कब तक चलेगा आयुर्वेद का औपनिवेशिक नीतियों से संघर्ष

रवि शंकर
लेखक सभ्यता अध्ययन केंद्र, दिल्ली के निदेशक हैं।


सर्वोच्च न्यायालय ने बाबा रामदेव की माफी स्वीकार नहीं की। न्यायमूर्ति ने कहा कि यहां आम आदमी की सेहत पर असर पड़ा है। अच्छी भावना के साथ रिप्लाई किया है, क्या ये अच्छी भावना है। हमें ऐसी सभी कंपनियों को लेकर फिक्र है, जो ऐसे लुभावने विज्ञापन देती हैं और लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। न्यायालय ने बाबा रामदेव को कहा कि लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने के लिए वे बड़ी कार्रवाई के लिए तैयार रहें।

चिंतनीय मुद्दा यह है कि बाबा रामदेव के खिलाफ यह मुकदमा इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा किया गया था। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की ओर से 17 अगस्त 2022 को दायर की गई याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें कहा गया था कि पतंजलि ने कोविड वैक्सीनेशन और एलोपैथी के खिलाफ निगेटिव प्रचार किया। वहीं खुद की आयुर्वेदिक दवाओं से कुछ बीमारियों के इलाज का झूठा दावा किया।

समझने की बात यह है कि यह झगड़ा बाबा रामदेव और आईएमए का है ही नहीं। यह झगड़ा है सरकारी चिकित्सा पद्धति एलोपैथ और आम जनता की स्वास्थ्य पद्धति आयुर्वेद का और यह झगड़ा काफी पुराना है। इस झगड़े की जड़ है औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय विज्ञान को अंधविश्वास और उनके अपने तुक्कों को विज्ञान के रूप में स्थापित करने के प्रयास। डेविड ऑर्नाल्ड की 18वीं शताब्दी की ब्रिटिश स्वास्थ्य नीतियों पर लिखी पुस्तक कोलोनइजिंग द बॉडी में इस झगड़े के भरपूर सूत्र प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटिश सरकार की वैक्सीन की नीतियों को देख सकते हैं। ऑर्नाल्ड यह दर्ज करते हैं कि यूरोप द्वारा किसी भी प्रकार की वैक्सीन का आविष्कार करने से पहले भारत में चेचक के टीकाकरण की एक प्रक्रिया यहाँ के गुरुकुलों, ब्राह्मणों और मालाकार जाति के पुजारियों द्वारा चलाई जाती थी और यह प्रक्रिया शीतला देवी के मंदिरों में ही संपन्न की जाती थी। अंग्रेजों ने इसे वेरियोलेशन कहा और इसकी प्रक्रिया की नकल करके चेचक का वैक्सीन तैयार किया। उनकी वैक्सीन काफी पीड़ादायक थी और सफल भी नहीं थी, क्योंकि इंग्लैंड से यहाँ आते-आते वह खराब हो जाती थी। परंतु ब्रिटिश सरकार ने भारतीय वेरियोलेशन (टीकाकरण) की पद्धति पर प्रतिबंध लगा दिया और अपनी वैक्सीन लगाने के प्रक्रिया को सरकारी कर्मचारियों के लिए अनिवार्य कर दिया था।

यह एक उदाहरण यह बताने के लिए पर्याप्त है कि सरकारी चिकित्सा पद्धति एलोपैथ का जनस्वास्थय् प्रणाली आयुर्वेद के प्रति विद्वेष कितना गहरा है। ब्रिटिश सरकार भारतीय स्वास्थ्य पद्धतियों को अवैज्ञानिक मानती थी और यूरोपीय चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने के लिए नीतियां बनायी गईं। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय चिकित्सा पद्धतियों पर रिपोर्ट देने के लिए डॉ. कोमैन आयोग का गठन किया। इस आयोग ने भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के बारे में नकारात्मक रिपोर्ट दी और इसका देश के वैद्यों ने भरपूर विरोध किया। भारत के स्वाधीनता संग्राम के गायब पृष्ठों में से कई पृष्ठ आयुर्वेद आदि भारतीय विज्ञान के संघर्ष के भी हैं, जिनका इतिहास की भारतीय पाठ्य पुस्तकों में कोई उल्लेख प्राप्त नहीं होता।

वस्तुस्थिति यह है कि वर्ष 1947 में सत्ता हस्तांतरण के बाद जवाहरलाल नेहरू की सरकार द्वारा यह निश्चय किया गया कि स्वाधीनता के बाद ब्रिटिश नीतियों, कानूनों और प्रशासन तंत्र को यथारूप में ही रखा जाएगा। कुछेक नाम अवश्य बदले गए, जैसे कि आईईएस को आईएएस कर दिया गया, परंतु उनका स्वरूप और तंत्र अंग्रेजी ही बनाये रखा गया। स्वाभाविक ही था कि औपनिवेशिक नीतियां ही नेहरू सरकार की स्वास्थ्य नीतियां बनीं, जिसमें एलोपैथ को वैज्ञानिक और आयुर्वेद आदि भारतीय पद्धतियों को अवैज्ञानिक मानकर ही कार्य किया जाता था।

