मुरारी शरण शुक्ल
सह सम्पादक, हिन्दू विश्व
कुम्भ का शाब्दिक अर्थ है घड़ा। यज्ञ-अनुष्ठानों में इसके लिए कलश शब्द प्रयुक्त होता है। यह मिट्टी इत्यादि पंच तत्वों से बनता है, इन्हीं पंच तत्वों से मानव शरीर भी निर्मित होता है। कुम्भ शब्द की उत्पत्ति कुंभूमि कुस्सितं वा उम्भति पूरयति+अय से हुई है। कुम्भ का अर्थ भूमि या पृथ्वी के रूप में भी आंका जाता है। कुं अम्भा धातु तथा अप प्रत्यय के संयोग से कुम्भ शब्द बना है, उम्भति का अर्थ है संक्षिप्त करना या भरना, पूर्यात का अर्थ भरना या पूरा करना। घड़ा, जल भरने का पात्र अर्थात् कलश। राशि चक्र में ग्यारहवीं राशि का नाम भी कुम्भ है। कुम्भ शब्द के अनेक अर्थ होते हैं। कुम्भ भारतीय संस्कृति में मंगल का प्रतीक है, शकुन का प्रतीक है, शोभा, सौन्दर्य एवं पूर्णत्व का वाचक भी है। स्वास्तिक चिन्हों से अंकित अक्षत्, दुर्वा, नारिकेल फल से ढँका हुआ, आम्र पल्लव से युक्त जलपूर्ण कुम्भ आदिकाल से आज तक मंगल के प्रतीक के रूप में चला आ रहा है। भारतीय संस्कृति में जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी संस्कारों में कुम्भ (कलश) का सर्वाधिक महत्व है। अस्थि कलश में भी कुम्भ और गंगा का ही योग है।
समुद्रमंथन और अमृत घट
यहाँ कुम्भ का सम्बन्ध समुद्रमंथन से उत्पन्न अमृतघट से है। इस अमृतघट को असुर गण उठा ले गए थे, जिसको गरुड़ पुन: पृथ्वी पर ले आए। जिन-जिन स्थानों पर यह अमृतघट (कुम्भ) रखा गया, वहाँ अमृत-बिन्दुओं के छलक जाने से, वे सभी प्रदेश पुण्यस्थल हो गए। वहाँ निश्चित समय पर स्नान-दान-पुण्य करने से अमृत-पद (मोक्ष) की प्राप्ति होती है। बारह-बारह वर्ष के अन्तर से चार मुख्य तीर्थों में लगने वाला स्नान-दान का ग्रहयोग है, कुम्भ।
कितने कुम्भ पर्व
इसके चार स्थल प्रयाग, हरिद्वार, नासिक-पंचवटी और अवन्तिका (उज्जैन) हैं। जब सूर्य तथा चन्द्र मकर राशि पर हों, गुरु वृषभ राशि पर हो, अमावस्या हो, ये सब योग जुटने पर प्रयाग में कुम्भयोग पड़ता है। इस अवसर पर त्रिवेणी में स्नान करना सहस्रों अश्वमेध यज्ञों, सैकड़ों वाजपेय यज्ञों तथा एक लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से भी अधिक पुण्य प्रदान करता है। कुम्भ के इस अवसर पर तीर्थयात्रियों को मुख्य दो लाभ होते हैं; गंगास्नान तथा सन्तसमागम। जिस समय गुरु कुम्भ राशि पर और सूर्य मेष राशि पर हों, तब हरिद्वार में कुम्भ पर्व होता है। जिस समय गुरु सिंह राशि पर स्थित हो तथा सूर्य एवं चन्द्र कर्क राशि पर हों, तब नासिक में कुम्भ होता है। जिस समय सूर्य तुला राशि पर स्थित हो और गुरु वृश्चिक राशि पर हों, तब उज्जैन में कुम्भ पर्व मनाया जाता है।
गंगा प्रयाग में दुर्लभ
सर्वत्र सुलभा गंगा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा:।
