प्रो. बलवंत सिंह राजपूत
लेखक वरिष्ठ वैज्ञानिक, पूर्व कुलपति तथा पूर्व अध्यक्ष, उ.प्र. राज्य उच्च शिक्षा परिषद।
जल संरक्षण के संदर्भ में भारत के पूर्व प्रधान मंत्री स्व. श्री अटल बिहारी वाजपेई जी की बात का स्मरण हो रहा है कि अगर तृतीय विश्व महायुद्ध हुआ तो वो पीने योग्य जल के आधिपत्य के लिए होगा। जितनी तेजी से और अंधाधुंध गति से प्राकृतिक जलस्रोतों का दोहन ही नहीं बल्कि शोषण हो रहा है उसके परिणाम स्वरूप निरंतर सूखते प्राकृतिक झरने, ताल, नदियां, नलकूप तथा कुओं को देख कर उतनी ही शीघ्र अटल जी की इस बात में वर्णित जलाभाव का भय बढ़ता जा रहा है। भूमिगत जल का स्तर भी निरंतर गिरता जा रहा है। मुझे याद है कि मेरे दादा जी नदी, झरनों और कुओं का शुद्ध जल पिया करते थे, मेरे पिता कुंए और हैंड पंप का शुद्ध पानी पीते थे और हम टैंक के पानी को आर ओ द्वारा साफ करके अथवा बोतल के तथाकथित मिनरल वाटर को पीते हैं। यदि शुद्ध पीने योग्य पानी की उपलब्धता इसी गति से घटती रही तो हमारी अगली पीढिय़ां एक एक चम्मच पीने योग्य शुद्ध जल के लिए संघर्ष करती दिखाई पड़ेंगी। इस जल संकट से बचने के लिए हमे जल संरक्षण और जल स्रोतों की पवित्रता बनाए रखने की अपनी प्राचीन वैदिक वैज्ञानिक परंपराओं को पुन: स्वीकारना और अपनाना होगा।
वेदों में स्पष्ट निर्देश हैं कि अन्न एवम जल को प्रदूषण से मुक्त रखा जाए, वायुमंडल को स्वच्छ एवम स्वास्थ्यवर्धक रखा जाए तथा पृथ्वी को धन के भंडार के रूप में सहेज कर अक्षुण्ण रखा जाए एवम इसकी मृदा को हर प्रकार के प्रदूषण से मुक्त रखा जाए। इन वैदिक निर्देशों में प्रकृति एवम मानव के मध्य सामंजस्य एवम सादर संतुलन समाहित है। प्रकृति के प्रति प्रेम एवम श्रद्धा की ये परंपराएं वैदिक युग में प्रारंभ हुई तथा भारत में मानव सभ्यता के विकास में शीर्ष पर पहुंची। इसके परिणाम स्वरूप यज्ञ, प्रकृति प्रेम, जलस्रोतों के प्रति श्रद्धा एवम पारस्परिक सहिष्णुता तथा समायोजन की परंपराओं के माध्यम से पर्यावरण एवम समाज के मध्य स्थाई सहस्तित्व एवम स्थाई संतुलन का प्रदूर्भाव हुआ। इसके कारण आध्यात्मिक साधना एवम बौद्धिक सुग्रहिता के धागे इतनी सहजता से बुने गए कि मानव की सांसारिक स्थूल आवश्यकताएं बहुत सीमित रखी गई जिनकी पूर्ति प्रकृति द्वारा सहजता से की जाने लगी थी।
वेदों में बारंबार निर्देशित किया गया है कि शुद्ध वायु में सांस लो, शुद्ध जल और शुद्ध दुग्ध का पान करो, शुद्ध अन्न का सेवन करो तथा प्रदूषण रहित मृदा में उपजाए फलों और सब्जियों का भोजन में प्रयोग करो।
इन सभी वैदिक शिक्षाओं में जल, वायु, मृदा, ऊर्जा तथा आकाश ( सभी पंचभूत), मस्तिष्क, विचार, स्मृति, बुद्धि, एवम चेतना (सभी पांच सूक्ष्म तत्व) तथा सभी पांच तनमत्राओं ( रूप, गंध, रस,स्पर्श एवम शब्द) को सभी प्रकार के प्रदूषण से मुक्त रखने निर्देश दिए गए हैं।
वैदिक परंपराओं में जल को जीवन द्रव मानकर देव ( वरुण देव) के रूप में पूजा जाता है। कई वैदिक ऋचाओं में जल को शुद्ध, संरक्षित एवम प्रदूषण रहित रखने के निर्देश दिए गए हैं। विभिन्न नदियों की पूजा करने की भी वैदिक परंपरा रही है।
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिंधु कावेरी जलेस्मिन संनिधी कुरु।।
