विजय शंकर तिवारी
मुख्य संपादक
भाषा को मनुष्य योनि का प्राण कहा गया है। यदि मनुष्य भाषा विहीन होता तो शायद पशुवत जीवन व्यतीत कर रहा होता। कुछ लोग गूंगे होते हैं भाषा बोल नहीं सकते किन्तु भाषा समझ सकते हैं। आजकल तो गूँगों की शिक्षा ने उन्हें प्रबुद्ध की श्रेणियों में ला खड़ा किया है। वह पढ़ सकते हैं, समझ सकते हैं, लिख सकते हैं किन्तु बोल नहीं सकते। किन्तु उन्हें एक विशेषण मिल गया है गूँगों का। कुछ भी हो भाषा ने मनुष्य को मनुष्य बनाया है इसे नकारा नहीं जा सकता। संसार भर में अनेकों देश हैं, सभी देशों की अपनी भाषा है, लिपियों में विभेदता है किन्तु काफी भाषाओं का जब गहनता से विचार करते हैं तो वे संस्कृत के समीप लगने लगती हैं।
संस्कृत के सन्दर्भ में कहते भी हैं कि यह सभी भाषाओं की जननी है। सभी भाषाओं का प्रस्फुटन संस्कृत से हुआ है। आवश्यकता केवल इस पर शोध करने की है। अकेले भारत में ही सैकड़ों भाषाएँ बोली जाती हैं। भले ही लिपियाँ सीमित हैं। एक लोकोक्ति भी है कोस-कोस में पानी बदले, चार कोस में बानी यानी पानी बदलने के स्थान दूरी कम है तो भी चार कोस में भाषा परिवर्तन हो जाता है। आखिर ऐसा क्यों है। यह भी समझने का विषय है। काफी प्रबुद्ध लोगों ने इस पर अध्ययन भी किया है किन्तु अन्त में उनका कहना होता है कि अमुक भाषा भी संस्कृत की पुत्री है।
विद्वानों ने भारत की भाषाओं को लिपि के आधार पर दो भागों में बाँट दिया है। एक तो द्रविड़ जो दक्षिण भारत में प्रचलित है दूसरी आर्य भाषा जो उत्तर भारत समूचे बंगाल की लिपि सहित है।वेदों को सबसे प्राचीन ग्रंथ की संज्ञा दी गई है। वेदों को संस्कृत भाषा में संकलित किया गया है। विश्व में जब कहीं लिपि नहीं थी भाषा भी वैज्ञानिक नहीं थी तब संस्कृत में समाज का मार्गदर्शन करने वाले सूक्त दिए गए। स्वाभाविक है विश्व की भाषाएँ संस्कृत से कहीं-न-कहीं जुड़ी अवश्य होंगी।
किन्नर क्षेत्र में बोली जाने वाली विविध भाषाएँ भी संस्कृत और हिन्दी के समीप हैं। ऐसा देखने और सुनने में मिलता है किन्नर बोलियों में पहाड़ी तथा हिन्दी भाषा तथा संस्कृत के इतने अधिक शब्द मिलते हैं कि व्याकरण को छोड़कर यह विश्वास करना कठिन लगता है कि यहाँ की भाषा कभी संस्कृत से भिन्न रही होगी। ऐसा मानना ठीक होगा कि प्रारम्भ में इस क्षेत्र की बोली संस्कृत पश्चात् में तिब्बती तथा बर्मी भाषाओं के साथ मिश्रित हुई होगी। भाषा में द्विवचन की विद्यमानता से यह स्पष्ट हो जाता है कि किन्नरी भाषा में संस्कृत के शब्द उधार लिये हुए हैं।
संस्कृत भाषा में प्रत्यय के रूप में ‘मÓ का प्रयोग होता है वहीं किनरी भाषा में ‘ङ’ का प्रयोग होता है। कई बार तो लगता है कि ‘ङ’ ‘म’ का ही परिवर्तित रूप है। उदाहरण के लिए कुछ शब्द दिये जा रहे हैं-
माटिङ्-मिट्टी, कातिङ्-कार्तिक, पतरङ्-पत्तियाँ, माहङ्-माघ, (सभी महीनों तथा दिनों के साथ ‘ङ’ शब्द लगता है (तेलङ-तेल, गुरङ-गुड़, अश्लेचङ अषाढ़ का मेला, समुद्रङ्-नदी, देशङ्-गाँव, गाटङ्-घराट, शानङ्-ताला, वोर्षङ वर्षा, अनङ्-अन्न, ग्रोमतङ-गौमूत्र, द्वारङ्-दरवाजा, डालङ डाली, दूमङ धुआँ, धुईङ्-कोहरा, मुसलङ्- मुसल, दाखङ-अँगूर, जेष्टङ-बड़ा, जेठ, नामङ-नाम, कोनसङ छोटा, कानङ्-कान, धूपङ्-धूप, गन्दुङ-गाँठ, दोषङ-दोष, शिरङ-सिर, मुखङ- मुख, रोपङ-रोष, पिठिङ-पीठ, कूलङ-कुहल, ग्रासङ-ग्रास।
