राम महेश मिश्र, अध्यक्ष एवं संस्थापक, भाग्योदय फाउंडेशन
विवाह में अतिशय विलम्ब की समस्या केवल एक व्यक्ति या परिवार की समस्या नहीं है, एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या भी है। युवक एवं युवतियों द्वारा अनजाने में की गईं ये गलतियां प्रकारांतर से उनकी जन्मभूमि-भारत भूमि के भविष्य एवं उसकी सुरक्षा के लिए भी ढेर सारे संकट व अवरोध उत्पन्न करेंगी। सभी को ऐसी स्थितियों से बचना और लोगों को बचाना चाहिए। आवश्यकता इस बात की भी है कि धर्म, अध्यात्म, भक्ति, ईश्वर, शान्ति, आनन्द जैसे विषयों पर प्रवचन करने वाले हमारे धर्मगुरु अपने उद्बोधनों में यह विषय अनिवार्य रूप से शामिल करें और व्यासपीठों से देश की युवा शक्ति का सम्यक एवं सशक्त मार्गदर्शन करें। जरूरत इस बात की भी है कि उच्च माध्यमिक शिक्षा के बाद की पढ़ाई में यह विषय पाठ्यक्रम में शामिल करते हुए स्नातक कक्षाओं से ही युवक-युवतियों को सजग किया जाए, उन्हें आगाह किया जाए तथा उनका समुचित मार्गदर्शन किया जाए। हमारे देश की राज्य सरकारें तथा केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय इस दिशा में बिना देर किए समुचित कदम उठाएं। आवश्यकता पडऩे पर देश के अनुभवी व्यक्तियों एवं संस्थाओं का भी सहयोग सरकारों द्वारा लिया जा सकता है।
विगत लगभग एक दशक में, सामाजिक एवं पारिवारिक मुलाकातों के दौरान, अनेक बार एक चर्चा से दो-चार होना पड़ा है। वह है-पुत्री अथवा पुत्र द्वारा सही समय पर विवाह के लिए सहमति नहीं देना और निरन्तर उसे टालना। बच्चों का यह स्वभाव और यूं कहें कि उनका यह कदम न केवल उनके, बल्कि परिवार, समाज और देश के हित में कतई नहीं है।
अधिक उम्र में होने वाली शादियों की इस समस्या के पीछे केवल लड़के और लड़कियां ही नहीं, परिवार के अन्य सदस्यों अर्थात् उन बच्चों के अभिभावकों की विभिन्न प्रकार की मान्यताएं, पूर्वाग्रह और हठ भी इस समस्या की बढ़ोतरी में सहयोग करते हैं। कुलीनता और अकुलीनता, सम्पन्नता और कम सम्पन्नता, बड़ा पद-छोटा पद, रूप-रंग, शिक्षा-दीक्षा, सामाजिक स्तर जैसे कई पूर्वाग्रह ऐसे हैं जो वर या कन्या के अनेक सद्गुणों को पीछे धकेलकर बच्चों के अभिभावकों के मन मस्तिष्क पर हावी हो गए हैं।
अभी कुछ दिन पहले बयालीस वर्षीया एक अविवाहित बहन ने मुझसे कहा, ‘वह हमसे नीचे दर्जे के ब्राह्मण हैं। Óउनकी इस बात ने हमें बुरी तरह निराश किया और शायद आक्रोशित भी।
हमें याद है, आज से कुछ वर्ष पहले हम लखनऊ में एक मित्र के परिवार में गए। कुछ एकान्त पाकर उनकी 28 वर्षीया बहन ने हमसे कहा था- भैया! हमारा कहीं विवाह करा दें। उपरिलिखित ढेर सारी विडंबनाओं के कारण ही शायद उसका विवाह टलता रहा होगा। लगभग 52 साल की उम्र में पहुंच चुकी वह बहन अब तक अविवाहित है। माता, पिता और भाई की मृत्यु हो चुकी है। इतना ही नहीं, उसकी एक बड़ी बहन भी इसी तरह अविवाहित बैठी है।
ऐसी घटनाएं वास्तव में हृदय को बहुत द्रवित करती हैं तथा बहुत कुछ सोचने पर विवश करती हैं। इनमें दोष बच्चों का नहीं, बल्कि बड़ों का ज्यादा दिखता है। बचपन से ही कुछ चीजों के बारे में माता-पिता एवं अभिभावकों द्वारा बच्चों का मानस ऐसा बना दिया जाना कि वे यथार्थ से कोसों दूर रहकर सोचें, विचारें और तदनुसार कृत्य करें, यह माता-पिता के लिए तो क्या कहें! बच्चों के भविष्य के लिए बड़ा ही घातक हो जाता है।
लड़कियों और लड़कों द्वारा अपने करियर के प्रति अत्यधिक सजग होने तथा उसके लिए अपने दाम्पत्य जीवन को, गृहस्थ जीवन को भी दांव पर लगाने की घटनाएं हों, अथवा उपरोक्त कारणों से घटित घटनाएं, सभी में हानि प्राय: सम्बन्धित सदस्य अर्थात् युवक और युवती को ही होती है। जब विवाह का समय निकल जाता है और संरक्षक माता-पिता चले जाते हैं, तब अपने भाई-भाभी और भतीजों-भतीजियों आदि की बदली निगाहों से वह स्त्री बिल्कुल टूट जाती है, वह बेहद अकेली रह जाती है, उसकी आभा नष्ट हो जाती है, उसे खुद का चेहरा डरावना लगने लगता है। वह स्थिति किसी भी स्त्री के लिए बड़ी पीड़ादायक होती है। हमारी युवा बेटियों एवं बेटों को समय रहते चेत जाना चाहिए और ऐसी दुर्गति को स्वयं आमंत्रित करने से बचना चाहिए। ह्व





