दुर्गुणों की होली जले, फैले प्रेम-प्रकाश

— धरोहर प्रतिनिधि


सामुदायिकता पर आधारित होली का त्योहार समाजवाद का उदाहरण है। यह ऐसा त्योहार है जो अपने रंगों से, व्यंग्यों से, अबीरों से, हँसी और खुशी से, मौज और मस्ती से, ऊँचे कुल और वर्ण का होने, धनवान और बलवान होने का भेद-भाव मिटा देता है। बुढ़ापे में सरक रहे लोगों को जवान बना देता है। इस मायने में होली एक सामाजिक पर्व है जो समाज को एक धरातल पर खड़े होकर हँसने-हँसाने और इसमें विविध रंग भरने का अवसर देता है, वह स्वत: स्फूर्त है, वह परंपरा से प्रेरित है, वह प्रकृति प्रदत्त है। वह समभाव हँसते-खेलते आता है, सुर और संगीत से आता है। पर कसक इस बात की है कि साल में एक बार आता है।

अटूट विश्वास और समर्पण की प्रतिमूर्ति, प्रहलाद को होलिका द्वारा अग्नि में भस्मीभूत करने का अंतिम षड्यंत्र भी विफल हो गया। यह प्रथा प्रतीक है उस भक्ति की जो ब्रह्म ज्ञान द्वारा प्राप्त होती है जिसकी प्रदीप-ज्ञान ज्वाला में साधक होलिका सदृश सभी कुसंस्कारों, वासनाओं आदि को स्वाहा कर अपने अंतस् में होलिका-दहन मनाता है। इसी तरह शिव द्वारा कामदेव को भस्म करने वाली कथा आज के समाज को एक उपयोगी सन्देश देती है। कुटिल राक्षसी ढुंढ़ा की मृत्यु और कृष्ण को मारने के लिए कंस द्वारा भेजी गई पूतना का वध भी होली में इस परंपरा का निर्वाह होता है।
दुर्गुणों की होली जले, फैले प्रेम-प्रकाश।
हृदय गुणों से हो भरा, ज्यों अनंत आकाश।।
इस पर्व ने सदियों से अपनी महायात्रा जारी कर, अपने आंचल में विभिन्न परंपराओं और मान्यताओं को समेटे हमारे मन के मलाल को मिटाने का भरसक प्रयत्न किया है। अपने द्वेष, प्रवृतियों एवं विकारों पर नियंत्रण रखने का संदेश दिया है।
होली के रंगों का स्मरण आते ही श्रीराधा-कृष्ण की नित्यलीला स्थली ब्रजभूमि की ओर तुरंत ध्यान जाता है। ब्रज के कण-कण में रंगीलापन आ जाता है। ब्रज की अधिष्ठात्री भगवती राधा के मायके बरसाने में लठमार होली होती है। भगवान भोलेनाथ की नगरी काशी फाल्गुन की इस रंग भरी एकादशी के दिन श्री काशी विश्वनाथ का अति विशिष्ट शृंगार किया जाता है। राजस्थान में खाटू के श्याम बाबा का विशेष उत्सव मनाया जाता है। गुरु अर्जुन देव जी ने होली के विषय में कहा था, ”फाल्गुन में होली में प्रभु! मैं तुम्हारे प्रेमरूपी रंग से रंग जाऊँ।” मन का कचरा जला कर मीराबाई की भाँति होली खेलें-फाल्गुन के दिन चार रे, होली खेल मना रे। पंजाब में होला मोहल्ला ऐतिहासिक आनन्दपुरसाहिब में होता है। 1922 में विदेशी कपड़ों की होली खेली गई।

प्रकृति भी होली के रस में सराबोर हो जाती है। कहीं लाल फूल, कहीं पीले तो कहीं नीले, हरभरी मखमली घास पर लहलहाते गेंदे, गुलाब मानो यह कह रहे हों-अब वक्त आ गया है। खिलखिलाने का, हँसने का, आनन्द का। नदियाँ नर्तन करती हैं, झीलें गीत गाती हैं, वनस्पतियाँ झूम उठती हैं। प्रकृति भी रंग बरसाती है। प्रकृति के सभी रूप रसवंत हो जाते हैं। हम नये अन्न की आहुति से पहले देवों को तृप्त करते हैं।

आज समाज के हर क्षेत्र में ऐसी हिंसा भड़क रही है जिससे लोगों में असुरक्षा के भाव पैदा हो गये हैं। इसे होलिका दहन के साथ जला कर भस्म कर दें और हम स्वस्थ, सुखी, समृद्ध समुन्नति की ओर अग्रसर हों।