अयोध्या का वैभव और प्राचीनता

श्री बृजेश मिश्र
लेखक


अनेकों प्रख्यात राजा इक्ष्वाकु, पृथु, मान्धाता, हरिश्चंद्र, सागर, भागीरथ, रघु, दिलीप, दशरथ तथा राम ने कोशल देश की राजधानी अयोध्या से शासन किया। उनके शासन काल में राज्य का वैभव शिखर पर पहुंचा तथा राम राज्य का प्रतीक बना।

सरयू नदी के पूर्वी तट पर बसा अयोध्या नगर पुरातन काल के अवशेषों से भरा हुआ है। प्रसिद्ध महाकाव्य रामायण व श्री रामचरितमानस और अन्य वेदों पुराणों में अयोध्या के ऐश्वर्य और प्राचीन इतिहास के बारे में मिलता है तो आइए जानने की कोशिश करते हैं कि ग्रंथो पुराणों और वेदों में कैसी थी अयोध्या।

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में राजा दशरथ के द्वारा सुरक्षित अयोध्या पुरी का वर्णन करते हुऐ बालकांड में बताया गया है कि कौशल नाम से प्रसिद्ध एक बहुत बडा जनपद है जो सरयू नदी के किनारे बसा हुआ है, वह प्रचुर धन धान्य से संपन्न सुखी और समृद्धशाली है और उसी जनपद में अयोध्या नामक एक नगरी है जो समस्त लोकों में विख्यात है, जिसे महाराज मनु ने स्वयं बसाया था। वह शोभा शालीन नगरी बारह योजन लम्बी और तीन योजन चौड़ी थी। नगरी के चारों ओर फैली हुई सड़कों पर नित्य जल छिड़का जाता और फूल बिछाए जाते हैं। अयोध्या से बाहर जाने का मुख्य मार्ग अन्य मार्गों से अलग और विशाल है। मुख्य मार्ग के दोनों तरफ पेड़ों की कतारें लगी हुई हैं, जिससे यह अन्य मार्गों से अलग जान पड़ता है। जैसे स्वर्ग में देवराज इंद्र ने अमरावती पुरी बसायी थी उसी प्रकार धर्म न्याय के बल से अपने महान राष्ट्र की वृद्धि करने वाले राजा दशरथ ने अयोध्या पुरी को बसाया था, वह पुरी बड़े-बड़े फाटकों और किवाड़ों से सुशोभित है, उसके भीतर पृथक- पृथक बाजार है। विभिन्न देशों के व्यवसायी नगरी में आते हैं और व्यवसाय करते हैं। यहां ऊंचे-ऊंचे भवन बने हुए हैं जो इस नगरी की वैभवता को बढ़ाते हैं। भवनों पर सोने का पानी चढ़ाया हुआ है। यहां कई नाट्य समितियां हैं, जिनमें केवल स्त्रियां ही नृत्य एवं अभिनय करती हैं। नगरी में चारों ओर उद्यान तथा आमों के बगीचे हैं। नगरी की रक्षा के लिए चतुर शिल्पियों द्वारा बनाए हुए सब प्रकार के यंत्र और शस्त्र रखे हुए हैं। नगरी के चारों ओर गहरी खाई खुदी है जिसमें प्रवेश करना या उसे लांघना अत्यंत कठिन है। नगरी गाय, हाथी, घोड़े, बैल, ऊंट, खच्चर जैसे उपयोगी पशुओं से भी भरी पूरी हैं। यहां का पानी गन्ने के रस के सामान मीठा है। अयोध्या नगरी में रहने वाले सभी नागरिक धनवान हैं। कोई भी कम धनवान या गरीब नहीं हैं।

