जरुरी है आयुर्वेद का आधुनिकीकरण

जवाहर लाल कौल

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

आयुर्वेंद का महत्त्व इस बात में है कि यह विश्व की अन्य चिकित्सा प्रणालियों से भिन्न केवल रोगोपचार पद्धति भर नहीं, अपितु जीवन जीने का विज्ञान है। इसके नाम से ही स्पष्ट है कि यह आयु का विज्ञान है जिसका उद्देश्य मानव को जीवनभर स्वस्थ और सक्रिय रखना हेै। स्वास्थ्य में आए विकारों को ठीक करना और जीवन को फिर से प्रगतिपथ पर लाना तो उस का एक ही आयाम है। स्वाभाविक है कि मनुष्य भी अन्य जीव जंतुओं की तरह प्रकृति का एक अंग है। इसलिए उसका प्रकृति के अनुकूल रहना अनिवार्य है। प्रकृति के प्रतिकूल व्यवहार ही उसके विकारों का कारण बनता है। मनुष्य प्रकृति के अनुकूल रहे, इसके लिए प्रकृति को समझना और उसके नियमों की तह तक जाना आवश्यक था। आयुर्वेद प्रकृति के गहन अध्ययन से ही विकसित प्रणाली है। आदिकाल से ही मनुष्य इस धरती के हर भाग में यही करता रहा है – प्रकृति को समझने की कोशिश। और उसी से मानव समाज के हर वर्ग ने अपनी जानकारी के अनुरूप कोई न कोई चिकित्सा प्रणाली विकसित कर ली जो उस समूह की सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति करती रही है। आदिम जातियों में प्राकृतिक चिकित्सा के ज्ञान की कम या अधिक मात्रा पाई जाती थी। लेकिन प्रकृति को समझने और उस से प्राप्त जानकारियों को नियमों और {jathumbnail off} सिद्धांतों में बदलने, मानव जीवन के स्वभाव के अनुकूल उपचार का विकास करके उसे विज्ञान के स्तर तक ले जाने वाली कुछ ही प्रणालियां विश्व में विकसित हो पाईं।

विज्ञान प्रेक्षण पर ही आधारित है, उससे ही विकसित होता है। हम नित्य सूर्य को पूर्व से उगता और पश्चिम में डूबते देखते रहे हैं तो हमने इस निरंतर गतिविधि के आधार पर पृथ्वी ओैर सूर्य के सम्बंध के नियम बनाए। लेकिन ये नियम एक दिन या काल खण्ड मेें ही नहीं बने। सूर्य और ग्रहों के बारे आज की हमारी जानकारी सदियों के प्रेक्षण और अध्ययन के बाद मिली है। विज्ञान के अधिकतर नियम ऐसी ही प्राकृतिक गतिविधियों के गहन अध्ययन से ही बने हैं।

अधिकतर आदिमकालीन जनजातियों का प्राकृतिक ज्ञान एक सीमा से आगे नही जा पाया। भौगोलिक, राजनैतिक, आर्थिक या धार्मिक कारणों से उस में लगातार वृद्धि नहीं हो पाई। चिकित्सा के बारे में विश्व की अनेक जनजातियों में आज भी बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारियां मिलेगी लेकिन यह ज्ञान विधिवत एक नियमबद्ध विज्ञान के रूप में केवल कुछ ही देशों में विकसित हुआ। आयुर्वेद चिकित्सा और मानव स्वास्थ्य के बारे विकसित पहली प्रणाली है। ऐसी प्रणाली जो आज भी स्वास्थ्य के बारे में अपने मौलिक दृष्टिकोण के कारण प्रासंगिक है।

विश्व में सबसे अधिक प्रचलित प्रणाली एलोपैथी का विकास उस समय हुआ जब आधुनिक विज्ञान पूर्व में राजनैतिक कारणों से ठहराव की स्थिति में था, लेकिन पश्चिम रेनांसां यानी पुनर्जागृति के दौर से गुजर रहा था। जब भौतिकी और रासायनिकी के नए सिद्धांत खोजे गए थे और इन का प्रभाव प्राणी विज्ञान के लिए वरदान बन गया था। एलोपैथी को शरीर की गहन जांच के उपकरणों के विकास में भौतिकी का सहारा मिला और औषधि निर्माण में रासायनिकी का योगदान महत्त्वपूर्ण था। स्पष्ट है कि यह प्रणाली रासायनिक औषधियों निर्माण और कायिक जांच के भौतिक उपकरणों के बल पर विकसित हुई।

आज आयुर्वेद और एलोपैथी में टकराव सैंद्धांतिक कम और व्यावसायिक अधिक है। विश्व स्तर पर विराट औषधि उद्योग के खरबों के कारोबार को जिससे भी खतरा पैदा होता है, उसी के विरुद्ध वह जंग का एलान कर देता है, वह चाहे सरकारें हों या प्रतिद्वंदी चिकित्सा प्रणालियां। यही कारण है कि आयुर्वेद और इस से जुड़ी अन्य प्रणालियां जैसे यूनानी को अपने मूल देशों से बाहर जाने के रास्ते बंद करने की कोशिश की जाती है।

