मनुस्मृति में कहा गया है कि इस भारत देश में जन्मे अग्रजनों से पृथ्वी के सभी मानवों ने अपने-अपने चरित्र की शिक्षा प्राप्त की। एक समय था जब पूरे विश्व से लोग भारत आते थे शिक्षा ग्रहण करने के लिए। इसलिए यहाँ के विद्यालय, विश्वविद्यालय कहलाते थे। शिक्षा की इन ऊँचाइयों तक भारत पहुँचा हुआ था। उसके कुछेक अवशेष हमें तीन हजार वर्ष पहले से लेकर बारहवीं शताब्दी तक मिलते हैं। उदाहरण के लिए तक्षशिला में तीन-चार हजार वर्ष पूर्व में एक बड़ा विश्वविद्यालय था। बारहवीं शताब्दी में नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय थे।
समझने की बात यह है कि जब विश्व के अन्य देशों में शिक्षा प्रक्रिया प्रारम्भिक अवस्था में थी, उस समय भारत में शिक्षा का स्तर अत्यन्त विकसित था। भारत की शिक्षा के स्तर को समझना हो तो हमें महर्षि पाणिनी के अष्टाध्यायी व्याकरण को देखना चाहिए। यह दुनिया न केवल सबसे प्राचीन व्याकरण ग्रंथ है, बल्कि सबसे अधिक वैज्ञानिक पद्धति से लिखा व्याकरण है। इसमें आज के अत्याधुनिक कम्प्यूटरों की भांति कोडिंग की भाषा प्रयोग की गई है। पाणिनी ने यह ग्रंथ उस समय लिखा था जब शेष विश्व भाषा की सीढिय़ां चढ़ ही रहा था। इतना ही नहीं, पाणिनी के पहले भी बड़ी संख्या में व्याकरणाचार्य हो चुके थे। पाणिनी ने अपने ग्रंथ में उन सभी को स्मरण भी किया है, उनके मतों को यथोचित स्थान भी दिया है। पाणिनी के ग्रंथ का अवलोकन करेंगे तो हमें शिक्षा के भारतीय सूत्र भी मिलेंगे।
प्राचीन भारत के विश्वविद्यालयों में तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, नदिया, उदयंतपुरी, कांची आदि विश्वविद्यालयों ने विशेष ख्याति प्राप्त की थी। इनमें विदेशों से भी छात्र अध्ययन के लिए आते थे। भारतीय शिक्षा परंपरा में आत्मज्ञान के लिए शिक्षा, गुरु और शिष्य का पिता तुल्य सबंध, शिक्षाकाल में ब्रह्मचर्यपालन का तपस्यामय जीवन, नि:शुल्क शिक्षा तथा बौद्धिक स्वातंत्र्य आदि भावों की प्रधानता थी। मध्यकाल के शिक्षाकेंद्रों में लाहौर, दिल्ली, रामपुर, जौनपुर, बीदर और अजमेर आदि विशाल शिक्षाकेंद्र थे।
1.तक्षशिला विश्वविद्यालय
भारत की प्राचीनतम शिक्षण संस्था प्रान्त के रावलपिंडी शहर से प्राय: 18 मील की दूरी पर (अब निर्जन और वीरान स्थान) तक्षशिला नाम का नगर था। यहाँ की सभ्यता संसार की सर्वोत्तम और पुरातन सभ्यताओं में से एक थी। चाणक्य जैसे राजनीतिज्ञ और भृत्य कौमारजीव जैसे शल्य चिकित्सक (सर्जन) यहीं प्राध्यापक थे। यहाँ देश-विदेश से बड़े-बड़े विद्वान आदि अठारह विद्याएँ विशेषरूप से अर्थशास्त्र, राजनीति और आयुर्वेद के अध्ययन के लिए आते और उसमें पारंगत होते थे।
सिकन्दर के आक्रमण के समय यह संसार का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय ही नहीं था, अपितु उस समय के चिकित्सा शास्त्र का एकमात्र सर्वाेपरि केन्द्र था। तक्षशिला विश्वविद्यालय का विकास विभिन्न रूपों में हुआ था। कुछ विद्वानों का मानना है कि इसका कोई एक केन्द्रीय स्थान नहीं था, अपितु यह विस्तृत भू भाग में फैला हुआ था। विविध विद्याओं के विद्वान आचार्यांे ने यहां अपने विद्यालय तथा आश्रम बना रखे थे। छात्र रुचिनुसार अध्ययन हेतु विभिन्न आचार्यों के पास जाते थे। महत्वपूर्ण पाठयक्रमों में यहां वेद-वेदान्त, अष्टादश विद्याएं, दर्शन, व्याकरण, अर्थशास्त्र, राजनीति, युद्धविद्या, शस्त्र-संचालन, ज्योतिष, आयुर्वेद, ललित कला, हस्त विद्या, अश्व-विद्या, मन्त्र-विद्या, विविद्य भाषाएं, शिल्प आदि की शिक्षा विद्यार्थी प्राप्त करते थे।
