उत्कृष्ट थी भारतीय स्थापत्य कला

विजय शंकर तिवारी
मुख्य संपादक


भवन निर्माण भारत की चौंसठ कलाओं में से एक महत्वपूर्ण कला है। भवन निर्माण की कला पर अपने देश में प्राचीन काल से ही काफी काम हुआ है और कई बड़े-बड़े ग्रंथों की रचना की गई है। दुर्भाग्यवश अपने देश की ऐसी सभी प्राचीन कलाओं को उनकी भाषा नहीं समझ पाने और अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के कारण आधुनिक यूरोपीय विद्वानों ने नकार दिया और उन्हें अंधविश्वास तक की संज्ञा दे दी। मध्यकाल के अविद्वान पंडितों द्वारा इन कलाशास्त्रों में किए गए मिथ्याचारों ने उनके इन आरोपों को और पुष्ट किया। भारत की भवन निर्माण की प्राचीन कला वास्तु के साथ भी यही कुछ हुआ है। या तो लोग इसे सिरे से खारिज कर देते हैं या इसे एक अंधविश्वास के साथ अपनाते हैं। इसे विज्ञान के रूप में स्वीकार व स्थापित करने वाले लोगों की संख्या काफी कम या नगण्य है।

वास्तुशास्त्र पर अनेक प्रामाणिक ग्रन्थ उपलब्ध हैं। स्कन्द पुराण में नगर योजना से सम्बन्धित सिद्वान्तों की चर्चा है। अग्नि पुराण में रिहायशी भवन से सम्बन्धित सिद्धान्तों की चर्चा है। वायु पुराण में ऊंचाई पर बनाए जाने वाले मन्दिरों से सम्बन्धित सिद्धान्तों की चर्चा है। गरुड़ पुराण में रिहायशी भवन व मन्दिरों से सम्बन्धित सिद्धान्तों की चर्चा है। नारद पुराण में जल भण्डारण कुओं, झील व मन्दिरों से सम्बन्धित सिद्धान्तों की चर्चा है। मत्स्य पुराण में शिलाओं पर नक्काशी, समारोह स्थल, स्तम्भ से सम्बन्धित सिद्धान्तों की चर्चा है। शास्त्रीय ग्रन्थों के अतिरिक्त वास्तु विषयक ज्ञान वैदिक साहित्य, रामायण, महाभारत, अष्टाध्यायी अर्थशास्त्र, जैन व बौद्ध ग्रन्थ, बृहत्संहिता आदि में स्थान-स्थान पर वर्णित है।

वास्तुकला का विकास
वास्तुशास्त्र का प्रादुर्भाव वैदिक काल में ही हुआ था। इसका विकास पुराणों व आगमों के समय में स्थिर हुआ। इसके पश्चात् वास्तुकला के आचार्यों ने इस कला को एक अलग शास्त्र का रूप प्रदान किया। वैदिक काल से तेरहवीं शताब्दी तक तो वास्तुकला का प्रसार, प्रचार व प्रयोग होता रहा, परन्तु इसके बाद मुगलों के आने पर इस कला का प्रचलन कम होता गया और धीरे-धीरे लुप्तप्राय: हो गयी। हांलाकि दक्षिण भारत में इस कला का प्रचलन जीवित रहा।

प्रसिद्ध वास्तुविद् द्विजेन्द्रनाथ शुक्ल का कहना है – वास्तुशास्त्र की न तो कोई व्याख्या है और न ही कोई कोष। वर्तमान में गुरु-शिष्य परम्परा भी विद्यमान नहीं है। यद्यपि दक्षिण भारत के भवन-शिल्पकार आज भी मय मत और विश्वकर्मीय वास्तु के सिद्धान्तों का अनुकरण करते हैं, यहां तक कि अनेक शिल्पकारों को ये वास्तु-सिद्धान्त कण्ठस्थ हैं, परन्तु वे इन सिद्धान्तों की शास्त्रीय एवं व्यावहारिक व्याख्या कर सकने में असमर्थ हैं।

