श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर
वरिष्ठ स्तंभकार
पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के प्रतिवेदन के अनुसार, धार में अब्दुल्ला शाह की दरगाह के प्रवेश द्वार पर स्थित शिलालेख की पंक्ति क्रमांक 17 और 18 में महमूद खिलजी (1455) के संबंध में लिखा हुआ है, …यह बहादुर बंदा दीन के केंद्र से इस प्राचीन मठ में बड़ी तादाद में अपने लोगों के साथ दाखिल हुआ,(17) …मूर्तियों को नष्ट किया और हिंसक होकर इस मन्दिर को मस्जिद में तब्दील कर दिया।(18)
मध्य प्रदेश के धार नगर में स्थित माँ सरस्वती के मन्दिर के रूप में जाने जाने वाला भोजशाला परिसर संबंधी विवाद भी, रामजन्म भूमि और ज्ञानवापी की तरह प्राचीन मन्दिर को तोड़ कर उस पर बनाई गई मस्जिद के सम्बंध में रहा है। धार (पूर्व में धारा नगरी) करीब 1000 वर्ष पूर्व से परमार साम्राज्य की राजधानी हुआ करता था। परमारों ने नवीं-दसवीं शताब्दी से लेकर चौदवी शताब्दी के प्रारम्भ तक करीब तीन सौ वर्ष तक मालवा पर शासन किया। परमार साम्राज्य, राजा भोज के कार्यकाल में ज्ञान, वैभव एवं पराक्रम के शिखर पर था। भोज स्वयं प्रतापी योद्धा एवं प्रकाण्ड विद्वान थे। उन्होंने युद्ध लड़ कर सभी युद्धों में विजय प्राप्त कर साम्राज्य की सीमाओं और संपन्नता को बढ़ाया तो दूसरी ओर विद्वानों, कवियों, कलाकारों आदि को राज्याश्रय देकर संस्कृति को भी समृद्ध किया। धारा नगरी में ही उन्होंने एक विशाल परिसर में भोजशाला विकसित की जहां विभिन्न कलाएं, शास्त्र आदि की उच्च शिक्षा दी जाती थी। उसी परिसर में राजा भोज ने विद्या की देवी मां सरस्वती की अत्यन्त सुन्दर मूर्ति मां वाग्देवी की स्थापना कर एक भव्य सरस्वती मंदिर की भी स्थापना की। आज यह मूर्ति अंग्रेजों के संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही है।
कालान्तर में मुस्लिम आक्रांताओं ने हमला कर परमारों को पराजित किया और मालवा पर अपना आधिपत्य जमा लिया। अपनी तासीर के अनुरूप उन्होंने भोजशाला को ध्वस्त कर वाग्देवी की मूर्ति को खण्डित कर दिया। इतिहास के प्रवाह में आगे चल कर इस स्थान पर एक मस्जिद बनाकर वहां नमाज अदा करने का सिलसिला प्रारंभ किया गया।
स्वतंत्रता के पहले से ही हिन्दू समाज इस परिसर पर अपना अधिकार जताता रहा, परन्तु न्याय से वंचित ही रहा। दशकों से न्यायालय में इस सम्बन्ध में वाद चला आ रहा है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस शासन काल में परिसर में मंगलवार को माँ वाग्देवी की पूजा और शुक्रवार को जुम्मे की नमाज अदा करने का निर्णय हुआ, तभी से आज तक यह व्यवस्था चली आ रही है। परन्तु हिन्दू समाज इस परिसर पर नित्य प्रतिदिन पूजा एवं एकछत्र हिन्दू आधिपत्य की मांग लेकर न्यायलय में अपना पक्ष रखता रहा है। इसी सम्बन्ध में प्रसिद्ध अधिवक्ता श्री विष्णु जैन द्वारा भी मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय में याचिका प्रस्तुत की गई है। याचिकाकर्ताओं