डॉ. योगेश कुमार पाण्डेय
एसोसिएट प्रोफेसर, काय चिकित्सा विभाग, सीबीपी आयुर्वेद चरक संस्थान, नजफगढ़, नई दिल्ली
ऊर्जा का दृश्य भाग ही तो रंग कहलाते हैं। सूर्य की किरणों के सात दृश्य रंग क्रमश: लाल, पाीला, नीला, बैंगनी, आसमानी, नारंगी एवं हरा हैं। वस्तुत: मुख्य रंग तो तीन ही हैं- लाल, पीला एवं नीला। अन्य रंग तो इनके सम्मिश्रण से ही बनते हैं। अदृश्य भाग अल्ट्रा वेव तथा इन्फ्रारेड नाम से जाना जाता है। अल्ट्रा वेव एवं इन्फ्रारेड किरणों का चिकित्सकीय उपयोग तो आधुनिक चिकित्सा के विशेषज्ञों द्वारा भी बहुलता से किया जाता है। तनिक ध्यान दीजिए आपके अलग-अलग शारीरिक अवयवों के रंग भी तो अलग-अलग हैं जैसे कि त्वचा का रंग गौर अथवा श्याम है तो केशों का काला, आंखों की पुतलियां काली हैं, तो जिह्वा रक्त वर्ण; अस्थियां श्वेत हैं, तो सिरायें नीली। क्रोमोथेरैपी के विशेषज्ञों की मान्यता है कि शरीर के विभिन्न अंग-प्रत्यंग की क्रियात्मक निरन्तरता एवं अक्षुण्णता विभिन्न रंगों की साम्यता पर निर्भर करती है। अंग विशेष को प्रभावित करने वाले रंग का वैषम्य ही रोगों का कारण बनता है। अत: रोग विशेष की चिकित्सा हेतु इसी साम्यता की प्रतिस्थापना को लक्ष्य करके विभिन्न प्राकृतिक अथवा कृत्रिम रंगों का उपयोग करना चाहिए।
योगशास्त्र के अनुसार शरीर का सम्पूर्ण क्रियात्मक नियंत्रण शरीरस्थ सात चक्रों के द्वारा होता है।
गुह्यमूल पर स्थित प्रथम चक्र को मूलाधार चक्र के नाम से जाना जाता है। इस चक्र को मानसिक एवं शारारिक स्थैर्य का आधार माना जाता है। इस चक्र के बिगडऩे से चिन्ता, भय, दु:स्वप्न, आदि मानसिक रोग होते हैं। इस चक्र का वर्ण रक्त (लाल) होता है। अत: योगसाधना में इस चक्र को साधने एवं इससे सम्बन्धित रोगों को दूर करने के लिए घर को लाल रंग से सजाएं तथा लाल रंग के वस्त्र आभूषण का प्रयोग करें। भोजन में भी रक्त वर्ण के फल, सब्जियां जैसे टमाटर, चुकन्दर, सेब तथा अनार का प्रयोग करें।
नाभि से नीचे तथा गुह्यांग के थोड़ा ऊपर स्थित द्वितीय चक्र को स्वाधिष्ठान चक्र कहा जाता है। मनुष्य की सृजन शक्ति इस पर ही अवलम्बित है। इसकी विगुणता से अवसाद, चित्तोद्वेग एवं नपुंसकता आदि रोग होते हैं। इस चक्र का वर्ण नारंगी है। इस चक्र को शक्तिशाली बनाने के लिए घर एवं ऑफिस की दीवारों को नारंगी रंग से पेंट करें। नारंगी रंग के ही वस्त्र एवं आभूषण धारण करें। खान—पान में नारंगी रंग के फल तथा सब्जियों यथा संतरा, गाजर, आम, पपीता आदि का अधिकाधिक प्रयोग करें।
नाभि पर स्थित तृतीय चक्र को मणिपूर चक्र के नाम से जाना जाता है। व्यक्ति की आत्मशक्ति,परावर्तन की शक्ति, शौर्य एवं पाचन शक्ति इस चक्र में ही सन्निविष्ट है। इस चक्र के वैगुण्य से आत्मविश्वास का अभाव तथा अग्निमांद्य एवं मेदोरोग हो सकते हैं। इस चक्र का वर्ण पीत होता है। अत: इसको शक्ति सम्पन्न बनाने के लिए घर, आफिस की दीवारों को पीले रंग से सजाएं। पीले रंग के कपड़े और गहने पहनें और खाने—पीने में भी पीले रंग की चीजें केले, अदरख, हल्दी आदि का अधिक से अधिक प्रयोग करें।
हृदयस्थ चतुर्थ चक्र अनाहत चक्र कहा जाता है। हृदय एवं फेफड़ों के स्वास्थ्य एवं मजबूत प्रतिरक्षा तंत्र के लिए इसका स्वस्थ रहना अति आवश्यक है। इसकी कमजोरी से अनावश्यक भय, ईष्र्या, घृणा आदि मानसिक विकार तथा हृदय एवं फेफड़ों के रोग उत्पन्न होते हैं। हरे रंग का प्रयोग इस चक्र को शक्ति प्रदान करता है। अत: इस चक्र को शक्ति सम्पन्न बनाने के लिए हरे रंग के वस्त्र एवं आभूषण धारण करना चाहिए। हरे रंग के परदों से घर को सजाएं एवं हरे रंग से ही दीवारों को पेंट करायें। खाने में हरी पत्तेदार सब्जियों का प्रयोग करें।
