श्रीराम की अयोध्या

प्रमोद कुमार दुबे
लेखक श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े रहे हैं


बाबरी की शहादत का विलाप आज भी हो रहा है और आज भी अयोध्या के वास्तविक स्वरूप को स्थापित करने की चुनौती है।

जिसे बाबरी ढाँचा कहा जाने लगा, क्या वह सचमुच बाबर का बनवाया हुआ मस्जिद था? उनदिनों एक ऐतिहासिक तथ्य उभरकर भी बहुत चर्चित नहीं हुआ, वह यह था कि ‘सवाई राजा जयसिंह द्वितीय (1699-1943ई.) ने अयोध्या के रामकोट के संदर्भित स्थान व आसपास की भूमि को औरंगजेब के उत्तराधिकारी फर्रुखशियर से रामकोट क्षेत्र कुल 983 वर्ग इलाही गज भूमि वंशागत हक के साथ इनाम में हवेली, कटरा और पुरा (अर्थात जयसिंहनपुरा) के निमार्ण हेतु प्राप्त कर लिया, जिसके 1 जून 1717 ई. एक प्रपत्र फारसी एवं देवनागरी में लिखा चकनामा जयपुर संग्रालय में हैÓ (राम जन्मभूमि की प्राचीनता, ले. दीनबन्धु पाण्डेय, पृ.- 73 )। इस ऐतिहासिक विवरण से स्पष्ट होता है कि श्रीराम जन्मभूमि पर किसी मुगलवंशी का मालिकाना हक नहीं है। राजा जयसिंह द्वितीय के वंशजों ने उस भूमि को न किसी को दिया है और न बेचा है।

सवाई राजा जयसिंह ने श्रीराम जन्मभूमि पर तीन शिखरों वाले मंदिर का निर्माण कराया। इस तथ्य से संबन्धित दस्तावेज उक्त पुस्तक में प्रकाशित है और सिटी पैलेस संग्रहालय, जयपुर में संग्रहित है। उक्त पुस्तक (पृ.-79) बताती है कि कुल्लू के राजा और इन्दौर की रानी अहल्याबाई (1784) ने अयोध्या के त्रेता के ठाकुर मंदिर का उद्धार किया।
18वीं-19वीं शताब्दी के बीच एक समय ऐसा आया, जब श्रीराम जन्मभूमि पर राजा जयसिंह द्वारा निर्मित मंदिर की तीनों शिखरें तीन गुंबद में तब्दील कर दी गयीं। प्रश्न उठता है कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की तीन शिखरें राम, जानकी और लक्ष्मण तीन मूर्तियों के लिए बनी थीं, मस्जिद के तीन गुबंद किन तीन देवताओं के लिए बने? क्या 6 दिसंबर 1992 को ध्वस्त किया गया जर्जर ढाँचा ही बाबरी मस्जिद था, जिसे 1528 में श्रीराम जन्मभूमि के प्राचीन मंदिर को तोड़कर बाबर के सिपाहसलार मीर बाँकी ने बनवाया था अथवा सवाई राजा जयसिंह द्वारा निर्मित तीन शिखरों वाला मंदिर था, जिन तीनों शिखर को तीन गुंबदों में तब्दील कर दिया गया था?

यह सच्चाई इतिहास से ज्ञात होती है कि श्रीराम जन्मभूमि को हिन्दुओं ने अपने हाथ से कभी जाने ही नहीं दिया। सतत युद्ध होता रह। अँग्रेज इतिहासकार कनिंघम ने लखनऊ गजेटियर में लिखा है कि एक लाख चौहत्तर हजार हिन्दुओं की लाशें गिर जाने के बाद ही मीर बाँकी तोप के गोलों से गिराने में सफल हो सका। इसके बाद दो वर्षों तक बाबर जीवित रहा। इन दो वर्षों में श्रीराम जन्मभूमि के लिए चार बार युद्ध हुए।

