चाणक्य की अर्थनीति

  प्रो.लल्लन प्रसाद
प्रख्यात आर्थिक विचारक एवं अध्यक्ष, कौटिल्य फाउंडेशन

आचार्य चाणक्य ने ऐसे राज्य की परिकल्पना की थी जहां राष्ट्र का स्वामी सबको सुरक्षा दे सके, सबके साथ न्याय करे, राज्य का विस्तार करे और उसे समृद्ध बनाये। अपने व्यक्तिगत हित में नहीं अपितु जनहित में तत्पर हो, स्वयं अनुशासित हो। जनता को भी उद्यमी बनाये, कृषि, उद्योगों और सार्वजनिक सेवाओं का कुशल प्रशासन हो, सरकारी अधिकारी निष्ठा और ईमानदारी से अपना कर्तव्य निर्वहन करें। श्रमिकों को उचित पारिश्रमिक मिले, महिलाओं, बूढ़ों और अशक्त लोगों के लिए कल्याणकारी योजनाएं हों, कृषकों और उद्यमियों को उत्पादन पर लाभ मिलें। किन्तु साथ ही साथ उन्हें उपभोक्ताओं का शोषण करने से रोका जाए। बाजार में सही दामों में सही चीजें उपलब्ध हो, सरकार के खर्चो के लिए कर लगाए जाएं, जो उचित हों, करदाता दे सकें और ऐसे वसूल किए जाए जैसे भौंरा फलों का रस लेता है किन्तु उन्हें हानि नहीं पहुंचाता।

प्राचीन भारतीय मनीषियों की परिकल्पना में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में धर्म और मोक्ष की प्रधानता रही, किन्तु चाणक्य ने मोक्ष को एक तरह से नकार दिया। ‘कौटिल्य अर्थशास्त्रÓ उद्यम या भगवत गीता के योग: कर्मसु कौशलम पर अधिक जोर देता है। धर्म की प्रधानता को मानता है किन्तु अर्थ के बिना धर्म को अधूरा समझता है। चाणक्य के पूर्व शुक्राचार्य और भीष्म पितामह सदृश्य मनीषियों ने भी अर्थ को महत्वपूर्ण माना। चाणक्य ने पुराने मनीषियों के विचारों का विशद उल्लेख अर्थशास्त्र में किया है और जहां उनसे वे सहमत नहीं थे, उन्होंने कारण भी दिये हैं। वे नहीं मानते थे कि साधू बनकर भिक्षावृत्ति से जीवन यापन करना मोक्ष देता है। हर व्यक्ति को अपने परिश्रम से धनोपार्जन करना चाहिए। सुखी एवं समृद्ध जीवन जीना चाहिए।

अर्थशास्त्र को परिभाषित करने में पृथ्वी-रत्नगर्भा वसुन्धरा और उद्यम को विशेष महत्व दिया है। अपने प्रयत्न से ही मनुष्य प्रकृति के दिये हुए साधनों की रक्षा करता है, उनका उपभोग करता है। पृथ्वी की प्राप्ति और उसकी रक्षा राष्ट्र के स्वामी का सबसे बड़ा दायित्व है। जो शास्त्र इन चीजों की व्याख्या करता है उसे अर्थशास्त्र कहते हैं। पाश्चात्य विद्वानों ने 19 वीं शताब्दी में अर्थशास्त्र की जो परिभाषा की, वह चाणक्य की सोच (लगभग 2500 वर्ष पूर्व) से बहुत भिन्न नहीं थी। उन्होंने माना कि अर्थशास्त्र का मुख्य उद्देश्य साधनों का मनुष्य की भलाई के लिए विकास और उपभोग है। साधन सीमित है, उनके उपभोग कई तरह के हो सकते है। अर्थशास्त्र बताता है कि साधनो का उपयोग कैसे किया जाय जिससे अधिकतम संतुष्टि हो।

कृषि, उद्योगों और सार्वजनिक सेवाओं के विकास के लिए राज्य की भूमिका का अर्थशास्त्र में भरपूर विवरण मिलता है। राजा को भूमि का स्वामी माना जाता था। खेती योग्य भूमि किसानों को दी जाती थी। अच्छे किस्म के बीज, सिंचाई के साधन, बैल, और खेती के उपयोग में आने वाली वस्तुएं राज्य की ओर से उपलब्ध करायी जाती थी, आर्थिक सहायता भी दी जाती थी। फसल कटने के बाद उधार दी गई वस्तुओं को वापस करने का विधान था। भूमि आवंटन के बाद यदि कोई किसान उस पर खेती नही करता तो भूमि उससे वापस ले ली जाती और उसे हर्जाना भी देना पड़ता। उत्पादन का निर्धारित हिस्सा किसान राज्य को देते थे। कितना हिस्सा राज्य का बनता है, इसका निर्धारण भूमि की गुणवत्ता, सिंचाई के उपलब्ध साधन, वर्षा, प्राकृतिक आपदाओं आदि को देखकर किया जाता था।

