युवाओं में सनातन शिक्षा की आवश्यकता

मधुकर पाण्डेय
लेखक, फिल्म निर्देशक एवं ब्राडकास्टिंग मीडिया प्रोफेशनल हैं।


आज के विषाक्त वातावरण को दृष्टिगत रखे हुए सनातन की शिक्षा ही भारत की संस्कृति की रक्षक बनेगी। आज जिस तरह से पाश्चात्य संस्कृति का भारत के कोने-कोने में आक्रमण हुआ है। वह किसी भी सैन्य आक्रमणों से कई गुना भयावह एवं हानिप्रद है। आज सनातनी अर्थात हिंदू संस्कृति को जिस तरह से मनोवैज्ञानिक ढंग से अप्रसांगिक सिद्ध करने के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रयास चल रहे हैं, वह आसानी से देखे व समझे जा सकते हैं। आज स्थिति ये होती जा रही है कि हिंदू युवा विशेषकर नगरीय एवं महानगरीय स्थानों में रहने वाले, ईश्वर के अस्तित्व एवम् हमारे सनातनी रीति-रिवाजों पर ही प्रश्न उठाने लगते हैं। जबकि हमारे सनातन धर्म में जो भी रीति-रिवाज हैं, उनका कोई न कोई आधार एवं तर्क होता है जिसे हम अपने संतानों को बता नहीं पाते क्योंकि यह अमूल्य ज्ञान हमारे परिवार से हमें ही नहीं स्थानांतरित किया गया। संस्कार परिवार से पड़ते हैं। समय बहुत तेजी से बदल रहा है। पहले अधिकतर संयुक्त परिवार होते थे लेकिन वर्तमान में अब एकल परिवारों की संख्या विभिन्न कारणों से बढ़ रही है। इसलिए संयुक्त पारिवारिक वातावरण से जो सनातनी शिक्षा सरल एवं प्राकृतिक ढंग से हमें प्राप्त होती थी, वह परम्परा अब क्षीण सी हो गयी है। इसे युद्धस्तर पर पुन: जाग्रत करने की आवश्यकता है नहीं तो भौतिक सफलताओं एवं आकांक्षाओं की पूर्ति की अंतहीन दौड़ में सनातन संस्कृति बहुत पीछे छूटी जा रही है।

अन्य अनेकों धार्मिक विचारधारा वाले समुदायों में धार्मिक शिक्षा एवं धर्म का कठोर पालन न केवल अनिवार्य है बल्कि उसकी पूरी शिक्षा देना एवं लेना भी एक आवश्यक धार्मिक कर्तव्य है। आप ईसाई धर्म को ही ले लें, या इस्लाम को ही लें या सिख समुदाय को, इन धार्मिक समुदायों में न केवल इनकी धार्मिक आस्था सशक्त है, बल्कि इनके ग्रंथों में जो भी लिखा है, उस पर कोई भी प्रश्न नहीं उठा सकता। यह कृत्य एक अक्षम्य अपराध की श्रेणी में माना जाता है। परन्तु क्या हमारे सनातन में ऐसा कुछ है? सीधा उत्तर है कि सनातन इतना कठोर नहीं। अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि जब सनातन इतना कठोर नहीं है,समावेशी है, सरल है तो फिर हमारे बच्चे, युवा एवं उनके माता-पिता हमारी सनातनी संस्कृति के लिए उतने समर्पित नहीं है जितने अन्य धार्मिक विचारों के लोग। ऐसा प्राय: देखा जाता है कि हमारे हिंदू धर्म के लोग जिसमें अधिकतर युवा, मंदिर दर्शन व्रतादि इसलिए अधिक करते हैं ताकि उनके अभीष्ट यानि उनकी शैक्षिक परीक्षाओं में उन्हें सफलता मिले या उनको उचित या मनचाही नौकरी मिल जाए, विवाह हो जाए, संतान प्राप्ति हो जाए, आदि अनेकों प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति हेतु ही वह अधिकतर इन धार्मिक स्थानों पर दर्शन हेतु जाता है। इसमें बुरा कुछ भी नहीं है, लेकिन मनुष्य की इच्छापूर्ति उसके प्रारब्ध, पुरुषार्थ, आचरण आदि पर निर्भर है एवं ईश्वर से इनकी पूर्ति हेतु प्रार्थना करना तथा इस हेतु अन्य आवश्यक धार्मिक कर्म करना अच्छी बात है, लेकिन बहुत ही बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आज की पीढ़ी को ईश्वर की आवश्यकता केवल उसकी अभिलाषाओं की पूर्ति तक ही है?