पंचम चक्र विशुद्ध चक्र कहा जाता है। वाक् शक्ति, श्रवण शक्ति एवं विचार सम्प्रेषण की क्षमता इस चक्र के अधीन है। साथ ही मुॅह, कान, नाक एवं गले का स्वास्थ्य इसके अधीन है। इसकी कमजोरी से वाक् एवं श्रवण शक्ति एवं विचार सम्प्रेषण शक्ति नष्ट हो जाती है। इसको स्वस्थ रखने के लिए हल्के नीले रंग के आहार-विहार-वस्त्र एवं आभूषण का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए।
आज्ञा चक्र भ्रूमध्य पर स्थित है। यह छठा चक्र कल्पनाशीलता, पूर्वानुमान की शक्ति एवं सहज निर्णय शक्ति के लिए उत्तरदायी हैै। इसके वैषम्य से निद्रा वैषम्य उत्पन्न होता है एवं व्यक्ति प्रज्ञापराध के लिए प्रवृत्त होता है। इस चक्र को गहरे नीले रंग के प्रयोग से सुदृढ़ किया जा सकता है। अत: इसको शक्ति सम्पन्न करने के लिए इसी रंग के वस्त्र आभूषण प्रयोग में लायें।
मूर्धा स्थित सप्तम सहस्रसार चक्र समस्त आध्यात्मिक ऊर्जाओं एवं अनुभवों का केन्द्र माना जाता है। इसकी विगुणता से व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास अवरूद्ध हो जाता है एवं उसे शिर:शूल आदि रोग हो जाते हैं। इस चक्र का प्रतिनिधि वर्ण बैंगनी है। इस वर्ण के प्रयोग से इसे शक्तिसम्पन्न किया जा सकता है, परन्तु नियमपूर्वक स्वाध्याय, योगाभ्यास, प्रार्थना के बिना ऐसा कर पाना असम्भव है।
आयुर्वेदिक मान्यता के अनुसार रोग दो प्रकार के होते है- सौम्य एवं आग्नेय। सौम्य रोग कफ एवं वात की बहुलता से तथा आग्नेय रोग पित्त एवं वात की बहुलता से होते हैं। सौम्य रोगों के लक्षण स्वरूप अग्नि मन्द हो जाती है, मल साम हो जाता है, मुॅह-नाक-छाती में बलगम इकठ्ठा हो जाता है, मूत्र की मात्रा बढ़ जाती है, पुरीष अधिक निकलता है, नसें संकुचित हो जाती हैं। कफ की उत्पत्ति जल एवं पृथ्वी महाभूत से होती है तथा वात की वायु एवं आकाश महाभूत से। अतएव ऐसे रोगों को नीले रंग से उत्पन्न माना जाता है। सामान्यत: कफ की अधिकता का मुख्य कारण अग्निमांद्य होता है जो कि पीले रंग के अभाव से पैदा होता है।
आग्नेय रोग पित्त अथवा वात-पित्त की अधिकता से उत्पन्न होते हैं। इन रोगों में शरीर की उष्णता अत्यधिक बढ़ जाती है, जिसकी परिणति ताप-दाह-कोथ एवं वैवण्र्य के रूप मे होती है। पित्त का सम्बन्ध लाल-गुलाबी-नांरंगी तथा पीले रंगो से माना जाता है।
नीला रंग
नीला रंग स्वभावत: सौम्य अर्थात् ठंडा, शान्तिप्रद, आकर्षक और चुम्बकीय शक्ति लिए हुए है।
नीले रंग की अधिकता से कफ दोष का प्रकोप एवं अग्निमांद्य होता है। नीले रंग की कमी से आंखों में जलन, शरीर पर चकत्ते, मल-मूत्र में पीलापन, चित्तोद्वेग, क्रोध की अधिकता; अतिसार एवं पाण्डु रोग होते हैं। ये सभी रोग कफ की कमी अथवा पित्त की अधिकता से होते हैं।
यदि सम्पूर्ण शरीर अथवा उसके किसी एक भाग में गर्मी बढ़ गयी हो तो, चक्कर आते हों, प्यास अधिक लगती हो तो नीले रंग के वस्त्र अथवा आवास का प्रयोग करना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में गर्मी के प्रकोप से बचने के लिए भी नीला रंग अत्यधिक उपयोगी है। पित्त प्रकृति के व्यक्तियों के लिए नीला रंग विशेष रूप से सुखदायी है। यकृत- प्लीहा के रोगों, पाण्डु, कामला, मोतीझरा तथा चेचक, खलित्य-पालित्य आदि की चिकित्सा तथा आंख-कान-गले के रोगों में भी नीला रंग अत्यधिक उपयोगी है। माइग्रेन के रोगियों में भी यह रंग आशातीत रूप से लाभकारी है।