हुमायूँ के काल में दस युद्ध हुए। रानी जयकुँवरी की महिला सेना और स्वामी महेश्वरानंद की साधु सेना ने छापामार युद्ध किया था। अकबर के काल में स्वामी बलरामाचार्य के नेतृत्व में बीस बार हिन्दुओं ने आक्रमण किया। अकबर की नींद हराम हो गयी। टोडरमल और वीरबल के परामर्श पर उसने एक चबूतरे पर छोटा मंदिर बनाने की स्वीकृति दी। इससे हिन्दुओं के आक्रमण थम गए।

औरंगजेब का समय आते ही हिन्दू अस्मिता पर बर्बर हमलों का सिलसिला शुरु हो गया। औरंगजेब (1658 से 1707) के काल में श्रीराम जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए तीस युद्ध हुए और अवध के नावाब असद अली (1773-1836) से पाँच युद्ध। परेशान होकर नवाब ने श्रीराम जन्मभूमि पर हिन्दुओं को पूजा और मुसलमानों को नमाज की इजाजत दे दी। नवाब वाजिद अली (1847-1836) के जमाने में श्रीराम जन्मभूमि हासिल करने के लिए बाबा उद्धवदास और भाटी नरेश ने चार बार आक्रमण किये। आजीज होकर नवाब ने विवाद समाप्ती के लिए तीन सदस्यीय समिति बनायी, जिसमें एक हिन्दू, दूसरा मुसलमान और तीसरा ईस्ट इण्डिया कंपनी का प्रतिनिधि रखा। समिति ने बताया कि मीर बाँकी ने पुराने भवन को तोड़कर इसे बनाया है। इसमें पुराने भवन का मलवा शेष है। यह फरिस्तों के अवतरण का स्थल है।

1856 में अँग्रेज ने नवाब वाजिद अली के अवध राज्य पर कब्जा कर लिया, श्रीराम जन्मभूमि पर बने बाबरी ढाँचे को रेलिंग से घेर दिया। इस घेरे के बाहर पूजा होती रही, दंगे-फसाद भी होते रहे। अँग्रेजी दासता के सौ वर्षों की यातना भारी पडऩे लगी, 1857 में प्रथम स्वाधीन संग्राम के दौर में जब हिन्दू-मुसलमान एकजूट होने लगे, हिन्दुओं ने बहादूर शाह के नेतृत्व को समर्थन दिया।

मुसलमानों के नेता अमीर अली ने बिरादने वतन की आवाज लगायी, बहादूर शाह जफर ने श्रीराम जन्मभूमि हिन्दुओं को सौंपने का फरमान जारी किया और तब अँग्रेज ने 18 मार्च 1858 को हजारों हिन्दू- मुसलमान जनता की भीड़ के समाने बाबा रामचरण दास और अमीर अली को कुबेरटीला की इमली के पेड़ पर लटकाकर फाँसी दे दी।

पाँच सौ वर्ष बीत गये, शताब्दियों के संघर्ष के बाद हिन्दुओं ने श्रीराम जन्मभूमि पर अपने राम लल्ला का भव्य मंदिर बनवाया। आज कोई बाबरी की शहादत का विलाप करता है तो उसे बार-बार हमें अपनी रामास्था का इतिहास सुनाते रहना होगा।

आदिकवि वाल्मीकि ने बताया है- सरयू के तट पर बसी हुई अयोध्या महापुरी बारह योजन लम्बी और तीन योजन चौड़ी थी। जैसे स्वर्ग में इन्द्र की अमरावती थी, महाराजा दशरथ ने धर्म और न्याय के बल से अयोध्यापुरी को राष्ट्र संवर्धन की कामना से बसायी थी। त्रेता युग की अयोध्या निरंतर प्रत्येक युग में पुनस्र्थापित होती रही।