दुर्भाग्य यह है कि इस सत्ता हस्तांतरण वाली स्वाधीनता के 70 ही नहीं, 77 वर्षों बाद भी देश की स्वास्थ्य नीतियां, सरकार की मानसिकता और न्याय आदि सभी तंत्रों की समझ पर वही ब्रिटिश औपनिवेशिकता हावी है। प्रश्न यह है कि आईएमए ने जब पतंजली के दावों से लोगों को नुकसान होने की बात कही, तो इस बात की जाँच की जाती कि देश में कितने लोगों ने पतंजली की दवाओं का सेवन किया और उनका कोरोना बढ़ गयी या फिर वे मृत्यु को प्राप्त हुए और फिर उसकी तुलना एलोपैथ के दावों की जाँच की जाती कि कितने लोगों ने एलोपैथ की दवाओं का सेवन किया और फिर भी उनका कोरोना बढ़ गया या वे मृत्यु को प्राप्त हुए। यह एक निष्पक्ष जाँच होती। इससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता। यह जाँच भी की जानी चाहिए थी एलोपैथ द्वारा कोरोना के इलाज के प्रोटोकोल में निरतंर किये जाने वाले परिवर्तनों को कितना वैज्ञानिक माना जा सकता है और उन परिवर्तनों के कारण कितनी मौतें हुईं। हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि कोरोना के प्रथम फेज यानी वर्ष 2020 में ही वल्र्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन द्वारा कोरोना के इलाज के प्रोटोकोल में तीन से चार परिवर्तन हो गए थे। उल्लेखनीय यह भी है कि एक ओर अस्पतालों में कोरोना से लाशों का ढेर लग रहा था, परंतु आयुर्वेद के अस्पतालों में कोरोना के रोगी ठीक हो रहे थे, कोई भी आईसीयू तक में नहीं जा रहे थे।

दुर्भाग्य यह भी है कि सर्वज्ञ होने का अहंकार पाले देश की न्यायपालिका के पास किसी भी चीज को जाँचने का कोई साधन है ही नहीं। जिसके कागजात दे दिये जाएंगे, वह उनके आधार पर निर्णय देने के लिए बाध्य है। कागजी प्रमाणों पर काम करने वाली न्यायपालिका ने बाबा रामदेव को कहा है कि वह उनके कागजी माफी को स्वीकार नहीं करेगी। यह एक हास्यास्पद विरोधाभास ही है। दुखद यह भी है कि बाबा रामदेव ने एलोपैथ पर जो आरोप लगाए, न्यायालय ने उनकी जाँच किये जाने की भी कोई आवश्यकता नहीं अनुभव की। यह दुर्भाग्यजनक ही है कि वर्ष 1981 से पेट में गैस होने की सामान्य बीमारी के लिए दी जाने वाली दवा रेंटीडाईइन से कैंसर होने की संभावनाओं का पता जिन्हें 40 वर्ष बाद 2020-21 में चलता है, वे आयुर्वेद पर अवैज्ञानिक होने का आरोप लगाते हैं और न्यायालय इसे सही स्वीकार करता है। क्या न्यायालय एलोपैथ से भी उतनी ही कठोरता से प्रश्न पूछ सकता है, जितनी कठोरता उसने स्वामी रामदेव और आयुर्वेद के खिलाफ दिखाई है?

प्रश्न उठता है कि क्या न्यायालय यह मानता है कि जितनी एलोपैथ दवाओं का सार्वजनिक प्रचार किया जाता है और फार्मास्युटिकल कंपनियों द्वारा प्रभावी होने का दावा किया जाता है, उनसे लोगों और स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं होता? क्या न्यायालय ने स्वास्थ्य संबंधी विज्ञापनों की जाँच किये जाने के लिए कोई प्रभावी निर्णय दिया है? क्या न्यायालय के पास इन विज्ञापनों के स्वास्थ्य प्रभावों को जाँचने का कोई साधन भी है? कोका कोला, माउंटेन ड्यु जैसे शीतल पेयों, चाय जैसे गरम पेयों के प्रचारों की अभी बात नहीं कर रहा, वरना माननीय न्यायालय और अधिक संकट में आ जाएंगे।

बाबा रामदेव की गलती मात्र इतनी है कि वे यह भूल रहे हैं कि वे स्वयं एक योगी हैं तो एक कंपनी की मालिक भी हैं। आचार्य बालकृष्ण एक आयुर्वेदाचार्य हैं तो साथ ही एक कंपनी के मालिक भी हैं। उन्हें इस अंतर का ध्यान रखना चाहिए था और उस एलोपैथ से भिडऩे का प्रयास नहीं करना चाहिए था, जिसके पक्ष में केवल भारतीय शासन तंत्र नहीं नहीं, बल्कि पूरे विश्व का अंतरराष्ट्रीय ड्रग माफिया भी खड़ा है और जो अमेरिका तक की सरकार को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।