श्री कृष्ण का राजनैतिक तत्व दर्शन

डॉ. हरवंश लाल ओबराय
लेखक भारतीय संस्कृति के प्रतिष्ठित शोधकर्ता तथा प्रमुख् विद्वान थे।


जिन भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द की, विश्व के करोड़ों व्यक्ति आदि पुरुष, पूर्ण पुरुष तथा परम पुरुष के रूप में अर्चना करते हैं उन विश्वगुरु श्रीकृष्ण का राष्ट्र पुरुष के रूप में चिन्तन सम्भवत: कुछ संकुचित भाव दिखाई देगा। किन्तु प्रस्तुत लेख का ऐसा कोई आशय नहीं है। जिस प्रकार से सहस्ररश्मि सूर्य की एक रश्मि का अध्ययन भी सूर्य को समझने में सहायक होती है उसी प्रकार इन पूर्ण पुरुष श्रीकृष्ण के जीवन की राष्ट्रीय रश्मि का अध्ययन भी कम महत्व का नहीं। वरन् अभी तक उन योगेश्वर कृष्ण की इसी जीवन रश्मि का कम से कम अध्ययन किया गया है।

भगवान् श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व इतना अनन्तमुखी है कि यह कहना कठिन है कि वे क्या नहीं थे। योग-योगेश्वर, ज्ञानदाता, सिद्ध साधक, मित्र, सारथि, सेवक, रक्षक, राष्ट्रनिर्माता, आदर्श कर्मयोगी, आदर्श प्रेमी, आदर्श शासक, सफल राजनीतिज्ञ, शूरशिरोमणि, मानवता के गौरव, लोकनायक, लोकशिक्षक वे सभी कुछ थे। पिछले 5000 वर्षों की गम्भीर गवेषणा के पश्चात् भी अभी तक उन के बहुआयामी जीवन की अनेकानेक अज्ञात दिशायें खोजनी शेष हैं।

एक पारसी विद्वान् प्रो. फीरीज कावसजी दावर भगवान् कृष्ण की महात्मा ईसा से तुलना करते हुए लिखते हैं… महात्मा ईसा इतिहास के उन बहुमूल्य रत्नों में से है जिनके लिए हम लोगों की सदा आदरसूचक विशेषणों का प्रयोग करने की इच्छा होती है, परन्तु क्या वे रणभूमि में जाकर युद्ध कर सकते थे या राजदूत का कार्य कर सकते थे? हमारी यह धारणा है कि समस्त संसार के इतिहास में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ, जिसका कार्यक्षेत्र इतना अधिक व्यापक रहा हो, जितना श्रीकृष्ण का था। उन्होंने अपने कीर्तिमय जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में जो-जो लोकोत्तर कार्य किए, वे गत पांच सहस्र वर्षों से अटक से लेकर कटक तक और काश्मीर से कन्याकुमारी तक ही नहीं, प्रत्युत सारे जगत् के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में गाए जाते हैं।। शासक, राजपूत, तत्त्वदर्शी, योगेश्वर, सिद्ध पुरुष तथा ईश्वर के पूर्णावतार आदि विद्वान् पारसी प्रोफेसर आगे लिखते हैं, बालक, विद्यार्थी, मित्र, प्रेमी, योद्धा, शासक, राजपूत, तत्वदर्शी, योगेश्वर, सिद्ध पुरूष तथा ईश्वर के पूर्णावतार आदि सारे ही रूपों में उनके जीवन की अद्वितीय महानता दृष्टिगोचर होती है। किसी कवि का कथन है कि कीर्तिमय जीवन की एक कार्य संकुल घड़ी भी कीर्ति रहित जीवन के एक युग से भी श्रेष्ठ है, फिर श्रीकृष्ण ने तो एक सौ पचीस वर्ष की लम्बी एवं पूर्ण आयु प्राप्त की और उसके प्रत्येक घंटे में उन्होंने ऐसे-ऐसे कार्य किए जिनसे उनका नाम तथा यश, सदा के लिए अमर हो गया।

