पुष्पा शर्मा
इतिहासकार
अरावली की उपत्यकाओं में अनेकानेक नगर, पुर, ग्राम का अस्तित्व रहा है, जो वर्तमान तक भी जीवन्त स्वरूप में है। अजमेर संभाग में अरावली की पहाडिय़ाँ हैं जिसकी एक श्रृंखला दक्षिण स्थित राजकोट से उत्तर पूर्व में बनेठा होते हुए सवाईमाधोपुर जिले में जाती है। दूसरी श्रृंखला टोंक जिले के टोडारायसिंह से राजमहल तक है, जहाँ बनास नदी के पहाड़ी क्षेत्र को चीर कर मार्ग का निर्माण किया गया है। टोडारायसिंह-बीसलपुर ग्राम स्थित पहाडिय़ों को जोड़कर बीसलपुर बाँध निर्मित किया गया है जो अजमेर, टोंक, जयपुर, नागौर की जीवनरेखा है।
टोंक जिले में स्थित टोडारायसिंह जयपुर से 119 किमी. दक्षिण, जिला मुख्यालय टोंक से 72 किमी., संभाग से 115 किमी. एवं प्राचीन कनकावती नगर (वर्तमान केकड़ी) से 35 किमी. दूरी पर स्थित है। यह नगर गौरव, शौर्यगाथा एवं पुरातात्विक महत्व का एक प्राचीन नगर है। पहले इस नगर को तक्षकगढ़, तक्षकपुर, टोडापत्तन इत्यादि कहते थे। अरावली पर्वतमाला के आंचल में यह नगर बसा है। वह श्रेणी तक्षकगिरि के नाम से जानी जाती है। अम्बा सागर के उत्तरी छोर पर नाग के फण की पर्वताकृति वाली चट्टान को लोक भाषा में ‘ताखाजी’ कहा जाता है,जो लोक आस्था का केन्द्र भी है। पुरातात्विक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि ईसा की प्रथम शताब्दी के लगभग यह क्षेत्र ‘मालवगण’ के अधीन रहा, जिसकी राजधानी कर्कोटक नगर थी जो टोंक जिले की उणियारा तहसील में वर्तमान में भी विद्यमान है। तीसरी एवं चौथी शताब्दी में मथुरा और पदमावती पर शासन करने वाले नागवंशीय राजाओं ने इस शहर की स्थापना की। पुरातात्विक साक्ष्यों से प्रमाणित होता है कि पदमावती के नागवंश का सम्बन्ध पंजाब के मालव जाति के साथ था जिनका तत्कालीन समय में मेवाड़, कोटा एवं टोंक क्षेत्र पर आधिपत्य था। भिन्न-भिन्न काल में यह नगर कई राजवंशीय शासकों-चौहान, सोलंकी(चालुक्य), कछवाहा,सिसोदिया, पठान एवं मुगलों के वर्चस्व में रहा। बारहवीं शताब्दी में यह पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) के सामन्त चामुण्डराय की जागीर था। 15वीं शताब्दी में यह चौलुक्य से मेवाड़ के सिसोदिया वंश के आधिपत्य में रहा। 16वीं शती में यह नगर लोदी शासकों के अधिकार में रहा। मेवाड़ के राणा राजमल के पुत्र पृथ्वीसिंह ने इस पर विजय प्राप्त कर मेवाड़ में सम्मिलित किया। मेवाड़ के राणा अमरसिंह के प्रपौत्र राजा रायसिंह सिसोदिया के नाम से यह टोडारायसिंह कहलाया। मुगलकाल साम्राज्य के पराभव काल में जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह ने टोडा पर विजय प्राप्त कर जयपुर राज्य में मिलाया जो स्वतंत्रता तक जयपुर रियासत का अंग रहा।