द्वारा अपने दावे के पक्ष में अनेक तर्क, ऐतिहासिक तथ्य और प्रमाण दिए गए जो निस्संदेह यह इंगित करते हैं कि मूलत: यह परिसर परमार राजाओं द्वारा निर्मित एक मन्दिर तथा विद्यार्जन केन्द्र था जिसे आगे चल कर मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा ध्वस्त कर उस पर मस्जिद का निर्माण किया गया। याचिकाकर्ताओं द्वारा यह प्रार्थना की गयी थी कि परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण हो जिससे यह प्रमाणित हो सके कि यह ढांचा मूलत: मन्दिर है। लम्बी सुनवाई के पश्चात् 11 मार्च, 2024 को प्रस्तुत तथ्यों, प्रमाणों और तर्कों के आधार पर माननीय न्यायलय द्वारा भारतीय पुरातत्व विभाग को परिसर के गहन सर्वेक्षण के आदेश दिए गए थे।
उपरोक्त आदेश का अनुपालन करते हुए पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा 22 मार्च, 2024 को गहन सर्वेक्षण प्रारंभ किया गया जो 98 दिन चला। सर्वेक्षण दल में पुरातत्व विशेषज्ञ, पुरालेखवेत्ता, रसायनज्ञ, संरक्षक, सर्वेक्षक, फोटोग्राफर, ड्राफ्ट्समैन आदि सभी प्रकार के विशेषज्ञ और अन्य कर्मी शामिल थे जिससे कि सुनियोजित सर्वेक्षण और प्राप्त जानकारियों का समुचित विश्लेषण हो सके। सर्वेक्षण के केन्द्र में निश्चित ही संरक्षित परिसर था परन्तु उसके आस पास 50 मीटर की परिधि में भी आधुनिकतम संसाधनों और तकनीक की मदद से सर्वेक्षण किया गया। हालांकि, पूर्व दिशा में 50 मीटर की परिधि में वर्तमान परिस्थितियों की वजह से उत्खनन नहीं हो पाया है। सर्वेक्षण के दौरान जी.पी.आर. और कार्बन डेटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का भी प्रयोग किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार यह सतर्कता भी बरती गई कि खुदाई और अन्य प्रक्रियाओं के दौरान भोजशाला का मूल स्वरूप अक्षुण्ण रहे। इस सर्वेक्षण का आधार उपलब्ध और खुदाई में प्राप्त शिलालेख, मूर्तियां, सिक्के, वास्तुशिल्प के अंश, मिट्टी के पात्र तथा टेराकोटा, पत्थर, धातु एवं कांच आदि से बनी वस्तुएं रही हैं। इस सर्वेक्षण के दौरान हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों के प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे। सर्वेक्षण प्रतिवेदन जुलाई, 2024 में ही न्यायालय को प्रस्तुत कर दिया गया था।
सर्वेक्षण के दौरान, संस्कृत, प्राकृत, स्थानीय बोलियों और नागरी अक्षरों में उपलब्ध अभिलेख / शिलालेख आदि का भी अध्ययन किया गया। कालगणना के अनुसार ये अभिलेख / शिलालेख 12 वीं से 16 वीं शताब्दी के मध्य के माने जा सकते हैं। इनमें पारिजात मंजरी नाटिका, अवनिकुर्मासतम तथा नागबंध जैसे महत्वपूर्ण लेख भी शामिल हैं, जिनका सघन अध्ययन किया गया। एक विशाल शिलालेख में पारिजात मंजरी नाटिका जिसे की मदन द्वारा रचा गया था, अंकित है। मदन, धार के परमार वंश के महाराजा अर्जुनवर्मन के गुरु थे। लेख की प्रस्तावना के अनुसार इस नाटिका का प्रथम मंचन मां सरस्वती (शारदा देवय: शादमणि) के मन्दिर में ही हुआ था।