गीता तत्व
गीता तत्व ही भगवान् कृष्ण का जीवन तत्व है। भगवान् स्वयं कहते हैं, गीता में हृदयम् अर्थात् गीता ही मेरा हृदय है। गीता उपनिषदों का सार है पर सार मात्र ही नहीं है इससे अधिक भी कुछ है। उपनिषदों का ब्रह्मज्ञान जगत् के कोलाहल से दूर अरण्यों या वनों में गाया गया। परमशान्ति में बैठे हुए गुरु और शिष्य वार्तालाप कर रहे हैं। पर समस्या है धर्म के उस परम तत्व को जीवन में कैसे साकार किया जाए? प्राय: लोग कह देते हैं कि परमार्थ की बातें परमार्थ के लिए है उनका यथार्थ जीवन में, व्यवहार में कोई स्थान नहीं। यह ऐसा ही, जैसा पश्चिम के बड़े-बड़े विज्ञानवेत्ता गिरजाघर में जाकर प्रभु ईसा का सन्देश गाते हैं- सभी जीवों से वैसे ही प्रेम करो जैसे अपने आप से करते हो। और गिरजे से बाहर अपनी प्रयोगशाला में जाकर मानवता के नाश के लिए अणुबम तथा उद्जन बम तैयार करते हैं। पूछने पर वे तर्क देते हैं कि धर्म और राजनीति का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है, विज्ञान का क्षेत्र और धर्म का क्षेत्र भिन्न-भिन्न है। ऊपर से ठीक प्रतीत होते हुए भी इस कथन में कितना धोखा छिपा हुआ है यह हिरोशिमा और नागासाकी के उजड़े हुए भू-प्रदेश से पूछियेगा, कथनी और करनी के इसी अन्तर ने मानवता का नाश कर रखा है। आदर्श और यथार्थ के बीच की इसी खाई में मानवता गिर रही है। गीता ने ऊँचे से ऊँचे ब्रह्मज्ञान को जीवन की भीषण से भीषण परिस्थिति पर लागू करके दिखाया है जब 18 अक्षौहिणी सेनाएं मरने-मारने को उद्यत है और रक्त की नदियाँ बहाना चाहती है वहाँ भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को ब्रह्मज्ञान का महान् उपदेश दिया पर शान्ति लाभ के लिए वन में भागने भी नहीं दिया।

प्रवृत्ति और निवृत्ति
क्रान्ति के तुमुल नाद के भीतर भी भगवान् ने अर्जुन को शांति का उपदेश दिया और भीतर की शांति को बिना खोए ही बाहर से भीषणतम युद्ध तक कर • सकना ही जीवन की वह अद्भुत कला है जो, गीता ने सिखाई है।
इसमें प्रवृत्ति तथा निवृत्ति का संयोग है बाहर से प्रवृत्त रहते हुए भी अन्तर से सर्वथा निर्लिप्त रहना ही गीता का मर्म है। श्रीकृष्ण का जीवन संदेश है- आदर्श को व्यवहार में उतारो, परमार्थ को यथार्थ में साकार करो, संन्यास को कर्म में विकसित होने दो। जीवन एक नहीं हैं। दोनों क्षेत्र एक ही इकाई है तथा धर्म राजनीति के दो अलग-भगवान का आदेश है माममुस्मर युद्ध च । मुझे याद भी करता रह युद्ध भी करता जा।

स्वदेश और स्वधर्म
देश और धर्म को भिन्न-भिन्न मानने से देश की सेवा धर्मपूर्वक नहीं हो सकेगी और धर्म हमें इहलोक में उत्थान न दे सकेगा। यदि धर्म से राजनीतिक बेहोशी हो तो उसका क्या लाभ है और यदि धर्म साधना से देश लूट जाए तो वह साधना किस काम की? शास्त्र का मत है-यतोऽभ्युदय नि:श्रेयससिद्धि स धर्म:। जौ इहलोक और परलोक दोनों सुधरे वही धर्म है अत: भारत में राजनीति धर्म का एक अंग है इसे राजधर्म कहा है। बिना धर्म के राजनीति वेश्या के समान हो जाएगी। अत: भगवान् श्री कृष्ण जहाँ धर्मरक्षक हैं वहाँ राष्ट्र निर्माता भी हैं।

धर्म युद्ध
भगवान कृष्ण ने गीता शास्त्र में धर्म युद्ध की कल्पना बड़ी सुन्दर दी है। राग, द्वेष से हीन होकर, सुख-दु:ख को समान जानकर मित्र-शत्रु में भेद न करते हुए, अपने मन की शांति को स्थिर रखते हुए, भगवान को निरन्तर स्मरण करते हुए निष्काम कर्म भाव से धर्म रक्षा के लिए यदि युद्ध किया जाय तो वह धर्म युद्ध है। सच्चा क्षत्रिय युद्ध धर्म के लिए ही लड़ता है, किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए वा प्रतिकार भावना से नहीं। शांति निश्चय ही उत्तम है किन्तु यदि अन्तर की शांति कायम रख कर असंग भाव से युद्ध किया जाय तो वह भी महान् है। जो धर्म की पुकार पर युद्ध से भागे, वह कायर है।
क्षत्रिय कसाई या बूचड़ नहीं है वह धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र धारण करता है। यदि युद्ध के साथ योग का संयोग न हो, यदि शक्ति के साथ शील का समन्वय न हो तो बल का दुरुपयोग प्रारम्भ हो जायगा।