भूमंडल की वह सर्वोत्तम नगरी दुंदुभी, मृदंग, वीणा, पणव आदि वाद्यों की मधुर ध्वनि से गुजती रहती थीं।
रामायण के अनुसार सरयू नदी के तट पर बसे अयोध्या की स्थापना विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु महाराज ने की थी। भगवान ब्रह्माजी के पुत्र मरीचि से कश्यप और कश्यप से विवस्वान का जन्म हुआ था। वैवस्वत मनु के 10 पुत्रों में से एक इक्ष्वाकु के कुल में ही आगे चलकर भगवान राम का जन्म हुआ।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के उत्तराकांड में अयोध्या के समृद्धशाली इतिहास का वर्णन मिलाता है। श्रीरामचरितमानस के उत्तरकांड में लिखा है कि जहा भगवान श्रीराम चंद्र जी राजा बनकर विराजमान है उस नगर के निवासियों के सुख संपति का वर्णन हजारों शेष जी नही कर सकते हैं। नारद आदि और सनक आदि मुनीश्वर प्रभु श्रीराम जी के दर्शन के लिए प्रतिदिन अयोध्या आते हैं और उस दिव्य नगर को देखकर वैराग्य भुला देते है। नगर में स्वर्ण और रत्नों से बनी हुई अटारिया है, उनमें (मणि रत्नों) की अनेक ढली हुइ फर्शे है, नगर में अत्यंत सुन्दर दीवारे बनी हैं जिस पर सुंदर कलश बने है, अयोध्या में बने हुए उज्ज्वल महल को चूम रहे है, महलों पर कलश अपने दिव्य प्रकाश से मानो सूर्य चंद्रमा के प्रकाश की भी निंदा करते हैं महलों में बहुत से रचे हुए झरोखे सुशोभित हंै और घर घर में मणियों के दीपक शोभा पा रहें हैं। महल सुंदर है मनोहर और विशाल है। उनमें सुन्दर स्फटिक के आंगन बने हैं और प्रत्येक द्वार पर बहुत से खरादे हुए हीरों से जड़े हुए सोने के किवाड़ हैं।

नगर की उत्तर दिशा में सरयू जी बह रही है, जिनका जल निर्मल और गहरा है। सरयू जी के किनारे मनोहर घाट बने हुए हैं, घाटों पर कीचड़ नही है, कुछ ही दूरी पर हाथी घोड़ों के लिए घाट हंै जहा पर वे जल पिया करते हैं, पानी भरने के लिए बहुत से ( जनाने) घाट है जो बड़े ही मनोहर है, वहा पुरूष स्नान नही करते हैं। राजाघाट सब प्रकार से सुन्दर है । जहां सभी वर्णों के पुरुष स्नान करते हैं, सरयू के किनार किनारे देवताओ के मंदिर है । जिनके चारो ओर सुन्दर बगीचे है। नदी के किनारों पर कहीं-कहीं विरक्त और ज्ञानपरायण मुनि और सन्यासी निवास करते हैं, सरयू जी के किनारे पर सुन्दर तुलसी जी के झुंड के झुंड बहुत से पेड़ मुनियों ने लगा रखे हैं। नगर की शोभा तो कुछ कही नहीं जाती है, नगर के बाहर भी परम सुंदरता है। स्वयं लक्ष्मीपति भगवान जहां के राजा हो, उस नगर कहीं वर्णन किया जा सकता है अणिमा आदि आठों सिद्धियां और समस्त सुख संंपत्तिया आयोध्या में छा रही है। लोग जहा तहां श्री रघुनाथ जी के गुण गाते हैं और बैठकर एक दूसरे को यही सिख देते है कि शरणागत का पालन करने वाले श्रीराम को भजों; शोभा, शील और गुणों के धाम श्री रघुनाथ जी को भज़ो।

