डॉ. सरिता सोनी, शिक्षाविद्
भारतवर्ष का अपना एक गौरवशाली इतिहास है, जिस पर आज के प्रगतिशील भारत की उपलब्धियों की नींव रखी गई है। हम भारतीयों की समझ, ज्ञान, बुद्धि का स्तर हमेशा से विश्व प्रसिद्ध रहा है। इस ज्ञान, समझ और बुद्धि के पीछे गहन शोधकार्य, अथक चिंतन और तपस्या की भूमिका है। वर्तमान समय में विश्व में हर स्तर पर चाहे वह तकनीकी क्रांति हो या विचारधारा के परिवर्तन की क्रांति, वह हम सभी को चकित कर रही है, लेकिन आज की इस चमक वाली क्रांतियों के पीछे जो भारतीय ज्ञान परंपरा रही है, उसको जानना और समझना बहुत जरूरी है। विश्व में नित हो रहे बदलाव हम सभी को रोमांचित कर रहे हैं। हमारी आज की पीढ़ी अपने आस-पास दूसरों के रहन-सहन एवं खान-पान से प्रभावित हो रही है, जबकि आज अगर हम उनका थोड़ा मार्गदर्शन करें और उनको सत्य से परिचित कराएँ तब शायद वे समझ पाएंगे कि वर्तमान समय की उपलब्धियाँ वस्तुत: वैदिक काल की उपलब्धियों के समक्ष कम ही होंगी।
गणित और सांख्यिकी उपलब्धियाँ
वर्तमान में जहाँ आज हर कार्य के लिए अनेक संसाधन व सुविधाएँ उपलब्ध हैं, प्राचीन समय में इन सभी संसाधनों के बिना ‘शून्य’ का जन्म हुआ, दशमलव प्रणाली की सरल विधि समस्त जगत को दी गई। एक से नौ तक की प्रत्येक संख्या के लिए अलग-अलग अंक संकेत की प्रणाली तैयार की गई। अल्फ्रेड नॉर्थ व्हाइटहेड (1861-1947)- ब्रिटिश गणितज्ञ और दार्शनिक के शब्दों में- ”आज का सबसे बड़ा ज्ञान भी प्राचीन भारत में ऋषियों की बुद्धि को पार नहीं कर सकता और आज अपने सबसे उन्नत चरण में विज्ञान अब पहले से कहीं अधिक वेदांत के करीब है।” लियोनार्डोफिबोनाची—इतालवी गणितज्ञ के यूरोपीय गणित के लिए आकर्षक अनुक्रम से बहुत पहले फाइबोनैचि संख्याओं का उल्लेख पिंगल शास्त्र छंद की संस्कृत परंपरा में मिलता है, बाद में इसका उल्लेख गणितज्ञ वीरांखा, गोपाला और हेमचन्द्र ने विस्तार से किया है।
शिल्प एवं वास्तुकला : भवन एवं नगर
सुप्रसिद्ध हड़प्पा सभ्यता की खोज 1920-22 में हुई जब इसके दो सबसे महत्वपूर्ण स्थलों की खुदाई की गई थी। ये रावी नदी के तट पर हड़प्पा और सिंधु के तट पर मोहनजोदड़ो थे। पुरातात्त्विक निष्कर्षों के आधार पर हड़प्पा सभ्यता 2500 ईसा पूर्व-1900 ईसा पूर्व के बीच की है और यह दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। इसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है। खोजकर्ताओं को वजऩ, मापन एवं मानक प्रणाली के प्रचलन व उपयोग के प्रमाण सिंधु घाटी नगर सभ्यता में मिलते हैं और जो शिल्प एवं वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण हैं।
पाटलिपुत्र – मेगस्थनीज लगभग 302 ईसा पूर्व और 288 ईसा पूर्व के बीच भारत आए। वे एक यूनानी इतिहासकार, राजनयिक और खोजकर्ता थे। वे चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में सेल्यूकस निकेटर 1 के राजदूत थे (उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ”इंडिका” मौर्य भारत का एक लेख है), उन्होंने कहा, ”मैंने रोम, पारसिया आदि जैसे महान शहर देखे लेकिन पाटलिपुत्र जैसा शहर कभी नहीं देखा। पाटलिपुत्र की आकृति समांतर चतुर्भुज के समान है जिसकी लंबाई 9 मील और चौड़ाई 1.5 मील है। शहर में 540 टावर और 8 दरवाजे हैं। दो टावरों के बीच की दूरी लगभग 54 गज है। परिधि लगभग 21 मील है, जो रोम शहर से दोगुना है और मुझे ऐसा लगता है कि पाटलिपुत्र प्राचीन दुनिया का सबसे बड़ा शहर है।”