इन सातों नदियों को दैविक और बहुत पवित्र मानकर इनकी पूजा की हमारी परंपरा रही है। इनमें भीं गंगा को सुरसरी अर्थात देवों की दैविक नदी माना गया है। देवभूमि उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में देवप्रयाग में अत्यंत पवित्र नदियों अलकनंदा एवम भागीरथी के संगम से गंगा के रूप में इसकी पूजा की जाती है। इन में भीं गोमुख से प्रत्यक्ष रूप से प्रारभ होकर गंगोत्री होकर प्रवाहित होने वाली भागीरथी का बहुत आध्यात्मिक एवम वैज्ञानिक महत्व है। इसका जल बहुत शुद्धिकारक एवम कीट नाशक होता है जिसमें उपस्थित माइक्रोप्लासम प्रत्येक प्रकार की अशुद्धि को नष्ट करने में सक्षम होते हैं। इसी कारण प्रत्येक प्रकार की यज्ञ प्रक्रिया तथा पूजा में गंगा जल को प्रयोग किया जाता है। ये भी मान्यता है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु से पूर्व उसके मुख में गंगाजल की कुछ बूंदे डाल देने से शव में काफी समय तक दुर्गंध नही आ पाती है। इसी कारण अनेक छोटी नदियां और बरसाती नाले गंगा में मिलने के बाद गंगा के इन गुणों से युक्त हो जाते हंै। गंगोत्री से ऋषिकेश तक कई स्थानों पर भागीरथी (गंगा ) जल के सैंपल लेकर कई विदेशी वैज्ञानिकों ने भी शोध करके गंगा जल में पर्याप्त मात्रा में उपस्थित उन माइक्रोप्लासम को चिन्हित किया है जिनके कारण गंगा जल में अद्भुत शुद्धिकरण एवम कीटनास की क्षमता है। इस शोध के अनुसार एक ऑप्टिमम स्तर तक प्रत्येक प्रकार की अशुद्धि को नष्ट कर देने की क्षमता गंगा जल में होती है। गंगा के थोड़ी दूरी के प्रवाह में जब उसमें गिरने वाली रसायनिक एवम बैक्टिरियल अशुद्धियां इस ऑप्टिमम लेवल से अधिक हो जाति हैं तभी गंगा कुछ दूरी के प्रवाह तक प्रदूषित हो जाती है और फिर लंबी दूरी के प्रवाह में पुन: प्रदूषण रहित हो जाति है। भागीरथी गंगा के इन अद्भुत गुणों के कारण उसे हमारे सभी सद्ग्रंथों में परम आदरणीय एवम् पूजनीय माता माना गया है। मुख्य गंगा (भागीरथी एवम अलकनंदा) के अतिरिक्त देवभूमि गढ़वाल में निम्नलिखित चार और नदियों को। गंगा माना गया है।
केदार गंगा जो गंगोत्री से 17 किलोमीटर दूर 4,750 मीटर की ऊंचाई पर स्थित केदारताल से निकलती है और गंगोत्री में भागीरथी में मिल जाती है। असीगंगा जो डोडीताल से निकल कर उत्तरकाशी में भागीरथी में मिल जाती है। जध गंगा जो गंगोत्री से 10 किलोमीटर दूरी पर स्थित भैरवघाट में भागीरथी में मिल जाती है। धौली गंगा जो भारत और चीन की पर्वतीय सीमा स्थित ग्लेशियर से आरंभ होकर तपोवन में प्रवाहित होती हुई विष्णुप्रयाग में अलकनंदा में मिल जाती है। इन सभी गंगाओं के जल में भी वो ही शुद्धिकारक तथा कीटनाशक गुण पाए जाते हैं जो भागीरथी गंगा के जल में होते हैं।
जिन निम्नलिखित पांच ग्लेशियर्स से ये पांच गंगाएं ( मूल भागीरथी गंगा सहित) निकलती हैं उन्हें भी देवभूमि में बहुत पवित्र एवम पूजनीय माना जाता है : गंगोत्री ग्लेशियर, सतोपंथ ग्लेशियर, खतलिंग ग्लेशियर, नंदादेवी ग्लेशियर।
त्रिशूल ग्लेशियर
इन पवित्र नदियों के उक्त शुद्धिकरक एवम कीटनाशक वैज्ञानिक गुणों के कारण ही इनमें अन्य नदियों के देवभूमि में स्थित निम्नलिखित संगम स्थलों को पंच प्रयाग जैसी उच्चस्तरीय पवित्रता तथा दिव्यता की मान्यता सद्ग्रंथो में दी गई है;
विष्णु प्रयाग जहां पर 1,372 मीटर की ऊंचाई पर अलकनंदा में धौलीगंगा मिलती है।
नंद प्रयाग जहां पर 1,358 मीटर की ऊंचाई पर अलकनंदा में नंदादेवी शिखर से निकल कर प्रवाहित होने वाली नंदाकिनी नदी मिलती है।
कर्णप्रयाग जहां पर पवित्र अलकनंदा में 860मीटर की ऊंचाई पर कुमाऊं क्षेत्र से आनेवाली पिंडर नदी मिलती है।
रुद्रप्रयाग जहां पर परम पवित्र केदारधाम से आकर मंदाकिनी अलकनंदा में मिलती है।
