इसको व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। कहीं पर इसे अनुबंध और समझौते के रूप में स्वीकार किया गया, तो अन्यत्र स्त्री-पुरुष के एक विशेष संबंध के रूप में इसे मान्यता मिली। भारतीय चिन्तन में विवाह को संस्कार के रूप में स्वीकार किया गया। यह संस्कार मानव-जीवन को दायित्ववान और परिपक्व बनाने के लिए आवश्यक है।
विवाह के निहितार्थ
विवाह शब्द संस्कृत में ‘वि’ उपसर्ग पूर्वक ‘वह्’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है विशिष्ट रूप से दायित्व का वहन करना। वस्तुत: जीवन के इस पड़ाव में वर-वधू नए विशिष्ट दायित्व का वहन करने की भूमिका के लिए अपने आपको तैयार करते हैं। इसके लिए पाणिग्रहण आदि शब्दों का भी प्रयोग होता है। पाणि शब्द का अर्थ हाथ है। माता-पिता अपनी पुत्री का हाथ वर के हाथ में सौंप देते हैं। अधिक गहराई से विचार करें तो पाणिग्रहण संस्कार के बाद दोनों जीवन भर एक—दूसरे का हाथ थामते हैं अर्थात् एक—दूसरे को सहारा देते हैं। एक विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठान के रूप में यह संस्कार संपन्न होता है, जिसमें सप्तपदी या 7 फेरों के बाद वर-वधू पति-पत्नी के रूप में धार्मिक तथा सामाजिक स्वीकृति प्राप्त करते हैं।
पारिवारिक तथा सामाजिक उत्सव
भारतीय परिवेश में रीतियों और परम्पराओं की विविधता के कारण विवाह की सामान्य क्रियाओं में कुछ भेद भले ही होते हैं, किन्तु सामान्य रूप से आधारभूत क्रियाकलापों में एकता व समानता भी है। भारत के अनेक भागों में यह उत्सव दो-तीन दिन या और अधिक समय तक चलता है। विवाह से पूर्व कई स्थानों पर सगाई, वाग्दान या गौना होता है, जिससे वर पक्ष और कन्या पक्ष आपसी सहमति स्थापित कर लेते हैं। विवाह से पूर्व कन्या पक्ष तथा वर पक्ष दोनों के घरों पर अपनी रीति के अनुसार कीर्तन, हल्दी आदि अनेक कार्यक्रम होते हैं और वरयात्रा के बाद तो दोनों परिवारों के उत्सव एकरूप हो जाते हैं। सामान्य रूप से मंगल-स्नान, हल्दी, गणेश-पूजन, द्वारपूजन, तिलक, वरमाला, हस्तपीतकरण, मर्यादाकरण, पाणिग्रहण, ग्रंथिबन्धन, प्रतिज्ञाएं, प्रायश्चित, शिलारोहण, सप्तपदी, शपथ, आश्वासन आदि ये विविध क्रियाकलाप विवाह के विशिष्ट अंग हैं। विवाह संपन्न होने के बाद भी कुछ अन्य परम्पराओं का निर्वहण कुछ परिवारों में होता रहता है। ये वैवाहिक उत्सव परिवार और समाज में उत्साह और उमंग का संचार करते हैं। भारत में विवाह मात्र दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का भी संबंध है।
धार्मिक अनुष्ठान के रूप में विवाह
विवाह की उत्सवधर्मिता के विवेचन के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि विशेष रूप से भारतीय परम्परा में विवाह एक धार्मिक अनुष्ठान भी है। 16 संस्कारों में से एक महत्त्वपूर्ण संस्कार के रूप में हम पहले ही विवाह का उल्लेख कर चुके हैं। विवाह के विविध चरण धार्मिक कर्मकाण्डों में निबद्ध हैं। विवाह के बाद ही व्यक्ति को धार्मिक यज्ञों के अनुष्ठानों का अधिकार प्राप्त होता है। यही कारण था कि सीताजी की अनुपस्थिति में श्रीराम को अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान के लिए उनकी प्रतिमा को यज्ञ में रखना पड़ा। पाणिनि का एक सूत्र है “पत्युर्नो यज्ञ-संयोगे” इस सूत्र में पत्नी शब्द की सिद्धि करते हुए वे बताते हैं कि पत्नी शब्द का प्रयोग किसी स्त्री के लिए तभी हो सकता है, जब पति के यज्ञ करने पर उस स्त्री को भी यज्ञ का फल प्राप्त हो।