एक और विशाल शिलालेख में 109 पदों की दो कविताएं प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण की गई हैं। एक कविता का शीर्षक अवनीकुर्मास्तन होकर इसके रचयिता का नाम स्वयं महाराजधिराज भोजदेव बताए गए हैं। द्वितीय कविता के अन्त में कविता संबंधी कोई जानकारी नहीं दी गई है परन्तु वह भी भोजदेव द्वारा रचित ही बताई गई है।
दो दूसरे स्तंभों पर उकेरे गए नागबंध लेख, व्याकरण संबंधी हो कर शैक्षणिक रुचि के हैं। ये लेख भोज द्वारा शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना संबंधी धारणा को पुष्ट करते हैं। इन लेखों के एक प्रारंभिक श्लोक में महाराज नरवर्मन का उल्लेख मिलता है जिनका शासन काल 1094 से 1133 ईस्वी रहा था। नरवर्मन, परमार राजवंश के प्रसिद्ध महाराज उदयादित्य के पुत्र थे।
अन्वेषण के दौरान शिलालेखों के 50 अंश प्राप्त हुए और पुरालेख शास्त्र के आधार पर ये सभी शिलालेख 13 वीं सदी के होना सिद्ध होता है। ये शिलालेख संस्कृत, प्राकृत या नागरी अक्षरों में लिखे गए थे। कईं शिलालेखों के अक्षरों को घिस कर मिटाने के प्रयास दृष्टिगत होते हैं और इन शिलाओं का निर्माण में उपयोग किया भी नजर आता है। कुछ पंक्तियां ही इस विनाश से बच सकी हैं। इन शिलालेखों के अतिरिक्त 34 छोटे उत्कीरण भी पाए गए हैं। इन लेखों में मदन, माधव, मोहिला, वैद्य, काम, मंडन, मदनका, कामदेव, सोम, सोमदेव, पद्म, सनापल, परमार, कोका, माला, रणपाल, महिला आदि नाम उल्लेखित हैं। परिसर की दीवारों पर कुछ चित्र भी बने हुए हैं। इनमें त्रिशूल, शंख, स्वस्तिक आदि स्पष्ट नजर आते हैं। इनके अतिरिक्त हथेलियों के अनेक छापे भी नजर आते हैं।
पश्चिमी गलियारे में बनी ‘मेहराब’ एक नवीन निर्मित है और इसीलिए खूबसूरती से तराशी हुई है। इसमें उपयोग हुई सामग्री भी सम्पूर्ण ढांचे से भिन्न है। मेहराब की दीवारों और नीचे के चबूतरे की निर्माण सामग्री भी भिन्न है। यहां स्थित पूर्ववर्ती निर्माण, स्तंभों, वातायनों आदि पर उकेरी गई आकृतियां वर्तमान ढांचा बनाते समय नष्ट कर दी गई थी। बड़ी संख्या में संस्कृत और प्राकृत में उत्कीर्ण बड़े शिलालेखों को भी घिस, तराश कर नष्ट कर दिया गया और उन उत्कृष्ट गुणवत्ता की शिलाओं का उपयोग फर्श और भित्तियों के निर्माण में किया गया। कईं शिलालेख आज भी वर्तमान ढांचे में लगे हुए हैं।
वर्तमान ढांचे में चारों ओर लंबे गलियारे हैं, जिनमें 106 स्तम्भ और 82 भित्तिस्तंभ (pilasters) मौजूद हैं। वर्तमान ढांचे में लगे ये स्तम्भ पूर्ववर्ती निर्माण के स्तंभों का ही पुनरुपयोग है। वांछित ऊंचाई प्राप्त करने के लिए दो प्राचीन स्तंभों को जोड़ कर उपयोग में लिया गया है। इन स्तंभों की बनावट और कला से स्पष्ट होता है कि ये मूल रूप से मन्दिर के लिए बने थे। वर्तमान ढांचे में उपयोग के लिए इन स्तंभों पर उत्कीर्ण देवताओं और मानवों की आकृतियों को घिस कर नष्ट या विकृत किया हुआ नजर आता है।
