श्री राम का राष्ट्र

प्रो. प्रमोद कुमार दुबे
लेखक श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े रहे हैं


जहाँ राजा राम नहीं होते, वहाँ राष्ट्र नहीं होता। जहाँ श्रीराम रहते हैं, वह वन भी राष्ट्र हो जाता है’- यह कथन है आदिकवि वाल्मीकि का-
न हि तद् भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपति।
तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामो निवत्स्यति।
प्रश्न उठता है कि आदिकवि ने क्यों कहा है कि जहाँ श्रीराम राजा नहीं होंगे, वहाँ राष्ट्र भी नहीं होगा, वह वन भी राष्ट्र हो जाएगा, यदि वहाँ श्रीराम निवास करें। श्रीराम के बिना राष्ट्र की कल्पना क्यों नहीं की जा सकती?
श्रीराम और राष्ट्र की अभिन्नता जानने केलिए राष्ट्र शब्द का परिचय प्राप्त करना चाहिए।

राष्ट्र वैदिक शब्द है। राष्ट्र शब्द ‘रा’ धातु से बना है जिससे राय:, रयि इत्यादि समृद्धि परक शब्द बने हैं। इस शब्द में अग्नि बोधक ‘र’ वर्ण बीज स्वरूप है, राजते- दीपत प्रकाशते इति राष्ट्रम् अर्थात राष्ट्र देदीप्यमान भूमि है। राजृ- दीपौ अर्थात प्रकाशमय है। इसीलिए हमारे राष्ट्र को भा में रत भारत कहा गया- भारत प्रकाशमान है। प्रकाश शाश्वत है, सनातन है। भारत सनातन राष्ट्र है।

भौतिक पदार्थों की अन्तर्हित ज्योति ही शाश्वत है। उसी ज्योति से भौतिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं और उसमें विलीन हो जाते हैं। यह ज्योति सर्वत्र व्याप्त है, यही प्राणिमात्र की प्राणाग्नि है, जन-जन के ज्ञान और कर्म की अग्नि अर्थात इन्द्रियाग्नि है।

पं. दीनदयाल उपाध्याय ने राष्ट्र का अवबोध स्पष्ट करते हुए कहा है-‘राष्ट्र का अस्तित्व उसके नागरिकों के जीवन का ध्येयभूत आधार है। जब एक मानव समुदाय के समक्ष एक व्रत, विचार या आदर्श रहता है और वह समुदाय किसी भूमि विशेष को मातृभाव से देखता है तो वह राष्ट्र कहलाता है।’ दीनदयाल जी ने राष्ट्र की आत्मा को चिति कहा और चिति की धारणा स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘चिति किसी समाज की वह प्रकृति है जो जन्मजात है तथा जो ऐतिहासिक कारणों से नहीं बनी।’ उन्होंने नेशन की इतिहासाश्रित यूरोपीय धारणा से भारत राष्ट्र का परिचय देने पर आपत्ति करते हुए कहा कि ‘ यदि हम राष्ट्रवाद की इस पुरीने विचार को समझ सकते हैं तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह हिन्दुत्व के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है’ (पृ. 26. दी.सं.वा. खण्ड-नौ)।