देवप्रयाग जहां पर परम पवित्र दिव्य नदी भागीरथी में उक्त चार संगमों के जल से युक्त अति पवित्र अलकनंदा मिलती है।
प्रयागराज में पतितपावनी गंगा में पवित्र नदी यमुना तथा प्राचीनतम पवित्र नदी सरस्वती का संगम होता है। कुछ वैज्ञानिक सरस्वती के अस्तित्व को नकारते हैं परंतु ऋग्वेद में कहा गया है कि
सरस्वती माताओं में सर्वश्रेष्ठ है, नदियों में सर्वश्रेष्ठ है तथा देवियों में सर्वश्रेष्ठ है। इसी प्रकार उक्त वर्णित सभी नदियों को अति पवित्र एवम पूजनीय माना गया तथा उन्हें सभी प्रकार के प्रदूषण से मुक्त रखा गया। हमारे देश के सभी प्राचीन नगर, शिक्षा केंद्र, तथा वैज्ञानिक एवम सांस्कृतिक महत्व के सभी स्थल नदियों के तटों पर ही निर्मित किए गए थे।
अथर्वेद तथा यजुर्वेद के अनुसार शुद्ध जल पीने और शुद्ध जल में स्नान करने से आंतरिक एवम बाह्य मलों का नाश हो जाता है।
वर्षा के जल के सुरक्षित संचय और भूमिगत जल के संरक्षण की वैदिक परंपरा रही हैं। वेदों में जलस्रोतों के रूप में कूप, तडाग, झरनों तथा तालाबों के निर्माण की वैदिक परंपरा रही है एवम किसी भी जलस्रोत को दूषित करने के कृत्य को महापाप घोषित किया गया है। सभी नदियों में भगीरथी गंगा को बहुत पवित्र एवम श्रद्धा का केंद्र माना गया है तथा इसके जल को भौतिक, मानसिक एवम आत्मिक शुद्धि का कारक माना गया है।
वेदों में जल संरक्षण हेतु नदी तंत्र प्रबंधन, झरना प्रबंधन, ताल तंत्र प्रबंधन, भूमिगत जल प्रबंधन पर बहुत बल दिया गया है।
इन वैदिक परंपराओं का पालन करने से हम भविष्य के शुद्ध जल के अभाव संकट का सामना कर सकते हैं। इसलिए हमे निम्लिखित कार्य अविलंब रूप से प्रारंभ करने होंगे:-
1. समस्त शुद्ध जलस्रोतों के प्रति श्रद्धा के भाव से उनकी पवित्रता को अक्षुण रखते हुवे उनके शोषण को तुरंत रोकना होगा और किसी भी रूप में शुद्ध जल को नष्ट करने से पूर्णत: बचना होगा।
2. नदियों के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए उन्हें हर प्रकार के प्रदूषण से मुक्त करना होगा तथा उनमें सतत शुद्ध जल प्रवाह बनाए रखकर कुशलता से नदी तंत्र प्रबंधन करना होगा।
3. सूख गए जलस्रोतों को पुन: जल प्रवाहयुक्त बनाकर जाग्रत करके इनका प्रबंधन करना होगा ताकि भविष्य में ये सूख ना पाए।
पर्वतीय क्षेत्रों में सूख गए जलस्रोतों और झरनों को पुन: जीवित करना होगा और उनमें सतत जल प्रवाह बनाए रखने हेतु उनका कुशल प्रबंधन करना होगा।
प्राकृतिक खनिज युक्त स्वास्थ्य वर्धक जल स्रोतों को हर प्रकार के प्रदूषण से मुक्त रखते हुवे संरक्षित रखना होगा।
भूगर्भीय जल का अंधाधुंध दोहन रोकना होगा ( समरसेवी पंपिंग आदि पूर्णत: प्रतिबंधित करके) और उसका समुचित प्रबंधन सुनिश्चित करना होगा।
वर्षा जल को सुरक्षित ढंग से संचित करके उसका समुचित प्रबंधन करना होगा तथा शेष वर्षा जल को भूमि गत जल के रूप में संचित करना होगा जिस से भूमिगत जल का उच्च स्तर बना रहे।
ड्रेनेज तंत्र को नियंत्रित करके इसके जल को शुद्ध करके रीसाइकल करना होगा जिससे सिंचाई आदि कृषि कार्यों में और वस्त्र प्रक्षालन आदि में इसका समुचित उपयोग हो सके।
मुद्रीय जल को शुद्ध करके पीने योग्य बनाने की प्रक्रिया विकसित करनी होगी।
जल स्रोतों के कुशल प्रबंधन के साथ जलक्षेत्र ( वाटर शेड) प्रबंधन तथा जलस्रोत प्रवर्धन ( वाटर रिसोर्सेस एन्हांसमेंट) प्रबंधन की प्रकिया भी विकसित करनी होंगी।
इन कार्यों में शासन, प्रशासन, वैज्ञानिकों एवम स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ जन साधारण का भरपूर सहयोग भी आवश्यक होगा।




