एक सत् ओंकार

इंदिरा मोहन
सुप्रसिद्ध लेखिका, कवयित्री और अध्यक्ष, दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन


सर्वव्यापक चेतना एक ही है। यही प्राणी—मात्र में अखंड रूप से व्याप्त है। इस चेतना का प्रतीक है—ॐ। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रकृति के अंतराल में एक ध्वनि प्रतिक्षण गुंजायमान होती रहती है, जिसके कारण परमाणुओं में पारस्परिक संघात द्वारा गति उत्पन्न होती है और सृष्टि का सारा क्रिया—कलाप चलता है— यह ध्वनि ओम ही है। ॐपरमात्मा का सबसे प्रिय, संक्षिप्त और सबसे निकट का नाम है। ॐ का चिंतन, ॐ का दर्शन, ॐ का उच्चारण भारत की पुण्य भू‌मि में सदियों से होता रहा है। यही वेदों का मूलमंत्र है, संतों का आराध्य है। सौर मंत्रों के अन्दर अनस्यूत है। इसी को सामवेदी ‘उद्गीथ, यजुर्वेदी ‘प्रणव’ और अथर्ववेदी ‘अक्षर’ कहते हैं। बौद्ध, जैन, सिख, आर्य समाज तथा निर्गुण संतों में भी ओंकार प्रयोग की परंपरा है। कई बार शंका उठती है कि भगवान का कोई भी नाम लें क्या अन्तर पड़ता है, आखिर ओम् में ऐसी क्या विशेषता है? तत्—तत् देवताओं का साक्षात्कार विभिन्न नामों के द्वारा हो सकता है, लेकिन आत्मा और ब्रह्म की एकता को समझना ओंकार द्वारा ही सम्भव है। ओंकार के अनुसंधान द्वारा यह निश्चय हो जाता है कि जो परमात्मा है वही ओम् है और जो ओम् है वही परमात्मा है।

आत्मा नित्य है। इसलिए आत्मा का ज्ञान कराने वाला मंत्र भी नित्य है। यह ज्ञान प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण से नहीं जाना जाता। इसको बताने वाला वेद ही है। यह भक्ति भी है, ज्ञान भी, नाम भी है और नामी भी, साधन भी है और साध्य भी। वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति अपनी देह में परमात्मा का ज्ञान—प्रकाश लिए हुए है— वह स्वयं चलता—फिरता मंदिर है, जहाँ ज्ञान, शांति और सुख का अनंत प्रकाश झिलमिला रहा है। ॐ उस मंदिर में प्रवेश का सबसे सरल स्वाभाविक उपाय है। संसार में जितने भी ज्ञान हैं, उन्हें जानने के बाद कुछ करना, कुछ पाना—छोडऩा अथवा होना पड़ता है किन्तु ओंकार द्वारा आत्मविषयक ज्ञान में अपने आप को जैसा है वैसा जानना है। इसमें भेद की गंध नहीं, अपना—पराया नहीं और न जन्म—मरण। ऐसा विशुद्ध ज्ञान गुरुशरण में उपनिषदों द्वारा ही प्राप्त होता है। जैसे खेलती तरंगों के नीचे सागर शांत है, वैसे ही हम भी ॐ की ध्वनि के साथ शांत—सहज एकता में प्रवेश कर जाते हैं, जहाँ वह अद्वितीय हम सबसे पहले पहुँचा हुआ है।
गीता सहित सभी उपनिषदों ने ओंकार के संधान से ‘परमानन्द’ की प्राप्ति और शोक की आत्यंतिक निवृत्ति पर प्रकाश डाला है, विशेषकर माण्डूक्य उपनिषद में ओंकार का विशद वर्णन मिलता है। कठोपनिषद में नचिकेता और यमराज के बीच की सारगर्भित चर्चा है। अपने तीसरे व्रत के रूप मे नचिकेता यमराज से प्रश्न करता है — ”जो धर्म से पृथक, अधर्म से पृथक तथा इस कार्य—कारण रूप प्रपंच से भी पृथक है और जो मूल एवं भविष्यत् से भी अन्य है—ऐसे जिसे आप देखते हैं, वही मुझसे कहिए” (कठ. 1/2/14)

यमराज उसके प्रश्न की प्रशंसा करते हुए उत्तर देते हैं— ”जिस पद का प्रतिपादन सारे वेद करते हैं, जिस पद—प्राप्ति का साधन सारी तपस्यायें हैं और जिस स्थान की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है, उस पद को मैं तुमसे संक्षेप में कहता हूँ— ॐ यही वह पद है।”
एतदालम्बनं श्रेष्ठ मेतदालम्बनं परम,
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते। कठ 1/2/16

