एक ही मंजिल के यात्री हैं विज्ञान और अध्यात्म

मुरली मनोहर जोशी
लेखक पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री हैं।

विज्ञान, तकनीक और पर्यावरण पर आयोजित आठवीं बोस-आइंसटीन व्याख्यानमाला में 24 अक्तूबर, 1998 को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली के सभागार में डा. मुरली मनोहर जोशी ने एक व्याख्यान दिया था। उन्होंने अपने व्याख्यान में स्थापित किया था कि आज का विज्ञान जहां पहुंच रहा है, उस अंतिम सत्य तक भारतीय मेधा पहले ही पहुंच चुकी थी। प्रस्तुत हैं उस व्याख्यान के प्रमुख अंश।

बीसवीं सदी के अंत तक मानव समाज ने जबरदस्त वैज्ञानिक और तकनीकी विकास देखा है। इससे एक ओर जहां भरपूर भौतिक प्रगति हुई, वहीं दूसरी ओर नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों में जबरदस्त गिरावट भी देखने में आई। इससे आज मानव जाति एक सभ्यतागत बहुआयामी समस्या से जूझ रहा है। इससे सभी अमीर और गरीब दोनों ही प्रकार के देश पीडि़त हैं। सवाल है कि विज्ञान और अध्यात्म किस प्रकार मिल कर दुनिया में शान्ति और सौहाद्र्र की स्थापना कर सकते हैं। मैं यहां यह स्थापित करने का प्रयास करूंगा कि किस प्रकार आधुनिक विज्ञान अंतिम सत्य के मामले में वहीं पहुंच रहा है, जहां भारत के प्राचीन ऋषि पहुंचे थे।

बीसवीं सदी के प्रारंभ से विज्ञान ने काफी विकास किया है और अनेक मूलभूत सिद्धांतों की पुनव्र्याख्या की है। हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता का सिद्धांत ने परमाण्विक कणों के व्यवहार के संबंध में काफी गहरी जानकारी दी। न्यूटोनियन प्रारूप की निश्चितता का स्थान परमाण्विक जगत की अनिश्चितता ने ले लिया।

आज विज्ञान ऐसे प्रश्नों से दो-चार हो रहा है जो पहले उसके क्षेत्र से बाहर माने जाते थे। विज्ञान में हुए अनेक अनुसंधानों के परिणामस्वरूप विद्वानों ने यह पूछना शुरू कर दिया है कि क्या पदार्थ किसी प्रकार से जीवन से जुड़ा हुआ है। और यदि जुड़ा हुआ है तो किस प्रकार?

इसकी शुरूआत वर्ष 1924-25 में हुई थी जब लुईस डिब्रोगली ने पदार्थ-तरंगों का विचार प्रस्तुत किया था। वेब मैकेनिक्स के जन्मदाता इरविन श्रोडिन्जर ने अपना समीकरण प्रस्तुत किया जिसने इलेक्ट्रोनों के मामले में न्यूटन के गतिकी-सिद्धांत की जगह ले ली। तब वार्नर हाइजेनबर्ग अपना अनिश्चितता का सिद्धांत लेकर आए जिसके अनुसार इलेक्ट्रान की गति या स्थिति में से किसी एक ही चीज के बारे में निश्चित जानकारी प्राप्त करना संभव है। हाइजेनबर्ग के सिद्धांत के तीन स्वाभाविक निष्कर्ष थे। पहला, आप मौलिक कण के बारे में वास्तविक जानकारी नहीं पा सकते, दूसरा, परमाण्विक जगत में कार्य-कारण का सिद्धांत काम नहीं करता और तीसरा, देखने वाले और दिखने वाले के बीच का अंतर गायब हो जाता है। इस प्रकार अंतिम सत्य को जानने के लिए किए जाने वाले प्रयोगों का कोई अर्थ नहीं बचा। परमाण्विक जगत में पुराने सिद्धांत किसी काम के नहीं थे। आज हम जानते हैं कि इस क्षेत्र की प्रक्रियाएं केवल गणितीय तौर पर बताई जा सकती हैं, किसी खास कण का व्यवहार निश्चित तौर पर बता पाना संभव नहीं है।