प्राचीन भारतीय साहित्य के अनुसार पाणिनी, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, जीवक, कौशलराज, प्रसेनजित आदि महापुरुषों ने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। वहाँ से प्राप्त आयुर्वेद संबंधी जीवक के अपार ज्ञान और कौशल का विवरण विनयपिटक से मिलता है। चाणक्य वहीं के स्नातक और अध्यापक थे और उनके शिष्यों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ चंद्रगुप्त मौर्य, जिसने अपने गुरु के साथ मिलकर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। तक्षशिला विश्वविद्यालय में वेतनभोगी शिक्षक नहीं थे। आजकल की भांति पाठयक्रम की अवधि निर्धारित नहीं थी और न कोई विशिष्ट प्रमाणपत्र या उपाधि दी जाती थी। शिष्य की योग्यता और रुचि देखकर आचार्य उनके लिए अध्ययन की अवधि स्वयं निश्चित करते थे। परंतु कहीं-कहीं कुछ पाठयक्रमों की समय सीमा निर्धारित थी। चिकित्सा के कुछ पाठयक्रम सात वर्ष के थे तथा पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद प्रत्येक छात्र को छह माह का शोध कार्य करना पड़ता था। इस शोध कार्य में वह कोई औषधि की जड़ी-बूटी पता लगाता तब जाकर उसे डिग्री मिलती थी। अनेक शोधों से यह अनुमान लगाया गया है कि यहां बारह वर्ष तक अध्ययन के पश्चात दीक्षा मिलती थी। 500 ई. पू. जब संसार में चिकित्सा शास्त्र की परंपरा भी नहीं थी तब तक्षशिला आयुर्वेद विज्ञान का सबसे बड़ा केन्द्र था। जातक कथाओं एवं विदेशी पर्यटकों के लेख से पता चलता है कि यहां के स्नातक मस्तिष्क के भीतर तथा अंतडिय़ों तक का आपरेशन बड़ी सुगमता से कर लेते थे। अनेक असाध्य रोगों के उपचार सरल एवं सुलभ जड़ी बूटियों से करते थे। इसके अतिरिक्त अनेक दुर्लभ जड़ी-बूटियों का भी उन्हें ज्ञान था। शिष्य आचार्य के आश्रम में रहकर विद्याध्ययन करते थे। एक आचार्य के पास अनेक विद्यार्थी रहते थे। इनकी संख्या प्राय: सौ से अधिक होती थी और अनेक बार 500 तक पहुंच जाती थी।
तक्षशिला राजनीति और शस्त्रविद्या की शिक्षा का भी अन्यतम केंद्र थी। वहाँ के एक शस्त्रविद्यालय में विभिन्न राज्यों के 103 राजकुमार पढ़ते थे। आयुर्वेद और विधिशास्त्र के वहाँ विशेष विद्यालय थे। तक्षशिला में प्राय: उच्चस्तरीय विद्याएँ ही पढ़ाई जाती थीं और दूर-दूर से आने वाले बालक निश्चय ही किशोरावस्था के होते थे जो प्रारंभिक शिक्षा पहले ही प्राप्त कर चुके होते थे। वहाँ के पाठयक्रम में आयुर्वेद, धनुर्वेद, हस्तविद्या, त्रयी, व्याकरण, दर्शनशास्त्र, गणित, ज्योतिष, गणना, संख्यानक, वाणिज्य, सर्पविद्या, तंत्रशास्त्र, संगीत, नृत्य और चित्रकला आदि का मुख्य स्थान था। जातकों में उल्लिखित (फांसबांल संस्करण, जिल्द प्रथम, पृष्ठ 256) वहाँ पढ़ाए जाने वाले तीन वेदों और 18 विद्याओं में उपयुक्त अवश्य होंगे। किंतु कर्मकांड की शिक्षा के लिये तक्षशिला नहीं, अपितु वाराणसी ही अधिक प्रसिद्ध थी। तक्षशिला की सबसे बड़ी विशेषता थी, वहाँ पढ़ाए जानेवाले शास्त्रों में लौकिक शस्त्रों का प्राधान्य।
