हरि मंगल
वरिष्ठ पत्रकार
प्रकृति के उद्भव काल से प्रयागराज को ‘पावन स्थली’ की मान्यता है। पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार समय समय पर देवी-देवता, साधु-संत यहां यज्ञ, तप, अनुष्ठान करके इसका मान बढ़ाते रहे हैं। स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी द्वारा यहां गंगा तट पर दस अश्वमेघ यज्ञ किए जाने का उल्लेख धर्म ग्रंथों में है, जिसकी स्मृति में दशाश्वमेध घाट बना हुआ है। आज भी काशी और बैजनाथ धाम में भगवान भोले शंकर को जलाभिषेक के लिए जाने वाले श्रद्धालु इसी घाट से गंगा जल लेकर जाते हैं। प्रयाग, त्रिवेणी संगम और माघ मास के महत्व के बीच कुंभ और महाकुंभ के बढ़ते आध्यात्मिक प्रभाव ने इसे मनोकामना सिद्ध तीर्थ स्थल के रुप में चर्चित किया है। इस कारण यह तीर्थ धर्म के साथ—साथ सनातन धर्म से जुड़े सामाजिक सरोकार के आयोजन का केन्द्र बन गया है।
भारत में पहले मुगलों फिर अंग्रेजों के चले लम्बे शासनकाल में हिन्दू धर्मानुयायियों पर अनवरत होते अत्याचार और उत्पीडऩ ने सनातन धर्म से जुड़े सामाजिक सरोकारों की गतिविधियों पर विराम लगा दिया था। हिन्दुओं के पास कहीं कोई ऐसा मंच और स्थान नहीं था, जहां वे अपने धर्म,संस्कृति और समाज के बारे में बैठ कर चिंतन, मनन कर सकें। आजादी के बाद खुले माहौल में सांस लेने के बाद धर्माचार्यों के साथ ही समाज सेवा से जुड़े लोगों ने अलग—अलग मंच बना कर लोगों को संगठित करने और जन—जन की आवाज उठाने के लिए कुछ राष्ट्रवादी संस्थाओं ने प्रयागराज के कुंभ, महाकुंभ और माघ मेले को अवसर के रूप में चुना। कारण यही था कि एक साथ इतनी बड़ी संख्या में हिन्दू धर्माचार्य और हिन्दू धर्मानुयायियों का समागम कहीं सम्भव नहीं है। त्रिवेणी के तट पर राष्ट्रवादी संगठनों का उदय, सनातन समाज के विश्व स्तरीय सम्मेलन और जन—जन के आराध्य प्रभु श्रीराम के मन्दिर निर्माण का संकल्प पारित हुआ, जो मूर्त रूप लिया और देश—विदेश में हिन्दू समाज गौरवान्वित हुआ। त्रिवेणी तट का कुंभ पर्व या माघ मेला तमाम ऐतिहासिक घटनाओं का मूक दर्शक या गवाह है।
प्रथम विश्व हिन्दू सम्मेलन
आजादी के बाद दूसरे प्रयाग महाकुंभ 1966 के अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद द्वारा मौनी अमावस्या पर 22, 23 एवं 24 जनवरी, 1966 को त्रिवेणी तट पर विशाल विश्व हिन्दू सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में चारों पीठ के शंकराचार्य, सभी सम्प्रदाय, पंथ से जुड़े धर्माचार्य, संत तुडके जी महराज, मैसूर आश्रम के ब्रह्मचारी दत्तमूर्ति जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी उपस्थित थे। दूसरी ओर हिन्दू जनमानस का सैलाब उमड़ पड़ा था। परिषद की ओर से लगभग 50 हजार लोगों के लिए व्यवस्था की गई थी, लेकिन कार्यक्रम में यह संख्या लगभग 75 हजार तक पंहुच गई। दक्षिण—पूर्व एशिया के देशों, अफ्रीका, अदन, श्रीलंका,मॉरीशस, फीजी, त्रिनिनाद, अमेरिका, ब्रिटेन, थाईलैंड़ आदि देशों से बड़ी संख्या में लोग आए थे। नेपाल के महाराजाधिराज महेन्द्रवीर विक्रमशाह देव के प्रतिनिधि के रुप में त्रिभुवन विश्वविद्यालय के कुलपति रुद्रराज पांडेय तथा प्रधानमंत्री तुलसी गिरि पधारे। इस आयोजन की अध्यक्षता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के भाई और अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति राम प्रसाद मुखर्जी ने की थी। इस ऐतिहासिक सम्मेलन में संतों के आशीर्वाद और उपस्थित जन समुदाय की सहमति पर विश्व हिन्दू परिषद को स्थाई रूप देने का निर्णय किया गया।