विवाह के प्रयोजन
भारतीय परम्परा में जीवन को 4 आश्रमों में विभक्त किया गया है— ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या प्राप्त करने के बाद ”प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सी:” अर्थात् सन्तानोत्पत्ति के सूत्र को मत तोडऩा। आचार्य की ऐसी आज्ञा का पालन करने के लिए समावर्तन संस्कार के बाद स्नातक विवाह करके गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करते थे। शास्त्रों में गृहस्थ आश्रम का महत्व बताते हुए कहा भी गया है कि जैसे वायु का आश्रय लेकर सब प्राणी जीवित रहते हैं, वैसे ही गृहस्थाश्रम पर ही सारे आश्रम आधारित हैं। अत: स्पष्ट है कि विवाह का यह सामाजिक प्रयोजन भी है कि विवाह के बाद गृहस्थ सारी व्यवस्था को बनाए रखने में अपना योगदान दे। ”अर्धं भार्या मनुष्यस्य” ऐसा कहकर शास्त्रकारों ने पत्नी को पति की अर्धांगिनी घोषित किया है। ”न गृहिणी गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते” अर्थात् गृहिणी के बिना घर घर नहीं है, वास्तव में गृहिणी को ही गृह स्वरूप बताया गया है। भारतीय चिन्तन के अनुसार हर व्यक्ति पर 3 ऋण चढ़े रहते हैं— देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण। इन ऋणों में पितृ-ऋण को विवाह के बाद सन्तान उत्पन्न करके ही उतारा जा सकता है। सन्तान ही पितृ-कर्म श्राद्ध आदि से पितरों का उद्धार कर सकती है। इसके अतिरिक्त विविध सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के साथ ही विवाह के माध्यम से अपनी स्वच्छंदता पर भी नियंत्रण स्थापित करना भी इसका अन्य प्रयोजन है।
विवाह के विविध रूप
धर्मशास्त्र के मर्मज्ञ पण्डितों ने विवाह की इस पद्धति का शास्त्रीय ग्रंथों में पर्याप्त उल्लेख किया है। वहाँ वर-वधुओं के लक्षण, विवाह का विधान, विवाह के प्रकार आदि विविध पक्षों पर व्यापक चर्चा हुई है। महाभारत में उल्लेख आता है कि श्वेतकेतु और कुछ सीमा तक दीर्घतमा जैसे ऋषियों ने विवाह की इस पद्धति को व्यवस्थित तथा स्थिर स्वरूप प्रदान किया। यूँ तो राजा-महाराजाओं के परिवारों तथा संभ्रांत कुलों में बहुपत्नी-प्रथा भी प्रचलन में रही, किन्तु विवाहों के इन रूपों को आदर्श नहीं माना गया। श्रीराम के मर्यादा-पुरुषोत्तम होने में यह भी एक महत्त्वपूर्ण मर्यादा रही है। समाज में निर्मित परिस्थितियों के कारण ही विद्वान शास्त्रों की रचना करते हैं और उचित मार्गनिर्देशन भी प्रदान करते हैं। शास्त्रकारों ने समाज में प्रचलित 8 प्रकार के विवाहों का उल्लेख किया है। ये हैं— ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच। इनमें ब्राह्म विवाह को सर्वोत्तम कहा गया है। इसमें पिता वेदज्ञ विद्वान् को सत्कारपूर्वक आमंत्रित कर स्वयं कन्या प्रदान करता है। दैव विवाह में यज्ञ करने वाले ऋत्विज को कन्या दिए जाने का विधान है। गुणवान् वर से एक या दो पशुओं के जोड़े लेकर जब पिता धर्मानुसार अपनी कन्या प्रदान