ईसवीं सन् के पाँच सौ वर्ष पूर्व से लेकर छठी शताब्दी पर्यन्त तक्षशिला बहुत उन्नति करती रही। इसके पश्चात् हूण आक्रमणकारियों ने तक्षशिला का सर्वनाश कर दिया। फिर लगभग ढाई हजार वर्षों के अनन्तर वैज्ञानिकों के कठिन शोध के पश्चात् वहाँ खुदाई हुई। और वहाँ उस समय के बर्तन, जिनमें छोटे-छोटे बर्तनों से लेकर चार-चार फुट के मटके भी हैं, कलम, दवात, थाली, लोटा, हीरक-हार, प्रकाश-स्तम्भ, कसौटी पत्थर और सूरमेदानी, गान्धारी कला के सर्वोत्कृष्ट नमूने तथा बौद्ध भिक्षुओं के अवशेष वस्तुएँ मिली हैं। इसके अतिरिक्त ‘ब्राम्ही’ और ‘खरोष्ट्री’ लिपियों में लिखी शिलालेख भी पाए गए। ये सभी समान वहाँ के ‘म्यूजियम’ में रखे गए हैं।
तक्षशिला के खण्डहर मीलों में पाये जाते हैं। भिड़माउण्ड, शिरकप, मोरा-मोरा-दू, जौलिया, पिपला, जांडियाल और रिचस्तूप आदि क्षेत्र एक-दूसरे के पास में ही हैं, यहाँ की संस्कृति जानने के लिए इन स्थानों को देखना आवश्यक हो जाता है। भिडमाउण्ड आमीक की राजधानी थी। जौलिया में बौद्धों का निवास स्थान था। यहाँ उनके व्यवहार की वस्तुएँ चक्की, घड़ा तथा थाली आदि मिलती हैं। यहाँ उन भिक्षुओं के भांडागार बिहार तथा स्नानागार बने थे। चितस्कूप में कनिष्क ने ईसवीं सन् से पूर्व एक स्तूप बनवाया था। इसके अतिरिक्त तक्षशिला में ब्राहा्रण बौद्ध दर्शन, साहित्य, अर्थशास्त्र एवं वैद्यक ग्रन्थ लिखे गए थे। उसके पीछे एक महान देश की समृद्धिशालिनी सभ्यता का महान इतिहास निहित है।
2.नालन्दा विश्वविद्यालय
तक्षशिला के पश्चात् नालन्दा विश्वविद्यालय का नाम आता है। यह सम्पूर्ण विश्व का ज्ञानपीठ माना जाता था। इसी ने तत्कालीन जगत् को भारतीय ज्ञान, धर्मशास्त्र, साहित्य, दर्शन, कला, शिल्प, सभ्यता और संस्कृति आदि का ज्ञान दिया था। यहाँ के स्नातक, प्रकाण्ड पाण्डित्य में अपना स्थान बनाकर रखे हुए थे। जब बौद्ध धर्म की विजय पताका सम्पूर्ण एशिया खण्ड में फहरा रही थी, भारतीय ज्ञान-विज्ञान का मूल स्त्रोत नालन्दा ही था। नालन्दा में अध्ययन किये बिना शिक्षा अधूरी समझी जाती थी।
नालन्दा के विषय में इतिहासकारों का विचार है कि ‘पालि साहित्य’ में नालन्दा राजगृह से आठ मील की दूरी पर बनाया गया है। चीनी यात्री ‘फाहियान’ की भी यही सम्मत्ति है और दूसरे चीनी यात्री ट्वान-ध्वाड् के कथानानुसार नालन्दा वर्तमान बिहार शरीफ शहर के दक्षिण पश्चिम कोण के एक आम का बगीचा था। उस बगीचे में ‘नालन्दा’ नाम का एक नागराज रहता था। यह भी कहा जाता है कि भगवान बुद्ध पूर्वजन्म में वहाँ ‘बोधि सत्त्व’ के रूप में पैदा हुए थे। खैर जो कुछ हो, खण्डहरों की खुदाई हो जाने पर अनुमान और कल्पना का कोई स्थान नहीं रहा। नालन्दा के भग्नाशेष ‘बख्तियारपुर बिहार लाइट रेलवे’ के ‘नालन्दा;’ स्टेशन से लगभग एक मील पर है। खुदाई में आर्य नागार्जुन की एक मूर्ति मिली है। अगर यह प्रतिमा शून्यवादी नागार्जुन की मान ली लाए तो इससे यह सिद्ध होता है कि नालन्दा दूसरी शताब्दी के मध्य में एक सुप्रतिष्ठित शिक्षा केन्द्र था। क्योंकि नागार्जुन महायान के प्रवर्तक थे और नालन्दा महायानियों का गढ़।