राज्य की ओर से कृषि प्रबन्धन के लिए जो अधिकारी नियुक्त किया जाता था, उसे सीताध्यक्ष कहते थे। कृषि शास्त्र, भूमि की पैमाइश और वृक्ष विज्ञान के जानकार को ही सीताध्यक्ष नियुक्त किया जाता था। अन्न, फल, फूल, शाक, कन्द-मूल, सन, जूट और कपास आदि के बीजों का संग्रह करने की जिम्मेदारी उसी की होती थी। वर्षा जल को नापने, भूमि की आवश्यकता अनुसार सिंचाई की व्यवस्था करने, खेतिहर मजदूरों को उचित पारिश्रमिक दिलाने की जिम्मेदारी भी उस पर ही होती थी। कौटिल्य अर्थशास्त्र में उन्नत बीज बनाने के तरीकों का भी उल्लेख है। जो किसान तालाब, बावलियां आदि स्वयं बनाते थे, उन्हें कर के रूप में उत्पादन का कम हिस्सा देना होता था। किसानों के स्वास्थ्य और उनकी कार्यक्षमता पर भी राज्य खर्च करता था। सुखी किसान ही देश को धन धान्य से परिपूर्ण कर सकता है, ऐसी चाणक्य की मान्यता थी। फसल कटने बाद उसके सुरक्षित भण्डारण की भी व्यवस्था करायी जाती थी।

खेती के अतिरिक्त भूमि का उपयोग जंगल लगाने, शहर और गाँव बसाने, दूर्ग बनवाने आदि के लिए किया जाता था। राज्य की ओर से वन लगाने और उनके संरक्षण की व्यवस्था के लिए जो अधिकारी नियुक्त किया जाता था उसे कुप्याध्यक्ष कहा जाता था। चन्दन,पलाश, अशोक आदि के अलग अलग वन लगाए जाते थे। जनपद की सीमा पर हस्तिवन लगाने की भी व्यवस्था थी। पंक्षियों को मारने वालो को प्राणदण्ड की सजा दी जाती थी। धनोत्पादन के मुख्य केन्द्रों पर बड़े बड़े नगर बसाये जाते थे जो वास्तुशास्त्र के अनुकूल होते थे और नदियों, तालाबों, जलाशयों के पास बनाये जाते थे। गांव बसाने का भी वर्णन अर्थशास्त्र में दिया गया है। प्रत्येक जनपद में कम से कम 100 घर और अधिक से अधिक 500 घर होते थे। गांवो की सीमा पर खाई, तालाब, वृक्ष आदि बनाए और लगाए जाते थे, श्मशान बस्ती से दूर बनाये जाते थे और उनके मार्ग भी अलग होते थे। किलों का निर्माण प्रकृति को ध्यान में रखकर किया जाता था। पानी से घिरे टापुओं, पहाड़ों, ऊसर भूमि, दलदल और कांटेदार सघन झाडिय़ों के वीच किलों का निर्माण कराया जाता था। किलों के आकार प्रकार, उनकें निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री उनकी उपयोगिता आदि का विवरण भी अर्थशास्त्र में मिलता है। नगर में आने जाने वाले जल और स्थल मार्ग की व्यवस्था भी राज्य की जिम्मेदारी थी। प्रदूषण मुक्त गांव और शहर बनाने और प्रकृति का संरक्षण करने के बारे में चाणक्य ने जो विवरण दिया है, वह न केवल बेमिसाल है बल्कि आज भी प्रासंगिक है।

उद्योगों का विकास राज्य की प्राथमिकताओं में थी। व उद्योग के प्रबंधन के लिए सूत्राध्यक्ष की नियुक्ति की जाती थी जो कपास, ऊन और रेशम से सूत बनाने, बुनाई करने,वस्त्र बनाने, चादर रस्सी आदि तैयार करने के कामों का निरीक्षण करता था।

भूमि के अन्दर छिपे खनिज सम्पत्ति जैसे सोना, चांदी, विभिन्न रत्न, तांबा, लोहा, मणि आदि को ढूंढ निकालने, खदानों की व्यवस्था करने, उनके उपयोग और विक्रय की देख रेख करने के लिए आकराध्यक्ष की नियुक्ति की जाती थी जो खनिज विज्ञान का विशेषज्ञ होता था। किस मिट्टी में कौन सा रत्न छिपा होता है, इसकी जितनी वैज्ञानिक व्याख्या चाणक्य ने की थी, उसका लोहा आज भी इस विषय के जानकार मानते है। धातुओं की गुणवत्ता परखने की विधि भी अर्थशास्त्र में दी गई है। धातुओं को नर्म या सख्त करने, उनको मिलाने और उनसे उत्पादन की विधियों का भी उल्लेख मिलता है। खनिज पदार्थ राज्य की सम्पत्ति माने जाते थे। निजी लोगों द्वारा निकाला जाना या बेचा जाना अपराध था। नियत स्थान पर उनकी बिक्री की व्यवस्था राज्य की ओर से की जाती थी।