वास्तुशास्त्र के जनकों में विश्वकर्मा एवं मय का नाम अधिक प्रचलित है। विश्वकर्मा को देवताओं का स्थापित्य अथवा वास्तु-प्रवर्तक माना गया है जबकि मय को असुरों का वास्तु-प्रवर्तक माना गया है। भारत में दोनों वास्तु परम्पराएं (सुर व असुर) साथ-साथ विकसित होती रहीं। समय के साथ इनके विभिन्न तत्त्व एक-दूसरे में घुलमिल गए।

वास्तुशास्त्र की दो परम्पराएं लोकप्रिय हैं। पहली उत्तरी वास्तु परम्परा। इस परम्परा के मुख्य ग्रन्थ समरांगण सूत्रधार, विश्वकर्मा प्रकाश, वास्तु रत्नावली आदि हैं। दूसरी दक्षिणी वास्तु परम्परा। इस परम्परा के मुख्य ग्रन्थ मयमत, मानसार, शिल्प संग्रह, चित्र लक्षण आदि हैं।

वराहमिहिर के ज्योतिष ग्रन्थ वृहत्संहिता में वास्तुशास्त्र के नियमों का वर्णन है, महाराजा भोजदेव ने ग्यारहवीं शताब्दी में समरांगण सूत्रधार लिखा जो वास्तुशास्त्र का प्रामाणिक और अधिकृत ग्रन्थ है। इसमें सभी पूर्ववर्ती ग्रन्थों के सिद्धान्तों का समावेश है।

वास्तुशास्त्र के अन्य मुख्य ग्रन्थ निम्नानुसार हैं – समरांगण सूत्रधार, विश्वकर्मा प्रकाश, वास्तु रत्नावली, विश्वकर्मीय शिल्प, शिल्प संग्रह, शिल्प रत्न, चित्र लक्षण, मयमत, मानसार, राजवल्लभ, वास्तु संदेश, मुहूर्तमार्तंड, रूपमंडन, हलायुध कोष, बृहद्वास्तुमाला आदि। इन सभी ग्रन्थों में वास्तु के अनुपम सिद्धान्तों का वर्णन किया गया है परन्तु समरांगण सूत्रधार नामक ग्रन्थ की एक विशेषता यह है कि इसमें निर्मित भवन, जिसमें कि वास्तुदोष पाए गए हैं, का वास्तुदोष निवारण बिना भवन की तोड़-फोड़ किए, विभिन्न उपचारों के माध्यम से किया जा सकता है।

समरांगण सूत्रधार के दूसरे अध्याय के चौवालिसवें श्लोक में कहा गया है कि स्थपित को शास्त्र एवं व्यवहारिक कर्म में कुशल होना चाहिए। उसका प्रजावान् व शीलवान् होना आवश्यक है। लक्षणों के आधार पर वास्तु सम्यक् ज्ञान इन सबके बाद अपेक्षित है।

अमर कोष में कहा गया है – गृहरचनावछित्र भूमे। अर्थात् गृह-रचना अथवा गृह-निर्माण योग्य अविच्छिन्न भूमि को ही वास्तु कहते हैं।

नारद संहिता में कहा गया है- भवन में निवास करने वाले गृहस्वामी को भवन प्रत्येक रूप से शुभफलदायक, सुख-समृद्धि प्रदाता, ऐश्वर्य, लक्ष्मी व धन को बढ़ाने वाला, पुत्र-पौत्रदि प्रदान करने वाला हो, इसका विचार वास्तु के अन्तर्गत किया जाता है।

वास्तु शब्द का जन्म वस्तु’ शब्द से हुआ है। वस्तुओं से सम्बन्धित शास्त्र ही वास्तुशास्त्र है। वस्तु शब्द का अर्थ है पृथ्वी, भवन व भवन में रखी जाने वाली वस्तुएं। वास्तुशास्त्र को मात्र भवन-निर्माण से सम्बन्धित शास्त्र मान लेना गलत होगा। वास्तुशास्त्र तो सम्पूर्ण देश, प्रदेश, नगर, उपनगर के निर्माण योजना से लेकर छोटे-छोटे भवन और उसमें रखी जाने वाली वस्तुओं से सम्बन्धित सिद्धान्तों को बताता है।