गंगाद्वारे प्रयागे च गंगासागर संगमे।। गंगा जहाँ से प्रवाहित होती है, उन सभी स्थानों पर वह सुलभ है, किन्तु तीन स्थानों पर यह दुर्लभ है। मत्स्यपुराण ने कहा है कि गंगाद्वार अर्थात हरिद्वार, प्रयागराज तथा गंगा और सागर के संगम बिन्दु गंगासागर में इस गंगा को अत्यंत दुर्लभ कहा गया है। गंगा के इन तीर्थों को सर्वकालिक तीर्थ भी कहा गया है। कहा जाता है कि अन्य सभी तीर्थ कालक्रम में निर्मत होते हैं और नष्ट भी हो जाते हैं। किन्तु उपरोक्त तीनों तीर्थ राजा भागीरथ के प्रयत्न से निर्मित हुए अविनाशी तीर्थ हैं। इसीलिए इनकी महत्ता कालातीत भी है और लोकातीत भी।

प्रयाग और प्रयागराज
गंगा के विभिन्न पुण्यदायी नदियों से संगम को, जहाँ देवताओं और ऋषियों ने प्रकृष्ट याग (यज्ञ) करके उसको और पुण्यदायी बना दिया है, ऐसे अलौकिक संगम स्थलों को प्रयाग कहा गया है। पंच प्रयाग और चतुर्दश प्रयाग की चर्चा तो सर्वत्र सुलभ है, जनता को प्रचुरता में ज्ञात है, शास्त्रों में शोध करने से कुल तीस प्रयाग प्राप्त हुए हैं, इनमें तीसवाँ प्रयाग प्रयागराज के नाम से विख्यात है, इसे तीर्थराज भी कहा जाता है। यहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का पवित्र संगम है, यह मोक्षदायी है। यहाँ स्नान, दान, सत्संग, कल्पवास, मंत्रपाठ, वेदपाठ, अध्ययन, साधना करने से विद्याएँ और अभिलाषाएँ सिद्ध हो जाती हैं। लौकिक और पारलौकिक दोनों सिद्धियों को साधने में अतिशय सहायक है, यह प्रयागराज।
प्रयाग नष्ट नहीं होता
नरसिंहपुराण (65.17) में विष्णु को प्रयाग में योगमूर्ति के रूप में स्थित बताया गया है। मत्स्यपुराण (111.4-10) के अनुसार रुद्र द्वारा एक कल्प के उपरान्त प्रलय करने पर भी प्रयाग नष्ट नहीं होता। उस समय प्रतिष्ठान के उत्तरी भाग में ब्रह्मा छद्य वेश में, विष्णु वेणीमाधव रूप में तथा शिव वटवृक्ष के रूप में आवास करते हैं और सभी देव, गंधर्व, सिद्ध तथा ऋषि पाप- शक्तियों से प्रयागमण्डल की रक्षा करते हैं। इसीलिए मत्स्यपुराण (10.4.18) में तीर्थयात्री को प्रयाग जाकर एक मास निवास करने तथा संयमपूर्वक देवताओं और पितरों की पूजा करके अभीष्ट फल प्राप्त करने का विधान है।
प्रयागराज
प्रयाग-गङ्गा-यमुना के संगम स्थल प्रयाग को पुराणों (मत्स्य 109.15; स्कन्द, काशी. 7.45; पद्म 6.23. 27-35 तथा अन्य) में ‘तीर्थराज’ (तीर्थों का राजा) नाम से अभिहित किया गया है। इस संगम के सम्बन्ध में ऋग्वेद (10.75) में कहा गया है कि जहाँ कृष्ण (काल)े और श्वेत (स्वच्छ) जल वाली दो सरिताओं का संगम है, वहाँ स्नान करने से मनुष्य स्वर्गारोहण करता है। प्रजापति (ब्रह्मा) ने आहुति की तीन वेदियाँ बनायी थीं- कुरुक्षेत्र, प्रयाग और गया। इनमें प्रयाग मध्यम वेदी है। माना जाता है कि यहाँ गङ्गा, यमुना और सरस्वती पाताल से आने वाली तीन सरिताओं का संगम हुआ है। पर सरस्वती का कोई बाह्य अस्तित्व दृष्टिगत नहीं होता। मत्स्य (104.12) कूर्म (1.36.27) तथा अग्नि (111.6-7) आदि पुराणों के अनुसार, जो प्रयाग का दर्शन करके उसका नामोच्चारण करता है तथा वहाँ की मिट्टी का अपने शरीर