इसी प्रकार सर्वेक्षण के दौरान 94 मूर्तियां, मूर्तियों के अवशेष तथा वास्तु चिन्ह भी दृष्टिगत हुए हैं। ये आग्नेय पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर, चूनापत्थर, शीस्ट आदि से बनी हुई कलाकृतियां हैं। इनमें वातायनों, स्तंभों और पाटों पर उत्कीर्ण चतुर्भुज देवताओं की आकृतियां भी शामिल हैं, जिन्हें वर्तमान ढांचे में उपयोग में लाया गया है। इन आकृतियों में गणेश, ब्रह्मा, नरसिम्हा, भैरव, देवी और देवता, मानव एवं अन्य प्राणी आदि शामिल हैं। विभिन्न माध्यमों से बनी प्राणियों की आकृतियों में सिंह, हाथी, घोड़ा, श्वान, बन्दर, नाग, कछुआ, हंस, चिडिय़ा आदि सम्मिलित हैं। कीर्तिमुख, व्याल आदि प्राचीन किंवदंती आधारित आकृतियां भी विभिन्न आकारों में दृष्टिगत होती हैं।
चूंकि मस्जिदों में मानवीय और प्राणियों की छवि प्रतिबंधित है इसलिए इन्हें घिस कर नष्ट किया गया है या विकृत कर दिया गया है। प्रवेश और गलियारों के स्तंभों पर ये प्रयास देखे जा सकते हैं। कईं स्तंभों पर देवताओं की छोटी आकृतियां लगभग अक्षुण्ण रह गई हैं तथा मनुष्य और प्राणियों के संयुक्त चेहरों से युक्त कीर्तिमुख भी नष्ट नहीं हुए हैं। इन स्तंभों पर अंकित कलाकृतियों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ये पूर्व में मन्दिर का हिस्सा थे जिनका पुनरुपयोग कर मस्जिद के गलियारे बना लिए गए थे।
परिसर में प्राप्त हुए वास्तु चिन्हों, मूर्तियों के अवशेषों, शिलालेखों, स्तंभों पर अंकित आकृतियों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि इस परिसर में शैक्षणिक तथा साहित्यिक गतिविधियां संचालित होती थीं। सर्वेक्षण के दौरान किए गए वैज्ञानिक अन्वेषण तथा प्राप्त हुए पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर पूर्ववर्ती निर्माण का काल परमार युग माना जा सकता है और यह कि वर्तमान ढांचा पूर्व में स्थित मन्दिर के हिस्सों से बना हुआ है।
स्पष्ट है कि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा अत्यन्त निरपेक्ष और पूर्वाग्रहरहित अन्वेषण किया गया है तथा वैज्ञानिक पद्धतियों से उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन कर एक सुस्पष्ट विवरण माननीय उच्च न्यायालय को प्रदान किया गया है।
सर्वेक्षण प्रतिवेदन उपलब्ध होने के बाद न्यायलय द्वारा दोनों पक्षों को अपनी आपत्तियां दर्ज करने हेतु आवश्यक समय दिया गया तथा स्वयं न्यायमूर्तियों द्वारा भी परिसर में जाकर उपलब्ध साक्ष्यों को देखा गया। तत्पश्चात न्यायलय में इस मामले पर नियमित सुनवाई चल रही है। धार नगर के रहिवासी व भोजशाला आंदोलन के प्रमुख श्री गोपाल शर्मा द्वारा यह विश्वास प्रकट किया गया है कि इस प्रतिवेदन की तथ्यात्मकता तथा वैज्ञानिक आधारों के परिपेक्ष में निश्चित ही उच्च न्यायालय का निर्णय भोजशाला के मन्दिर होने को प्रतिपादित करने वाला होगा तथा एक लम्बे समय से संघर्षरत सनातनी समाज को उनका आराध्य स्थल निर्बाध पूजा—अर्चना हेतु प्राप्त होगा।