नगर, बाजार और वास्तु
वास्तुशास्त्र के अन्तर्गत नगर रचना का विस्तार से वर्णन मिलता है और इस प्राचीन भारतीय नगर रचना शास्त्र में आपण विद्या का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार भूमि चयन के उपरान्त नगर नियोजन की प्रक्रिया प्रारम्भ की जाती है। रिहायशी इलाकों व व्यापारिक संस्थानों के लिए स्थान निश्चित किये जाते हैं और उन स्थानों पर निर्माण कार्य किया जाता है। वास्तुशास्त्र में भूमि का चयन भूमि के रंग, रूप, आकार, ढाल, गन्ध, स्वाद आदि को आधार बनाकर किया जाता है। इक्कीसवीं सदी में ये सभी प्रक्रियायें सम्भव नहीं रह गयी हैं। जमीन का अभाव, समय का अभाव, धन का कहीं अभाव तो कहीं इसका बहाव, सरकारी कानून-कायदे इत्यादि वास्तुशास्त्रीय परम्परा द्वारा भूमि चयन की प्रक्रिया में आड़े आते हैं। जनसंख्या की वृद्धि सभी समस्याओं पर भारी पड़ती दिखती है। शहरों में और भी अन्य कारण है जो भूमि चयन एवं बाजार को विकसित करने में प्रभावी हैं। परन्तु बाजार को विकसित करने में भूमि के वास्तुशास्त्रीय गुणों के साथ-साथ अन्य सभी कारकों पर विचार करने के उपरान्त भूमि का ढाल ही सर्वाधिक प्रभावी दिखाई देता है।

चर वास्तु
वास्तुशास्त्र की पुस्तकों में भूमि के विभिन्न दिशाओं में बने ढाल के कारण उत्पन्न होने वाले गुणों का वर्णन किया गया है। वास्तुविद्या नामक ग्रन्थ में दिशाओं व उनके विपरीत दिशा व विदिशाओं के साथ बने ढाल के गुणों का भी वर्णन किया गया है। इस क्रम में ग्रन्थकार ने दक्षिण दिशा व उसके विपरीत उत्तर दिशा व विदिशाओं ईशानकोण व वायव्य कोण द्वारा बनी ढालुआँ भूमि को चर-वास्तु की संज्ञा दी है।

वास्तुविद्या 2/24/24 में कहा गया है कि उत्तर, ईशान कोण तथा वायव्य कोण में ऊँची तथा दक्षिण में नीची भूमि को चर-वास्तु कहते हैं। यह भूमि वैश्यों के लिए विशेष लाभदायक होती है। चर-वास्तु वाली भूमि पर विभिन्न प्रकार के रसायन, तेल, घी, पेन्ट, मेडिसिन आदि का व्यापार देखने को मिलता है। यह भूमि वैश्यों के लिए बतायी गयी है, लेकिन वैश्यों के अन्य व्यापार की तुलना में तेल, घी, कैमिकल, मेडिसिन का व्यापार ही इस वास्तु पर वृद्धि करते हुए नजर आता है। रसायन, तेल, घी, मेडिसिन आदि का व्यापार अन्य दिशाओं की ढालुआँ भूमि पर वृद्धि करते हुए नजर नहीं आता जबकि अन्य विभिन्न प्रकार के व्यापारों की वृद्धि उत्तर या पूर्व की ढालुआँ जमीन पर देखी जाती है। पाया गया है कि सभी प्रकार के बाजारों में जैसे ही भूमि की ढाल दक्षिण की ओर परिवर्तित होती है, व्यापार की वस्तु भी कैमिकल, तेल या मेडिसिन में बदल जाती है।