पर आलेप करता है, वह पापमुक्त हो जाता है। वहाँ स्नान करने वाला स्वर्ग को प्राप्त होता है तथा देह त्याग करने वाला पुन: संसार में उत्पन्न नहीं होता। यह केशव को प्रिय (इष्ट) है। इसे त्रिवेणी कहते हैं। प्रयाग शब्द की व्युत्पत्ति वनपर्व (87.18-19) में यज् धातु से मानी गयी है। उसके अनुसार सर्वात्मा ब्रह्मा ने सर्वप्रथम यहाँ यजन किया था, आहुति दी थी, इसलिए इसका नाम प्रयाग पड़ गया।
प्रयाग की सीमा
पुराणों में प्रयाग- मण्डल, प्रयाग और वेणी अथवा त्रिवेणी की विविध व्याख्याएँ की गई हैं। मत्स्य तथा पद्मपुराण के अनुसार प्रयागमण्डल पाँच योजन की परिधि में विस्तृत है और उसमें प्रविष्ट होने पर एक-एक पद पर अश्वमेध यज्ञ का पुण्य मिलता है। प्रयाग की सीमा प्रतिष्ठान (झूंसी) से वासुकिसेतु तक तथा कंबल और अश्वतर नागों तक स्थित है। यह तीनों लोकों में प्रजापति की पुण्यस्थली के नाम से विख्यात है। पद्मपुराण (1.43-27) के अनुसार ‘वेणीÓ क्षेत्र प्रयाग की सीमा में 20 धनुष तक की दूरी में विस्तृत है। वहाँ प्रयाग, प्रतिष्ठान (झुंसी) तथा अलर्कपुर (अरैल) नाम के तीन कूप हैं। मत्स्य (110.4) और अग्नि (111.12) पुराणों के अनुसार वहाँ तीन अग्नि- कुण्ड भी हैं, जिनके मध्य से होकर गङ्गा बहती है। (वनपर्व) (85.81 और 85) तथा मत्स्य. (ल104.16-17) में बताया गया है कि प्रयाग में नित्य स्नान को ‘वेणी’ अर्थात् दो नदियों गङ्गा और यमुना का संगम स्नान कहते हैं। वनपर्व (85.75) तथा अन्य पुराणों में गङ्गा और यमुना के मध्य की भूमि को पृथ्वी का जघन या कटिप्रदेश कहा गया है। इसका तात्पर्य है पृथ्वी का सबसे अधिक समृद्ध प्रदेश अथवा मध्य भाग ।
ओम् कार स्वरूपा त्रिवेणी
गङ्गा, यमुना और सरस्वती के त्रिवेणी संगम को ‘कार’ नाम से अभिहित किया गया है। ‘ओंकार’ का ‘ओम्’ परब्रह्म परमेश्वर की ओर रहस्यात्मक संकेत करता है। यही सर्वसुखप्रदायिनी त्रिवेणी का भी सूचक है। ओंकार का अकार सरस्वती का प्रतीक, उकार यमुना का प्रतीक तथा मकार गङ्गा का प्रतीक है। तीनों क्रमश: प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा संकर्षण, हरि के व्यूह को उद्भूत करने वाली हैं। इस प्रकार इन तीनों का संगम त्रिवेणी नाम से विख्यात है (त्रिस्थलीसेतु, पृष्ठ 8)।
प्रयाग में नारी का भी क्षौरकर्म
क्षौर कर्म (शिरोमुंडन) भी प्रयाग में सम्पन्न होने पर पापमुक्ति का हेतु माना गया है। बच्चों और विधवाओं के क्षौर कर्म का विधान तो है ही, यहाँ तक कि सधवा पत्नियों के क्षौर कर्म का भी विधान ‘त्रिस्थलीसेतुÓ के अनुसार मिलता है। वहाँ बताया गया है कि सधवा स्त्रियों को अपने केशों की सुन्दर वेणी बनाकर, सभी प्रकार के केशविन्यास सम्बन्धी व्यंजनों से सजाकर पति की आज्ञा से (वेणी के अग्र भाग का) क्षौर कर्म कराना चाहिए। तत्पश्चात् कटी हुई वेणी को अंजली में लेकर उसके बराबर स्वर्ण या चाँदी की वेणी भी लेकर जुड़े हाथ से संगम स्थल पर बहा देना चाहिए और कहना चाहिए कि सभी पाप नष्ट हो जायें और हमारा सौभाग्य उत्तरोत्तर वृद्धि पर रहे। नारी के लिए एक मात्र प्रयाग में ही क्षौर कर्म कराने का विधान है।
