श्रीकृष्ण के गीता-उपदेश की वास्तविक तिथि -२

राजेन्द्र सिंह
प्रख्यात इतिहासकार


शान्तिदूत श्रीकृष्ण का हस्तिनापुर जाना-राजा धृतराष्ट्र का सन्देश लेकर आए संजय के लौट जाने पर इधर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी सहित सभी पाण्डवों से युद्ध और शान्ति के सन्दर्भ में भली-भांति विचार-विमर्श करके उनका अभिमत जान लेने के बाद राजा धृतराष्ट्र के यहां शान्तिदूत के रूप में हस्तिनापुर जाने की तैयारी की। उपप्लव्य नगर से हस्तिनापुर की ओर शान्ति का प्रस्ताव लेकर प्रस्थान करने वाले श्रीकृष्ण ने किस ऋतु, मास और तिथि में अपनी यात्रा प्रारम्भ की, इस सन्दर्भ में व्यासदेव बताते हैं कि ”फिर जब रात्रि का तमस=अन्धकार दूर हुआ, विमल आकाश में सूर्य का उदय होने पर और मैत्र मुहूर्त के प्राप्त होने पर दिवाकर की मृदु=कोमल किरणें सर्वत्र फैल गईं तब सत्त्वशीलों में श्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने यात्रा प्रारम्भ की। उन दिनों कौमुद=कात्र्तिक मास में चन्द्र रेवती नक्षत्र में स्थित था तथा शरद ऋतु समाप्त प्राय: थी, हेमन्त ऋतु का आगमन हो रहा था और सब ओर उपजी खेती लहलहा रही थी”।

इस प्रकार कात्र्तिक मास की शुक्ला त्रयोदशी को उपप्लव्य नगर से चलकर मार्ग में अनेक स्थानों पर ऋषि-समूह, विद्वान् ब्राह्मणों तथा भारी जन-समूह का सत्कारपूर्ण समर्थन प्राप्त करते हुए और विश्राम के लिए रात्रि व्यतीत करते हुए श्रीकृष्ण कात्र्तिक कृष्णा पंचमी (उत्तर भारतीय पद्धति के अनुसार मार्गशीर्ष कृष्णा पंचमी) के दिन हस्तिनापुर से कुछ मील पहले सूर्यास्त के समय वृकस्थल नामक ग्राम में पहुंचे।

यह उल्लेखनीय है कि इस समय उनके साथ 10 शस्त्रधारी महारथी, 1000 अश्वारोही, 1000 पैदल योद्धा और सैंकड़ों सेवक सहयात्री के रूप में हस्तिनापुर जा रहे थे।

उधर हस्तिनापुर में राजा धृतराष्ट्र ने विदुर को यह बताते हुए कहा:
विदुर ! मुझे सूचना मिली है कि जनार्दन कृष्ण उपप्लव्य नगर से यहां के लिए चल पड़े हैं, इस समय वृकस्थल में ठहरे हैं और कल प्रात: इस नगर में पहुंच जाएंगे।

श्रीकृष्ण का धृतराष्ट्र द्वारा स्वागत
वृकस्थल पर रात भर ठहरने के बाद कात्र्तिक कृष्णा षष्ठी के प्रात:काल में उठकर नित्यकार्यों से निवृत्त होकर श्रीकृष्ण हस्तिनापुर की ओर चल दिए। उस नगर की सीमा में प्रवेश करते समय वहां राजमार्ग के दोनों किनारों पर विशाल जन-समूह द्वारा किए जा रहे अभिनन्दन को प्रेमपूर्वक स्वीकार करते हुए श्रीकृष्ण ने अन्तत: राजा धृतराष्ट्र के सुशोभित राज-भवन में प्रवेश किया। वहां पर धृतराष्ट्र ने भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, महाराज बाह्लिक और सोमदत्त आदि प्रमुखों के साथ अपने आसन से उठकर श्रीकृष्ण का स्वागत किया।