इस प्रकार के उदाहरण दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेत्रई, विजयवाड़ा, हैदराबाद, अमृतसर, गुवाहाटी आदि सभी शहरों के बाजारों में दिखाई देते हैं। विचारणीय है कि यह वास्तु वैश्यों के लिए कहा गया है और वैश्य सभी प्रकार की वस्तुओं का व्यापार करते हैं, परन्तु चर वास्तु पर केवल रसायन, तेल, पेन्ट, मेडिसिन आदि के ही व्यापार में वृद्धि दिखाई देता है। वैश्यों में और इस प्रकार के व्यापार में तथा चर-वास्तु में सम्बन्ध पर और शोध किए जाने की आवश्यकता है।

इसी वास्तुशास्त्र के आधार पर अपने देश में नगरों, बाजारों, राजभवनों और मंदिरों आदि की रचना हुई। विशेषकर मंदिरों का अवलोकन करने से भारतीय वास्तुशास्त्र की महत्ता की जानकारी होती है। यदि हम भारत के प्राचीन मंदिरों पर नजर डालें तो पता चलता है कि सभी का वास्तुशिल्प बहुत उन्नत था। मौर्य शासक अपनी कला और वास्तुकला के लिए जाने जाते थे। उत्खनन के दौरान प्राचीन मंदिरों के अवशेष सामने आए हैं। राजस्थान में जयपुर के बैराट जिले में ईसा पूर्व 3 शताब्दी का एक मौर्यकालीन गोलाकार ईंट और इमारती लकड़ी का मंदिर मिला है। तेईस मीटर व्यास का यह मंदिर चूने से पलस्तर की गई ईंटों का बना था। आगामी शताब्दियों में मंदिर में अनेक परिवर्तन हुए जिसके कारण इसे मूल रूपरेखा के माध्यम से पहचानना कठिन हो गया। ये संरचनात्मक मंदिर कहलाते हैं।

इन संरचनात्मक मंदिरों के अलावा एक अन्य प्रकार के मंदिर थे जो चट्टानों को काट कर बनाए गए थे। ये मंदिर चेन्नई के दक्षिण में 38 मील दूर समुद्र तट पर 5वीं शताब्दी ईसवी में बनाए गए थे। स्थानीय भाषा में इन्हें रथ कहते हैं और इनका नाम पांच पांडव भाइयों और द्रौपदी के नाम पर रखा गया है। कांचीपुरम के महान पल्लव शासकों ने अनेक मंदिर निर्माण किए और पल्लव शिल्पियों ने समुद्र तट पर उपलब्ध चट्टानों और शिलाखंडों का प्रयोग कर उन्हें अखंडित मंदिरों का तथा छोटे शिलाखंडों को काटकर उनसे सिंह, हाथी, वृषभ इत्यादि की विशाल मूर्तियों को आकार दिया।

चट्टानों से काटकर बनाए गए इनमें से एक मंदिर को द्रौपदी रथ कहा जाता है। यह लकड़ी के स्तंभों के सहारे खड़ी छप्पर की छत वाली मिट्टी की झोपड़ी की पत्थर पर अनुकृति है। द्रौपदी रथ में एक चौकोर कक्ष है लेकिन डयोढ़ी नहीं है और इसकी छत अपने आकार से बंगाली झोपड़ी का आभास देती है। भारत में संरचनात्मक वास्तुकला के विभिन्न प्रकारों की भांति यह भी बांस और छप्पर से निर्माण के आदिप्रारूप की अनुकृति है। प्रवेशद्वार पर दो सुंदर लड़कियों की आकृतियां हैं, प्रत्येक को प्रवेशद्वार के दोनों ओर बनाए गए छोटे से आले में तराशा गया है। इनके किनारों पर पुष्पों से सजावट की गई है जो कुछ लोगों के अनुसार छप्पर को अपने स्थान पर रखने के लिए मूल रूप से बनाए गए पीतल और तांबे के किनारों की चट्टानों पर अनुकृति है।