नारी गर्भ और कुम्भ
वैदिक ऋषियों ने कुम्भ को नारी-गर्भ से भी समीकृत किया है। यजुर्वेद के अनुसार, योनि के भीतरी गर्भ में कुम्भ स्थित है, जो गर्भस्थ शिशु को धारण करता है। एक ऋक् से ज्ञात होता है कि यज्ञ के अवसर पर कुम्भ में बीज (रेत) सिंचन के पश्चात् उससे वशिष्ठ और अगस्त्य का प्रादुर्भाव हुआ। नारी गर्भ की रचना कुम्भ के सदृश माना गया है। जनक तनया सीता का जन्म स्वर्ण कलश से हुआ, यह सर्वविदित है। प्रयाग के संगम की भी रचना कुम्भ के सदृश माना गया है।
प्राणायाम और कुम्भ
प्राणायाम की कुम्भक-क्रिया में हृदय को कुम्भ मानकर बाहर की वायु खींचकर उसमें भरी जाती है। फेफड़े के असँख्य वायु कोश, जहाँ ऑक्सीजन को सोखने वाले रिसेप्टर्स होते हैं, ये ऑक्सीजन को सोखकर रक्त की हीमोग्लोबिन से उनका मेल कराते हैं। यह शरीर के अंदर की अमृतवर्षा और प्राण पोषण की एक प्रक्रिया है, उन वायु कोशों की रचना भी कुम्भ सदृश होती है। हलायुधकोश में महाभारत का उद्धरण देते हुए, कुम्भ करें शुद्धात्मा और विष्णु का पर्याय कहा है।
वेदों में कुम्भ
‘कुम्भ’ शब्द ऋग्वेद में पाँच से अधिक बार, अर्थववेद में दस बार और यजुर्वेद में अनेक बार आया है। देवालय के प्रतिमा प्रतिष्ठापन केन्द्र को गर्भगृह कहा जाता है, अर्थात् उसकी भी रचना गर्भ अर्थात् घट से समीकृत की जाती है। ब्रह्माण्ड की रचना को भी कुम्भ के सदृश ही माना गया है। पृष्ठ तनाव के कारण कमल के पत्ते पर जल की बून्दें भी कुम्भ सदृश आकृति ग्रहण करती हैं। पृथ्वी भी ऐसी ही आकृति ग्रहण करती है। ब्रह्माण्ड के सभी खगोलीय पिण्ड भी प्रकारान्तर से ऐसी ही आकृति ग्रहण करते हैं। सौरमंडल, अन्य तारामंडल, मंदाकिनी और अन्य आकाशगंगा भी कुम्भ सदृश आकृति ग्रहण करते हैं। पृथ्वी का परिक्रमण पथ भी कुम्भाकार है। ऐसी रचना पृथ्वी का जो भी भाग ग्रहण किया हुआ है, उनको द्वादश ज्योतिर्लिंग स्थल, 52 शक्तिपीठ स्थल, 108 विष्णुतीर्थ स्थल, कुम्भ स्थल और अन्य पवित्र तीर्थों के रूप में जाना जाता है। वेदों में कुम्भ को पुर्णपात्र के रूप में उद्धृत किया गया है। पूर्ण कलश यजमान के धनधान्य की पूर्णता का प्रतीक था। ”यजमान का कलश पूर्णत: भरा है, यह उसके लिए कल्याणप्रद हो।” कुम्भ का उपयोग घृत-अमृत और सोमरस रखने के लिए भी किया जाता था। कुम्भ में औषधी संग्रह और निर्माण भी किया जाता था। वेदों में कलश को समुद्रस्थ कहा जाना भी महत्वपूर्ण है।अथर्ववेद में पितरों के लिए ‘कुम्भ दान’ का उल्लेख है।
शाही स्नान