वेदों पुराणों में अयोध्या
अयोध्या अति प्राचीन नगरी है, जिसका अस्तित्व वैदिक काल से माना जाता है।
पुराणों में अयोध्य को भारत की प्राचीन नगरियों में से एक पवित्र और सबसे प्राचीन सात मोक्षदायिनी पुरियों में प्रथम माना गया है।
अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मेोक्षदायिका: ।।
सप्त पुरियों में अयोध्या, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जयिनी) और द्वारका को शामिल किया गया है। अयोध्या का सर्वप्रथम अथर्ववेद के एक मन्त्र में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि इसमें आठ चक्र थे और बाहर आने-जाने के लिए नौ प्रमुख द्वार थे। पारम्परिक रूप से इसकी मान्यता देवनगरी के रूप में थी। इसमें स्वर्ण की अपार निधि थी। यह स्वर्ग के सदृश आनन्दमयी और चमक-दमक से परिपूर्ण थी। प्रत्येक द्वार पर शक्ति सम्पन्न रक्षक रहते थे। इसमें रहने वाले देवताओं के तुल्य माने जाते थे। इस पुरी के निवासी इसे ही स्वर्गधाम समझते थे। वेद की तैत्तिरीय शाखा में भी अयोध्या का उल्लेख है।

ऋग्वेद के एक मन्त्र में ‘इक्ष्वाकु’ वंश का भी उल्लेख है। दानस्तुतियों के प्रकरण में अन्य राजाओं के साथ राजा दशरथ की भी प्रशंसा की गयी है। कहा गया है कि दशरथ के पास चालीस भूरे रंग के ऐसे घोड़े थे, जो एक हजार घोड़ों के दल के समकक्ष थे- ‘चत्वारिशंद दशरथस्य शोणा: सहस्रस्याग्रे श्रेणि नमन्ति।’

स्कन्द पुराण के अनुसार अयोध्या का आकार मत्स्य के समान था। इसका पूर्व-पश्चिम में एक-एक योजन तथा दक्षिण और पश्चिम में भी इतना ही था। ‘तीर्थकल्प’ के 34 वें अध्याय में इसे बारह योजन लम्बी और नौ योजन चौड़ी कहा गया है। तो वही वाल्मिकी रामायण के बालकाण्ड में अयोध्या को 12 योजन (144 किमी) लंबा एवम् 3 योजन (36 किमी) चौड़ा बताया गया है।

यह प्राचीन कोसल की राजधानी थी, आगे कोसल जनपद उत्तर और दक्षिण दो भागों में विभक्त हो गया। अयोध्या मूलत: उत्तर कोसल में स्थित है। कालिदास ने ‘रघुवंश में भी यही वर्णन किया है।’

इक्ष्वाकुवंश में एक श्रेष्ठ एवं प्रशंसनीय गुणों वाले ककुत्स्थ नामक राजा हुए। उनके कारण बाद में उत्तरकोसल के सभी राजा अपने को काकुत्स्थ ही कहने लगे तथा संयम से अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने वाले योगियों और प्रजापालक राजाओं में श्रेष्ठ महाराज दशरथ ने अपने पिता के पश्चात् योग्यतापूर्वक उत्तर कोसल का राज्य सँभाल लिया।

उत्तर कोसल की प्रसिद्धि पवित्र सरयू नदी के कारण अधिक रही है। कालिदास जी ने अयोध्या के नामान्तर ‘साकेतÓ शब्द का भी प्रयोग किया है।

साकेत के निवासियों ने गुरुदक्षिणा से अधिक धन न लेने वाले स्नातक कौत्स और कुबेर से प्राप्त सम्पूर्ण स्वर्णराशि को समर्पित कर देने के इच्छुक महाराज रघु, दोनों की ही प्रशंसा की।

महाराज विक्रमादित्य ने 57 ईसा पूर्व अयोध्या में श्रीराम जन्म स्थान पर कसौटी पत्थर के 84 स्तंभों और सात कलशों वाला मंदिर बनवाया था। जिसे 1528 ई. में मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीर बांकी ने ध्वस्त कर दिया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए उत्खनन में वहां हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां, प्रतीक और स्तंभ प्राप्त हुए हैं जिसके आधार पर वहां एक भव्य मंदिर था, इस बात की पुष्टि हुई है। वेदों पुराणों ग्रंथो में जिस प्रकार का वर्णन मिलता है वो वास्तव में अयोध्या का वैभव अकल्पनीय था।