श्रीकृष्ण के ‘मामनुस्मर युद्ध च’ में ध्वनि है कि मनुष्य निरन्तर भगवान् को भी स्मरण रखे तथा जीवन के संघर्ष में भी लगा रहे। इसी भाव को गुरु गोविंदसिंह ने प्रकट किया है-
धन्य जिओ सिंह को जग में, मुख ते हरि चित्त में युद्ध विचारे।

यज्ञमय जीवन
भगवान् का अपना जीवन भी यज्ञमय था, वे स्वयं कहते हैं- त्याग के लिए कर्म के अतिरिक्त यह संसार कर्म से बंधा हुआ है। अर्थात् यज्ञ के सिवा शेष सभी कर्म बन्धन में डालने वाले हैं। श्रीकृष्ण का कोई भी स्वार्थ शेष नहीं था, कोई कामना नहीं थी। फिर भी वे इतने कर्मशील थे। उन का समस्त जीवन इदं न मम् की यज्ञ भावना से ओत-प्रोत था। राष्ट्र के प्रत्येक बच्चे को इसी भावना से कार्य करना चाहिए, स्वार्थ एवं अहंकार राष्ट्रोत्थान के लिए घातक है।

राज्य के उद्देश्य
श्रीकृष्ण की घोषणा है- यह धर्मियों के उद्धार और दुष्टों के विनाश के लिए है। मैं हर युग में धर्म की स्थापना करने में सक्षम हूं। यह एक राजकीय घोषणा भी है कि धर्मियों की रक्षा करो, दुष्टों को दण्ड दो।

समता
समता का आश्वासन देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- ज्ञान और विनम्रता से संपन्न ब्राह्मण एक गाय और एक हाथी है। कुत्तों और बिल्लियों के मामले में बुद्धिमान लोग समान विचारधारा वाले होते हैं, अच्छा शासक सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करे। वह पशुओं तथा छोटे जीवों का भी संरक्षण करे। किसी प्रकार का पक्षपात न करे।

अनन्य राष्ट्रभक्ति
भगवान् की प्रतिज्ञा है- जो मुझे अनन्य समझकर मेरी पूजा करते हैं, मैं योग के क्षेत्र को उन लोगों के लिए लेकर चलता हूं जो हमेशा इसमें लगे रहते हैं।

जो लोग अनन्य भाव से मुझ राष्ट्र पुरुष का चिन्तन करते हैं मैं उन के योग क्षेम का वहन करता हूँ। अनन्य भाव से राष्ट्र चिन्तन करने का अर्थ है राष्ट्र को अपने से अन्य, अपने से भिन्न न माने। अर्थात् अपना हित और राष्ट्र हित को भिन्न न समझे। मैं राष्ट्र का अंग हूँ तथा राष्ट्र के हित में ही मेरा हित है, ऐसा मानकर राष्ट्र सेवा करने से ही राष्ट्र का उद्धार हो सकता है। यदि देश के मुसलमान तथा ईसाई, भारत के हित में ही अपना हित मानें तथा राष्ट्र को पराया न समझें तो क्या वे राष्ट्र के साथ कभी द्रोह कर सकते हैं?

विराट् रूप दर्शन
श्रीकृष्ण राष्ट्र पुरुष हैं। विराट् रूप में उन्होंने अर्जुन को संगठित राष्ट्र की विराट् शक्ति का रूप दिखाया है। विराट् रूप के सामने एक राष्ट्र के व्यक्ति समझता है में सब कुछ कर रहा हूँ, किन्तु विराट् लज्जित हो जाता है। भगवान उसे कहते हैं राष्ट्र के इस विराट रुप करके सारे पापी पहले ही भस्म होने के लिए जा रहे हैं, निमित्त मात्र भवस हे अर्जुन, तू निमित्त मात्र बन जा।

राष्ट्र शरणागति राष्ट्र की शरण में आने वालों को आश्वासन देते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं चाहे बड़े से बड़ा दुराचारी भी मुझ राष्ट्रपुरुष की शरण में आ जाये, यानि राष्ट्रभक्त का कभी नाश नहीं होगा। वे आह्वान करते हुए मानव से कहते हैं- सभी धर्मों को त्याग दो और केवल मेरी शरण लो। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूंगा।

बल तथा बुद्धि
बल तथा बुद्धि के संयोग से ही राष्ट्र का कल्याण है। जहां योग के गुरु भगवान श्री कृष्ण रहते हैं, वहां धनुर्धारी अर्जुन रहते हैं। श्रीविजय की विजय निश्चित है और मेरी नीति ही मेरी बुद्धि है।
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं तथा जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है, जहाँ शस्त्र और शास्त्र का, युद्ध और यज्ञ का, बल एवं बुद्धि का समन्वय है, वहीं विजय है, वैभव है तथा यश है। राष्ट्रोत्थान के लिए जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र महाराज का यह मुक्ति मन्त्र क्या हम सुनेंगे।