दीनदयाल का सुस्पष्ट मत है- ‘हमारी दृष्टि में राष्ट्रों का आविर्भाव किसी ऐतिहासिक संयोग के कारण नहीं, अपितु दैवी प्रकृति की मूल योजना के कारण है। कोट्यावधि मानव राष्ट्र के रूप में किसी कृत्रिम से एकत्र नहीं कर सकते। कुम्भ पर्व जैसे अनेक पर्व और त्यौहार राष्ट्र के अस्तित्व का परिणाम है, कारण नहीं।’ राष्ट्र जीवन में दिखनेवाली समानताएँ किसी अंतर्निहित चेतना की अभिव्यक्ति मात्र है, ये राष्ट्र के लक्षण हैं, कारण नहीं’ (पृ. 239, दी.सं.वा. खं- सात)।
जन-जन में व्याप्त राष्ट्रात्मा की अभिव्यक्ति कुंभ इत्यादि पर्वों में होती है। निरुक्तकार यास्क के अनुसार यही नर राष्ट्रमेव है अर्थात जन-जन में समाहित राष्ट्र। दीनदयाल जी की पंक्ति है-‘जीवात्मा के समान राष्ट्रात्मा के स्थायित्व एवं उसके विश्वात्मा के साथ अभिन्न संबन्धों के आधार पर ही हम उनके विकास की वह धारा निश्चित कर सकेंगे, जो विरोधात्मक न होकर विधायक होगा’ (पृ. 239, वही)। दीनदयाल जी ने राष्ट्र को जीवात्मा, राष्ट्रात्मा और विश्वात्मा तीन स्तरों में निरूपित किया है।
जैसे आज नेता जनता से वोट माँगता है, वैदिक राज्याभिषेक में राजा प्रजा से राष्ट्र माँगता था- अर्थेतस्थ राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त स्वाहा! (यजु. 10.3) और पुरोहित प्रजा के सम्मुख राजा को अनुशंसित करता था, आश्वस्ति देता था कि यह सुपात्र व्यक्ति है, आर्थिक उन्नति में सहयोग देगा, सुरक्षा और विकास के कार्य करेगा।

समाजहित में निरंतर कार्य करनेवाले सत्यनिष्ठ तपस्वी पुरोहित पर प्रजा का विश्वास था कि उसने शिक्षा-दीक्षा और संस्कार देकर दायित्व वहन के योग्य सुपात्र बनाया है, इसीलिए पुरोहित भावी जन प्रतिनिधि का अनुशंसक होता था, आज भी नेता को गणमान्य लोगों की अनुशंसा मिलती है।

यह वैदिक धारणा है कि राष्ट्र व्यक्ति के स्वराट् में स्थित है, यह लोक में व्याप्त सामूहिक चेतना है। जनमन में निहित राष्ट्र अपने राजा को अर्थ की आकांक्षा से चुनता है, राजा के नेतृत्व में राज्य गठित करता है। राज्य ही अर्थ का मूल है- अर्थस्य मूलं राज्यम् (3-चा.सू.)। जनमन का राष्ट्र सर्वात्मक है और वही राष्ट्र प्रजा के समर्थन से राजा के नेतृत्व में साकार होकर राज्य बन जाता है।

सर्वात्म सत्ता को ही विष्णु कहा जाता है। विष्णु शब्द विश् धातु से बना है, विश् धातु से प्रवेश और प्रविष्ट शब्द बने हैं, जो सर्वत्र प्रविष्ट है, वही विष्णु है- हम में तुम में खडग खंभ में घट- घट व्यापे राम हैं । इसी निराकार राम के बारे में कबीर कहते हैं- राम बिनु कोई धाम नहीं, अखंड में है जोत का बासा।

जन-जन में व्याप्त श्रीराम को आदिकवि ने ‘जनेश्वर’ कहा है- नगरस्थो वनस्थो वा त्वं नो राजा जनेश्वर:।
जनमन के स्वराट् में निहित परमात्मा को तुलसी बाबा ने ‘ईश्वर अंश जीव अबिनासी’ कहा है, जनमन के श्रीराम सर्वव्याप्त विष्णु हैं- यो रामं प्रतियुध्यते विष्णु तुल्य पराक्रमम्।

ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में परम पुरुष से जिस विराट की उत्पत्ति की चर्चा हुई है, वही राष्ट्र का मूल है। बताया गया है कि परम पुरुष से विराट उत्पन्न हुआ और विराट से विराज अधि पुरुष- तमाद् विराटो जायत विराजो अधि पूरुष:।
यजुर्वेद (5.21) में जिस विष्णु को विष्णो रराटसि कहा गया है, उसी विष्णु को आदिकवि ने कृताभिषेक: रराज राम: कहा है। विष्णु विश्वात्मा हैं उन्हीं के स्वरूप श्रीराम राष्ट्रात्मा हैं।

श्रीराम धर्म के विग्रह हैं- रामो विग्रहवान धर्म: और धर्म ही प्रजा को धारण करता है- धर्मो धारयते प्रजा:।
विश्वात्मा विष्णु की सक्रियता उनके तीन पदों से व्यक्त होती है। ऋग्वेद के विष्णु सूक्त में कहा गया है- यस्य त्री पूर्णा मधुना पदानि । राष्ट्र के तीन स्तर हैं- वैयष्टिक, सामष्टिक और पारमेष्टिक। सामान्य शब्दों में कह सकते हैं कि व्यक्ति, समाज और देश में राष्ट्र अन्तर्भूत है।