जहाँ पर नालन्दा पिद्यापीठ के सुन्दर भवन थे, वहाँ बडग़ाँव नाम की एक बस्ती है। इसके पास नालन्दा के ध्वंसवाशेष ऊँची-ऊँची उजाड़ दीवालें, अनहित टीले, प्राचीन तालाब आदि अपने प्राचीनतम गौरवमयी काल की महानता के सूचक हैं।
नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए चीन, जापान, तातार, तिब्बत, मध्य एशिया, श्याम, अनाम, वर्मा, मलय आदि देशों के लोग आते थे। यहाँ पर अठारह बौद्ध निकाय ग्रन्थों के अतिरिक्त वैद्यक, दर्शन, साहित्य, कला, ब्राह्मण एवं जैन दर्शन आदि की शिक्षा दी जाती थी। खण्डहरों की खुदाई के सामान यह कह रहे हैं कि केवल किताबी शिक्षा ही पर्याप्त नहीं थी, हस्तकौशल की शिक्षा का भी सुप्रबन्ध था।
यहाँ के चीनी स्नातक ह्नेनसांग के अनुसार नालन्दा में दस हजार से अधिक छात्र पढ़ते थे, और अध्यापकों की संख्या डेढ़ हजार थी। प्राचार्य शीलभद्र थे। विश्वविद्यालय के साथ बिहार में आठ विशाल कक्ष और तीन सौ प्रकोष्ठ थे। सभा सदन दस भागों में विभक्त था । शिक्षार्थियों के रहने के लिए भिन्न-भिन्न तीन सौ छात्रावास भवन थे। तीन विशाल पुस्तकालय, रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक नाम के थे। इन पुस्तकालयों में हीनयान, महायान, वज्रयान आदि बौद्ध तथा अन्यान्य सम्प्रदायों के विविध विषयक ग्रन्थ उपलब्ध थे।
शिक्षा विभाग में जिनमित्र, शीघ्र बुद्धि, चन्द्रपाल, ज्ञानचन्द्र, स्थिरमति, प्रभाकर मित्र, धर्मपाल, भद्रसेन, शान्त रक्षित आदि प्रथमश्रेणी के प्रकाण्ड विद्वान थे-जिनमें आचार्य शान्ति रक्षित नाम विशेष उल्लेखनीय है। उनके समय में नालन्दा की कीर्ति अखिल विश्व में व्याप्त हो चुकी थी।
नालन्दा केवल मगध का ही ज्ञान भण्डार नहीं अपितु समस्त विश्व में ज्ञान-विज्ञान का पथ प्रदर्शक था। नालन्दा के अन्तिम दिनों में घोर वज्रयान का विकृत से विकृत रूप जनता में प्रचारित किया जा रहा था। इन्हीं आन्तरिक दुर्बलता और मुस्लिम आक्रमण ने नालन्दा को मिट्टी में मिला दिया । मुसलमानों ने निष्ठुरता के साथ इस विश्वविद्यालय को लूटा। इसके साक्षी हैं-वहाँ की जली ईटें, चौखटें, चावल के जले हुए दाने इत्यादि। भारतीय वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने बर्बाद किये गए। यदि भयंकर अमानुषिक प्रहारों से नालन्दा का नाश न हुआ होता तो वहाँ के ग्रन्थागार आज भी विश्व को यह बता सकते कि उस समय नालन्दा कितना विस्तृत एवं गम्भीर ज्ञान समुद्र था, उसका ज्ञान-भण्डार संसारभर में कैसा अद्धितीय था।
3. विक्रमशिला विश्वविद्यालय
भारत के तीसरे विश्वविद्यालय विक्रमशिला के स्थान को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभिन्नता रही है। तिब्बती बौद्ध ग्रन्थों के अनुवाद के पश्चात्, उसके आधार पर वर्तमान भागलपुर जिले के सुल्तानगंज को ‘विक्रमशिला’ निश्चित किया गया है।