शिल्प एवं वास्तुकला
भारतीय प्राचीन इंजीनियरिंग संरचना अद्भुत है। भारतीय वास्तुकला के स्वरूप पौराणिक हैं। इसके अंतर्गत चार मुख वाले भगवान ब्रह्मा को निर्माता के रूप में माना गया है और कहा जाता है कि उन्होंने स्वर्ग के चार वास्तुकारों विश्वकर्मा, माया, तवशतर और मनु की उत्पत्ति की है। भारतीय मंदिर वास्तुकला की 3 व्यापक शैलियाँ हैं-नागर-उत्तरी शैली, वेसर (मिश्रित) शैली और द्रविड़ (दक्षिणी) शैली। इनमें से प्रत्येक के अपने विशिष्ट सांस्कृतिक प्रभाव और वंश हैं।
कैलास (मंदिर) संसार में अपने ढंग का वास्तु का अनूठा उदाहरण है। इसको मालखेड स्थित राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण (प्रथम) ने 757-783 ई0 में निर्मित कराया था। यह एलोरा (जिला औरंगाबाद) में स्थित है। बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे द्रविड़ शैली के मंदिर का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में 276 फीट लम्बा, 154 फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: 40 हजार टन भार के पत्थरों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिए पहले पर्वत के खंड को अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। यह मंदिर भीतर और बाहर चारों ओर मूर्तियाँ एवं सुंदर अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में नन्दी की मूर्ति है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी तथा स्तंभ बने हुए हैं। यह कृति भारतीय वास्तुशिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है।
वैज्ञानिक चमत्कार जंतर मंतर-जयपुर
18वीं शताब्दी की शुरुआत में जयपुर के महाराजा जयसिंह द्वितीय ने नई दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी इन सभी अलग-अलग जगहों पर जंतर-मंतर का निर्माण किया। ये सभी जंतर-मंतर 1724 और 1735 के बीच बन कर तैयार हुए। जंतर-मंतर का शाब्दिक अर्थ है ‘स्वर्ग के सामंजस्य को मापने के लिए उपकरण’। इसमें 13 वास्तुशिल्प खगोल विज्ञान उपकरण शामिल हैं।
जंतर-मंतर, जयपुर राजस्थान के जयपुर के संस्थापक राजपूत राजा सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित 19 खगोलीय उपकरणों का एक संग्रह है। यह स्मारक 1734 में बनकर तैयार हुआ था। इसमें दुनिया की सबसे बड़ी पत्थर की धूप वाली घड़ी है और इसको यूनेस्को की विश्व धरोहर में स्थान मिला हुआ है।
सिंधुदुर्ग किला
यह किला 400 साल से भी अधिक समय से खारे समुद्र के पानी में खड़ा है। इस किले का निर्माण छत्रपति शिवाजी महाराज ने करवाया था। यह किला महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में सिंधुदुर्ग जिले के मालवन शहर के तट पर स्थित है, जो मुंबई से 450 किलोमीटर (280 मील) दक्षिण में है। यह किला इंजीनियरिंग का एक चमत्कार है। इसके प्राचीर में लगभग 75,000 किलोग्राम लोहा है।