लाल रंग
लाल रंग स्वभावत: उष्ण एवं उत्तेजक होता है। अत: इसका प्रयोग शरीर के सुस्त पड़े अवयवों को उत्तेजित करने एवं सौम्य व्याधियों के प्रतिकार के लिए किया जाता है। वात व्याधियों यथा लकवा, गठिया, मासिक धर्म की अनियमिता, नपुंसकता आदि की चिकित्सा के लिए यह रंग अत्यधिक उपयोगी है। कफज व्याधियों यथा निद्राधिक्य, गौरव, अग्निमांद्य, संग्रहणी तथा मेदोरोग में भी इस वर्ण के अन्न-वस्त्र-औषधियां एवं वातावरण अत्यधिक लाभदायक हैं। इसके अत्यधिक प्रयोग से उच्च रक्तचाप होने की सम्भावना रहती है।
लाल रंग की कमी से निद्राधिक्य, आलस्य, बिबन्ध तथा मल-मूत्र-जिह्वा-त्व्चा का श्वेत हो जाना आदि लक्षण होते हैैं। इन्हें कफ की अधिकता तथा पित्त की कमी से उत्पन्न माना जाता है।
पीला रंग
पीला रंग पाचन संस्थान के लिए अमृततुल्य है। इसके उपयोग से आमाशय तथा आंतों के रोग दूर होते हैं। यह रंग मेधा, धृति एवं स्मृतिवर्धक माना जाता है। अत: मानसिक रोगों से ग्रस्त रोगियों में भी इस रंग का उपयोग किया जाता है। पीले रंग की कमी से मन्दाग्नि, रूक्षता, अरूचि, निद्राल्पता, शूल, तोद आदि वात की अधिकता से होने वाले लक्षण होते हैं।
हरा रंग
हरा रंग प्रकृति में जीवन्तता, सन्तुलन एवं सामंजस्य का प्रतीक माना जाता है। इसे हृदय एवं मांसपेशियों के स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना जाता है।
मिश्रित रंग
नारंगी रंग आंतों को बल देने वाला है। जिन रोगों की चिकित्सा के लिए लाल रंग उपयोगी है वही रोग अगर 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों में हो जाय तो नारंगी रंग का प्रयोग किया जाता है। वृक्क एवं फेफड़ों को इस रंग से ताकत मिलती है। थायराइड के रोगियों के लिए तथा मनोअवसाद के रोगियों में इस रंग के प्रयोग से लाभ मिलता है। इसके अधिक सेवन से अतिसार होने का भय रहता है।
बैंगनी रंग को शीतल तथा भेदक माना जाता है। अत: उष्णता तथा ज्ञान तन्तुओं की उत्तेजना के अधिक बढ़ जाने की स्थिति में यह उपयोगी है। प्रलाप, मधुमेह, छर्दि तथा बहुमूत्रमा की चिकित्सा में इसका प्रयोग किया जाता है।
गुलाबी रंग अल्प मात्रा में उत्तेजक, पाचक तथा स्वभाव से किचित् शीत है। गर्भवती स्त्रियों में जहां लाल रंग द्वारा चिकित्सा इंगित हो वहां गुलाबी रंग का प्रयोग किया जाता है।
सफेद एवं काले रंग प्राय: चिकित्सा की दृष्टि से उपयोगी नहीं होते।
चिकित्सार्थ रंगों का प्रयोग करने के लिए उस रंग के औषध-आहार-वस्त्र-बिछौने-परदे-फल-फूल अथवा पारदर्शी जल पात्र उपयोग में लाये जा सकते है अथवा उस रंग की रोशनी से प्रभावित अंग पर सेक किया जा सकता है।
वात दोष की शान्ति के लिए पीला एवं सुनहरा रंग अच्छा माना जाता है। लाल रंग वात दोषों की प्रारम्भिक चिकित्सा के लिए अच्छा है, परन्तु इसका दीर्धकालिक एवं मात्रा से अधिक प्रयोग अन्तत: पुन: वात प्रकोप कर सकता है। पित्त दोष की शान्ति के लिए नीला, हरा एवं गुलाबी रंग उपयोग में लेने चाहिए तथा कफ प्रकोप से उत्पन्न होने वाले रोगों के लिए लाल एवं नारंगी रंग उत्तम है।
अत: इस होली में अपने अन्तर्मन एवं बाह्य जगत को प्राकृतिक रंगों से रंजित कर सम्पूर्ण आधिदैविक, आध्यात्मिक एवं आधिभौतिक उन्नति अर्जित करें।