इस विश्वविद्यालय के चारों ओर तोरण थे। हर एक प्रवेशद्वार पर एक-एक प्रवेशिका निरीक्षक होता था। इन सभी द्वारों पर एक-एक प्रकाण्ड विद्वान की व्याख्या थी। जो विद्यार्थी प्रवेश के लिए आता था, वह परीक्षा के लिए इन्हीं विद्वानों के पास आकर सन्तुष्ट करता था, कि वह इस विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के योग्य है।
अध्ययन विभाग में रत्नवज्र, लीला वज्र, कृष्ण समर वज्र, तथागत रक्षित, दीपंकर श्री ज्ञान, बोधभद्र, कमल रक्षित और नरेन्द्र श्री ज्ञानन्ये आठ महापण्डित और 108 पण्डित थे। आचार्य ‘दीपंकर श्री ज्ञान’ थे। इस विश्वविद्यालय में धर्म, साहित्य, दर्शन, न्याय आदि के अतिरिक्त विशेषरूप से मंत्रशास्त्र की शिक्षा दी जाती थी। नालन्दा जैसे प्राचीन तथा विक्रमशिला जैसे नवीन विश्वविद्यालयों में तंत्र शास्त्र की ही प्रधानता थी। यहाँ के महापण्डितों में मैत्री या डोम्बीया, स्मृत्यकर आदि ‘सिद्ध’ थे।
विक्रमशिला में भारतीय छात्रों के अतिरिक्त बहुत से विदेशी छात्र भी विद्याध्ययन के लिए आते थे। छात्रों के निवास एवं भोजन आदि का प्रबन्ध विश्वविद्यालय की ओर से होता था। दीपंकर श्री ज्ञान के समय में यहाँ के संधस्थविर ‘रत्नाकरÓ थे। बिहार के मध्य में ‘बोधिसत्व’ की मूर्ति थी। सैकड़ों तान्त्रिक देवालय थे। विदेशी छात्रों को विशेष सुविधा प्राप्त थी।
4. उड्डयन्तपुर विश्वविद्यालय
इस विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के प्रवर्तक तथा प्रथम राजा गोपाल ने की थी। इसकी स्थापना भी बौद्ध विहार के रूप में हुई थी। आज यहां बिहार नगर है। पहले यह क्षेत्र मगध के नाम से जाना जाता है। 12वीं शताब्दी में यह शिक्षा का अच्छा केन्द्र था।
इन विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त सौराष्ट्र बलभी विश्वविद्यालय भी काफी प्रसिद्ध रहा है। अन्य असंख्य शिक्षा केन्द्र भारतवर्ष के कोने-कोने में स्थित थे। 317 ई. पू. तमिलनाडु में मदुराई विद्या एवं शिक्षण संस्थानों का केन्द्र रहा है। सुप्रसिद्ध तमिल कवि तिरुवल्लुवर यहां के छात्र थे। अल बिरूनी के अनुसार 11वीं शताब्दी ई. में कश्मीर विद्या का केन्द्र रहा था। इसी शताब्दी के अंतिम भाग में बंगाल के राजा रामपाल ने रामावती नगरी में जगद्धर विहार की स्थापना की थी। उस समय प्राय: प्रत्येक मठ और विहार शिक्षा के केन्द्र होते थे। शंकराचार्य ने वैदिक विषयों के अध्ययन के लिए अनेक विद्यालयों की स्थापना की। ये मठों के नाम से प्रसिद्ध हुए। काशी, कांची, मथुरा, पुरी आदि तीर्थस्थान भी विद्या के प्रसिद्ध केन्द्र रहे हैं।
सन् 1193 ईस्वीं में पालवंशी राजाओं के अध: पतन के साथ-साथ ये विश्वविद्यालय भी सदा के लिए अन्धकार में विलीन हो गए। विजय मदान्ध मुसलमानों ने मुहम्मद बिन अख्तियार के नेतृत्व में गोविन्दपाल को मार कर नालन्दा और विक्रमशिला को खूब लूटा। हजारों विद्यार्थी और अध्यापक तलवार के घाट उतारे गए। आक्रान्ताओं ने लगभग हजारों वर्ष के पुराने धर्म और भारतीय सभ्यता को पूर्ण रूप से नष्ट करने का प्रयास किया।
प्रस्तुत लेख लगभग 20 वर्ष पूर्व विजय शंकर तिवारी लिखित प्राचीन भारत का समृद्ध ज्ञान-विज्ञान से लिया गया है।





