आचार्य अलंकार शर्मा
लेखक साफ्टवेयर इंजीनियर तथा ज्योतिष अलंकार हैं।
गीता के प्रसिद्ध कथन में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि साधु पुरुषों की रक्षा, दुष्कर्म करने वालों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए वे युग-युग में प्रकट होते हैं। वेदांतदेशिकाचार्य वेंकटनाथ अपने भाष्य में स्पष्ट करते हैं कि युग-युग से आशय कृत, त्रेता आदि युगों से है, परंतु भगवान का प्रकट होना न किसी विशेष युग तक सीमित है और न प्रत्येक युग में होना अनिवार्य है। ज्योतिष में काल को चार युगों—सतयुग (17,28,000 वर्ष), त्रेतायुग (12,96,000 वर्ष), द्वापरयुग (8,64,000 वर्ष) और कलियुग (4,32,000 वर्ष)—में मापा जाता है। ये युग प्रत्येक मन्वंतर में चक्र की भाँति बार-बार आते हैं।
आठवें अध्याय में भगवान ब्रह्मा के दिन और रात्रि की अवधि बताते हैं। ब्रह्मा का एक दिन एक हजार महायुगों के बराबर है और उनकी रात्रि भी इतनी ही लंबी होती है। दिन के आरंभ में अव्यक्त से समस्त चराचर जगत उत्पन्न होता है और रात्रि के आगमन पर उसी अव्यक्त में लीन हो जाता है। यही भूतसमुदाय बार-बार उत्पन्न होकर विलीन होता रहता है।
ज्योतिष के आर्ष ग्रंथ सूर्यसिद्धांत में भी एक हजार महायुगों के बराबर ब्रह्मा के एक दिन को कल्प कहा गया है। एक महायुग 43,20,000 सौर वर्षों का होता है। इस प्रकार ब्रह्मा का एक दिन 4,32,00,00,000 सौर वर्षों का होता है। इसके बाद सृष्टि का संहार होता है और इतनी ही अवधि की रात्रि के उपरांत पुन: सृष्टि की रचना होती है। भगवान श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि कल्प के अंत में समस्त प्राणी उनकी प्रकृति में लीन हो जाते हैं और कल्प के आरंभ में वे पुन: उनकी रचना करते हैं।
अयन
भगवान उत्तरायण और दक्षिणायन का भी उल्लेख करते हैं। परंपरागत कालगणना में छह महीने का उत्तरायण देवताओं का दिन और छह महीने का दक्षिणायन उनकी रात्रि माना गया है। इस प्रकार तीस मानव वर्षों का एक दिव्य मास और 360 मानव वर्षों का एक दिव्य वर्ष माना जाता है। भगवान बताते हैं कि अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष और उत्तरायण के छह महीनों वाले मार्ग से जाने वाले ब्रह्मविद् साधक ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत, धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन के छह महीनों वाले मार्ग से जाने वाला योगी चंद्रलोक की ज्योति प्राप्त करके संसार में लौट आता है।
विभूतियाँ
सूर्य और चंद्रमा के प्रकाश का उल्लेख करते हुए भगवान कहते हैं कि वे जल में रस, सूर्य और चंद्रमा में प्रकाश, समस्त वेदों में प्रणव अर्थात् ओंकार, आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषत्व हैं। सूर्य और चंद्रमा की प्रकाश देने वाली विशेषता को प्रभा कहा गया है। ज्योतिष में सूर्य, चंद्रमा, अन्य ग्रहों और नक्षत्रों की गति एवं स्थिति का गणना तथा प्रेक्षण द्वारा अध्ययन किया जाता है। सूर्य और चंद्रमा को विशेष महत्व प्राप्त है, इसलिए ज्योतिष को प्रत्यक्ष शास्त्र भी कहा गया है।
विभूतियोग में भगवान स्वयं को प्रकाशमान पिंडों में किरणों वाले सूर्य और नक्षत्रों में चंद्रमा बताते हैं। फलित ज्योतिष में सूर्य को आत्मा और पिता का, जबकि चंद्रमा को मन और माता का कारक माना जाता है। जातक के जीवन में आत्मा और मन का विशेष महत्व है। इसी कारण सूर्य और चंद्रमा को ज्योतिष में प्रमुख स्थान प्राप्त है।
इसी अध्याय में भगवान कहते हैं कि वे आदित्यों में विष्णु, प्रकाशमान वस्तुओं में किरणों वाले सूर्य, मरुतों में मरीचि और नक्षत्रों में चंद्रमा हैं। पुरोहितों में वे बृहस्पति और कवियों में उशना अर्थात् शुक्राचार्य हैं। बृहस्पति देवताओं के पुरोहित होने के कारण ज्ञान, धर्म और आचार के प्रतीक हैं। ज्योतिष में उनसे धार्मिकता, अध्यात्म के प्रति झुकाव, नेतृत्व, न्याय, नीति-निर्माण और उच्च शिक्षा के योग देखे जाते हैं। शुक्राचार्य को रचनात्मकता, कला, सौंदर्य और नीति से जोड़ा जाता है। कवियों में उशना का उल्लेख उनकी काव्य-प्रतिभा का संकेत देता है।
काल और मार्गशीर्ष मास
सूर्यसिद्धांत में काल के दो रूप बताए गए हैं—एक सबका अंत करने वाला काल और दूसरा गणना का आधार बनने वाला काल। स्वामी रामसुखदास जी भी अपने गीता-भाष्य में कहते हैं कि ज्योतिषशास्त्र में काल के आधार पर आयु की गणना होती है। इसलिए क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास और वर्ष आदि समय-गणना के साधनों में काल भगवान की विभूति है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे दैत्यों में प्रह्लाद, गणना करने वालों में काल, पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड़ हैं। वे स्वयं को अक्षय काल भी बताते हैं और विराट् स्वरूप में लोक का अंत करने वाला काल भी कहते हैं। इस प्रकार गणनीय काल और संहारकारी काल, दोनों को उनकी विभूति माना गया है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रस्थानत्रयी के प्रमुख ग्रंथों में से एक श्रीमद्भगवद्गीता में ज्योतिष, जो कि वेदांग है, से संबंधित अनेक संदर्भ प्राप्त होते हैं। ये संदर्भ कालगणना, ग्रह-नक्षत्रों, अयन, युगों और काल की व्यापक अवधारणा को समझने में सहायक हैं।