आधुनिक भौतिकी आज क्वांटम मैकेनिक्स के नए सिद्धांतों से दो-चार हो रही है। मुख्य प्रश्न यह है कि क्वांटम मैकेनिक्स बताता क्या है। इसका सर्वस्वीकृत उत्तर को कोपेनहैगेन व्याख्या के रूप में जाना जाता है। यह व्याख्या बताती है कि क्वांटम मैकेनिक्स हमारे अनुभवों के अंतस्संबंध को बताता है। हालांकि आइंस्टीन अपने अंतिम समय तक इसका विरोध करते रहे। उनका प्रसिद्ध वाक्य है – मेरा मानना है कि भगवान जुआ नहीं खेलता। बहरहाल, क्वांटम मैकेनिक्स का सिद्धांत निस्संकोच यह बताता रहा कि नई भौतिकी निरपेक्ष सत्य पर आधारित होने की बजाय ‘हम’ पर आधारित है। इस प्रकार ‘वह’ दुनिया और ‘यह’ मैं दोनों एक ही हैं।

कारण सिद्धांत पर विश्वास करने वाले आइंस्टीन कभी भी अनिश्चितता के सिद्धांत को स्वीकार नहीं पाए। आइंस्टीन, बोरिस पोडोस्की और नॉथन रोजेन ने एक लेख में सवाल खड़ा किया कि यदि अनिश्चितता का सिद्धांत सही है और कार्य-कारण संबंध परमाण्विक जगत में कार्य नहीं करते हैं तो इससे एक विरोधाभास पैदा होता है। इसका सीधा अर्थ है कि दो परमाणु चाहे वे एक दूसरे से कितने भी दूर क्यों न हों, किसी प्रकार से समानांतर रूप से परस्पर जुड़े हुए हैं। जितनी दूरी को पार करने में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों को भी कुछ सेकेंड लगता है, इतनी दूरी पर स्थित दो कणों के बीच में कोई संवाद कैसे संभव है? क्या उनमें किसी प्रकार की चेतनता विद्यमान है?

वर्ष 1936 से पहले ऐसे किसी तात्कालिक संवाद की कोई प्रक्रिया पता नहीं चली थी। इसलिए आइंस्टीन ने हाइजेनबर्ग को गलत सिद्ध कर दिया। लेकिन वर्ष 1972 में लंदन में डेविड बोह्म के, अमेरिका में क्लाउजर तथा फ्रीडमैन के और वर्ष 1982 में ऑरसे में एलेन ऑसपेक्ट के सफल प्रयोगों द्वारा साबित कर दिया कि इस तरह की विचित्र प्रक्रियाओं का अस्तित्व है। इन्होंने सापेक्षता के सिद्धांत द्वारा प्रतिपादित बात कि प्रकाश से तेज गति संभव नहीं है, को पूरी तरह गलत साबित कर दिया।

