वैदिक परंपराओं में पर्यावरण संरक्षण

प्रोफेसर बलवंत सिंह राजपूत
लेखक पूर्व कुलपति तथा अध्यक्ष, उत्तरप्रदेश राज्य उच्च शिक्षा परिषद।


पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में विश्व में आधुनिक जागरूकता 1971 में हुए अंतराष्ट्रीय अर्थ सब्मिट के साथ प्रारंभ हुई तथा 1977 में मैन एंड एनवायरनमेंट विषय पर हुई अंतराष्ट्रीय कांफ्रेंस से उत्पन्न हुई पर्यावरण चेतना विश्व के लगभग सभी देशों में फैल गई। इसके फलस्वरूप भारत समेत विश्व के अनेक शीर्ष विश्विद्यालयों में विज्ञान के अनेक विभागो मे पर्यावरण संरक्षण पर विकास के दुष्प्रभावों पर शोध किया जाने लगा तथा ये धारणा बलवती होने लगी कि पर्यावरण संरक्षण एवम विकास परस्पर विरोधी अवधारणाएं हैं। इसके धारणा के कारण अनेक सामाजिक संगठनों एवम संस्थाओं ने अनेक संवेदन क्षेत्रों विशेष कर पर्वतीय क्षेत्रों एवम समुद्र तटों में प्रत्येक प्रकार के रचनात्मक विकास का विरोध भी प्रारंभ हुआ था। पर्यावरण संरक्षण पर 1992 में हुई रियो कांफ्रेंस से इंटीग्रेटेड एप्रोच ऑफ सस्टेनेबल डेवलपमेंट की अवधारणा का उदय हुआ जिसने सस्टेनेबल इको फ्रेंडली विकास का समर्थन किया तथा परिस्थितिकी चेतना के विषय में जागरूकता उत्पन्न की। इस अक्षुण विकाश की युग्मित अवधारणा को प्राचीन भारत मे सभी वेदों, उपवेदों तथा वैदिक दर्शनों में विकसित कर लिया गया था।

यह मानने के अनेक अकाट्य प्रमाण हैं कि विज्ञान का विकास प्रत्यक्ष प्रकृति की विविधता एवम जटिलता में छुपी सममिती के संदर्भ में प्राचीन भारतीय ऋषियों की जिज्ञासा के साथ प्रारंभ हो गया था। प्रकृति को घटकों एवम प्रक्रमो को मौलिक आधार पर समझने के ये प्रयास उन्हें प्रत्यक्ष परीक्षणों के क्षेत्र से बहुत आगे ले गए थे तथा तार्किक विश्लेषण के आधार पर वे परमाणु पदार्थ संरचना का मुख्य घटक तथा गणित में शून्य, अनंत, स्वतंत्र नौ अंको, ज्यामिति, त्रिकोणमिति, सममिति, बीजगणित, गति के नियमो, गुरत्वाकर्षण तथा ग्रहगति, एवम अति सूक्ष्म वस्तुओ के मापन में अनिश्चितता को समझने में पूर्ण रूप से सफल हुए थे। उन्होंने विज्ञान, प्रद्योगिकी , तथा विभिन्न दर्शनों को वेदांग एवम उपांग में सम्मिलित किया था जिनके आधार पर वैदिक ज्ञान को आत्मसात किया गया था। वेद ज्ञान के अक्षय श्रोत है तथा वेद वाक्य स्वयं में ही प्रमाण होता है। पुरुषसूक्त के द्वारा वेद ऋचाओ में निहित विज्ञान के सिद्धांतो को समझा जा सकता है।

प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में ब्रह्मांड के प्रदुभव के संदर्भ में अनेक वैज्ञानिक जिज्ञासाएं एवम उनके समाधान उल्लेखित हैं। इसी प्रकार अथर्वेद में चिकित्सा विज्ञान के अद्भुत ज्ञान का श्रोत है जिसके कारण आयुर्वेद को अथर्वेद का उपवेद माना जाता है। यजुर्वेद में भी विज्ञान एवम गणित के विभिन्न क्षेत्रों में अद्भुत शोध के संकेत मिलते है। चारो उपवेद आयुर्वेद, धनुर्वेद, स्थापत्यवेद तथा गन्धर्व वेद विज्ञान की विभिन्न शाखाएं ही हैं तथा सभी वैदिक दर्शन सांख्य, वैशेषिक, न्याय, मीमांसा, योग एवम वेदांत प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक शोध के भंडार है

