श्रीराम धर्म के विग्रह हैं-धर्म के मूर्तमान स्वरूप। किस धर्म के विग्रह? महाभारत का कथन है- जो वेद में है वही धर्म है, अन्य नहीं- यश्च वेद: स वै धर्म:। श्रीराम वेद धर्म के विग्रह हैं। श्रीराम ने वेद धर्म को चरित्रार्थ किया है। वेद धर्म क्या है? देवों ने सृष्टि रूपी यज्ञ किया, उसका अनुसरण कर ऋषियों ने यज्ञ किया। यज्ञेनयजमयन्यत देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। (ऋग्. 10.90.16)। उस यज्ञ में वसंत ऋतु घृत बना, ग्रीष्म ऋतु इंधन हुआ और उससे शरद हवि उत्पन्न हुआ। इस यज्ञ विधि को ऋत कहा जाता है। देवता कौन हैं? अग्नि, वायु, जल आदि को सनातन देवता कहा जाता है। देवों का यज्ञ ही सृष्टि है। यह यज्ञ समाप्त नहीं हुआ है, सृष्टि सतत विद्यमान है। इसमें सत्य और ऋत प्रतिष्ठित है, इससे प्रथम धर्म व्यक्त होता है, अर्थात सृष्टि रूपी देव यज्ञ के तदनुकूल कर्म करना ही धर्म है। यही धर्म पृथ्वी को धारण करता है, इसी धर्म में सूर्य तपता है, वायु बहती है, इसी धर्म में सभी प्रतिष्ठित हैं-
यज्ञ रूपी सृष्टि में सर्वत्र परमात्म सत्ता व्याप्त है। सर्वत्र व्याप्त परमात्म सत्ता को पुरुष कहा गया- पुरे शेते इति पुरुष:। पुर में सोये हुए सर्वत्र व्याप्त पुरुष का दूसरा संबोधन विष्णु है। विष्णु का अर्थ है- जो सभी अस्तित्वों में प्रविष्ट है, जो सर्वात्मक है। यही विष्णु संतों के घट- घट व्यापी राम है, सबै घट राम बोले। वेद धर्म की दृष्टि में पिण्ड देह ब्रह्माण्ड का ही आणविक रूप है। वही विराट पुरुष विष्णु महत्तम है और वही लघुतम।
यज्ञपुरुष विष्णु विश्वरूप है। दशसंख्यक विराट ही विश्व है। ध्यान रहे, विश्व ‘वर्ड’ नहीं है, विश्व दिव्य सत्ता है। विश्व की आत्मा सूर्य है, इसका मन चन्द्रमा है। विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के विश्वरूप में ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में वर्णित विराट पुरुष का दर्शन होता है-
कामिल बुल्के आदि वेद विरोधी अध्येता रामकथा पर कार्य करते हुए श्रीराम को उनके विष्णु स्वरूप से अलग करने का कुत्सित प्रयास करते हैं। उन्हें ज्ञात नहीं है कि रामायण वेद का उपबृंहण है और श्रीराम विष्णु के मानुषी अवतार हैं। आदि कवि ने वेद का उपबृंहण करने के लिए रामायण की रचना की है।
वेद के उपबृंहण का आशय है- वेदार्थ का विस्तार करना। रामायण वेद को लोक मानस के लिए कैसे विस्तार देती है? यह विषय रामायण के शिल्प विधान से लेकर कथायोजन में सर्वत्र है।
नारायण की परम सत्ता के समानान्तर रामायण का सृजन हुआ है। इसीलिए रामायण के महात्म्य के संदर्भ में नारायण के समान ही रामायण शब्द मात्र का उच्चारण भी सर्व फलप्रद है। मनुष जब ‘रामायण’ नाम का उच्चारण करता है, वह सभी प्रकार के पापों से निर्मुक्त होकर विष्णु लोक वैकुण्ठ को प्राप्त कर लेता है।
आदिकवि ने सृष्टि के समानान्तर रामायण का प्रबन्धन किया है। उन्होंने कहा है, जबतक इस धरती पर पर्वत और सरिता है।