कर देता है तब वह आर्ष विवाह कहलाता है। प्रजापति ब्रह्मा की सृष्टि को आगे बढ़ाने में सहायता देने के कारण प्राजापत्य नाम दिया गया है। इसमें पिता वर और कन्या को आदेश देते हैं कि तुम मिलकर धर्म का पालन करो। इस प्रकार वर का पूजन करके पिता उसे अपनी कन्या प्रदान करता है। इस विवाह में वर द्वारा कन्या के पिता से कन्या की याचना की भी परम्परा रही है। आसुर विवाह को वशिष्ठ द्वारा मानुष विवाह भी कहा गया है। इसमें वर पक्ष कन्या और कन्या पक्ष को यथाशक्ति धन प्रदान करके स्वेच्छा से विवाह करता है।
गान्धर्व विवाह में पुरुष तथा स्त्री परस्पर प्रणय के वशीभूत होकर परिणय-सूत्र में बँधते हैं। यद्यपि शास्त्रकारों ने इसे उत्तम नहीं माना, किन्तु कविकुलगुरु कालिदास ने अपने नाटक में इसका अनुमोदन किया है और वात्स्यायन ने तो इसे प्रशंसनीय ही माना है। आज के प्रेम-विवाह इसी कोटि में रखे जा सकते हैं। राक्षसी विवाह में वर पक्ष के लोगों को मार-पीटकर बलपूर्वक रोती-चिल्लाती कन्या का हरण किया जाता है और फिर उससे यज्ञादिपूर्वक विवाह किया जाता है। जिस विवाह में छल-कपट के साथ सोई या असावधान कन्या का हरण किया जाए वह पैशाची विवाह है। इसे अत्यन्त निकृष्ट कोटि में रखा गया है। रामायण, महाभारत तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों से स्वयंवर-प्रथा के भी पर्याप्त उल्लेख प्राप्त होते हैं, जिनमें कन्या योग्य वर का वरण करती थी।
आधुनिक परिवेश में चुनौतियाँ
आधुनिकता के इस परिवेश में विवाह-पद्धति तथा उसके अन्तर्गत क्रिया-कलापों में सामयिक परिस्थितियों के कारण पर्याप्त परिवर्तन हुए हैं। स्वतंत्रता के बाद 1955 में हिन्दू-विवाह अधिनियम आया, जो अनेक अल्पसंख्यक समुदायों पर भी लागू होता है। मुस्लिम समुदाय का अपना कानून है। व्यवस्था में परिवर्तन स्वाभाविक होते हैं, किन्तु अत्यधिक धन का अपव्यय, दहेज-प्रथा, विवाह-विच्छेद के बढ़ते हुए प्रकरण विवाह-व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौतियाँ उपस्थित कर रहे हैं। मुस्लिम समुदाय में प्रचलित 3 तलाक को संसद द्वारा निरस्त कर दिया गया है, किन्तु बहुविवाह आदि प्रथाएं उस समुदाय में अभी भी वैध हैं, जो एक चुनौती है। तलाक के बढ़ते हुए मामलों से आधुनिक समाज में विवाह गुड्डे-गुडिय़ों के खेल जैसा बन गया है। इससे परिवारों की पीडि़त सन्तानों पर अत्यधिक दुष्प्रभाव पड़ रहा है। इस दृष्टि से प्रबुद्ध वर्ग को समाज़ के मार्गदर्शन के लिए आगे आना होगा, जिससे समाज में विखण्डन की प्रवृत्ति भयावह रूप धारण न कर सके।
निष्कर्ष
उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि यद्यपि प्रजनन तो सभी जीवों में होता है, किन्तु विवाह एक ऐसी पद्धति है, जो अन्य जन्तुओं से मानव को भिन्न करती है। विवाह-पद्धति का प्रणयन करके मानव-समाज ने अपने आपको अधिक सभ्य और सुसंस्कृत बनाया है। वास्तव में यह पद्धति हमारे अस्तित्व का आधार बन गई है। इसके अभाव में मानव-समाज अव्यवस्थित और निरंकुश होकर आपस में ही कलह और द्वेष के कारण नष्ट हो सकता है, इसमें कोई सन्देह नहीं। अत: किसी भी परिस्थिति में इसका संरक्षण करना व्यक्ति और समाज के अस्तित्व के लिए नितांत आवश्यक है। ह्व