प्राचीन भारतीय दार्शनिकों तथा मनीषियों ने जागृति की प्रारंभिक अवस्था में ही ब्रह्मांड की सम्मिति के रहस्य को समझ लिया था और यह जान लिया था कि इसका सुदृढ़ गणितीय आधार है तथा इसके किसी भी मौलिक प्रकरण का विस्तृत विश्लेषण करने के लिए गणितीय शुद्धि की एक निश्चित सीमा तक आवश्यकता है जिसके लिए कुछ गणितीय नियमों को जानना आवश्यक है । इन तथ्यों के प्रकाश में वेदांग ज्योतिष 1200 ई .पूर्व में गणित को सभी प्रकार के विज्ञान के शीर्ष पर रखा गया था:

जैसी मयूर पंख पर चांदोवे की शोभा है तथा नाग के सिर पर नागमणि की शोभा है वैसे ही सभी वेदांग शास्त्रों में गणित की शोभा है जो सभी प्रकार के विज्ञानों के शीर्ष पर है।

गणित में शून्य, अनंत, स्वतंत्र नौ अंको एवम दशमलव स्थान मान पद्धति की खोज प्राचीन भारत में ही हुई थी। भारत में शून्य की खोज वैदिक युग में ही कर ली गई थी ।

पर्यावरणीय चेतना प्राचीन भारतीय संस्कृति एवम विज्ञान का अभिन्न अंग रही है तथा सभी वेदों एवम उपवेदों में अक्षुण स्थाई विकास की युग्मित अवधारणा को स्वीकार किया गया है।प्रकृति के लिए प्रेम, आदर तथा श्रद्धा प्राचीन भारतीय परंपरा रही है जिसका उद्गम वैदिक युग में ही हो गया था। प्रकृति, ब्रह्मांडीय ऊर्जा तथा पर्यावरण के व्यापक महत्व को स्वीकारते हुए वैदिक ऋषियों ने किसी भी कार्य को प्रारंभ करते हुए शांति एवम स्वस्तिवाचन का निर्देश दिया था।

जिसमे द्यौ को सर्वोच्च पिता एवम पृथ्वी को सर्वोच्च माता के रूप में सर्वदा पूजनीय माना गया है। पृथ्वी, सूर्य तथा प्रकृति के माध्यम से परम चेतना के द्वारा जीवन के उद्गम की वैदिक मान्यता है। वेदों में स्पष्ट निर्देश एवम शुभकामनाएं हैं कि अन्न एवम जल को प्रदूषण से मुक्त रखा जाए, वायुमंडल को स्वच्छ एवम स्वास्थ्यवर्धक रखा जाए तथा पृथ्वी को धन के भंडार के रूप में सहेज कर अक्षुण रखा जाए एवम इसकी मृदा को हरप्रकार के प्रदूषण से मुक्त रखा जाए। इन वैदिक निर्देशों में प्रकृति एवम मानव के मध्य सामंजस्य एवम सादर संतुलन समाहित है। प्रकृति के प्रति प्रेम एवम श्रद्धा की ये परंपराएं वैदिक युग में प्रारंभ हुई तथा भारत में मानव सभ्यता के विकास में शीर्ष पर पहुंची। इसके परिणाम स्वरूप यज्ञ, प्रकृति प्रेम एवम पारस्परिक सहिष्णुता तथा समायोजन की परंपराओं के माध्यम से पर्यावरण एवम समाज के मध्य स्थाई सहस्तित्व एवम स्थाई संतुलन का प्रदूभाव हुवा। इसके कारण आध्यात्मिक साधना एवम बौद्धिक सुग्रहिता के धागे इतनी सहजता से बुने गए कि मानव की सांसारिक स्थूल आवश्यकताएं बहुत समित रखी गई जिनकी पूर्ति प्रकृति द्वारा सहजता से की जाने लगी थी। वैदिक काल में मानव जीवन इतना संयमित एवम संतुलित था कि इसका अधिकतम भाग पारंपरिक रूप से वनों, पर्वतों एवम पवित्र नदियों के तटों पर बिताया जाता था। ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या अध्ययन में ज्ञानी ऋषियों के आश्रमों में, वानप्रस्थ आश्रम में नदियों के तटों पर धार्मिक स्थानों पर तथा वृद्धावस्था में वनों, पर्वतों एवम पवित्र गुफाओं में जीवन बिताने की परंपरा प्राचीन भारत में विकसित हुई थी। इस से प्रकट होता है कि प्राचीन भारत में मानव जीवन का प्रकृति के साथ कितना गहन सामंजस्य था।इन कारणों से भी उस काल में भारत में संपूर्ण मानव समाज के लिए प्राकृतिक संसाधन प्रेम, आदर और श्रद्धा के केंद्र होते थे।