सोने, चांदी और रत्नों के आभूषण अक्षशाला में तैयार कराये जाते थे जिनका प्रबन्ध सुवर्णाध्यक्ष करता था। कीमती धातुओं और उनसे आभूषण बनाने की कला में माहिर व्यक्ति ही इस काम में लगाए जाते थे। अक्षशाला में उत्पादन और विक्रय का प्रबन्ध होता था। बड़े बड़े भवन होते थे जहां चतुर, विश्वस्त और पारखी सर्राफों को वसाया जाता था और सुरक्षा के पुख्ता प्रबन्ध होते थे। सोने के प्रकार और उनके रंगों की व्याख्या अर्थशास्त्र में मिलती है। सोने को शुद्ध करने की विधि, गुणवत्ता जांचने की विधि का भी विवरण है। सर्वोत्तम सोना उसे बताया गया है जिसका रंग तपाने के बाद भी न बदले, कसौटी पर जिससे खिची रेखा केसर के समान रंग वाली, स्निग्ध, मृदु और चमकदार हो और जो बाहर भीतर एक सा हो। आभूषणों में मणियों की जुड़ाई की कला – कांचकर्म का भी उल्लेख है। कारीगरों की मजदूरी उनके कौशल और कार्य के घंटों के हिसाब से निर्धारित की जाती थी। अक्षशाला निर्माण केन्द्र से सोने, चांदी और रत्नों एवं उनके बनाने के औजार बाहर ले जाने पर प्रतिबन्ध होता था। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी होती थी।

उपभोक्ता पदार्थो जैसे गन्ने से गुड़, खांड, शक्कर आदि, सेंधा और समुद्री नमक, शहद, फलों के जूस, इमली, आंवला, नींबू, दही, मट्ठा मिर्च मसाले, गेंहु, दालें, धान, तिलहन आदि के उत्पादन, भण्डारण और विज्ञापन व्यवस्था का उल्लेख भी अर्थशास्त्र में मिलता है। भण्डारण की व्यवस्था के लिए कोष्टागाराध्यक्ष की नियुक्ति की जाती थी। कोष्टागार में सामान रखने का शुल्क लिया जाता था। जिन चीजों की बहुतायत होती थी उनका व्यापार निजी हाथों में होता था। राज्य अपने हाथ में वे व्यवसाय रखता था जो जनता के हित में आवश्यक था। जल और स्थल मार्गो के निर्माण, उनके रख रखाव और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य पर होती थी।

नौका परिवहन के अधिकारी को नौकाध्य़क्ष कहा जाता था। समुद्र, नदी, झीलों और सभी जलमार्गो की भली भांति देख-रेख, मछली, मोती और शंख आदि सामुद्रिक वस्तुओं की व्यवस्था, बन्दरगाहों की देख-रेख,शत्रु देश से अनधिकृत नौकाओं को नष्ट करना, जलमार्ग में संकट आने पर अपने व्यापारियों की नावों को सुरक्षित तट पर लाने एंव जलमार्ग से जाने वाली वस्तुओं पर चुंगी और निर्धारित कर वसूलने का दायित्व नौकाध्यक्ष पर होता था। जनपद में स्थल मार्गो का नियोजित ढंग से निर्माण और देख-रेख राज्य की ओर से होता था।

व्यापार के विकास और वस्तुओं की मांग और पूर्ति में तालमेल बनाए रखने के लिए पण्याध्यक्ष की नियुक्ति की जाती थी। स्वदेश में निर्मित और विदेशों अपात्रित वस्तुओं की विक्री का प्रबन्ध जिससे प्रजा को कोई कष्ट ना हो, उसकी जिम्मेदारी होती थी। यदि किसी वस्तु को और मंहगा करके बेचा जा सकता है किन्तु इससे प्रजा को कष्ट हो तो इसकी अनुमति नहीं थी। नावों और जहाजों से लाए जाने वाली वस्तुओं में कर में रियायत की व्यवस्था थी। राज्य की ओर से जो वस्तुएं व्यापारियों को विक्रय के लिए दी जाती थी। उनका पूरा हिसाब उन्हें देना पड़ता था जो व्यापारी देश में बनी चीजें बेचने विदेश जाते थे उनको परिवहन पर आने वाले खर्च, मार्ग में आने वाले संकट, विदेशी बाजार में लगने वाले करों और अन्य खर्चो के बारे में जानकारी दी जाती थी।