द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन
विश्व हिन्दू परिषद द्वारा प्रयाग में त्रिवेणी तट पर 1979 में 25 से 27 जनवरी तक द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें देश—विदेश लगभग एक लाख प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन का उद्घाटन बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने किया था। दलाई लामा का स्वागत जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी शान्तानंद जी ने किया था। सनातन धर्म के इतिहास की यह अनूठी घटना बौद्ध मत और सनातन धर्म की एकात्मकता की प्रतीक थी। स्वयं दलाई लामा ने अपने उद्बोधन में कहा कि हिन्दू सम्मेलन में उनका उपस्थित होना असंगत सा प्रतीत होता है, लेकिन उदार दृष्टि से देखा जाए तो यह असंगत नहीं है, क्योंकि इस सम्मेलन में हिन्दू तथा भारत वर्ष में उद्भुत सभी मत—पंथ के अनुयायी सम्मिलित हुए हैं। इसमें 18 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे। सम्मेलन में धर्माचार्यों की सहमति से 13 प्रस्ताव पारित हुए थे, जिनमें हिन्दुओं की अल्पसंख्या वाले क्षेत्रों में सुरक्षा, मठ मन्दिरों की सुरक्षा, देश—विदेश के हिन्दुओं के हितों के संरक्षण, गोवंशों की रक्षा जैसे प्रमुख मुद्दे शामिल थे।
तृतीय विश्व हिन्दू सम्मेलन
प्रयाग अर्ध कुंभ 2007 के अवसर पर 11 से 13 फरवरी तक तृतीय विश्व हिन्दू सम्मेलन का आयोजन हुआ। इसका उद्घाटन शंकराचार्च स्वामी सत्यमित्रानंद जी ने किया था और अध्यक्षता की थी शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने। इसके लिए गंगा तट पर 350 एकड़ में गुरु गोलवलकर नगर बसाया गया था। इसके लिए 3 लाख लोगों को आमंत्रित गया था। इस सम्मेलन में विदेशों से भी बड़ी संख्या में प्रतिनिधि आए। इसमें बांग्लादेश और भूटान से आए प्रतिनिधियों ने अपने यहां हो रही हिन्दुओं की दुर्दशा पर पूरे विश्व का ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास किया। कार्यक्रम में संत समाज के अतिरिक्त प्रमुख लोगों में सरसंघचालक श्री कुप्.सी. सुदर्शन और विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अशोक सिंघल जी शामिल थे।
धर्म संसद
प्रयाग कुंभ 1989 में 01 फरवरी को तृतीय धर्म संसद का आयोजन किया गया। आयोजन में उपस्थित धर्माचार्यों, संतों, विचारकों द्वारा श्रीराम जन्म भूमि मन्दिर का शिलान्यास 9, 10 नवम्बर, 1989 को करने का आदेश दिया गया। संतों के समक्ष राम मन्दिर का मॉडल भी रखा गया, जिसे संतों ने स्वीकार किया। यद्यपि बाद में इसमें कुछ संशोधन किया गया। इसी धर्म संसद में प्रत्येक ग्राम से एक रामशिला पूजन और प्रत्येक हिन्दू से सवा रुपया भेंट स्वरूप लेने की रूपरेखा तय की गई। श्रीराम मन्दिर निर्माण की दिशा में यह धर्म संसद मील का पत्थर साबित हुई। इस धर्म संसद की अध्यक्षता कांची कामकोटि पीठ के जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती द्वारा की गई और मार्गदर्शन के लिए परमपूज्य देवरहा बाबा उपस्थित थे। यह एक महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि देवरहा बाबा किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में भागीदारी नहीं करते थे।