यही श्रेष्ठ आलंबन है, यहीं पर आलम्बन है। उसी आलंबन को जानकर पुरुष ब्रह्मलोक में महिमान्वित होते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अपनी व्यापकता एवं विस्तार की चर्चा करते हुए कहते हैं— ”मैं जल में रस हूँ, चंद्र—सूर्य में प्रभा हूँ, सब वेदों में प्रणव (ओ3म्) हूँ, आकाश में शब्द और नरों में पौरुष हूँ।” ओंकार को यहाँ प्रणव कहा है— नव माने नया, प्र अर्थात् प्रकर्ष से — उत्तमता से। ॐ हर मंत्र के साथ नए रूप में दीखता है। सारे मंत्रों को धारण करने वाला भगवद् रूप है। मनुष्य मात्र के कल्याण का परम साधन है।

माण्डूक्य उपनिषद में ओंकार का गहन एवं विस्तृत वर्णन है। इस उपनिषद में उपासना अथवा यज्ञ का समावेश नहीं है। यह तो भीतरी यात्रा के लिए एक नक्शे (मैप) के समान है, जिसके द्वारा सांसारिकता से सनातन तत्व की ओर मुड़ा जा सकता है। ओंकार के द्वारा ईश्वर की खोज करते—करते हमें अपने आप की सहज उपलब्धि हो सकती है जो नित्य है, एकरस है और विकार रहित है। जैसे घोड़े के पदचिह्नों से घोड़ा मिल जाता है वैसे ही मैं के भीतर सच्चिदानंद की छाप मिल जाती है। इस उपनिषद के अनुसार मैं रूपी जीव की चार अवस्थायें हैं— जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। यहाँ दृष्टा एक है अवस्थायें बदल रही हैं। यह अनुभव मनुष्यमात्र का है। इस संसार का प्रत्येक नाम, रूप, गुणधारी पदार्थ परिवर्तनशील है। अत: वह सत् नहीं हो सकता। यह तीनों अवस्थायें भी सत् नहीं हैं। जागने वाला स्वप्न और निद्रा में उपस्थित नहीं। स्वप्न देखने वाला और गहरी नींद में सोने वाला जाग्रत अवस्था में उपस्थित नहीं होते हैं। स्वप्न के जल से हम जाग्रत की प्यास नहीं बुझा सकते। गहदी नींद यानि सुषुप्ति में प्रयास रहित आनन्द का भोग है साथ ही अविद्या के कारण आनंद ज्ञात नहीं होता। इन तीनों अवस्थाओं के आश्रय को, अधिष्ठान को ‘तुरीय’ कहते हैं, जो परमात्मा का वास्तविक स्वरूप है। वह इन्द्रियों का विषय नहीं वह सर्वव्यापक है, उसमें लेन—देन का व्यापार नहीं। आत्मा रूप से पहले ही वह हम सबके पास है। उसे जानने के लिए किसी अन्य प्रमाण अथवा साधन की जरूरत नहीं। श्रुति कहती है— ”एकात्मप्रत्ययसारम्” — ज्ञान ही प्रमाण है। यही सारे ज्ञानों का सार है। विकार एवं विकल्प से रहित यह स्थिति ही ‘शिव’ है। यह शिव तत्त्व अद्वैत है, जहाँ शिव है वहाँ दो नहीं, जहाँ दो हैं वहाँ शिव नहीं। यही ‘शिवम् अद्वैतम्’ है (मांडूक्य उपनिषद)—शान्त— आनन्दमय, एकमात्र आधार।

यह आत्मचैतन्य तीनों अवस्थाओं का साथी है, संपूर्ण संसार के अनुभवों सहित शरीर—मन—बुद्धि के बदलावों का साक्षी है, वही शाश्वत, अपरिवर्तनशील परम सत्ता है जिसे दर्शन—शास्त्र में सत्य तथा धर्म में, ईश्वर कहा जाता है। यही आत्मचैतन्य वास्तविक ‘मैं’ है जो सभी बदलावों में एक सा रहता है। उसी सत् का नाम ‘ओऽम’ है। ओऽम एक अखंड शब्द है, जिसमें अ—उ—म कल्पित है। ओऽम के अर्थ सहित उच्चारण से दृष्टि, चैतन्य से अभिन्न ब्रह्म के आकार में ढल जाती है, ओऽम की शान्ति में लीन होकर सर्वव्यापक तत्व का अनुभव साधक कर लेता है।