वेदों में बारंबार निर्देशित किया गया है कि शुद्ध वायु में सांस लो, शुद्ध पानी और शुद्ध दुग्ध का पान करो, शुद्ध अन्न का सेवन करो तथा प्रदूषण रहित मृदा में उपजाए फलों और सब्जियों का भोजन में प्रयोग करो। चांदोग्य उपनिषद में उसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है:

मस्तिष्क शुद्ध भोजन से शुद्ध होता है, मस्तिष्क की पवित्रता से स्मृति प्रबल होती है, तथा इस दिव्य स्मृति से युक्त होने पर सभी बंधनो से मुक्ति हो जाती है।

इन सभी वैदिक शिक्षाओं में जल, वायु, मृदा, ऊर्जा तथा आकाश सभी पंचभूत, मस्तिष्क, विचार, स्मृति, बुद्धि,एवम चेतना सभी पांच सूक्ष्म तत्व तथा सभी पांच तनमत्राओं रूप, गंध, रस,स्पर्श एवम शब्द सभी को प्रत्येक प्रकार के प्रदूषण से पूर्णत: मुक्त रखने के निर्देश दिए गए हैं।

वैदिक साहित्य में मानव जीवन को उन्नत बनाने हेतु निम्नलिखित परिपाटियों के पूर्ण निष्ठा से पालन करने के निर्देश दिए गए है:

वैदिक यज्ञ परिपाटी।
प्राणी मात्र के प्रति प्रेम की परिपाटी।
वन संरक्षण परिपाटी ।
जल संरक्षण परिपाटी।
गौ, गंगा, गुरु एवम गायत्री की पूजा परिपाटी

वैदिक यज्ञ परिपाटी
वेदों के अनुसार मानव के उच्चतम विकास एवम उन्नति का मार्ग यज्ञमय जीवन है। यज्ञ के द्वारा प्रकृति की अनंत शक्तियों के मध्य सामंजस्य एवम संतुलन स्थापित करके ब्रह्मांडीय ऊर्जा को विस्तारित एवम संतुलित किया जाता है। यज्ञ के इस दैविक प्रभाव की अनुभूति वैदिक ऋषियों ने की थी। इस ब्रह्मांडीय प्रदुर्भाव को ही यज्ञ कहते हैं। यजुर्वेद में यह यज्ञ प्रक्रिया विस्तार से कई अध्यायों में 1975 मंत्रों द्वारा वर्णित है। दिव्य शक्तियां जिन्हे यज्ञ द्वारा सशक्त एवम संतुलित किया जाता है वे हमारे पर्यावरण के विभिन्न महत्वपूर्ण घटक हैं। जो हैं: वरुण, मरुत, अग्नि,भूमि,तथा आकाश जिन्हें हर प्रकार के प्रदूषण से मुक्त रखा जाता है। यज्ञ के अग्निहोत्र की अग्नि तथा यज्ञ में शुद्ध रूप से उच्चारित मंत्रों के स्पंदन संपूर्ण वायुमंडल एवम अंतरिक्ष को ऊर्जित कर देते हंै जिससे सभी जंतुओं एवम वनस्पतियों को जीवन बल प्राप्त होता है। ये सभी मंत्र वेदों में उल्लेखित हैं। यज्ञ में वेदमंत्रो के लययुक्त उच्चारण आकाश तत्व एवं उसके गुण शब्द को ऊर्जा एवम संतुलन भी प्रदान करते हैं। इन वैदिक मंत्रों के उच्चारण में लय और स्वर का बहुत महत्व होता है जैसा कि अत्रे ब्राह्मण 4/1/23 में उल्लेखित है कि सुस्वर एवम उत्तम लय के साथ ये मंत्र औषधि के तुल्य है और टूटी लय एवम भंजित स्वर में ये वज्र के समान दुख दाई हो जाता है। वैदिक यज्ञ वैदिक मंत्रों के लय युक्त सुस्वर उच्चारण के साथ किया गया यज्ञ को परिस्तिथि की इकोलॉजी चक्र के रूप में समझा जा सकता है जिससे प्रकृति में संतुलन स्थापित होता है तथा समय पर वर्षा होती है। जैसे कि शुक्ल यजुर्वेद 22/22 में वर्षा हेतु निम्नांकित मंत्र उल्लेखित है कि वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ यज्ञ की अग्नि में क्रमबद्ध आहुतियां सूर्य को प्राप्त होती है जिनसे वर्षा होती है और जिसके परिणाम स्वरूप अन्न उत्पन्न होता है जिससे जीवन चलता है।