तृतीय धर्म संसद में संतों ने राम मन्दिर सहित कुल 9 प्रस्ताव पारित किए, जिसमें इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयाग करने तथा अकबर के किले में स्थित अक्षयवट को आम श्रद्धालुओं के लिए खोले जाने का प्रस्ताव शामिल था। उस समय असंभव से लगने वाले ये दोनों प्रस्ताव प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के दृढ़ संकल्प के चलते अब पूर्ण हो गए हैं।
मंदिर निर्माण की घोषणा
प्रयाग के माघ मेले में 27-28 जनवरी, 1990 को आयोजित संत सम्मेलन में पहली बार संतों ने श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण के लिए 14 फरवरी, 1990 का शुभ मुहूर्त निकाल कर निर्माण का कार्य प्रारम्भ करने का आदेश दिया था।
हट गई सरकार
1991 के प्रयाग माघ मेले में संतों का एक विशाल सम्मेलन हुआ, जिसमें संतों ने तत्कालीन मुलायम सरकार द्वारा श्रीराम जन्मभूमि की कारसेवा के लिए अयोध्या गए लाखों कारसेवकों पर 2 नवम्बर, 1990 को अंधाधुंध गोलियां चलवाए जाने को क्रूरतम घटना बताते हुए कहा कि सरकार झुके या हटे। संतों की नाराजगी ऐसी फलीभूत हुई कि कुछ माह बाद चुनाव में मुलायम सिंह को सत्ता से बाहर होना पड़ा और प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में भाजपा सरकार का गठन हुआ। इसी मेले में मकर संक्रान्ति के दिन संतों द्वारा 22 हुतात्मा कारसेवकों की अस्थियों का विसर्जन संगम में किया गया।
9वीं धर्म संसद
राम मन्दिर निर्माण के लिए चल रहे संघर्ष को धार देने के लिए प्रयाग कुंभ 2001 में 19, 20 एवं 21 जनवरी को 9वीं धर्म संसद का आयोजन संगम तट पर हुआ। इस कार्यक्रम में अपार जन समूह के साथ लगभग 6000 धर्माचार्य और साधु—संतों की उपस्थिति रही। धर्म संसद द्वारा प्रस्ताव पारित किया गया कि सरकार 12 मार्च महाशिवरात्रि तक मन्दिर निर्माण की समस्त बाधाओं को दूर करे, ताकि उसके बाद किसी शुभ मुहूर्त में मन्दिर निर्माण कार्य प्रारम्भ हो सके। इस कार्यक्रम में धर्मांतरण पर प्रतिबंध और गोवंश की रक्षा सहित 7 प्रस्ताव पारित हुए थे। इस कुंभ में जयपुर के विजय टूडी द्वारा थर्मोकोल से निर्मित राम मन्दिर का प्रारूप आम जनता के दर्शनार्थ रखा गया था। कुंभ के बाद इसे अयोध्या के कारसेवकपुरम ले जाया गया।
11वीं धर्म संसद
प्रयाग माघ मेले में 1 और 2 फरवरी, 2006 को 11वीं धर्म संसद का विशेष अधिवेशन आहूत किया गया था, जिसमें सरकार से आग्रह किया गया कि वह 2007 के अर्धकुभ से पहले श्रीराम जन्मभूमि परिसर राम जन्मभूमि सेवा न्यास को सौंप दे, ताकि मन्दिर निर्माण का कार्य हो सके। इस संसद में गंगा रक्षा और मठ मन्दिरों की सुरक्षा और स्वायत्तता का मुद्दा भी छाया रहा।
12वीं धर्म संसद
