डॉ. प्रिया सूफी
व्याख्याता, साहित्य अन्वेषक
वेदों को सर्वज्ञानमय कहा जाता है। अर्थात् वेदों में सभी प्रकार का ज्ञान निहित है। वेद ही विश्व -संस्कृति के आधार स्तंभ हैं। आयुर्वेद की दृष्टि से अथर्ववेद अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसके एक मंत्र को देखिए—
वाङ्म आसन्नसो: प्राणश्चक्षुरक्षणों: श्रोतम् कर्णयो:।
अपलिता: केशा अशोणा दन्ता बहु बाह्वोर्बलम्।।
ऊर्वोरोजो जँघयोर्जव: पादयो: प्रतिष्ठा।
अरिष्टानि मे सर्वास्स्त्मास्निभृष्ट:।।
इस मंत्र में कहा गया है कि ”मेरे मुख में पूर्ण आयु तक वाचा बनी रहे, नासिकाओं में प्राण, नेत्रों में चक्षु (दर्शन शक्ति) तथा कानों में श्रोत्र (श्रवण शक्ति) बनी रहे। मेरे केश श्वेत न हों, दांतों में रक्त न पड़े। मेरे बाहुओं में प्रभूत बल रहे, ऊरुओं (जांघों) में ओज (दृढ़ता), जंघाओं (टांगों) में वेग तथा पादों (पैरों) में स्थिरता रहे। मेरे सभी अंग-प्रत्यंग अविकल तथा आत्मा उत्साही रहे।
वेदों में शरीर के अंगों की निरोगता और आत्मा की अजेयता की प्रार्थना की गई है। इसके लिए आचार-विचार की शुद्धि होना आवश्यक माना गया है। हालांकि अन्य वेदों में भी चिकित्सा और विविध औषधियों को स्थान दिया गया है, परंतु अथर्ववेद में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है।
चरक सूत्र के अनुसार-प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं आतुरस्य विकारप्रशमनं च। अर्थात् आयुर्वेद का उद्देश्य है-स्वस्थ पुरुष के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी व्यक्ति के रोग को दूर करना। सुश्रुत ने भी यही भाव दिया है कि रोगी को रोग से मुक्त करना और स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा करना, ये ही दो आयुर्वेद के मुख्य प्रयोजन हैं।
अब प्रश्न यह है कि जो वेद रोगी को रोग—मुक्त करने तथा स्वस्थ के स्वास्थ्य की रक्षा करने का कार्यभार ले रहा है, वह न केवल चिकित्सा को जानता है, अपितु रोग के सभी प्रकारों, कारणों और लक्षणों को भी जानता, समझता है। अन्यथा वह किसी को भी रोग—मुक्त नहीं कर पाएगा।
कहीं भी स्पष्ट उल्लेख न मिलने के बावजूद आयुर्वेद के आठ अंग स्वीकार किए जाते हैं।
कमोवेश कुछेक नाम परिवर्तन के साथ सभी वैदिक वैद्य इन आठ अंगों को उल्लिखित करते हैं। जिनके नाम क्रमश: — कायचिकित्सा, बालचिकित्सा, ग्रहचिकित्सा, उध्र्वांग चिकित्सा, शल्यचिकित्सा, विषचिकित्सा, रसायनतंत्र, वाजीकरणतंत्र।
अथर्ववेद में चार प्रकार की औषधियों और चिकित्सा विधियों का उल्लेख मिलता है-
आथर्वणी चिकित्सा, आंगिरसी चिकित्सा, दैवी चिकित्सा, मनुष्यजा या मानवी चिकित्सा।
जिस प्रकार चिकित्सा पद्धतियां और विधियां अनेक प्रकार की हैं तो जाहिर सी बात है कि रोग भी अनेक प्रकार के होंगे। जिनकी चिकित्सा में इतनी विविधता है। जैसे ज्वरादि रोग, वातज रोग, पित्तज रोग, कफज़ रोग, चर्म रोग, घाव, चोट आदि, सिर, आँख, नाक, कान के रोग, हृदय, नाभि, उदर आदि के रोग, हाथ,पैर के रोग, मानस रोग, बाल रोग, विविध शूल एवं प्रमेह आदि, स्त्री रोग, गुप्त रोग। इन सब का विस्तार से वर्णन आयुर्वेद में मिलता है।
वेदों में निरोगी रहने के कुछ साधन बताए गए हैं :