इसका अर्थ है कि मंत्रोच्चारण के साथ किया गया यज्ञ विश्व में सर्वश्रेष्ठ कर्म है जैसा कि शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है।

यज्ञ में शुद्ध रूप से उच्चारित वैदिक मंत्रों के स्पंदन सभी जीवों जंतुओं एवम वनस्पतियों को ऊर्जित करते हैं तथा सभी प्राकृतिक शक्तियों को संतुलित करते हैं। हिंदुओं में बचपन से लेकर मृत्यु तक सारे संस्कारों में वैदिक मंत्रों का लय युक्त शुद्ध उच्चारण करके दिव्य शक्तियों की पूजा की जाती है जिससे सभी का कल्याण होता है।

प्राणिमात्र के प्रति प्रेम की परिपाटी
वैदिक संस्कृति में सभी जीवों जंतुओं एवम वनस्पति के प्रति प्रेम एवम सहानुभूति की परिपाटी रही है। जंगली जानवरों को भी सामाजिक एवम धार्मिक महत्व दिया
गया है। उनमें से कईयों को सिंह, पक्षियों, ब्रषभ, गज, स्वान, एवम गर्दभ आदि) को देवी देवताओं के वाहनों के रूप में पूजनीय माना है।

सभी प्राणियों के प्रति ये प्रेम, आदर तथा संरक्षण का भाव अठारह पुराणों में भी पाया जाता है जहां प्रत्त्यात्मक रूप में प्रकृति में जीवो के क्रमिक विकास हेतु निम्नांकित पुराणों का वर्णन मिलता है:
जल जीवो के लिए मत्स्य पुराण तथा कूर्म पुराण।
धरातलीय मानवेत्तर जीव के लिए वराह पुराण।
पक्षियों के लिए हंस पुराण एवम गरुड़ पुराण।
पौधों हेतु पद्म पुराण।

मानव रचना हेतु लिंग पुराण।
भौतिक तत्वों हेतु अग्नि पुराण।
मानव विकास हेतु नारद पुराण , मार्कण्डेय पुराण तथा वामन पुराण।
मानव, जंतुओं एवम वनस्पति के मध्य ये समन्वय पर्यावरण संरक्षण का अति उत्कृष्ट रूप है।

वन संरक्षण परिपाटी
वैदिक युग में वृक्षों, पौधों तथा वन की महता को पर्यावर्ण संरक्षण हेतु पूर्ण रूप में स्वीकार किया गया था। वृक्षों एवम पौधों द्वारा विषैली गैस कार्बन डाइऑक्साइड को शोषित करके प्राण वायु ऑक्सीजन के उत्सर्जन के प्राकृतिक प्रक्रम की सभी प्राणियों के कल्याण हेतु सदा शिव द्वारा विषपान के साथ तुलना की गई है। यजुर्वेद के रुद्रदाध्याय में पोधों को सींचने की क्रिया को शिव को जल अर्पित करने के समान पुण्य माना गया है।

वेदों में वृक्षो को कटने का निषेध किया गया है और स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि पक्षियों के घोंसलो से युक्त वृक्ष को, शमशान के वृक्ष को, तथा किसी मंदिर के निकट के वृक्ष को कभी नहीं काटना चाहिए। वट वृक्ष को, पीपल को, बहेड़े को, हरड़ को, तथा नीम और तुलसी को कटने की वेदों में सख्त मनाही की गई है क्योंकि ये सभी पौधे वायु को शुद्ध रखते हैं और अनेक औषधियों को बनाने में काम आते हैं।

