वेदों से होगा भारत का पुनरोत्थान

एक ओर जहां भारत में वेदों को पिछड़ेपन और पुरातनपंथ का प्रतीक माना जाता है, विदेशों में इसके प्रति आकर्षण, अनुराग और शोध की प्रवृत्ति बढ़ रही है। पिछले दिनों यह बात और तीव्रता से सामने आई जब ‘फाउण्डेशन फॉर ‘ वैदिक इण्डिया और ‘महर्षि वेदव्यास प्रतिष्ठान’ द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित सेमिनार में यूरोप से आए विद्वानों ने वेदों के बारे में उनके द्वारा किए गए शोध-निष्कर्षों को सामने रखा। वैदिक भारत की पुनस्र्थापना के विषय पर आयोजित यह तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार नई दिल्ली में गत 21, 22 एवं 23 फरवरी को संपन्न हुआ। इस सेमिनार में विश्व के 40 देशों से वैदिक विद्वान और साधक आए। इनमें 40 प्रतिशत ईसाई, 10 प्रतिशत बौद्ध, 5 प्रतिशत यहूदी, 3 प्रतिशत मुसलमान, 5 प्रतिशत नास्तिक और शेष मानवतावादी थे। सभी का मानना था कि वेद किसी एक पंथ विशेष तक सीमित नहीं हैं, वे मानव मात्र के लिए हैं। वक्ताओं ने वैदिक शिक्षा, वैदिक तकनीक, वैदिक विज्ञान, वैदिक समाज, योग, ध्यान आदि विषयों पर बहुत ही शोधपूर्ण बातें कीं।

भारत को अपने वेद पर गौरव अनुभव करना चाहिए। हालांकि वेद केवल भारत का नहीं है, यह वैश्विक और {jathumbnail off} प्राकृतिक है। वेद हर किसी के लिए है। वेद विज्ञान है और यह हमारे जीवन से अंधेरा दूर करता है, आनन्द देता है। वेद में मस्तिष्क, विज्ञान और तकनीक का समावेश है। वेद हमें आत्मा का साक्षात् अनुभूति कराता है। वेद के अनुसार जीना ही वेद को अपनाना है। वेद में ब्रह्माण्ड की पूरी संरचना मिलती है। वेद ही ब्रह्म है। यह सभ्यता और शान्ति को सन्तुलित करता है। हमारे गुरु देव महर्षि महेश योगी ने बताया है कि अक्षर, ध्वनि, तरंग सबमें वेद है। वेद शाश्वत है। वेद ज्ञान का भण्डार है। वेद की ऋचाएं पूरी तरह वैज्ञानिक हैं। वेद में प्रयुक्त ‘विराम’, ‘अल्पविराम’, ‘पूर्ण विराम’ आदि से जो ध्वनि निकलती है उसका भी महत्व है। वेद तकनीक का प्रतिनिधित्व करता है। विश्व में ऐसी कोई तकनीक नहीं है जिसका वर्णन वेद में नहीं है। ऋषि-मुनियों ने जो मार्ग बताया है उसी पर चलकर हम वेद को जान सकते हैं।

प्रो. टोनी नादर, प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट

वेद अनन्त ज्ञान का स्रोत है। सारे ज्ञान वेद से आते हैं। आप जितनी बार वेद का अध्ययन करेंगे उतनी बार आपको नया ज्ञान मिलेगा। वेद इस सृष्टि के साथ आए हैं। इस पर जितना अधिक शोध होगा उतना ही अधिक अच्छा होगा। जब तक पिण्ड ब्रह्म नहीं बनेगा तब तक हम वेद को समझ नहीं सकते हैं। योग के द्वारा हम वेद ज्ञान तक पहुंच सकते हैं। वेद हमें बताता है कि आत्मा ही ब्रह्म है। हम सब एक ही ब्रह्माण्ड के भाग हैं। यदि यह विचार पूरे विश्व में जाता तो आज जो सीरिया, इराक आदि देशों में लड़ाई-झगड़े हो रहे हैं वे नहीं होते। इसलिए हमें वैदिक ज्ञान को पूरी दुनिया में ले जाना है। वैदिक संस्कृति हमें बताती है कि आपके पास जो कुछ भी है उसे बांटें। सबके हित और कल्याण की चिन्ता करें। पशु, पक्षी, प्रकृति सबके साथ सामंजस्य बनाकर चलें। यदि ऐसा होगा तो निश्चित रूप से यह दुनिया बहुत सुन्दर होगी।

डॉ. मुरली मनोहर जोशी, वरिष्ठ भाजपा नेता

भारतीय संस्कृति पर हमें गर्व है। यह ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है। आज कम्प्यूटर के जरिए हम नक्षत्रों और ग्रहों की स्थिति को देखकर कुछ भविष्यवाणी करते हैं, लेकिन हमारे ऋषि-मुनि हजारों वर्ष पहले ही इस विद्या में पारंगत थे। हमारे यहां हजारों वर्ष पूर्व भी शल्यक्रिया होती थी। यह सब ज्ञान वेद से ही मिला है। संस्कृत की जानकारी के बिना हम वेद के ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

डॉ. जी. माधवन नायर, भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष

वैदिक योग ही वास्तविक योग है।  इस समय विश्व की तीन प्रमुख समस्याएं हैं। एक, मजहबोन्माद, दूसरा, युद्धोन्माद और तीसरा भोगोन्माद। एक वर्ग मजहबी उन्माद का पागलपन दिखा रहा है। यही पागलपन युद्धोन्माद खड़ा करता है। भोगोन्माद वाले हर चीज का भोग स्वयं ही करना चाहते हैं, जबकि वैदिक संस्कृति हमें बताती है कि जितनी आवश्यकता है उतना ही लो। वेद के मार्ग पर चलने से ही इन समस्याओं का समाधान हो सकता है। वेद सम्पूर्ण ज्ञान का मूल स्रोत है। वैदिक भारत और फिर वैदिक विश्व बनाने के लिए हर कोई प्रयास करे। भारत सरकार भी वेद को बढ़ावा देने के लिए सार्थक प्रयास करे। वेद ही शक्ति और समृद्धि का मार्ग खोलेगा।

स्वामी रामदेव, योग गुरु