राजा धृतराष्ट्र आदि से पूजित और सम्मानित होकर महायशस्वी श्रीकृष्ण उनकी अनुज्ञा लेकर राजभवन से निकले और महात्मा विदुर से मिलने उनके रमणीय गृह में जा पहुंचे। विदुर से वार्तालाप करने के बाद वे अपराह्न=तीसरे पहर अपनी बुआ कुन्ती से मिलने गए। फिर वे दुर्योधन से मिलकर पुन: विदुर के घर आ गए और रात्रिभर वहीं विश्राम किया।

कौरव-सभा में श्रीकृष्ण का सम्भाषण
प्रात:काल के नित्यकार्यों से निवृत्त हुए श्रीकृष्ण के पास आकर दुर्योधन और शकुनि ने उन्हें सूचित किया कि राजा धृतराष्ट्र और भीष्म पितामह आदि प्रमुख लोग सभी भूपालों के साथ सभागार में आ चुके हैं। तब श्रीकृष्ण सारथि दारुक द्वारा संचालित शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामक चार घोड़ों से जुते अपने रथ में बैठकर कौरव-सभा में पधारे जहां सबने खड़े होकर उनका स्वागत किया।

परस्पर कुशल-क्षेम पूछने के बाद जब राजसभा में उपस्थित लोग शान्त-भाव से बैठ गए तब श्रीकृष्ण ने कौरवों और पाण्डवों में शान्ति-स्थापन हेतु बड़े ही सन्तुलित शब्दों में दुर्योधन द्वारा पाण्डवों के प्रति किए जा रहे अन्यायपूर्ण व्यवहार का विश्लेषण करते हुए अपने प्रभावशाली सम्भाषण के अन्त में राजा धृतराष्ट्र से यह कहा : जनेश्वर ! आपसे पाण्डवों का राज्य लौटा देने के सिवा दूसरी कौन-सी बात यहां कही जा सकती है !! इस सभा में जो महीपाल बैठे हैं, वे धर्मार्थ का विचार करके स्वयं बतावें कि मैं ठीक कहता हूं या नहीं। पुरुषरत्न ! आप इन क्षत्रियों को मृत्यु-पाश से छुड़ाइए। भरतश्रेष्ठ ! शान्त हो जाइए, क्रोध के वशीभूत न होइए।

परंतप ! पाण्डवों को उनका यथोचित पैतृक राज्यभाग देकर अपने पुत्रों के साथ सफल मनोरथ होकर मनोवांछित भोग भोगिए।

प्रजानाथ ! आपके पुत्र लोभ में अत्यन्त आसक्त हो गए हैं, उन्हें वश में लाइए। राजन् ! शत्रुओं का दमन करने वाले पाण्डव आपकी सेवा के लिए भी तैयार हैं और युद्ध के लिए भी प्रस्तुत हैं। परंतप ! जो आपके लिए विशेष हितकर जान पड़े, उसी मार्ग पर रहें।

सभासदों द्वारा दुर्योधन को समझाना
श्रीकृष्ण की बातों का अनुमोदन करते हुए पहले जमदग्निनन्दन परशुराम, कण्व मुनि, देवर्षि नारद, धृतराष्ट्र, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और महात्मा विदुर ने दुर्योधन को समझाने का बहुत प्रयास किया। किन्तु दुर्योधन के मन पर उनकी बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तब धृतराष्ट्र ने श्रीकृष्ण से अनुरोध किया कि वे ही शास्त्र की आज्ञा का उल्लंघन करने वाले मेरे मन्दमति पुत्र दुर्योधन को समझावें।