आपको एक उद्धारण देता हूँ। मेरे मुंबई प्रवास के दौरान जिस सोसायटी में मैं रहता था, वहाँ अमेरिका से एक युवा दम्पति किसी अतर्राष्ट्रीय कंपनी के उच्चाधिकारी बन कर भारत आये। यह दम्पति जिसमें उनके छोटे बच्चे भी थे, पूर्ण रूप से समाज में आधुनिक से दिखते थे। वहाँ रह रहे हिंदू समाज के लोगों के साथ उनका सौजन्यतापूर्ण व्यवहार था। प्रात:कालीन भ्रमण के दौरान प्रत्येक दिन एक व्यक्ति साईकिल से मेरे टॉवर के नीचे आता था। उसकी वेशभूषा उसके धार्मिक मान्यता के अनुसार ही होती थी। एक दिन मैंने अपने वाचमैन से पूछा कि यह सज्जन कौन हैं, जो रोज प्रात: यहाँ आते हैं? तो उसने उत्तर दिया कि यह एक धार्मिक शिक्षक है, जो अमेरिका से आये हुए दंपत्ति के बच्चों को कुरआन पढाते हैं। यह उत्तर सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा कि अमेरिका जैसे समाज में एक उच्च मध्यम वर्गीय शैली वाला परिवार न केवल स्वयं बल्कि अपने बच्चों में अपनी धार्मिक मान्यता के अनुसार अपने छोटे-छोटे बच्चों में अपने धर्म की पुस्तकों एवं ज्ञान का एक अनिवार्य कर्तव्य कर रहा है।

क्या यह एक उदाहरण हमको यह नहीं सिखाता कि हम भले ही कितने ही आर्थिक ऊंचाइयों पर ही क्यों न हों, हमें अपने परिवारों में सनातनी शिक्षा को अनिवार्य करना चाहिये? यदि आपने अपने सनातन धर्म के वृहदज्ञानकोष के किसी भी शास्त्र, वेद, पुराण, उपनिषद आदि का अध्ययन नहीं किया है और आप अपनी भौतिक प्रगति में बहुत ही व्यस्त हैं तो कम से कम सनातनी शिक्षा का सारांश एवं मूल भाव का ही अध्ययन कर लें ताकि अपनी संतानों को कुछ अमूल्य धार्मिक एवं आध्यात्मिक आधारशिला दे सकें। यदि आप यह पैतृक संपत्ति अपनी संतानों को दे पायेंगे तो न केवल उनके सफल एवं संतुष्ट जीवन बल्कि सनातन के सशक्त अस्तित्व एवं भारत के सुनहरे भविष्य के निर्माण में एक अविस्मरणीय योगदान देंगे। यह अनिवार्य कार्य हम-आपको ही करना होगा। सरकारें अपनी विभिन्न चुनावी, संवैधानिक बाध्यताओं के कारण सनातन की शिक्षा को सभी सनातनी छात्रों के लिए भले ही अनिवार्य न कर सकें लेकिन आप अपने घर में कर सकते हैं, वहाँ कोई संवैधानिक एवं चुनावी बाध्यता नहीं होती।

जो एक उदाहरण मैंने आपको दिया है, उससे आपको क्या शिक्षा मिलती है? सोचियेगा अवश्य। और हाँ क्या वैसा कोई धार्मिक शिक्षक आपके घर आकर आपके बच्चों को सनातनी शिक्षा देता है? सोचियेगा…सनातन की शिक्षा ही सनातनियों एवं भारत की रक्षा एवं सुरक्षा कर सकती है। आज ही निर्णय लीजिए, एक सनातनी सैनिक बनने एवं परिवार तथा समाज को सनातनी सैनिक बनाने का, जहाँ शस्त्र नहीं बल्कि शास्त्र ही आपकी सुरक्षा करेंगे।

कुछ प्रश्न अपने सभी सनातनी परिवारों से पूछना है कि क्या कभी आप लोगों ने अपने बच्चों के साथ बैठकर सनातन धर्म के ऊपर चर्चा की? कभी हम लोगों ने अपने बच्चों को यह बताया कि हम नवरात्रि क्यों मनाते हैं? दीपावली एवं होली क्यों मनाते है? इन सभी त्यौहारों का धार्मिक महत्व क्या है? क्या हमने कभी अपने बच्चों को यह बताया कि सनातन के अनुसार महीनों के नाम क्या होते हैं, कभी यह बताया कि सावन, भादों, जेठ, आषाढ़ आदि नाम अंग्रेजी के किन महीनों को कहते हैं? कभी हमने बच्चों को यह बताया कि हिन्दू कैलेंडर के अनुसार महीने को दो पक्षों को किन नामों से जानते हैं? आज सनातनी समाज की यह बहुत बड़ी आवश्यकता है कि वह अपने परिवारों, समाज एवं क्षेत्र में सनातनी ज्ञान का गम्भीरतापूर्वक प्रसार करें एवं उनमें सनातन के प्रति गर्व की अनुभूति करावें, नहीं तो हम न केवल अपने बच्चों के साथ बल्कि सनातन धर्म के साथ बहुत बड़ा अन्याय करेंगे।

”जो पुरूष धर्म का नाश करता है, उसी का नाश धर्म कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी धर्म भी रक्षा करता है । इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले, इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी न करना चाहिए।