टोडा अपनी प्राकृतिक स्थिति एवं सौन्दर्य के कारण दर्शनीय स्थान है। यहाँ के शासकों ने यहाँ की स्थापत्यकला के वैभव को भव्य बावडी, सोपान युक्त कुण्ड, तालाब के रूप में प्रस्तुत किया। टोडाराय सिंह अपनी सुदृढ़, सुन्दर और विशाल बावडिय़ों के लिए जाना—पहचाना जाता है। इनमें टोडा नरेश राव रुपाल की हाड़ी राणी (देवा हाड़ा की राजकुमारी) द्वारा निर्मित विशाल कुण्ड मध्ययुगीन जल स्थापत्य का अनुपम उदाहरण है। बावडिय़ाँ हमारी प्राचीन जल संरक्षण प्रणाली का आधार रही हैं। दूर से देखने पर यह तलघर के रूप में निर्मित किसी बहुमंजिला हवेली जैसी दृष्टिगत होती है। वास्तुशास्त्र के अनुसार बावडिय़ाँ चतुष्कोणीय, वर्तुल या गोलाकार हो सकती हैं। इनके प्रवेश से मध्य भाग तक कच्चा अथवा पाषाण युक्त ठोस निर्माण होता है, जिसके ठीक निम्नतल में जल होता है जो प्राय:किसी भूगर्भीय जलस्रोत से जुड़ा होता है।
यह सीढिय़ों युक्त भव्य बावड़ी 17वीं शताब्दी की निर्मित है। योजना में यह वर्गाकार है,जिसका माप 80&80 फुट के लगभग एवं गहराई 80से 90फीट है। इसके पश्च भाग में दो मंजिला गलियारा है जिसके अग्रभाग में सात मेहराबदार द्वार हैं। उल्लेख मिलता है कि निचले तल के आलों में ब्रह्मा, गणेश तथा महिषासुर-मर्दिनी की अलंकृत प्रतिमाएं थीं, लेकिन सामुख्य अध्ययन के दौरान सभी आलें रिक्त थे। छह आलों में से चार राजपूती एवं दो मुगलकला से उत्कीर्ण हैं। शेष तीन दिशाओं में कुण्ड के तल तक पहुंचने के लिए कलात्मक रूप से सीढिय़ाँ निर्मित हैं। इन सोपानों में अधिकतम ऊंचाई स्तर 13 एवं न्यूनतम 5 है जो जल तल तक है। गलियारे के प्रवेश द्वार मुगल स्थापत्यकला एवं आलों की नक्काशी राजपूती कला को संदर्शित करते हैं। यह जल स्थापत्य मुगल एवं राजपूती कला का अनूठा संगम है। बावड़ी के जीर्णोद्धार एवं चारों ओर उद्यान विकसित होने से इसकी सुन्दरता कई गुणा बढ़ गयी है। उद्यान परिसर में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में राजपरिवार की आठ स्तम्भों पर स्थित वर्गाकार 10&10 के लगभग छतरी (देवल ) अवस्थित है। छतरी के मध्य में शिव परिवार की लघु प्रतिमाएं स्थापित हैं। प्रतिमाओं के साथ ही एक लघु दीप-स्तम्भ भी निर्मित है जिसकी लंबाई लगभग 30 सेमी. है, दीप प्रज्वलन के खण्ड का माप लगभग 20&20 सेमी. है। छतरी के समीप ही एक चबूतरे पर शिव के वाहन नंदी (वृषभ) की खण्डित प्रतिमा रखी है, जिसका माप लगभग 95&65 सेमी. है। नंदी के मध्य भाग पर आसन (बैठने के लिए) का सुन्दर शिल्पांकन है। नंदी की ग्रीवा में कंठी का अंकन एवं ग्रीवा खण्डितावस्था में है। बावड़ी सुन्दरता के साथ रहस्य को भी छुपाए हुए है। कहा जाता है कि इसके जिस सोपान से कुण्ड में उतरा जाता है पुन: उन्हीं सोपानों से कुण्ड से बाहर नहीं निकला जा सकता। यह एक पहेली है इसीलिए फिल्म पहेली का फिल्मांकन इस कुण्ड पर किया गया। कुण्ड की बाहरी मजबूत भित्तियों (चौकियों) पर लोक-संस्कृति से जुड़े खेलों का अंकन देखने को मिलता है।