श्रीकृष्ण द्वारा समझाए जाने पर भी दुर्योधन सीधे मार्ग पर न आया। उसने श्रीकृष्ण की सुसंगत बातों को अनसुना करके अपने-आपको सर्वथा निर्दोष बताते हुए स्पष्ट शब्दों में यह कहा कि परन्तु मुझे यहां अपना कोई व्यभिचार, दुराचार दिखाई नहीं देता। इधर राजा धृतराष्ट्र सहित आप सब लोग मुझसे द्वेष करने लगे हैं। अरिदमन केशव ! मैं अत्यन्त सोच-विचार कर दृष्टि डालता हूं तो मुझे अपना सुसूक्ष्म-सा भी अपराध दृष्टिगोचर नहीं होता। मधुसूदन ! पाण्डवों को जूए का खेल बड़ा प्रिय होने से ही वे उसमें प्रवृत्त हुए थे। फिर यदि शकुनि ने उनका राज्य जीत लिया तो इसमें मेरा क्या दुष्कर्म है !! ”

जनार्दन ! हम क्षत्रियों का यही प्रमुख धर्म है कि संग्राम में हमें बाण-शय्या पर सोने का अवसर प्राप्त हो। अत: माधव ! हम अपने शत्रुओं के सामने नत-मस्तक न होकर यदि युद्ध में वीर-शय्या को प्राप्त हों तो इससे हमें संताप नहीं होगा।
इस समय मुझे महाबाहु दुर्योधन के जीते-जी पाण्डवों को भूमि का उतना अंश भी नहीं दिया जा सकता जितना कि तीखी सूई की नोक से छिद सकता है।

इस पर श्रीकृष्ण ने स्वयं को सर्वथा निर्दोष बताने वाले दुर्योधन को जब उसके सारे अपराध गिना दिए तो दु:शासन ने कौरव-सभा में ही दुर्योधन को चेताते हुए कहा:

यदि आप अपनी इच्छा से पाण्डवों के साथ सन्धि नहीं करेंगे तो जान पड़ता है कि कौरव आपको बांध कर कुन्तीपुत्र को सौंप देंगे। नरश्रेष्ठ ! पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य और पिता जी ये कर्ण को, आपको और मुझे – तीनों को ही पाण्डवों के अधिकार में दे देंगे।

अपने भाई दु:शासन की बात सुनकर दुर्योधन अति कुपित हो नाग की भांति लम्बी सांसे खींचता हुआ और सबका अपमान करते हुए सभा से उठकर बाहर चला गया।

श्रीकृष्ण द्वारा कौरवों को सुझाव देना
दुर्योधन के इस अशिष्ट व्यवहार को जानकर कमल-नयन श्रीकृष्ण ने अपने मामा कंस की आप बीती और प्राचीन इतिहास का एक उदाहरण देते हुए भीष्म-द्रोण आदि प्रमुखों को यह सुझाव दिया:

कुरुकुल के सभी वृद्धजनों का यह बड़ा अन्याय है कि आप लोग इस मूर्ख दुर्योधन को राजा के पद पर बिठा कर अब इसका बलपूर्वक नियन्त्रण नहीं कर रहे हैं। ”वृद्ध भोजराज उग्रसेन का दुराचारी और अजितेन्द्रिय पुत्र कंस पिता के जीते-जी उनका सारा ऐश्वर्य छीन कर स्वयं राजा बन बैठा था। अत: बन्धु-बान्धवों के हित की इच्छा से मैंने महान् युद्ध में कंस को मार डाला और उसके पिता उग्रसेन को पुन: राजा बना दिया।

इसके सिवा एक और उदाहरण लीजिए। प्रजापति ब्रह्मा के सुझाव पर धर्मराज ने उद्दण्ड दैत्य-दानवों को बांध कर वरुण को सौंप दिया था। उसी प्रकार आप लोग भी दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और दु:शासन को बन्दी बना कर पाण्डवों को सौंप दें। समस्त कुल की भलाई के लिए एक पुरुष को, गांव के हित के लिए एक कुल को और जनपद के भले के लिए एक गांव को त्याग देना चाहिए। अत: आप लोग दुर्योधन को बन्दी बना कर पाण्डवों से सन्धि कर लें। क्षत्रियों ! ऐसा न हो कि आपके कारण समस्त क्षत्रियों का विनाश हो जाए।