महाकुंभ के काल में सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है शाही स्नान। इस स्नान के समय अखाड़ों के साधु-संत विशेष शोभायात्रा के साथ संगम तक पहुंचते हैं और श्रद्धालुओं के बीच आस्था का केंद्र बनते हैं। शाही स्नान की परंपरा में सर्वप्रथम साधु-संत स्नान करते हैं, इसके उपरांत आम श्रद्धालु गंगा के पवित्र जल में डुबकी लगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि महाकुंभ के समय ग्रहों और नक्षत्रों की विशेष स्थिति के कारण संगम का जल चमत्कारी गुणों से भर जाता है। इसी कारण से शाही स्नान को अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। शाही सवारी, रथ, हाथी-घोड़े की सजावट, घंटा-बाजे, नागा-अखाड़ों के करतब और यहाँ तक की तलवार और बंदूक तक का प्रदर्शन होता है। श्रद्धालु जहाँ पुण्य कमाने की इच्छा लिए संगम पर पहुँचते हैं, वहीं साधुओं का दावा है कि वे कुंभ पहुंचते हैं गंगा को निर्मल करने के लिए। उनका कहना है कि गंगा धरती पर आने को तैयार नहीं थीं, जब संतों ने धरती को पवित्र किया, तब गंगा आईं।
अखाड़ों की स्थापना
माना जाता है कि आदि शंकराचार्य ने सदियों पहले बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रसार को रोकने के लिए अखाड़ों की स्थापना की थी। कहा जाता है कि जो शास्त्र से नहीं माने, उन्हें शस्त्र से मनाया गया। मूलत: 13 अखाड़े हैं। हाल ही में किन्नर अखाड़े को जूना अखाड़ा में शामिल कर लिया गया है। उक्त तेरह अखाड़ों के अंतर्गत कई उप-अखाड़े माने गए हैं। शैव पंथियों के 7, वैष्णव पंथियों के 3 और उदासीन पंथियों के 3 अखाड़े हैं। तेरह अखाड़ों में से जूना अखाड़ा सबसे बड़ा है। इसके अलावा अग्नि अखाड़ा, आह्वान अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, महानिर्वाणी अखाड़ा एवं अटल अखाड़ा आदि सभी शैव से संबंधित है। वैष्णवों में वैरागी, उदासीन, रामादंन और निर्मल आदि अखाड़ा है।
नागा और अन्य साधु
कुंभ में लोगों के आकर्षण का केन्द्र प्राय: नागा संत ही होते हैं, जो शैव अखाड़ों से संबंध रखते हैं। लेकिन तीन अखाड़े ऐसे भी हैं, जो वैष्णव मत से संबंध रखते हैँ। इन अखाड़ों में नागा संन्यासी नहीं होते। तीनों अखाड़े राम और कृष्ण के विभिन्न रूपों के उपासक हैं और हनुमान इनके मुख्य देवता हैं। वैष्णव अखाड़ों की सबसे बड़ी विशेषता इनका सेवा भाव है। सभी अखाड़ों में पूरे मेले भर भंडारे चलते हैं। इसके साथ ही कथा-प्रवचन होते रहते हैं। इन अखाड़ों का संगठन भी शैव अखाड़ों से थोड़ा अलग है। लेकिन इनसे जुडऩा आसान है। तुलसी की प्रधानता वाले इन अखाड़ों में शालीनता भी देखने को मिलती है। वैष्णव अखाड़ों के स्कूल और अस्पताल भी चलते हैं। उदासीन और निर्मला अखाड़े भी वैष्णव अखाड़ों से समानता रखते हैं और वैष्णव अखाड़े इन्हें अपना अंग मानते हैं। अखाड़ा साधुओं का वह दल है जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है.
अखाड़ा परिषद
1954 के कुंभ में मची भगदड़ के बाद, टकराव और अव्यवस्था को टालने के लिए अखाड़ा परिषद की स्थापना की गई, जिसमें सभी 13 मान्यता-प्राप्त अखाड़ों के दो-दो प्रतिनिधि होते हैं, और आपस में समन्वय का काम इसी परिषद के माध्यम से होता है।