कार्लाइल महोदय के अनुसार – नागरी भाषा में उल्लेखित संवत् 1469 एवं 1604 से इसे संरक्षित माने जाने की सम्भावना व्यक्त की है। टोडारायसिंह के ही दूसरे कुण्ड की तिथि 1654 हस्त नक्षत्र एवं तृतीय कुण्ड पर संवत् 1661 का उल्लेख मिलता है। यहाँ की अन्य बावडिय़ों में जगन्नाथ कछवाहा द्वारा निर्मित बावड़ी, भोपतबावड़ी,ईसरबावड़ी एवं सारडाबावड़ी मुख्य है। जगन्नाथ बावड़ी का माप 90 &30 फुट के लगभग है। इनके अतिरिक्त बुधसागर, खारोलाव, अम्बा सागर विवेच्य स्थल के प्रमुख जलाशय हैं। बूंदी नरेश अनिरुद्ध के ज्येष्ठ पुत्र नरेश बुधसिंह के नाम से बुधसागर सरोवर का नाम रखा गया। इन सागरों एवं बावडिय़ों ने टोडारायसिंह के नैसर्गिक सौन्दर्य को द्विगुणित करने में कोई कोर-कसर नही छोड़ी।
डॉ.पूरण सहगल के अनुसार टोडानगर में चक्रवाय प्राचीन वाबड़ी निर्मित है, जिसका निर्माण चक्रिया पुरोहित ने 11 लाख रुपए लगाकर करवाया था। यह संवत् 1604 (1547 ई.) में निर्मित की गयी। इसकी प्रशस्ति में यहाँ के राजा सूरसेन, पृथ्वीराज व रामचंद्र के नाम उल्लेखित बताए जाते हैं।
अनुश्रुतियों के आधार पर भोपत बावड़ी का निर्माण राजदरबार के कामदार द्वारा करवाया गया। लंवबत (आयताकार) रूप में निर्मित उक्त बावड़ी का तीन खण्डों में विभाजन है, तीनों खण्डों पर प्रवेश द्वार का निर्माण है जिनका स्थापत्य राजपूती एवं मुगलकला पर आधारित है। इस शिल्पकला के स्वरूप का माप 95&35 फुट के लगभग है। द्वार के शीर्ष पर दायें-बाएं गज,सिंह एवं आमलक उत्कीर्ण किये गये हैं। मुख्य प्रवेश द्वार के शीर्ष पर गज एवं उष्ट्र पर आरूढ़ स्त्री-पुरुषों का अंकन है। बावड़ी के जल-तल पर ताक में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित है। बावड़ी का निर्माण दो तलों में है एवं द्वार की दोनों तरफ झरोखे उत्कीर्ण हैं।
मण्डन ने नगर के मध्य व बाहर चार प्रकार की बावडिय़ाँ, दस प्रकार के कूप, चार प्रकार के कुण्ड व छह प्रकार के जलाशय बनवाने को कहा है। यह कहा नहीं जा सकता कि विवेच्य क्षेत्र के कुण्ड, जलाशय मण्डन के विधान के अनुसार है लेकिन यह कहा जा सकता है कि यहाँ के शासकों ने जल स्रोतों के निर्माण को पुण्य कर्म मान कर स्वीकार किया। सभ्यताओं के विकास ने मानव को जल के प्रति सचेत किया और इन अनमोल रजत बूंदों के संरक्षण के लिए नदी, सरोवर, तडाग, कूप, नाड़ी टांका ..आदि के प्रति सकारात्मक व्यवहार के गूढ़ रहस्य को समझाया।