ऐसा लगता है कि संस्कृत के म् प्रत्यय की भाँति अथवा उसी से बिगड़ कर ही ‘ङ’ प्रत्यय लगा। जैसे कामङ-को काम के स्थान पर प्रयुक्त करते हैं। पर यदि यही शब्द संस्कृत में बोलना होता तो कामन ही बोला जाता है। तेल को किन्नर भाषा में तेलङ बोलते हैं पर संस्कृत में तेलम बोलते हैं। भाषा के साथ अंग्रेजों का भुलावा देने वाला इतिहास भी यहीं आकर पकड़ में आ जाता है। जहाँ उन्होंने आदिवासी आदि आर्यन सभ्यता की व्याख्या कर दी है।
हस्तरेखा के सन्दर्भ में कहा जाता है कि इनसे मनुष्य के भविष्य को बताया जा सकता है। नक्षत्र ग्रहों से ऐसा काम हो जाता है एक प्रकार से यदि किसी संस्कृति का अध्ययन करना होता है तो वहाँ की भाषा का साथ लेना आवश्यक हो जाता है। कहा जाता है कि रूस के एक चिकित्सक (वैद्य) जब भी किसी का उपचार करते थे तो पहले वह मरीज का हाथ देखते थे। उसके ग्रह नक्षत्र देखते थे तब कहीं उसका इलाज करते थे। उनके विषय में प्रसिद्ध था कि उनके हाथ से किया गया इलाज कभी निष्फल नहीं गया। तात्पर्य यह है कि अंग्रेजों की विभेदकारी नीति ने भी भाषा को कम हानि नहीं पहुँचाई।
सम्पूर्ण किन्नौर में कई विशेष प्रकार की बोलियाँ बोली जाती हैं जो एक-दूसरे से भिन्न होती हैं। कहीं-कहीं तो किन्नौर वाले ही आपस में नहीं समझ पाते। किन्तु वहाँ की सामान्य भाषा जो कल्पा और साँगला में बोली जाती है उसका ही माध्यम बनाकर वार्तालाप कर पाते हैं। संस्कृत के सबसे अधिक शब्द इसी कल्पा साँगला की भाषा में ही मिलते हैं। यहाँ पर जो विविध भाषाएँ बोली जाती हैं उनके केवल नाम ही यहाँ प्रस्तुत हैं-
कनौरमानुस्कद, छितकुली, हरिजनों की बोली, औरसों की बोली, न्यमस्कद, सुङनम की बोली, थेबर सकद, जंगी-लिप्पा-आसरंग की बोली, नमगिया की बोली है।
इन बोलियों में अनेक प्रकार की समानता भी है। और उच्चारण सम्बन्धी भिन्नता होते हुए भी इस क्षेत्र के लोग दूसरे क्षेत्र की बोली जब नहीं समझ पाते तो कनौरमानुस्कद का ही प्रयोग करते हैं।
एक वाक्य जो ‘किन्नर लोक-साहित्य’ से लिखा गया है उसमें लगता है कि संस्कृत शब्द ही द्वी समानत्व दिखता है शेष में काफी अन्तर है। वाक्य है-
एक आदमी के तीन पुत्र और दो पुत्रियाँ थीं।
1. कन्नौरमानुस्कद
इद मियू शुभ छङा रङनिश चिमे डूज्ञो।
2. औरसों की बोली
एक मानस रो त्रोन कनारी-सी दी छोटी थी।
3. हरिजन बोली
एक मणशे त्रोन छोई-सी दी छेटी ती।
इसमें ‘इद’ शब्द एक के लिए जो प्रयोग हुआ है वह किन्नौर की अन्य घाटियों की बोलियों में भी प्राय: प्रयोग हुआ है। यहाँ की भाषा ने हिन्दी के भी काफी शब्दों को आत्मसात किया है जो बोलते समय सहज ही समझ आ जाते हैं। जैसे-
रेकङ-रेखा, ओटक्याचिम अटकना, पोतटयामो-पलटना, रीशास- ऋषि, थोम्याम-थामना, आखौर-अक्षर, तोमासो-तमाशा, परिङ-पीड़ा, गरौतराड़-गौमूत्र, दियूसाङ-दिवस, सौंकट संकट, पुरशी-पुरुष, बौंसना- बसना, पौता-पता, धनाङ धान, दूपाङ धूप, जोरिङ-जोरी, फुक्यामो- जलाना, चकरङ-चक्र, बोगान भगवान, जैसे बहुत शब्द हैं जो हिन्दी के निकट बैठते हैं। किन्तु मैं प्रत्यय के साथ जो ङ लगता है वह किन्नौर की भाषा में बहुलता के साथ पाये जाते हैं।
परम्पराओं में भारतीय संस्कृति तथा भाषाओं में संस्कृत को इस क्षेत्र ने सुरक्षित रखा है। इस क्षेत्र में एक व्यापक शोध की आवश्यकता है जो प्राचीनता के आधार पर दर्शन हेतु भारतीय समाज का मार्गदर्शन कर सकता है।