धृतराष्ट्र का गान्धारी को बुलाना और फिर दुर्योधन को बुला कर समझाना
श्रीकृष्ण का कथन सुनकर राजा धृतराष्ट्र ने दीर्घ-दर्शिनी गान्धारी को राजसभा में बुलवाया और फिर दुर्योधन को समझाने के लिए कहा। तब गान्धारी ने धृतराष्ट्र से कहकर दुर्योधन को बुलवाया और उसके आ जाने पर उसे समझाते हुए यह कहा:

अरिदमन पुत्र ! यदि तुम अपने अमात्यों सहित राज्य भोगना चाहते हो तो पाण्डुपुत्रों को उनका यथो-चित आधा राज्य दे दो। भारत ! पृथ्वी का आधा राज्य अमात्य सहित तुम्हारे जीवन-निर्वाह के लिए पर्याप्त है। तुम सुहृदों के वचनानुसार चलकर यश प्राप्त करोगे। तात ! श्रीमान्, मनस्वी, बुद्धिमान् और जितेन्द्रिय पाण्डवों के साथ होने वाला विग्रह, कलह तुम्हें महान् सुख से वंचित कर देगा। भरतश्रेष्ठ ! तुम पाण्डवों को उनका राज्य-भाग देकर सुहृदों के बढ़ते हुए क्रोध को शान्त कर दो और अपने राज्य का यथोचित रीति से पालन करते रहो

किन्तु क्रोध के वशीभूत हुआ दुर्योधन अपनी माता गान्धारी के नीतियुक्त वचनों का अनादर करके सभा-भवन से उठकर चला गया।

श्रीकृष्ण का कौरव-सभा से प्रस्थान
सभाभवन से निकलकर दुर्योधन ने शकुनि, कर्ण और दु:शासन से मिलकर पापपूर्ण गुप्त-मन्त्रणा करके श्रीकृष्ण को बन्दी बना लेने का निश्चय किया जिसे सात्यकि ने ताड़ लिया और सभा में उपस्थित होकर बता दिया। तब राजा धृतराष्ट्र ने विदुर को भेज कर दुर्योधन को कौरव-सभा में बुलाया। जब दुर्योधन, कर्ण, दु:शासन और अन्य साथी राजाओं से घिरा हुआ सभा भवन में आ गया तो धृतराष्ट्र और विदुर ने उसकी घोर निन्दा की।

उधर अपने को दुर्योधन द्वारा बन्दी बनाने के षड्यन्त्र को जानकर योगेश्वर श्रीकृष्ण ने योगबल से अपने विराट् रूप का प्रदर्शन किया और फिर वे कौरव सभा में उपस्थित ऋषियों से आज्ञा लेकर सात्यकि और कृतवर्मा का हाथ पकड़े कौरव-सभा से बाहर चले गए। अपने रथ में बैठते समय महाबाहु श्रीकृष्ण ने विदा करने आए राजा धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह, विदुर, बाह्लिक और कृपाचार्य से कहा:

कौरव-संसद में जो घटा है, उसे आप लोगों ने प्रत्यक्ष देखा है कि किस प्रकार मन्दमति दुर्योधन सभा से रोषपूर्वक उठ गया था। महीपति धृतराष्ट्र भी अपने-आपको असमर्थ बता रहे हैं। अत: अब मैं आप सब से आज्ञा चाहता हूं, मैं युधिष्ठिर के पास जाऊंगा (महाभारत, उद्योगपर्व 131/37-38)।