1. अथर्ववेद के एक सूक्त में पांच आरोग्यकारक तत्वों का उल्लेख है। ये हैं— पर्जन्य (वर्षा का जल) यह शुद्ध और रोगनाशक है।
2. मित्र (प्राणशक्ति) प्राणवायु शरीर को शक्ति प्रदान करती है।
3. वरुण (जल) जल शरीर के दूषित तत्त्वों को बाहर निकालता है।
4. चन्द्र और सूर्य : चंद्रमा इंद्रियों और मन को शांति एवं शक्ति देता है।
5. सूर्य शरीर का पोषक और रक्षक है।
अथर्ववेद का कथन है कि शुद्ध अन्न शक्तिवर्धक और रोगनाशक होता है। अन्न के विषय में आवश्यक बताया गया है कि निरोगता के लिए निर्विष अन्न ही खाया जाना चाहिए।
अथर्ववेद में निरोगता के लिए भोजन के कुछ नियम बताए गए हैं :
(क) अन्न को ठीक प्रकार से चबा कर खाना चाहिए, क्योंकि ऐसा भोजन बलवर्धक और पोषक होता है।
(ख) पेय वस्तुओं को ठीक ढंग से और उचित मात्रा में पिया जाए। उचित मात्रा में पिया गया जल आदि रोगनाशक और शरीर शोधक होता है।
(ग) भोजन जितनी शांति से किया जाता है और मुख की लार के साथ निगला जाता है, वह उतना ही पौष्टिक और सुपाच्य होता है। शीघ्रता से खाया हुआ भोजन अपाच्य और अजीर्ण (कब्ज) करता है।
कोस्रुक् कौन निरोग रहता है? इसके उत्तर में तीन बातें कही जाती हैं— हितभुक्—हितकारी भोजन करना। मितभुक्— अल्प या संतुलित मात्रा में भोजन करना। ऋतभुक्—सात्विक एवं ईमानदारी से कमाया गया अन्न ही खाना।
अथर्ववेद में मूत्र वेग को रोकने से मूत्रकृच्छर का वर्णन किया गया है और मूत्र को तुरंत निकालना आवश्यक बताया गया है। चरक ने ‘न वेगान् धारणीय’ अध्याय में इसका विस्तृत वर्णन किया है। वात, पित्त और कफ के विकार से सारे रोग होते हैं और इनको सम रखने से निरोगता होती है। अथर्ववेद में अभ्रज (कफ), वातज (वात) और शुष्म (पित्त) के विकार होने से सिरदर्द और कास (खांसी) आदि रोगों का उल्लेख किया गया है। इनकी चिकित्सा औषधि – सेवन एवं पर्वतों का आश्रय लेना बताया गया है। अष्टांग हृदय का कथन है कि रोगों के दो आश्रय स्थान होते हैं-शरीर और मन। कुछ सूत्र हैं: मानसिक रोग रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होते हैं। यजुर्वेद में निरोगता के लिए शुभ विचारों को उपादेय बताया गया है। प्रसन्नचित्त रहने से मनुष्य निरोग, दीर्घायु और तेजस्वी होता है। पापों, दुष्कर्मों और दुव्र्यसनों के परित्याग से मनुष्य निरोग और दीर्घायु होता है।
अथर्ववेद का कथन है कि शरीर में नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियां शरीर की रक्षक हैं। इनको पुष्ट रखने से निरोग और दीर्घायु होता है। उदय होता हुआ सूर्य सोने वालों का तेज हर लेता है। इसलिए निरोगता और तेजस्विता के लिए सूर्योदय से पूर्व उठना आवश्यक है। निश्चित ही हमारे मंत्रों की निधि वेद मानव समुदाय को निरापद, निरोग रखने की प्रेरणा के रहस्य छुपाए हुए हैं।
प्रकृति मनुष्य के लिए वरदान है। ज्ञातव्य है कि अगर धरती पर रोग मनुष्य को घेरते हैं तो प्रकृति उनका इलाज भी उपलब्ध कराती है। प्रकृति के सभी तत्व किसी न किसी रूप में मनुष्य के लिए चिकित्सक का कार्य भी करते हैं।