ऋतेनादित्यस्तिष्ठन्ति दिवि सोमोअधिश्रित:। (ऋग्. 10.85.1)
पृथ्वी को आकाश में सत्य ने धारण किया है, द्यौलोक को सूर्य ने धारण किया है, आदित्य को ऋत ने धारण किया है, सोम द्युलोक में ऊपर अवस्थित है। इस वेदवाणी का उपबृंहण श्री राम के वचनों में हुआ है।
श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा- संसार में धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है, धर्म में ही सत्य प्रतिष्ठित है। पिता का वचन भी धर्मयुक्त होने के कारण परम उत्तम है। श्रीराम वेद-वेदांग के तत्त्ववेता और धनुर्वेद में प्रवीण हैं। धनूर्वेद यजुर्वेद का उपवेद है।
श्रीराम वेदज्ञ हैं और अयोध्या की प्रजा वेद धर्म की अनुगामिनी। अयोध्या में ऐसा कोई नहीं था, जो अग्निहोत्र और यज्ञ न करता हो। ऐसे लोग अयोध्या में नहीं रहते थे, जो क्षुद्र हो, चोर हो, सदाचार रहित हो अथवा वर्णसंकर हो।
उस श्रेष्ठ नगर में निवास करनेवाले सभी मनुष्य दीर्घायु थे, सत्य और धर्म का पालन करते थे, सदा पुत्र- पौत्र, स्त्री सहित परिवार में सुखी रहते थे।
ये सभी वैदिक राज्य के लक्षण हैं। आदिकवि ने लिखा है- जैसे चन्द्रमा नक्षत्र लोक पर शासन करते हैं, उसी प्रकार महातेजस्वी महाराजा दशरथ अयोध्यापुरी पर शासन करते थे। उन्होंने अपने सभी शत्रुओं को नष्ट कर दिया था।
नक्षत्रों पर चन्द्रमा का शासन ही शाश्वत राज्य है। यही वैदिक राज्य का आधार है जिसकी अभिव्यक्ति रामराज्य में होती है। कृतयुग के समान इस राज्य में प्रजा सदा प्रमुदित रहती है- नित्य प्रमुदिता: सर्वे यथा कृत युगे तथा। महाभारत के अनुसार कृतयुग में न राज्य था, न राजा, न दण्ड देने वाला था, न दण्डित होने वाला। समस्त प्रजा धर्म द्वारा परस्पर रक्षित थी।
स्वयं श्रीराम वेद धर्म के मूर्तमान स्वरूप हैं और उनका राज्य वैदिक राज्य है अर्थात धर्मराज्य है, जिसमें न भूख है, न भय है, न तस्कर हैं, न अन्याय। नगर और राष्ट्र धन-धान्य से भरपूर हैं।
श्रीराम के राज्य की पुनरावृत्ति धरती होती रहे, जिसमें धर्म का कल्पतरु हो, आत्मानुशासन ही शासक हो। माता सीता का कथन है- धर्म से अर्थ होता और धर्म से ही सुख होता है। धर्म से सब कुछ प्राप्त होता है, धर्म सब का सार है।
कहना आवश्यक नहीं कि धर्म का बोध यज्ञ संस्था से विकसित हुआ है। इसकी प्रतीति वेद से होती है। सृष्टिकारी देव शक्तियाँ इसी धर्म का पालन करती हैं। धर्म रहित अर्थ को अर्थ नहीं, अनर्थ कहा जाता है।
आज के विश्व में धर्म का अभाव है, अनर्थकारी समृद्धि का वर्चस्व है, जिससे विश्व जीवन सर्वनाश की ओर बढ़ता जा रहा है। धर्म के नाम पर कपटी मुनि का पाखण्ड फैला हुआ है, स्वयं कपटी मुनि के भीतर शांति नहीं, हाहाकार है।
तुलसी बाबा ने अपने युग के कपटी मुनि को देखा था, उसने राजा प्रतापभानु को धर्म से विचलित कर दिया था। धर्म रहित राजा का राज्य विनष्ट हो गया था। आज के युग में भी धर्म से विचलित करने वाले कपटी मुनि छाए हुए हैं।