अरब सागर से घिरे एक छोटे से टापू पर स्थित सिंधुदुर्ग किला युद्धों और उसकी की तैयारी के साथ मराठा लोगों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए मराठा मुख्यालय था। शिवाजी के आदेश पर बने किले को पुर्तगाल के लगभग 100 वास्तुकारों और 3000 की जन शक्ति के साथ पूरा करने में तीन साल लगे। यह किला 48 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है, जिसकी दीवारें 12 फीट मोटी और 2 मील तक 29 फीट ऊंची हैं। ढलाई में 4000 से अधिक किलो लोहे का उपयोग किया गया था और नींव के पत्थरों को सीसे में मजबूती से रखा गया था। यह जानना आश्चर्यजनक है कि समुद्र के बीच में पिघला हुआ सीसा कैसे पहुँचाया गया होगा। इसका छिपा हुआ प्रवेश द्वार इसे एक वास्तुशिल्प का आश्चर्य बनाता है, जो दुश्मन हमला करने की कोशिश करता था, वह किले के मुख्य द्वार का पता लगाने की कोशिश में इधर-उधर चक्कर लगाता रह जाता था।
शिक्षा और इंजीनियरिंग
भारत हमेशा से शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहा है। भारतीय शिक्षा का स्तर पाश्चात्य देशों के लिए वैदिक काल से ही एक ऐसे ध्रुव तारे के समान रहा है, जिसका सभी ने अनुसरण किया है। कला, विज्ञान, संस्कृति के क्षेत्र के साथ-साथ इंजीनियरिंग विश्वविद्यालय भी सन् 1917 में मैसूर में भारतरत्न सर एम0 वी0 (सर मोक्षगोंडम विश्वेश्वरैया) द्वारा शुरू किया गया था। जिसे अब यू0 वी0 सी0 ई0 (University Visvesvaraya College of Engineering) के नाम से जाना जाता है। सर एम. वी. एक भारतीय मुख्य सिविल इंजीनियर, विद्वान, राजनेता और मैसूर के 19वें दीवान थे, जिन्होंने 1912 से 1919 तक सेवा की।
भारतीय वेद और साहित्य ने इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी और विज्ञान के विकास में बहुत योगदान दिया है। भारतीय साहित्य में यह दिखाने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं कि नवीन वैज्ञानिक तरीके और इंजीनियरिंग अवधारणाएं विद्यमान थी, जो हमारे ऋषियों की योग्यताओं एवं क्षमताओं को दर्शाती हैं और उन सभी को हम सही मायने में इंजीनियर कह सकते हैं। मनुस्मृति में उल्लेख किया गया है कि भारतीय वेद ज्ञान से भरे हुए हैं और आधुनिक विषयों की सभी अवधारणाएँ वेदों में पहले से मौजूद थीं।
स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि स:।
इसका अर्थ है कि सभी कला, इंजीनियरिंग और विज्ञान के बारे में ‘ज्ञान के सूत्र’ भारतीय वेदों में मौजूद हैं।
इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी के लिए समर्पित संस्कृत में कई किताबें हैं, जैसे- यंत्र सर्वस्व, समराङ्गणसूत्रधार तंत्र प्रदीपिका, शिल्पतंत्र रहस्य, युक्ति कल्पतरु आदि। विज्ञान से संबंधित कई अन्य पुस्तकों में भी तकनीकी खंड शामिल हैं, जैसे अर्थशास्त्र, गणित शास्त्र, वास्तु तंत्र, स्थापत्य शास्त्र। तक्षशिला विश्वविद्यालय के अवशेष 10वीं शताब्दी ईसा पूर्व से मिलते हैं। तक्षशिला विश्वविद्यालय सिंधु नदी के तट के पास तक्षशिला (आधुनिक पाकिस्तान में) शहर में स्थित था। रामायण के अनुसार तक्षशिला शहर की स्थापना राजा दशरथ की रानी कैकेयी के पुत्र और प्रभु श्री राम के छोटे भाई भरत ने की थी। तक्षशिला के प्रसिद्ध शोधकर्ताओं और शिक्षकों में पाणिनि (संस्कृत के महान व्याकरणविद) कौटिल्य (चाणक्य) जिनको राज निर्माता, चतुर राजनीतिक सलाहकार, और अर्थशास्त्र के लेखक के रूप में जाना जाता है, चरक (प्रतिष्ठित चिकित्सक, जिनके चरक संहिता में वर्णित क्षेत्र की वनस्पतियों और जीवों पर शोध ने आयुर्वेद के विकास को मजबूत किया) और जीवक (गौतम बुद्ध और उनके अनुयायियों के महान चिकित्सक) शामिल हैं।