यूरोपीयन ऑरगेनाइजेशन फॉर न्यूक्लीयर रिसर्च के एक भौतिकीविद् जे एस बेल ने आइंस्टीन, पोडोस्की और रोजेन (आईपीआर) प्रभाव को एक गणितीय फार्मुला दिया था। बेल के प्रमेय की मुख्य स्थापना थी कि मूलभूत और गहरे स्तर पर ब्रह्मांड के अलग-अलग हिस्से एक अंतरंग व तत्काल संबंध से जुड़े होते हें। वर्ष 1975 में जैक सरफॅट्टी ने कहा कि न केवल प्रकाश से तेज गति के संबंधों का अस्तित्व है, बल्कि संवाद भेजने में उनका नियंत्रित उपयोग भी किया जा सकता है। बेल ने यह सिद्ध कर दिया कि ब्रह्मांड या तो सिद्धांतत: नियमविहीन है या फिर सिद्धांतत: एक है। डेविड बोह्म ने सुझाव दिया कि बजाय कणों से शुरूआत करने के हमें संपूर्णता से शुरूआत करनी चाहिए। गैरी जुकोव ने कहा कि इस विषय को समझने में पश्चिमी मस्तिष्क पर हावी वह ग्रीक मानसिकता बाधा थी जिसके अनुसार केवल सत् का ही अस्तित्व होता है, असत् का नहीं। बोह्म की भौतिकी में ऐसी कोई चीज नहीं है जिसकी इयत्ता नहीं की जा सके यानी कि यह वह है, कह कर नहीं दिखाया जा सके। बोह्म के सिद्धांतों और पूरब के विचारों विशेषकर उपनिषदों की शिक्षाओं में एक अद्भुत साम्यता है। छांदग्योपनिषद् में श्वेतकेतु और उसके पिता उद्दालक का एक संवाद पाया जाता है। जब बारह वर्षों तक वेदों का अध्ययन करने के बाद श्वेतकेतु वापस आता है तो उसके पिता उससे पूछते हैं कि श्वेतकेतु, क्या तुमने वह ज्ञान प्राप्त कर लिया है जिसको पाने से हम न सुने जाने योग्य को सुन सकते हैं, न प्राप्त किए जाने योग्य को प्राप्त कर सकते हैं और न जानने योग्य को जान सकते हैं। श्वेतकेतु ने पूछा कि वह ज्ञान क्या है? उद्दालक ने कहा कि यह वह ज्ञान है जिसे जानने से हम सब कुछ जान लेते हैं। इसका विस्तार करते हुए उद्दालक आगे कहता है कि प्रारंभ में केवल सत् था। केवल एक और अद्वितीय। उससे ही पूरा जगत उत्पन्न हुआ। हिंदू दर्शन में ब्रह्मांडीय चेतना हरेक अंश को शेष ब्रह्मांड से जोड़ती है। स्वामी विवेकानंद कहते हैं, बाह्य जगत सुझावों का जगत है। जो भी हम देखते हैं वह हमारे मस्तिष्क द्वारा दिखाया गया होता है। मैक्स प्लांक का भी मानना था कि पदार्थ चेतना से ही उत्पन्न है। प्लांक ने कहा, च्चेतना को ही मैं मूल मानता हूँ। मेरा मानना है कि पदार्थ चेतना से ही उत्पन्न है। हम चेतना से परे नहीं जा सकतेज् इस प्रकार हम पाते हैं कि आधुनिक भौतिकीविदों की भाषा हमारे आध्यात्मिक गुरूओं की भाषा से मेल खाने लगी है। राबर्ट ओपेनहाइमर ने कहा कि यदि पूछा जाए कि क्या इलेक्ट्रान स्थिर हैं, तो हमारा उत्तर होगा कि नहीं, और यदि पूछा जाए कि क्या इलेक्ट्रान स्थिति बदल रही है, हमारा उत्तर होगा कि नहीं। इसकी तुलना इस उपनिषद् वाक्य से करें – वह हिलता है, वह नहीं हिलता, वह दूर है, वह सबसे नजदीक है, वह सबके अंदर है, वहीं सबके बाहर है। सभ्यता के युग से हजारों वर्ष पहले भारत के ऋषियों ने इसे अनुभूत कर लिया था। उन्होंने सृष्टि के मूल को ब्रह्म के रूप में पहचाना था। उनका मानना था कि मनुष्य के अस्तित्व का उद्देश्य और परम ज्ञान उसी परम सत्ता ब्रह्म को जानना है। यह हालांकि उतना सरल नहीं है। इसे उन्होंने तलवार की धार पर चलने के समान कठिन माना।