वृक्ष-आयुर्वेद
आधुनिक विज्ञान में भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने प्रयोग द्वारा सिद्ध किया था कि पेड़ पौधे आदि वनस्पति भी जीव होते हैं। भारत में वनस्पति के जीव होने की ये मान्यता वैदिक काल से ही रही है। इसके अनेक प्रमाण सभी वेदों, उपवेदों, वैदिक दर्शनों तथा उपनिषदों में पाए जाते हैं। वनस्पतियों में जीवन होने की अवधारणा प्राचीन भारतीयों के मन मानस में संस्कार रूप में इतनी गहरी बस गई थी की ग्रामीण अनपढ़ महिलाएं भी बच्चों को रात्रि में पौधों को न छूने का निर्देश ये कह कर देती थी कि रात में पेड़ पौधें सो जाते हैं। कई प्रकार के वृक्षों एवम औषधिय पौधों की श्रद्धापूर्वक देख भाल करने एवं विभिन्न अवसरों पर उनकी स्तुति तथा उपासना करने का प्रचलन भारत में वैदिक काल से है। मनुष्यो तथा जंतुओं की भांति पेड़ पौधों में भी संवेदना होती है तथा उन्हें भी स्वास्थ्य संबंधी व्याधियां होती हैं और वे भी रुग्ण हो जाते हैं । इन पर भी पर्यावरण में प्रदूषण के कुप्रभाव पड़ते हैं और ये भी संगीत एवम वैदिक मंत्रों से प्रभावित होते हैं। ये अवधारणाएं भारतीय जनमानस में प्राचीन काल से ही व्याप्त हैं।

पांच हजार वर्षों से भी पूर्व महर्षि वेद व्यास के जनक महर्षि पाराशर द्वारा सभी प्रकार की वनस्पतियों पर गहन शोध के बाद वृक्ष – आयुर्वेद की रचना की गई थी तथा इसे पेड़ पौधों का स्वास्थ्य विज्ञान घोषित किया गया था। उनके निर्देशन में अत्रेय, हरित, मेल, गर्ग, करल, सुश्रुत, तथा काव्या आदि अनेक ऋषि वनों एवम पर्वतों पर औषध पादपों की खोज में घूमते रहते थे। वराह मिहिर द्वारा रचित ब्रह्म संहिता तथा कौटिल्य द्वारा रचित अर्थ शास्त्र में पाराशर के वृक्षायुर्वेद का संदर्भ अति विकसित वनस्पति विज्ञान के रूप में दिया गया है। प्राचीन भारत में विज्ञान की अति विकसित विधाओं में वृक्षायुर्वेद को भी सम्मिलित किया जाता है। वृक्षायुर्वेद के निम्नांकित छ: अंक व्यूम्स उपलब्ध हैं:

इनमें बीजोत्पत्ति कांड में आठ अध्याय हैं जिनमें उन्नत बीजों को विकसित करने तथा उन्हें सुरक्षित रखने की अति उन्नत विधियां बताई गई है, उन्नत बीच तकनीक सीड टेक्नोलॉजी विकसित की गई है, उनके रोपण के लिए उत्तम भूमि के चयन एवम मृदा विकास पर विस्तार से वर्णन किया गया है तथा उपयुक्त वातावरण एवम जलवायु का विश्लेषण किया गया है। विरुद्धावली कांड मे पेड़ पौधों में वात, पित्त, एवम कफ संबंधित व्याधियों एवम उनके उपचार का विस्तृत वर्णन है। वनस्पति कांड मे पेड़ पौधों के विकास पर वातावरण एवम पर्यावरण के प्रभावों का विस्तार से वर्णन किया गया है।

गुल्मक्षुप कांड मे पेड़ पौधों मे संवेदना तथा इन पर पडऩे वाले वेदमंत्रो के सकारात्मक प्रभाव का विस्तार से वर्णन मिलता है। क्षित्शु कांड में मानव सभ्यता एवम संस्कृति के विकास में पेड़ पौधों के योगदान को विस्तार से उल्लेखित किया गया है।