भारतीय इस्पात
भारत को स्टील का पहला निर्माता कहा जा सकता है। लगभग 400 ईसा पूर्व, भारतीय धातुकर्मियों ने एक गलाने की विधि का आविष्कार किया, जो कार्बन की सही मात्रा को लोहे से जोडऩे से हुआ। बाहरी रूप से गर्म (गैस या इलेक्ट्रिकल हीटिंग द्वारा) स्टील क्रूसिबल का उपयोग औद्योगिक रूप से पिघली हुई धातु रखने के लिए किया जाता है। भारतीय इस्पात प्राचीन विश्व में चर्चा का विषय बन गया था। ऐसा कहा जाता है कि वापस जाते हुए महान सिकंदर लगभग 2.7 टन लोहा अपने साथ ले गया था। भारतीय लौह स्वामियों ने अपना समान एबिसिनिया (इथियोपिया) को निर्यात किया और टोलेडोस्पेन के लोहारों ने शाही रोमन सेना के लिए भारतीय स्टील को तलवारों में इस्तेमाल किया।
लौह स्तंभ-दिल्ली
हम भारतीय इंजीनियरिंग के अद्भुत अजूबे के रूप में दिल्ली में स्थित लौह स्तंभ को देख सकते हैं। इसकी संरचना 7.21 मीटर (23 फीट 8 इंच) ऊंची और 41 सेंटीमीटर (16 इंच) व्यास वाली है जिसका निर्माण चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में किया गया था। यह स्तम्भ इसके निर्माण में प्रयुक्त धातुओं की जंग प्रतिरोधी क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। स्तंभ का वजन तीन टन (6,614 पाउंड) से अधिक है और माना जाता है कि इसे शायद उदयगिरि गुफाओं के बाहर कहीं और बनाया गया था और 11 वीं शताब्दी में अनंगपाल तोमर द्वारा अपने वर्तमान स्थान पर ले जाया गया था।
जस्ता में आसवन प्रक्रिया – प्राचीन भारत में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि इंजीनियरिंग की- यह भी है कि भारत आसवन प्रक्रिया द्वारा जिंक को गलाने वाला पहला देश था। जस्ते को गलाना मुश्किल होता है। शुद्ध जस्ते का उत्पादन हमारे प्राचीन रासायनिक ग्रंथ में वर्णित आसवन तकनीकों में महारत हासिल करने के बाद ही किया जा सकता है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में राजस्थान की खानों से जस्ता उत्पादन के निश्चित प्रमाण मिलते हैं। इस प्रकार भारत आसवन प्रक्रियाओं द्वारा जस्ता का उत्पादन करने वाला पहला देश है। हमारे प्राचीन भारतीय ग्रंथों में ऐसे बहुत से प्रमाण हैं, जो स्पष्ट रूप से इस तस्वीर को चित्रित कर सकते हैं कि पहले हमारी तकनीक कितनी अद्भुत और शानदार थी। शिक्षा की पारंपरिक गुरुकुल पद्धति ने सीखने की स्थिति को इस हद तक बढ़ाया कि उच्च श्रेणी के इंजीनियर और उससे भी अधिक एक जिम्मेदार नागरिक पैदा हो सकें, जो बेहतर तरीके से राष्ट्र की सेवा कर सकें। प्राचीन ग्रंथों में पर्याप्त मात्रा में ज्ञान का खजाना है, जो छिपा हुआ है और यह भारत के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है कि इसे समझें और इसे शीर्ष पर लाएं, ताकि दुनिया को पता चले कि भारत हमेशा विश्व गुरु के पद पर था। (साभार : भारतीय ज्ञान परंपरा : विविध आयाम, संपादक प्रोफेसर सरोज शर्मा)





