इस समय जब देश में चुनाव चल रहे है, लोकतंत्र के महापर्व को मनाने में देश व्यस्त है। पार्टियों के द्वारा अपने अपने दावे और वादे चल रहे हैं,साथ ही मौजूदा सरकार पर लोकतंत्र समाप्त करने के आरोप भी लग रहे हैं कि ये सरकार फिर से आई तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा, जिस लोकतंत्र के लिए पूर्वजों ने बलिदान दिया हो, जिस लोकतंत्र ने हमें, खाने,पीने का अधिकार दिया है उसे समाप्त कर दिया जाएगा। इस प्रकार के आरोप विपक्ष के द्वारा लगाए जा रहे हैं जबकि वर्तमान सरकार भारतीय धरोहरों की रक्षा के लिए प्रहरी का काम कर रही है।
अब प्रश्न आता है कि क्या भारतवर्ष में 26 जनवरी 1950 से पहले लोकतंत्र नही था? कैसी चलती थी भारत की न्याय व्यवस्था? क्या खाने, पीने का अधिकार नहीं था? ये प्रश्न प्रत्येक चिंतनशील व्यक्ति का होना चाहिए। भारतवर्ष के इतिहास में पिछले एक हजार वर्ष काफी उथल पुथल वाले रहे हैं, इन एक हजार वर्षों में मुस्लिम आक्रमणकारियों और अंग्रेजों ने भारत की संस्कृति सभ्यता को ना सिर्फ़ हानि पहुंचाई है बल्कि हमारे पौराणिक ग्रंथों और विचारों को नष्ट करने की पुरजोर कोशिश की है, यहां तक कि काफी हद तक वे सफल भी हुए हैं। भारतवर्ष में लोकतंत्र और गणतंत्र की जड़े काफी मजबूत रही हैं। इसके अनेकों उदाहरण आपको रामायण, महाभारत, वेदों एवम पुराणों में मिल जाएँगे।
लोकतंत्र का उद्देश्य है सबको न्याय मिले, सभी को जीने का अधिकार हो, राज्य के हित सुरक्षित रहें, सबके लिए एक समान न्याय व्यवस्था हो,शक्तियों का केंद्रीकरण ना हो। महाभारत,रामायण,वेद पुराण या फिर चाणक्य के अर्थशास्त्र में मंत्रिमंडल, आमात्य, सभा, समिति, गण, परिषद संघ और निकाय जैसे अनेकों व्यवस्थाएँ मिलती हैं।
राजा का निर्वाचन समिति के द्वारा किया जाता था। समिति सार्वजनिक कार्यों को संपादित करने वाली संस्थाओं में सर्वप्रमुख थी। यह जनसामान्य का प्रतिनिधित्व करती थी। परिचर्चा और पारस्परिक सम्मति से निर्णय लिए जाते थे। सभा समिति के अधीन कार्य करती थी। इसमें वृद्ध एवं अनुभवी लोगों को विशेष स्थान प्राप्त होता था। यह चयनित लोगों की स्थायी संस्था थी। ब्राह्मण ग्रंथों में वर्णित राज्याभिषेक के आरंभ से अंत तक के कार्यव्यवहार से स्पष्ट होता है कि राजा को राजपद प्राप्त करने से पूर्व राष्ट्र के विभिन्न अंगों की अनुमति प्राप्त करनी पड़ती थी, वह राष्ट्र में निवास करने वाले विभिन्न वर्गो और संसाधनों का प्रतिनिधत्व करता था। उसका निरंकुश होना संभव नहीं था। उसे मंत्रिपरिषद के परामर्श स्वीकृति और प्रजा के कल्याण की भावना से कार्य संपादित करना होता था।
रामायण के बालकांड के सातवें सर्ग में राजा दशरथ के यशस्वी होने का कारण राज्य के प्रमुख कार्यों में उनके मंत्रिमंडल की सहभागिता थी, जिसमें आठ मंत्री होते थे। राजा दशरथ के राज्य संबंधी अथवा अन्य किसी भी योजना संबंधी विषयों में एक विशाल मंत्रिसमूह की भूमिका उनकी लोकतांत्रिक दृष्टि का बोध कराती थी। महाभारत के शांति पर्व में गणराज्यों (जिन्हें गण कहा जाता था) की विशेषताओं का विस्तृत विवरण मिलता है। इसमें कहा गया है कि जब एक गणतंत्र के लोगों में एकता होती है तो वह शक्तिशाली हो जाता है और उसके लोग समृद्ध हो जाते हैं तथा आंतरिक संघर्षों की स्थिति में वे नष्ट हो जाते हैं। इसी पर्व में पितामह भीष्म युधिष्ठिर को लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का उपदेश देते हुए कहते हैं कि राजा को प्रजा के हित की रक्षा एवं धर्म का अनुसरण करना चाहिए तथा उसे सभासदों, प्रकृतिजनों एवं प्रजाजनों के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए। महाभारत में सभासदों की योग्यता, गणों की महत्ता, उसके गठन एवं निर्माण की रचना-प्रक्रिया, उनकी कार्यप्रणाली और उनके प्रशासनिक उत्तरदायित्वों आदि का भी पर्याप्त उल्लेख मिलता है।
इन उपरोक्त उदाहरणों के अलावा ऋग्वेद में 40 स्थानों पर, अथर्ववेद में 9 स्थानों पर, ब्राह्मण ग्रंथों में कई स्थानों पर गणतंत्र व राष्ट्र के कई संदर्भ हैं। महाभारत के बाद बौद्ध काल में (450 ईसा पूर्व से 450 ई. तक) अनेक गणतंत्र रहे हैं। पिप्पली वन का मौर्य, कुशीनगर और काशी के मल्ल, कपिलवस्तु का शाक्य, मिथिला का विदेह और वैशाली का लिच्छवी गणराज्य प्रमुख रहे हैं। वैशाली में राजा का विशाल चुनाव हुआ था।
इन तमाम तथ्यों के आधार पर हम कह सकते हैं कि प्राचीन भारत में लोकतंत्र की उत्तम व्यवस्था थी। जिसका मात्र उद्देश्य होता था, राष्ट्र और प्रजा का हित तो ऐसा कहना बिल्कुल उचित नहीं होगा कि प्राचीन भारत में लोकतंत्र नही था या फिर 26 जनवरी 1950 के बाद ही लोगों को बोलने, पूजा, संपति का, न्याय और अन्य अधिकार मिले हैं।





