गीता में जीवन जीने के सूत्र

भूषणलाल पाराशर
संरक्षक, श्री सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा, दिल्ली


हमारी गीता, भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की विश्वव्यापी पहचान है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में अपने सगे—संबंधियों को देखकर अर्जुन को विशाद हो गया था। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस धर्म युद्ध में पुन: जाग्रत करने वाला जो वचन, तर्क, संवाद तथा काउंसलिंग किया था वह संवाद ही गीता ज्ञान है। गीता जीवन का गीत है। गीता जीवन जीने की कला सिखाती है। 700 श्लोक तथा 18 अध्याय पर आधारित यह गीता ज्ञान वेद की वाणी है जो भगवान् श्रीकृष्ण के श्रीमुख से सीधी निकली है। गीता ज्ञान सार्वकालिक तथा सार्वभौमिक है। गीता का अनुवाद विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में लगभग 59 भाषाओं में हो चुका है। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपनी विदेश यात्रओं में वहाँ के अध्यक्षों को गीता माता का ग्रंथ भेंट स्वरूप प्रस्तुत किया है। जन्म-मृत्यु तथा जीवन जीने की आचार संहित प्रदान करने वाला यह ग्रंथ हमारी सभी समस्याओं, उलझनों एवं चिंताओं का समाधान उपस्थित करता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायमूर्ति श्री शम्भुनाथ श्रीवास्तव ने सितम्बर 2007 में एक याचिका पर सुनावाई करने के बाद निर्णय देते हुए कहा था कि श्रीमद्भगवद् गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाए। इस महान राष्ट्रीय ग्रंथ की जयंती के पावन अवसर पर समूचा सनातन धर्म जगत् भारत सरकार से माँग करता है कि श्रीमद्भगवद् गीता को तुरन्त राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाए। आज के तेजी से बदलते सामाजिक परिप्रेक्ष्य में जहाँ व्यक्ति का जीवन उलझनों, समस्याओं, चिंताओं, हिंसा, आतंक एवं व्यसन से ग्रस्त है उसे सुधारने के लिए निम्नलिखित गीता सूत्र दिये जा रहे हैं जिन्हें संत, महात्मा एवं विद्वानों ने गीता के चिंतन के बाद ज्ञानरूपी मक्खन के रूप में दिया है।

  • संसार में रहते हुए सुखों को भोगों, पर संसार को अपने भीतर न रहने दो जैसे नाव पानी में रहे तो ठीक, पर यदि पानी नाव में आ गया तो नाव डूब जायेगी।
  • गीता पढ़ो-आगे बढ़ो।
  •  परिवर्तन को स्वीकार करो, बालक जन्मा है, तो बड़ा होगा, जवान होगा, वृद्ध होगा तथा शरीर के मरने पर उसकी आत्मा नये शरीर को धारण करेगी, अत: मृत्यु का दूसरा नाम आत्मा द्वारा शरीर परिवर्तन है।
  • तुम शरीर नहीं हो, तुम आत्मा हो, शरीर मरता है, आत्मा कभी नहीं मरती, आत्मा अमर तथा अविनाशी है।
  • डरो नहीं, तुम्हें कोई नहीं मार सकता, भय मुक्त रहो।
  • संसार में रहो पर आसक्त न बनो, मोह त्यागो। अत: त्यागी बनो।
  • चंचल मन पर नियंत्रण, सत्संग, स्वाध्याय, शान्त, एकाग्र एवं आत्मचिंतन से होता है। कहते हैं मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। यही मन हमारे दु:खों का कारण है, मन को जीतना-जग को जीतना है।
  • कर्म करो फल की इच्छा मत करो, परमात्मा सब देख रहा है, फल वही देगा।
  • मृत्यु जीवन की अनिवार्य घटना है, यह अटल नियम है। मृत्यु के पश्चात् फिर जन्म है।
  • अर्जुन की तरह जिज्ञासु बनो।
  • काम से भागो नहीं, डट कर काम करो, कायरता को भगाओ-जीवन जीओ।
  • सार्थक जीवन यात्र धर्म के मार्ग पर चलने से प्राप्त होती है, इसी को मोक्ष कहते हैं।
  • गीता ज्ञान मरते हुए मनुष्य को सुनाने मात्र का नहीं है। अपितु बाल्यकाल से ही देने वाला ज्ञान है, अत: यह जीवन जीने की कला सिखाता है, नित्य प्रति इसका पठन करो।
  • आज हम सभी जीवों के मन में उलझनों, चिंताओं एवं समस्याओं का द्वंद्व प्रतिपल कुरुक्षेत्र के युद्ध की तरह घटित हो रहा है। अत: गीता ज्ञान आज अधिक प्रासंगिक है। मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, कहाँ जाऊँगा, इस विचार का सर्वदा चिंतन करना चाहिए।
  • चिंता नहीं, चिंतन करना चाहिए।
  • गीता हमें भय मुक्त, मोह मुक्त तथा शोक मुक्त बनाती है। च