इस प्रकार कात्र्तिक कृष्णा सप्तमी को शान्तिवार्ता एक ही बैठक में असफल हो गई।

श्रीकृष्ण का बुआ कुन्ती से मिलना
राजा धृतराष्ट्र से विदा होकर श्रीकृष्ण अपनी बुआ कुन्ती से मिलने चले गए और उसके चरणों में प्रणाम करके उसे संक्षेप में कौरव-सभा का वृत्तान्त सुनाया। जब क्षत्राणी कुन्ती ने यह समझ लिया कि अब युद्ध को छोड़कर और कोई विकल्प नहीं बचा है तो उसने अपने भतीजे श्रीकृष्ण के माध्यम से युधिष्ठिर को भिजवाए अपने सन्देश में यह कहा:
युधिष्ठिर ! तुम्हारे लिए भिक्षावृत्ति निषिध है और कृषि भी तुम्हारे योग्य नहीं है। तुम तो दूसरों को क्षति से त्राण कराने वाले क्षत्रिय हो। तुम्हें तो बाहुबल से ही जीविका चलानी चाहिए। महाबाहो ! तुम्हारा पैतृक राज्य-भाग लुप्त हो गया है। तुम साम, दान, भेद अथवा दण्ड-नीति से उसका पुन: उद्धार करो। इससे बढ़कर दु:ख की बात और भला क्या हो सकती है कि मैं तुम्हें जन्म देकर भी बन्धु-बान्धवों से हीन नारी की भांति जीविका के लिए दूसरों के दिए अन्न-पिण्ड की आशा लगाए ऊपर देखती रहती हूं। अत: तुम राजधर्म के अनुसार युद्ध करो। कायर बनकर अपने पिता-पितामह का नाम मत डुबाओ और अनुजों सहित पुण्य से वंचित होकर पापमयी गति को न प्राप्त होओ। ”कृष्ण ! मैं तो उस महान् धर्म को नमन करती हूं जो धर्म समस्त प्रजा को धारण करता है। तुम अर्जुन से तथा युद्ध के लिए सदा उद्यत रहने वाले भीमसेन से भी कहना कि क्षत्राणी जिसके लिए पुत्र को जन्म देती है, उसका उपयुक्त अवसर आ गया है। श्रेष्ठ मनुष्य किसी से वैर ठन जाने पर उत्साह-हीन नहीं होते।

इस प्रकार श्रीकृष्ण के माध्यम से क्षत्राणी कुन्ती ने क्षात्रधर्म के सर्वथा अनुरूप अपने शूरवीर पुत्रों को बड़ा ही उत्साह-वर्धक सन्देश भिजवाया।

चित्र परिचय :

1- शान्तिदूत श्रीकृष्ण का धृतराष्ट्र द्वारा स्वागत
2- कौरव-सभा में योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा
3- विराट् रूप का प्रदर्शन करना
ततो व्यपेततमसि सूर्ये विमलवद्गते।
मैत्रे मुहूर्ते सम्प्राप्ते मृद्वर्चिषि दिवाकरे।।
कौमुदे मासि रेवत्यां शरदन्ते हिमागमे।
स्फीतसस्यसुखे काले कल्प: सत्त्ववतां वर:।।
न चाहं लक्षये कंचिद् व्यभिचारमिहात्मन:।
अथ सर्वे भवन्तो मां विद्विषन्ति सराजका:।।
न चाहं कंचिदत्यर्थमपराधमरिंदम।
विचिन्तयन् प्रपश्यामि सुसुक्ष्ममपिकेशव।।
प्रियाभ्युपगते द्यूते पाण्डवा मधुसूदन।
जिता: शकुनिना राज्यं तत्र किं मम दुष्कृतम्।।
मुख्यश्चैवैष नो धर्म: क्षत्रियाणां जनार्दन।
यच्छयीमहि संग्रामे शरतल्पगता वयम्।।
ते वयं वीरशयनं प्राप्स्यामो यदि संयुगे।
अप्रणम्यैव शत्रूणां न नस्तप्स्यन्ति माधव।।
ध्रियमाणे महाबाहौ मयि सम्प्रति केशव।
यावद्धि तीक्ष्णया सूच्या विध्येदग्रेण केशव।
तावदप्यपरित्याज्यं भूमेर्न: पाण्डवान् प्रति।।
– महाभारत, उद्योगपर्व 127/5-7, 16-17, 25