वृक्षायुर्वेद में वर्णित वन संरक्षण की परंपरा वैदिक काल से चली आ रही है। उसकी मौलिक परंपरा को शुरप्ला को भोजपत्र पर संस्कृत में लिख कर दिया गया था:
वननाम पतए नम:।
व्रक्षानाम पतए नम:।
औषधीनाम पतए नम:।
अत्रे ब्राह्मण में ओषधि पादपों को जीवन रक्षक वनस्पति माना गया है तथा यजुर्वेद के रुद्रध्याय में वनों, वृक्षों एवम वनस्पति के प्रति आदर एवम श्रद्धा प्रकट की गई है। वैदिक युग में सामूहिक व्रक्षारोपण बहुत प्रचलित था तथा वराह पुराण में वनौत्सव एवम सामूहिक वृक्षारोपण का उल्लेख मिलता है। शुक्ल यजुर्वेद 5/43 में एक सूखे वृक्ष को काटने पर सौ वृक्षों के रोपण का निर्देश मिलता है:
अत्सत्व देव वनस्पति शतवल्शो।
वि रोह सहस्रवल्शवी वयम रुहेम।।
ऋग्वेद 10/146/1 में वन समुच्चय को वनदेवी संबोधित किया गया है:
अरण्यान्यरण्यसौ या प्रेव नश्यसी।
कथा ग्राम न प्रच्छसि न त्वा भीरिव विन्दति।।

जल संरक्षण की वैदिक परंपरा
वैदिक परंपराओं में जल को जीवन द्रव मानकर देव वरुण देव के रूप में पूजा जाता है। कई वैदिक ऋचाओं में जल को शुद्ध, संरक्षित एवम प्रदूषण रहित रखने के निर्देश दिए गए हैं। विभिन्न नदियों की पूजा करने की भी वैदिक परंपरा रही है:

शुद्ध जल पीने और शुद्ध जल में स्नान करने से आंतरिक एवम बाह्य मलों का नाश हो जाता है।
वर्षा के जल के सुरक्षित संचय और भूमिगत जल के संरक्षण की वैदिक परंपरा रही हैं। वेदों में जलस्रोतों के रूप में कूप, तडाग, झरनों तथा तालाबों के निर्माण की वैदिक परंपरा रही है एवम किसी भी जलस्रोत को दूषित करने के कृत्य को महापाप घोषित किया गया है। सभी नदियों में भगीरथी गंगा को बहुत पवित्र एवम श्रद्धा का केंद्र माना गया है तथा इसके जल को भौतिक, मानसिक एवम आत्मिक शुद्धि का कारक माना गया है।

वेदों में जल संरक्षण हेतु नदी तंत्र प्रबंधन, झरना प्रबंधन, ताल तंत्र प्रबंधन, भूमिगत जल प्रबंधन पर बहुत बल दिया गया है। आगामी 22 मार्च को विश्व जल दिवस पर इन वैदिक परंपराओं के व्यापक प्रचार प्रसार की बहुत आवश्यकता होगी।
प्राचीन भारतीय विज्ञान उन अनेक तथ्यों एवं प्रक्रमों के अकाट्य स्पष्टीकरण भी प्रदान करता है जिन्हें समझने में अभी तक आधुनिक विज्ञान समर्थ नहीं हो पाया है। जैसे कि ब्रह्मांड के प्रेक्षित गतीय पक्ष का आधार, कृष्ण ऊर्जा डार्क एनर्जी तथा कृष्ण पदार्थ डार्क मैटर का आधार, क्रमिक विकसित ब्रह्मांड विज्ञान, अद्रष्टा अति सुदृढ़ बल स्ट्रॉन्ग फोर्स का उद्गम, प्रकाश से अधिक गति से गमन त्रिकाल दर्शी संकल्पना का आधार, कारणता एवम दिक्काल नियमन सहसंबंध, परमाणु एटम नहीं की मूल प्रकृति, अयोनिजा संतानों की उत्पत्ति, तथा नियोग द्वारा संतान उत्पत्ति, मंत्रो का जीवो जंतु तथा वनस्पति एवं जड़ वस्तुओं पर प्रभाव आदि।

प्राचीन भारत में गणित एवं विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में इतने अदभुत शोध होने पर भी हमारे स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में दी जाने वाली विज्ञान शिक्षा में प्राचीन भारत में विज्ञान के शोध में अद्भुत उपलब्धियों का उल्लेख तक नहीं किया जाता है जिस कारण किसी भी स्तर पर छात्रों में प्राचीन भारतीय विज्ञान एवं गणित के संदर्भ में कोई जागरूकता नही उत्पन्न होती है। इन तथ्यों के प्रकाश में विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों तथा गणित के विकास में प्राचीन भारत के अद्भुत योगदान के प्रति हमारी आधुनिक शिक्षा में जागरूकता लाना परम आवश्यक है जिससे भारतीय छात्रों को भारतीय ज्ञान परंपरा का ज्ञान हो सके और उसके आधार पर उनमें मौलिक चिंतन की प्रवृति जागृत हो सके।