दक्षिण भारत के तंजावूर शहर में स्थित बृहदीश्वर मंदिर भारत का सबसे बड़ा मंदिर कहा जा सकता है। यह मंदिर तंजावूर प्रिय कोविल के नाम से भी प्रसिद्ध है। सन 1010 में अर्थात् आज से एक हजार वर्ष पूर्व राजराजा चोल ने इस विशाल शिव मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर की प्रमुख वास्तु (अर्थात गर्भगृह के ऊपर) की ऊँचाई 216 फुट है (यानी पीसा की मीनार से छत्तीस फुट ऊँचा)। यह मंदिर न सिर्फ वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, बल्कि तत्कालीन तमिल संस्कृति की समृद्ध परंपरा को भी प्रदर्शित करता है। कावेरी नदी के तट पर स्थित यह मंदिर पूरी तरह से ग्रेनाईट की बड़ी-बड़ी चट्टानों से निर्मित है। ये चट्टानें और भारी पत्थर पचास कि.मी. दूर पहाड़ी से लाए गए थे। इसकी अदभुत वास्तुकला एवं मूर्तिकला को देखते हुए यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर के रूप में चिन्हित किया हुआ है।

दसवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में चोल वंश के अरुलमोझिवर्मन नाम से एक लोकप्रिय राजा थे जिन्हें राजराजा चोल भी कहा जाता था। पूरे दक्षिण भारत पर उनका साम्राज्य था। राजराजा चोल का शासन श्रीलंका, मलय, मालदीव द्वीपों तक भी फैला हुआ था। जब वे श्रीलंका के नरेश बने तब भगवान शिव उनके स्वप्न में आए और इस आधार पर उन्होंने इस विराट मंदिर की आधारशिला रखी। चोल नरेश ने सबसे पहले इस मंदिर का नाम राजराजेश्वर रखा था और तत्कालीन शासन के सभी प्रमुख उत्सव इसी मंदिर में संचालित होते थे। उन दिनों तंजावूर चोलवंश की राजधानी था तथा समूचे दक्षिण भारत की व्यापारिक गतिविधियों का केन्द्र भी था। इस मंदिर का निर्माण पारंपरिक वास्तुज्ञान पर आधारित था, जिसे चोलवंश के नरेशों की तीन-चार पीढिय़ों ने रहस्य ही रखा। बाद में जब पश्चिम से मराठाओं और नायकरों ने इस क्षेत्र को जीता तब इसे बृहदीश्वर मंदिर नाम दिया।

तंजावुर प्रिय कोविल अपने समय के तत्कालीन सभी मंदिरों के मुकाबले चालीस गुना विशाल था। इसके 216 फुट ऊँचे विराट और भव्य मुख्य इमारत को इसके आकार के कारण दक्षिण मेरु भी कहा जाता है। 216 फुट ऊँचे इस शिखर के निर्माण में किसी भी जुड़ाई सामग्री का इस्तेमाल नहीं हुआ है। इतना ऊँचा मंदिर सिर्फ पत्थरों को आपस में इंटर-लांकिंग पद्धति से जोड़कर तैयार किया गया है। इसे सहारा देने के लिए इसमें बीच में कोई स्तंभ भी नहीं है, अर्थात यह पूरा शिखर अंदर से खोखला है। भगवान शिव के समक्ष सदैव स्थापित होने वाली नंदी की मूर्ति 16 फुट लंबी और 13 फुट ऊँची है तथा एक ही विशाल पत्थर से निर्मित है। अष्टकोण आकार का मुख्य शिखर एक ही विशाल ग्रेनाईट पत्थर से बनाया गया है। इस शिखर और मंदिर की दीवारों पर चारों तरफ विभिन्न नक्काशी और कलाकृतियां उकेरी गई हैं। गर्भगृह दो मंजिला है तथा शिवलिंग की ऊँचाई तीन मीटर है।