वस्तुओं के मापतौल के मानक स्थापित करने और तराजु, बाट आदि के प्रमाणन की व्यवस्था पौतवाध्यक्ष की जिम्मेदारी थी। सोने चांदी जैसी कीमती चीजों से लेकर भारी वजन के पदार्थ लोहे तांबे आदि, गन्ना और खाने पीने की चीजें सबके नापतौल की इतनी विशद व्याख्या जो अर्थशास्त्र में मिलती है और किसी प्राचीन ग्रन्थ में नहीं है। छोटी बड़ी तुलाएं कैसे बनायी जायं, किन धातुओं का उपयोग हो, उनके निर्माण में, कैसा हो उनका आकार प्रकार, उनकी क्षमता, बटखरों का निर्माण की प्रक्रिया और मानक, घी तेल आदि द्रव्य पदार्थो की माप के लिए बनाए जाने वाले वर्तन आदि के बारे में विस्तृत जानकारी अर्थशास्त्र में दी गई है।

 कम तौलना या मापना, बिना प्रमाणित तराजू और बाट रखना दण्डनीय अपराध था। वस्तुओं से होने वाले लाभ, उनकी लागत, उपादेयता, उपभोग सीमा और गुणवत्ता की अतिशयोक्ति, कीमतें चढ़ाकर अधिक लाभ कमाने, गा्रहक को धोखा देने, माल दबाकर रखने और मांग बढऩे पर अधिक कीमत वसूलने वाले व्यापारी दण्ड के भागी होते थे। उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने की जिम्मेदारी राज्य के अधिकाारियों की होती थी।

राज्य अपने खर्चों के लिए टैक्स वसूलती थी, शुल्काध्यक्ष की नियुक्ति करती थी जो व्यवसाइयों के हिसाब देखता था और निर्धारित कर वसूज करता था। किसानों से फसल का जो हिस्सा सरकार लेती थी, उसे एकत्रित करने की व्यवस्था सीताध्यक्ष को करनी पड़ती थी, भूमि कर भी वसूल किया जाता था और राज्य की समस्त भूमि का रिकार्ड रखा जाता था जिसके लिए भूमिकर अधिकारी नियुक्त होता था। आम उपभोग की वस्तुओं पर कर या तो नही लगाए जाते थे या वहुत कम दर पर लगाए जाते थे। विलासिता की वस्तुओं पर भारी कर चुकाने होते थे। कर की चोरी दण्डनीय था। सरकारी अधिकारी यदि जानबूझकर किसी से कम टैक्स वसूलते या मनमाना टैक्स लगाते तो वे भी दण्ड के भागी होते थे। कर दाताओं का शोषण दण्डनीय था। अधिकारियों से अपेक्षा की जाती थी कि वे एक माली की तरह फल फूल तोड़े और बगीचे की शोभा बनाए रखें न कि उसे उजाड़ दें, कोयले में परिवर्तित कर दें। विभिन्न मार्गो से निकलने वाले पदार्थो पर चुंगी निर्धारित दर पर देय होती थी। बिना चुंगी दिये माल निकालने, वस्तु की तौल कम बताने, कीमत घटा कर बताने, प्रतिबन्धित वस्तुओं को छुपा कर चुंगी से बाहर करने पर अनियमितता के अनूरूप जुर्माना वसूल करने और माल जहंा करने के प्रावधान भी थे। सरकारी अधिकारी यदि इस काम में किसी व्यापारी की मदद करते पाये जाते तो वे भी दण्ड के भागी होते थे। युद्ध या संकट की स्थिति में विशेष करों के प्रावधान भी थे।

राज्य के कोष का कुशल प्रबन्ध और उसकी वृद्धि चाणक्य के मतानुसार शासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। सारे कार्य कोष पर ही निर्भर हैं। अधिकारी कर वसूलने,राजकोष में जमा करने हिसाब किताब रखने और कोष की रक्षा करने के लिए नियुक्त किये जाते थे। उनके ऊपर निगाह रखने की भी विस्तृत व्यवस्था अर्थशास्त्र में दी गयी है। बलप्रयोग से खजाने की वृद्धि या बेइमानी से उसका क्षय करना, दोनों ही दंडनीय अपराध माना गया है। प्रशासनिक अधिकारी जनता के सेवक की तरह काम करें न कि शोषक की तरह, इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन की होती थी। राज्य को सशक्त और समृद्ध बनाने के लिए साम, दाम, दंड और भेद सबका प्रयोग आवश्यकतानुसार किया जाता था।