महाकवि कालिदास कृत रघुवंशम् के साहित्यिक साक्ष्य से प्रमाणित होता है कि आज से दो हजार बयासी वर्ष पहले उजैन के सम्राट शकारि विक्रमादित्य ने अयोध्या के प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था। पुरातत्त्वज्ञ मानते हैं कि अयोध्या में कम से कम चतुर्थ शताब्दी से श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर होने का साक्ष्य मिलता है। यद्यपि प्रथम शताब्दी का प्राचीनतम प्रस्तर अभिलेख अयोध्या में ही मिला है, जिससे ज्ञात होता है कि तब अयोध्या में वैदिक यज्ञ हो रहे थे। ब्राह्मी लिपि में लिखी संस्कृत भाषा के इस अभिलेख बताता है कि कोसल राज्य पुष्यमित्र के अधीन था, पुष्यमित्र ने दो अश्वमेध यज्ञ किया था- कोसलाधिपेन द्विरश्वमेधयाजिन:। इसका आशय स्पष्ट है कि अयोध्या यज्ञादि धार्मिक अनुष्ठानों की प्रधान नगरी थी।

श्रीराम जन्मभूमि की खुदाई से प्राप्त शिलालेख और पुरातत्त्वों से ज्ञात होता है कि 1528 ई. में मीर बाँकी ने जिस मंदिर को तोड़ था, उस श्रीविष्णु हरि मंदिर का निर्माण 12 वीं शताब्दी में गहड़वाल राजा गोविन्दचन्द्र (1114 -1154 ई.) के शासन काल में हुआ था। इसके निर्माण के सत्तर वर्ष पहले सलार मसूद ने अयोध्या पर आक्रमण किया था। सलार मसूद को बहराइच के रण में महाराजा सुहेलदेव ने 14 जून 1033 ई. को मौत के घाट उतारा था।

श्रीविष्णु हरि मंदिर के शिलालेख का आरंभ ओं नम: शिवाय से हुआ है। सर्वप्रथम महादेव को श्रेष्ठतम पराक्रम युक्त, सर्वोच्च, शतधा शरीर धारण करनेवाले कहकर नमस्कार किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि भारत में प्राचीन काल से शिव शासन प्रचलित था। उक्त शिलालेख में एक पंक्ति है- साकेत मण्डल का आधिपत्य राजाओं के गुरु गोविन्द के प्रसाद से प्राप्त हुआ है अर्थात श्रीविष्णु हरि मंदिर का पुनस्र्थापक राजा श्रीकृष्ण को राजाओं का गुरु मानता था और उसे साकेत मण्डल का शासन श्रीकृष्ण की कृपा से प्राप्त हुआ है। इससे ज्ञात होता है कि राजा शैव और वैष्णव मतों में समभाव रखता था।

शिलालेख के श्लोक- 24 में कहा गया है- नीति पूर्वक अर्जित वैभव द्वारा ऊँचे भवनोंवाले देव मंदिरों से युक्त अयोध्या को सजाया गया है, समस्त साकेत मण्डल को सहस्रों कूप, वापी, तड़ाग और धर्मशाला आदि से सुसज्जित करवाया गया है। श्लोक-26 बताता है कि राजा गोविन्द चन्द्र ने काशी में भी निर्माण कार्य किया था।

अर्थव वेद (10.2. 31.) के अनुसार अयोध्या अष्टचक्र नौ द्वारों से युक्त दिव्य नगरी है, इसमें तेजयुक्त स्वर्ण कोश हैं, यह स्वर्गिक ज्योति से घिरी हुई है। उस स्वर्ण कोश में एक पूज्य देवता रहता है। चन्द्र-सूर्य इसकी आँखें हैं, अग्नि इसका मुख है (अथव.र्10.8 .43.)। यह ब्रह्म ज्ञानियों को दिखने वाली अयोध्या है, जिसका प्रतिछवि पृथ्वी पर मनुष्य के लिए उपलब्ध हुई है।

अयोध्या का पुनर्निर्माण विशेष प्रावधान बनाकर उसकी गरिमा के तदनुकूल करना होगा, अन्यथा अगणित रामभक्तों की आस्था तब- तब चोट खाती रहेगी, जब- जब अयोध्या में गरिमा के प्रतिकूल कोई अनैतिक कार्य होगा, अत: ध्यान रखना होगा कि जनमन में अयोध्या के प्रति जो पूज्य भाव है, उसकी सदा रक्षा हो।