उपनिषद् में सूर्य को मानव जगत का प्राण कहा गया है। उदय होता सूर्य मृत्यु के सभी कारणों को नष्ट करता है। यह रोगों को दूर करने के साथ साथ बुद्धि को शुद्ध तथा ज्ञान की वृद्धि प्रदान करता है। ऋग्वेद के अनुसार उदय होता सूर्य हृदय के सभी रोगों को, पीलिया और रक्ताल्पता को दूर करता है। अथर्ववेद में कहा गया है कि उदय होते सूर्य की किरणों के साथ लाल रंग की गाय के दूध का सेवन हृदय रोग में उपयोगी होता है। प्रात: काल सूर्याभिमुख बैठ कर संध्या करने का यही रहस्य है कि अवरक्त किरणों के प्रभाव से व्यक्ति सदा निरोगी रहता है।
मानव जीवन का आधार प्राण हैं। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद का कथन है कि मनुष्य का भूत, वर्तमान तथा भविष्य सब प्राण शक्ति पर ही निर्भर है। संसार में जहां भी जीवनी शक्ति है, वहां प्राण तत्व का चमत्कार है। प्रेम आग्नेय तत्व है, यही ज्योति, तेज और ऊष्मा देता है। प्राणायाम चिकित्सा इसी प्राणों की शक्ति का विस्तार है। मनुस्मृति में इसे धौंकनी से उपमा देकर समझाया गया है कि जिस प्रकार धौंकनी की सहायता से अग्नि को प्रदीप्त करके सुवर्ण आदि धातुओं को शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार प्राणायाम के द्वारा शरीर के सारे दोषों को नष्ट किया जाता है।वेदों के अनेक मंत्रों में वायु को अमृत निधि कहा गया है और इसे दीर्घायु कसधन माना गया है। शुद्ध वायु का सेवन, घर में शुद्ध वायु का निर्बाध प्रवेश, शुद्ध वायु में लंबे श्वास लेना, प्रदूषण -रहित स्थान में निवास, पर्वतों पर रहना या समुद्र तट पर निवास करते हुए अतिशुद्ध वायु का सेवन दीर्घायुष्य का साधन है।
प्राकृतिक चिकित्सा में अग्नि चिकित्सा को भी प्रमुख स्थान प्राप्त है। अग्नि चिकित्सा के अनेक रूप हैं – अग्नि का साक्षात् सेवन, शरीर के अंगों को अग्नि से सेंकना, अग्नि में रोगनाशक दवाओं को डाल कर रोगों और कृमियों को नष्ट करना, वस्त्र, ईंट, पत्थर आदि को गर्म करके रोग आदि से प्रभावित अंग को सेंकना, निवास स्थान आदि को गर्म करना आदि। वेद का कथन है कि अग्नि शीत की औषधि है। विष चिकित्सा में भी अग्नि का प्रयोग किया जाता है। विष उतारने के लिए काटे हुए स्थान को गर्म लोहे से दागा जाता है। कुछ औषधियों को जैसे ग़ुग्गल आदि को अग्नि में जला कर उनकी सुगंध से इलाज किया जाता है। आधुनिक युग में मानसिक विक्षेप आदि के लिए विद्युत आघात आदि का प्रयोग भी चिकित्सा के लिए किया जाता है।
जल चिकित्सा में रुद्र और वरुण देव को अग्रगण्य बताया जाता है। ऋग्वेद के अनुसार जल में सभी औषधियों के गुण विद्यमान हैं। जल में सोम आदि रसों को मिला कर सेवन करने से मनुष्य दीर्घायु होता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों का जल विशेष लाभकारी है। बहता हुआ जल शुद्ध और गुणकारी होता है। यह मनुष्य को शक्ति और गति देता है। वर्षा का जल भी उत्कृष्ट और अमृत तुल्य होता है। जल में शक्ति एवं आरोग्यता का कारक माना जाता है। गीली घास, गीले पत्थर, ओस में भीगी रेत या जमीन, ताजी पड़ी हुई बर्फ इन सब से भी चिकित्सा की जाती है।
इसके अतिरिक्त भी वेदों में चिकित्सा के लिए मृदा, यज्ञ, मानस चिकित्सा, मंत्र चिकित्सा, स्पर्श चिकित्सा, मणि चिकित्सा इत्यादि बहुत सी चिकित्सा पद्धतियां वर्णित हैं।