आगे आने वाले चोल राजाओं ने सुरक्षा की दृष्टि से 270 मीटर लंबी 130 चौड़ी बाहरी दीवार का भी निर्माण करवाया। सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी तक यह मंदिर कपड़ा, घी, तेल, सुगन्धित द्रव्यों आदि के क्रय-विक्रय का प्रमुख केन्द्र था। आसपास के गाँवों से लोग सामान लेकर आते, मंदिर में श्रद्धा से अर्पण करते तथा बचा हुआ सामान बेचकर घर जाते। सबसे अधिक आश्चर्य की बात यह है कि यह मंदिर अभी तक छ: भूकंप झेल चुका है, परन्तु अभी तक इसके शिखर अथवा मंडप को कुछ भी नुकसान नहीं हुआ। दुर्भाग्य से ऐसे अदभुत मंदिर की जानकारी भारत में कम ही लोगों को है। इस मंदिर के वास्तुशिल्पी कुंजारा मल्लन माने जाते हैं। इन्होंने प्राचीन वास्तुशास्त्र एवं आगमशास्त्र का उपयोग करते हुए इस मंदिर की रचना में (एक सही तीन बटे आठ या 1-3/8 अर्थात, एक अंगुल) फार्मूले का उपयोग किया। इसके अनुसार इस मात्रा के चौबीस ईकाई की माप 33 इंच होती है, जिसे उस समय ‘हस्त्य, मुज़म्य’ अथवा किश्कुय कहा जाता था। वास्तुकला की इसी माप यूनिट का उल्लेख चार से छह हजार वर्ष पहले के मंदिरों एवं सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माण कार्यों में भी पाया गया है।

भारतीय वास्तुकला का ऐसा ही एक उत्कृष्ट उदाहरण मध्य प्रदेश में है। मध्य प्रदेश के चम्बल के बीहड़ इलाके में मितावली में एक मंदिर है चौंसठ योगिनी मंदिर। नौवीं सदी के इस मंदिर को निहारेंगे तो हैरत से भर उठेंगे। जमीन से करीब 300 फीट ऊंचाई पर एक पहाड़ी पर यह गोलाकार शिवमंदिर स्थित है। मितावली में इकंतेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी पहचाने जाने वाला चौसठ योगिनी शिव मंदिर हू-ब-हू हमारी पुरानी संसद के जैसा दिखता है। इस मंदिर को देखने के बाद मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि 12 फरवरी 1921 को दिल्ली में जिस संसद भवन की आधारशिला रखी गई, क्या उसके वास्तु की प्रेरणा लुटियंस को चम्बल के चौसठ योगिनी शिव मंदिर से मिली थी।
मितावली का यह चौसठ योगिनी शिव मंदिर मुरैना जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए संकरी सड़क है। यहां तक पहुंचने में पर्यटकों को थोड़ी मुश्किल का सामना जरूर करना पड़ता है लेकिन यहां आने के बाद उन्हें महसूस होगा कि यदि वे इस मंदिर को न देखते तो देखने के लिए बहुत कुछ छूट जाता। नौवीं सदी में इस शिव मंदिर का निर्माण तत्कालीन प्रतिहार राजवंश ने कराया था। मंदिर गोलाकार है, ठीक भारतीय संसद के भवन की तरह। मंदिर की गोलाई में चौसठ कमरे हैं। प्रत्येक कमरे में एक-एक शिवलिंग है। कभी इन कमरों में भगवान शिव के साथ देवी योगिनी की मूर्तियां भी थीं। देवी योगिनी की चौसठ मूर्तियों के कारण ही इसका नाम चौसठ योगिनी शिव मंदिर पड़ा। देवी योगिनी की काफी मूर्तियां ग्वालियर किले के संग्रहालय में रखी हैं। परिसर के बीचों-बीच एक बड़ा गोलाकार शिव मंदिर भी है। मुख्य मंदिर में 101 खंभे कतारबद्ध खड़े हैं, जो संसद भवन के गलियारे की याद दिलाते हैं। मंदिर के निर्माण में लाल-भूरे बलुआ पत्थरों का उपयोग किया गया है, जो मितावली और उसके आसपास के इलाके में पाए जाते हैं।