अर्ध कुंभ 2007 में 16 तथा 17 जनवरी को 12 वीं धर्म संसद आयोजित हुई, जिसमें संतों ने सरकार को चेताया कि वह मन्दिर निर्माण के लिए कानून बनाए। संतों ने उसी समय स्पष्ट कर दिया था कि अयोध्या की शास्त्रीय सीमा में किसी भी मस्जिद का निर्माण नहीं होने देंगे। इस धर्म संसद में कुल दो प्रस्ताव, श्रीराम जन्म भूमि पर मन्दिर निर्माण और हिन्दुओं की एकता पारित किया गया था। उसी समय विहिप अध्यक्ष ने हिन्दू समाज का आह्वान किया कि वह सेकुलर सरकारों को उखाड़ फेंके तभी हिन्दुओं के मान बिन्दुओं की रक्षा होगी।
प्रयाग कुंभ 2013
प्रयाग कुंभ 2013 में विहिप के केन्द्रीय मार्गदर्शक मंडल की बैठक और धर्म संसद में श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर निर्माण के अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार—विमर्श और गहन मंथन हुआ। वह मुद्दा था अगले वर्ष यानी 2014 के चुनाव में हिन्दू हितों की सरकार का गठन और उसका नेतृत्व। इसी बैठक में सनातनधर्मियों के अनुकूल सरकार लाने और उसका नेतृत्व श्री नरेन्द्र मोदी को सौपे जाने पर संत समाज, संघ और विहिप में सहमति बनी थी। त्रिवेणी तट पर हुआ यह निर्णय मात्र 15 माह की अवधि में साकार हो गया।
प्रयाग महाकुंभ 2025
12 वर्ष के लम्बे अंतराल के बाद एक बार फिर विभिन्न धर्म, पंथ और सम्प्रदाय से जुड़े धर्माचार्य, साधु-संत, नागा, संन्यासी, अखाड़े सब प्रयाग के त्रिवेणी तट पर एकत्र हैं। धार्मिक कार्यक्रमों के साथ—साथ उनका ध्यान सनातन समाज की आवश्यकताओं पर भी है। महाकुंभ में पहुंचे अधिकांश साधु—संत, बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार, तिरुपति मन्दिर के प्रसाद में जानवरों की चर्बी तथा मछली के तेल की मिलावट और तमाम मुस्लिम युवकों द्वारा खाने ,नाश्ते, जूस इत्यादि में मल मूत्र, थूक या अन्य आपत्ति—जनक सामग्री मिलाने की घटना को लेकर आक्रोशित हैं। अखाड़ों से जुड़े धर्माचार्य सनातन बोर्ड के गठन को लेकर गम्भीर हैं। कहा जा रहा है कि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद मौनी अमावस्या के आसपास एक धर्म संसद का आयोजन करेगा, जिसमें चारों शंकराचार्यों सहित सभी धर्म, पंथ, सम्प्रदाय और विचारधारा से जुड़े साधु—संतों के साथ सभी 13 अखाड़ों के प्रमुख संतों को आमंत्रित किया जाएगा। इसी संसद में सनातन धर्म के वैभव को बचाए रखने के लिए जिन प्रमुख प्रस्तावों पर विचार किया जाना है उनमें सनातन बोर्ड के गठन का प्रस्ताव सर्वोपरि है। संतों की सहमति से पारित प्रस्ताव को केन्द्र और राज्य सरकारों को भेजा जाएगा। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवीन्द्र पुरी ने कहा है कि सनातन बोर्ड देश भर के सभी मठ—मन्दिरों की सारी व्यवस्थाओं की देखरेख, करेगा ताकि सनातन धर्म और धर्मावलम्बियों की सुरक्षा हो सके।
मात्र 6 दशक के ये महत्वपूर्ण संकल्प बताते हैं कि प्रयाग का त्रिवेणी तट उद्भव काल से अनगिनत धार्मिक संकल्पों का साक्षी है। हमारे धर्माचार्य सनातन धर्म के वैभव को गौरवपूर्ण और अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए सभी कालखंडों में समर्पित रहे हैं। संत समाज यज्ञ, तप और अनुष्ठान के साथ ही इस परम्परा का निर्वहन उसी प्रकार करता आ रहा है जैसे गंगा,यमुना जैसी पावन नदियों ने युगों—युगों से मानव कल्याण के लिए तमाम झंझावातों से जूझते हुए अपने अविरल प्रवाह को अक्षुण्ण रखा है। ह्व