यूरोपीय वर्चस्व के कारण पिछले दो सौ सालों में इन देशों पर अंगेजो का राज्य था और अपने मूल देशों में भी देसी प्रणालियां दोयम दर्जे पर ही स्थापित हैं। एलोपैथी अंग्रेजी साम्राज्य के साथ विश्वव्यापी हो गई। लेकिन क्या हम आयुर्वेंद को अपने देश में पर्याप्त विकास का अवसर दे रहे हैं? हमें याद रखना होगा कि आर्युेद और एलोपैथी, दोनों में गम्भीर काल व्यवधान के कारण कुछ छूट गया है या अधूरापन रह गया है। पश्चिमी चिकित्सा प्रणाली का वर्तमान स्वरूप मध्यकाल में उस समय विकसित होने लगा जब कि मानव समाज का प्रकृति से नाता कमजोर होने लगा था और यह धारणा पनपने लगी थी कि मानव प्रकृति को काबू कर सकता है, उसे मनचाही दिशा में मोड़ सकता है। प्रकृति के शोषण के दुष्परिणाम तो दो सदी बाद ही दिखने लगे लेकिन तब तक एलोपैथी खालिस कीमियाई करतब बन गई थी।

एलोपैथी स्वाभाविक रूप से प्रकृति की कोख से पैदा नहीं हुई। मनुष्य का वह शैशव काल उसने नहीं देखा जबकि वह प्रकृति की गोद में ही खेलता था और उससे ही सीखता था। इसके विपरीत आयुर्वेद मध्यकाल में लुप्तप्राय या सुप्त अवस्था में आ गया था। वह काल जब विज्ञान अंगडाई ले रहा था और शरीर के बारे में ही नई जानकारियां नहीं मिल रही थी और जांच के नए साधन भी उपलब्ध हो रहे थे।

आज हम मानते है कि ज्ञान सार्वदेशिक है और समस्त मानव समाज के लिए है, उसे क्षेत्रीय या देशीय खांचों में नहीं बांटा जा सकता है। इसलिए यह कामना करना स्वाभाविक है कि हम प्रतिस्पर्धी चिकित्सा प्रणालियों के चक्कर में न पड़ कर मानव मात्र के लिए एक ही समग्र प्रणाली का विकास करें। इसके लिए आदान-प्रदान की आवश्यकता है। जो हमारे पास है, हम दें और जो उनके पास है, उसे हम अपना लें।

 यह आज एक सपना ही लगता है, क्योकि हम जानते हैं कि वर्तमान पूर्वाग्रहों के युग में पश्चिम से यह उम्मीद करना कि वह भारतीय चिकित्सा प्रणाली की कुछ विशेषताएं और उपलब्धियां अपनाए, बबूल से आम मांगने के बराबर ही हेै। पश्चिम से वर्चस्व की लड़ाई लडऩे के बदले हमें अपने ज्ञान को अधिक सार्थक और उपयोगी बनाने का प्रयास करना होगा। हम जानते हैं कि आज भी पारंपरकि आयुर्वेद जितनी जड़ी बूटियों पर आधारित है, वह वास्तविक उपलब्ध औषधि पदार्थों से बहुत कम है। हमें मालूम है, हमारे गावों में आज भी अनेक वनस्पति पदार्थ उपचार के रूप में उपयोग में लाए जाते हैं। कुछ वनस्पतियां तो कई असाध्य रोगों के लिए भी बहुत उपयोगी सिद्ध हुई हैं। इस लौकिक ज्ञान भंडार का सही तरीके से अभी भी दोहन नहीं हुआ है। लगभग एक हजार वनस्पति पदार्थों के बदले कई हजार औषधि पदार्थ हमारी पहुंच के भीतर है। हमारे वैद्यों और छात्रों के लिए एक व्यापक मेटीरिया मेडिका उपलब्ध होगी अगर हम इस भण्डार को विधिवत् सम्हाल लें।

मानव काया को देखने का हमारा अपना मौलिक दृष्टिकोण ही हमारी उपलब्धि है, लेकिन शरीर को जांचने के उपकरणों के उपयोग की तो मनाही नहीं होनी चाहिए। आयुर्वेद के छात्रों को विज्ञान की उपलब्धियों से वंचित रखने का कोई कारण नहीं है। जब सुश्रुत शल्य चिकित्सा करते थे तो वे भी कई प्रकार के उपकरणों का ही उपयोग करते थे। अंतर केवल यह है कि आज उनकी गुणवत्ता और विविधता अधिक है। मेडिकल टेक्नोलाजी को अपनाने से रोग को जांचने में सुविधा ही होगी और वैद्य की व्यावसायिक कुशलता में ही वृद्धि होगी।

विज्ञान एक स्थान पर ठहरा हुआ ज्ञान नहीं होता। हमने आरम्भ में सूर्य का उदाहरण दिया। पृथ्वी सूर्य और ग्रहों के बारे में हमने अपने ज्ञान में लगातार वृध्दि और संशोधन किए हैं और यही अन्य आयामों में भी विज्ञान के विकास की कहानी है। इसलिए आवश्यक है कि जो ज्ञान यात्रा हमने वैदिक युग से ईसा बाद आठवीं शताब्दी तक जारी रखी थी, उसे फिर से आरम्भ करें और उसे नई गति दें। अगर हम अपने देश में यह सिध्द कर सकें कि आयुर्वेद हमारी स्वास्थ्य और रोगोपचार की अधिकतम आवश्यकताओं को पूरा करता है तो इसे भारत से बाहर विश्वव्यापी बनने से कोई भी नहीं रोक सकता है। तभी मानव के लिए एक समग्र उपचार प्रणाली की आवश्यकता भी महसूस की जाएगी।