असाध्य रोगों से बचा सकता है आयुर्वेद

अब समय आ गया है कि यह समझा जाए कि आयुर्वेद चमत्कार आधारित नहीं बल्कि पूर्णत: प्रमाण आधारित विज्ञान है। दुर्भाग्य की बात है कि पिछले कई दशकों से आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति न केवल शासकीय उपेक्षा का बल्कि आयुर्वेद के विषय में रत्ती भर भी ज्ञान न रखने वाले लोगों द्वारा किए गए अनेक दुष्प्रचारों का भी शिकार रही है। यह तो कहा ही जाता रहा है कि आयुर्वेद द्वारा किए गए उपचार की गति बहुत धीमी है इस कारण यह चिकित्सा पद्धति वर्तमान समय में कारगर नहीं हैं।

सुखद बात यह है कि इन सब आरोपों और उपेक्षाओं के बावजूद आयुर्वेद न तो कालवाह्य हुआ और ना ही अप्रासंगिक। देश में अनेक वैद्य ऐसे तमाम असाध्य रोगों का उपचार कर रहे हैं जिन्हें एलोपैथ और अन्य चिकित्सा पद्धति ठीक नही कर पाती हैं। बहुधा ऐसी अनेक घटनाएं जनसाधारण में कही और सुनी जाती हैं जबकि ऐसे रोगियों पर भी आयुर्वेद कारगर रहा जिनके परिजनों को बोल दिया गया था कि आप इन्हें घर ले जाएं और सेवा करें इसका कोई उपचार नहीं है।

कठिनाई यह है कि वैद्यों के पास रोगी रोग की प्रारम्भिक अवस्था में नही आता बल्कि रोग को बिगाड़ करआता है और फिर चाहता है कि वैद्य जी चमत्कार कर दें। खैर उसके बाद भी आयुर्वेद चिकित्सक धैर्यपूर्वक उपचार करते है और उन रोगियों को ठीक करते हैं जो मानते हैं कि आयुर्वेद कारगर नहीं है।

आयुर्वेद के आचार्यों ने रोगों को तीन श्रेणियों में बांटा है। सुख साध्य, याप्य (ऐसे रोग जिनमे रोगी को पथ्य और अपथ्य का विशेष ध्यान रखना होता है जैसे मधुमेह) और असाध्य। लेकिन आज हम उन रोगों की बाते कर रहे हैं, जिन्हें एलोपैथ असाध्य मानता है और उसे आयुर्वेदिक चिकित्सक ठीक कर रहे हैं। एंकाइलोजिग़ स्पॉन्डिलाइटिस, पैंक्रियाटाइटिस, रूमेटाइड आर्थराइटिस, अवास्कुलर नेक्रोसिस (ऑस्टियोनेक्रोसिस), फाइब्रोमायल्जया, क्रोनिक लिवर रोग, सारकोडोसिज़, मल्टीपल स्क्लेरोसिज़ आदि ऐसे रोग है जिसका उपचार करने में आधुनिक चिकित्सा पद्धति असफल रही है और इन्हें असाध्य माना जाता है लेकिन इन उपरोक्त असाध्य रोगों का आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति से सफल उपचार प्रतिष्ठित आयुर्वेदिक चिकित्सक कर रहे हैं इसलिए अच्छा है कि आयुष मंत्रालय ऐसे सब रोगों की सूची प्रकाशित करें जिन्हें आधुनिक चिकित्सा विज्ञान असाध्य मानता है और जिनका उपचार अनेक प्रतिष्ठित आयुर्वेदाचार्य करते हैं। अच्छा हो कि उन सब शोधों संकलनों को भी प्रकाशित किया जाए जोकि उपरोक्त असाध्य रोगों में आयुर्वेदिक चिकित्सा की उपयोगिता के संदर्भ में अबतक किए जा चुके हैं।

कोविड 19 जैसे महामारी के दौर में जब पूरा विश्व असहाय महसूस कर रहा था उस समय आयुर्वेद के प्रति हमारी आस्था हमें जीवनदायी संबल प्रदान कर रही थी। यही कारण था कि अनेक विश्व प्रसिद्ध संस्थानों के अनुमानों के विपरीत कोविड काल में अन्य देशों की तुलना में भारत में मृत्युदर कम रही। इसका सबसे बड़ा उदहारण नई दिल्ली स्थिति आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद है। जहां पर एडमिट होने वाला प्रत्येक रोगी निरोग होकर बाहर निकला। इसलिए अब मान लिया जाना चाहिए कि आयुर्वेद में बहुत दम है बस आवश्यकता है कि सरकार के द्वारा आयुर्वेद को वही प्रोत्साहन मिले जो आधुनिक चिकित्सा पद्धति को मिल रहा है।