यहाँ सब कुछ ईश्वर है, ईश्वर का है, ईश्वर के लिए है। यहाँ केवल उद्देश्य का परिवर्तन है— न कर्म छोडऩा है और न कर्तव्य से पलायन करना है। ईश्वर में, अखंड चेतन में और चेतन के अंशों में किंचित भेद नहीं है। ओंकार भेद की संभावना को हटा कर एकता, अनन्यता का बोध जगा देता है। जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग अलग—अलग क्रिया करने पर भी सब मिलकर एक ही शरीर है, उसी प्रकार एक अखंड चिन्मात्र ही अनंत प्रकारों में प्रतीति करा रहा है। सब भाषाओं के पार सोच—विचार के पार, पूर्ण शान्त मन के द्वारा परिपूर्ण मौन में ओऽम की ध्वनि सुनी जा सकती है। वह हमारे भीतर ही विद्यमान है। हमें सागर तल को नापने और आकाश छूने की जरूरत नहीं, उस तक पहुँचने के लिए स्वर्गारोहण की जरूरत है, न पाताल खोजने की। केवल ओंकार द्वारा आत्मा को साधने की जरूरत है। सारे शास्त्र वेद में हैं और सारे वेद गायत्री में हैं, समूची गायत्री ओंकार में है, तब अब ओंकार से बढ़ कर कौन होगा (कठ. उप.)। ओंकार के महत्व को देखते हुए छांदोग्योपनिषद्, प्रश्नोपनिषद, मुण्डकोपनिषद, अथर्व शिखोपनिषद आदि अधिकतर उपनिषदों ने मन को अमन होने के लिए ओंकार को ही एक मात्र साधन माना है।

ब्रह्मबिन्दु उपनिषद के अनुसार ओऽम् अक्षर ध्वनि रूप भी है। उच्चारण करते समय आकार की उठती हुई ध्वनि अ, उ के साथ बढ़ते—बढ़‌ते ‘म्’ के साथ विलीन होने लगती है और तब कोई वृत्ति नहीं रहती और मन भी नहीं रहता, किन्तु बिल्कुल अभाव नहीं होता, क्योंकि शांतिमयी चेतना सदा रहती है। ओंकार का उच्चारण करते हुए साधक भावात्मक शांतिमयी अनंत चेतना तक पहुँच जाता है। यही ओंकार की कृपा है।

हमारे गहन अन्तकरण में एक मूलभूत तत्व है और वह है हमारी अमर आत्मा जो स्वयं पवित्र है। अपने मन को आग्रह रहित विशुद्ध एवं निर्मल बना कर इस दिव्य निधि को प्राप्त करना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है। जब तक हम ‘मैं और मेरेÓ तक सीमित है—हमारी अनुभूति भी सीमित है। सारा पसारा मन का है। अपने अहंकार को विवेक द्वारा शान्त कर वस्तुओं की अपेक्षा अपने आप पर स्वामित्व पाना होगा, तभी अपने ‘मैं’ की सही जाँच—पड़ताल संभव है। हम तैरने की कला उसकी चर्चा से नहीं जान सकते, उसे तो पानी में उतर कर, तैरने के अभ्यास से ही सीखा जा सकता है। हमें तो अपने भीतर के संशयों, प्रश्नों की अशांति से मुक्त होना है। विवेक द्वारा आत्मा का साक्षात्कार कर लेने पर जगत के पदार्थ आकर्षित नहीं कर पाते। अज्ञान से होने वाला भ्रम नष्ट हो जाता है। इस दिव्य अनुभव के लिए ओंकार के जाप एवं अर्थ के मनन द्वारा बार—बार परमार्थ चिंतन एवं ब्रह्म विचार करना है। विश्वास और श्रद्धा सहित इस स्थिति में ॐ का प्रकाश पथ दिखलाता है, सहायता करता है और परमात्‌मा से एक—रस कर देता है, तब जीवन की धारा स्वयं ऊध्र्वमुखी हो जाती है। अभ्यास, सत्संग, गुरु—कृपा से जब प्रकाश का चकाचौंध कर देने वाला अनुभव होता है तब इस परम चैतन्य के साथ एकाकार होने की व्याकुलता बढ़ती जाती है।

इतिहास साक्षी है आत्मबल की ऊर्जा ने ही भारतीय सभ्यता को बचाए रखा है। हमें अपनी विरासत को फिर से प्राप्त करना होगा। प्रश्न उठता है, यह विरासत क्या है? हृदय की शुद्धता, आध्यात्मिक दृष्टिकोण की स्पष्टता, सादगी, संसार से सामंजस्य और प्राणी जगत में ब्रह्म की एकता। एकता—अखंडता की यह अनुभूति ही समूची मानवता को विश्व—बंधुत्व की भावना से एक हृदय कर सकती है। हम ‘स्वयं पूर्णता’ को जान कर ओंकार की साधना से पूर्ण होकर इस धरती को सुन्दर और अधिक सुन्दर बना सकते हैं। यह आमूल परिवर्तन अपनी आत्मा के सत्य को जानकर संभव है।