विष्णु की त्रिधा गति लक्ष्मी में निरूपित हुई है। लक्ष्मी सृष्टि- स्थिति- संहारकारिणी राजराजेश्वरी त्रिगुणात्मिका महाशक्ति हैं। माता सीता को तुलसी बाबा ने ‘आदिशक्ति सब विधि जगमूला’ और उद्भव स्थिति संहारकारिणीं कहा है। तुलसी के राम विष्णु हैं और सीता लक्ष्मी। तेनेयं त्रयी वर्तते वेद त्रयी ही त्रिगुण और त्रिवर्ग का उत्स है। इसीलिए चाणक्य ने कहा है- राजनीतिर्लक्ष्मी धर्मो नारायण। राजनीति लक्ष्मी और धर्म नारायण हैं।

श्रीराम को अगस्त ने विष्णु का धनुष दिया और कहा- राम! पूर्व काल में भगवान विष्णु ने इसी धनुष से युद्ध में बलवान असुरों का संहार किया। देवताओं की उद्दीप्त लक्ष्मी को असुरों के अधिकार से मुक्त कर उन्हें लौटाया-
अनेन धनुषा राम हत्वासंख्ये महासुरन्।
आजहार श्रियं दीप्तां पुरा विष्णु: दिवौकसाम्।
35. 13. अरण्य.

विष्णु का धनुष कैसा है? श्रीमद्भागवत (12.10.15) में विष्णु के सारंग नामक धनुष के परिचय मिलता है- कालरूपं धनु: शाङ्र्ग तथा कर्ममयेषुधिम् । तुलसी बाबा ने सरल शब्दों में श्रीराम के कालरूप धनुष का परिचय दिया-
लव निमेष परमान जुग वर्ष कल्प शर दण्ड।
भजसि न मन तेहि राम कहँ काल जासु को दण्ड ।।
विष्णु और श्रीराम की अभिन्नता से ज्ञात होता है कि वेदोक्त राज्य सिद्धान्त ही रामराज्य है। तुलसी बाबा का कथन है- श्रुति सेतु पालक राम तुम जगदीश, माया जानकी। श्रीराम लोक और वेद के मध्य सेतु है। उन्होंने अपने आचरण से लोक में वेदधर्म का चरित्रार्थ किया है।

राष्ट्र की वैदिक धारणा मानुषी राष्ट्र की धारणा से बृहद है, उसे बृहद् राष्ट्रं संवेश्य कहा गया। बृहद् राष्ट्र में वरुण, वायु, इन्द्र और अग्नि आदि देव शक्तियाँ ऋत पूर्वक समाविष्ट हैं। बृहद् राष्ट्र के रक्षक- पोषक श्रीहरि विष्णु हैं। जहाँ तक सृष्टि है, वहाँ तक विष्णु का साम्राज्य है। यह विश्वात्मा की पारमेष्ठिक सत्ता है। विष्णु के पारमेष्ठिक साम्राज्य के भृत्य देवता हैं। इसमें देवासुर संग्राम होता रहता है। आसुरी शक्तियाँ उत्पात करती हैं, विष्णु अपने धनुष से असुरों का संहार करते हैं।
सृष्टि यज्ञ का रक्षक और विस्तारक विष्ण का धनुष है। धनुष ऋग्वेदीय सूक्त में कहा गया- धनु: शत्रोरपक्रामं कृणोति धन्वना सर्वा: प्रदिशो जयम्। धनुष शत्रु के आक्रमण को रोक देता है। धनुष से हम सारी दिशाओं में विजय प्राप्त करें। यह त्रिसप्तात्मक धनुष सृष्टिकारी दिव्याग्नि है। इससे ब्रह्माण्ड में ब्रह्म नाद ओंकार गूँजता है। इसीसे काल का विस्तार होता है। काल के इसी धनुष से युग परिवर्तन होता है। निश्चय ही यह श्रीराम के राष्ट्रोदय की वेला है।